कुतूहल अध्याय 2 खोजें, अभिकल्पित करें और चर्चा करें

अद्यतन2026-09-05

प्र1.
भारत में बायोगैस उत्पादन का एक लंबा इतिहास रहा है। हमारे सबसे पुराने बायोगैस संयंत्रों में से एक 1850 के दशक के अंत में स्थापित किया गया था। भारत सरकार के नवीन एवं नवीकरणीय ऊर्जा मंत्रालय द्वारा आरंभ किए गए बायोगैस कार्यक्रम के विषय में सूचनाएँ एकत्र कीजिए।
उत्तर

पहले वही याद कीजिए जो अध्याय बता चुका है, फिर कार्यक्रम की जानकारी जुटाइए। बायोगैस गैसों का वह मिश्रण है जो कुछ जीवाणु ऑक्सीजन रहित वातावरण में पादप और जंतु अपशिष्ट अथवा घरेलू अपशिष्ट जल को विघटित करते समय निर्मुक्त करते हैं। यह मुख्यत: मीथेन और कार्बन डाइऑक्साइड से बनी होती है और खाना पकाने, तापन, बिजली उत्पादन तथा वाहन चलाने के लिए ईंधन के रूप में उपयोग की जाती रही है।

कहाँ देखें: भारत सरकार के नवीन एवं नवीकरणीय ऊर्जा मंत्रालय की वेबसाइट और वार्षिक प्रतिवेदन; अपने ज़िले का कृषि या ग्रामीण विकास कार्यालय; पास का कोई गाँव जहाँ बायोगैस संयंत्र चल रहा हो।

क्या पता लगाएँ और अभिलेखित करें —

  • वर्तमान राष्ट्रीय बायोगैस कार्यक्रम का नाम और वह किस वर्ष आरंभ हुआ।
  • एक परिवार को किस आकार का संयंत्र मिलता है, उसमें क्या डाला जाता है (गोबर, रसोई का कचरा, कृषि अपशिष्ट) और वह प्रतिदिन कितनी गैस देता है।
  • संयंत्र बनवाने पर सरकार कितनी वित्तीय सहायता देती है और कौन पात्र है।
  • आपके राज्य में कितने संयंत्र लगे हैं और पिछले कुछ वर्षों की प्रवृत्ति क्या रही।
  • गैस निकल जाने के बाद बची स्लरी का क्या किया जाता है।
बायोगैस संयंत्र एक साथ दो समस्याएँ क्यों हल करता है: जो अपशिष्ट भीतर डाला जाता है वह अन्यथा खुले में सड़कर परेशानी बनता। बंद संयंत्र के भीतर वही सड़न उन जीवाणुओं से होती है जो ऑक्सीजन के बिना रहते हैं, और वे जो गैस निर्मुक्त करते हैं वह व्यर्थ जाने के बजाय एकत्र कर ली जाती है। जो पदार्थ शेष बचता है वह पहले ही विघटित हो चुका होता है — वही खाद है। अत: एक ही अपशिष्ट से संयंत्र ईंधन भी देता है और उर्वरक भी, इसीलिए यह ग्रामीण परिवार के लिए इतना उपयुक्त है।
प्रतिवेदन के लिए संकेत: उसमें एक स्थानीय तथ्य जोड़िए — अपने ही ब्लॉक में लगे संयंत्रों की संख्या, या पास के किसी संयंत्र का चित्र — और एक स्पष्ट आरेख कि गोबर कहाँ से भीतर जाता है, गैस ऊपर से कैसे निकलती है और स्लरी दूसरे सिरे से कैसे बाहर आती है।
प्र2.
भारत के कुछ भागों में किण्वित सोयाबीन और बाँस के किण्वित प्ररोह जैसे किण्वित खाद्य पदार्थ पारंपरिक भोजन के रूप में खाए जाते हैं। अपने माता-पिता और शिक्षकों की सहायता से अपने क्षेत्र के कुछ पारंपरिक खाद्य पदार्थों की सूची बनाएँ जो किण्वन प्रक्रिया का उपयोग करते हैं। इन किण्वित खाद्य पदार्थों को तैयार करने में प्रयुक्त सामग्री, इन्हें तैयार करने की विधि, भोजन के किण्वन के लिए उत्तरदायी सूक्ष्मजीव एवं किण्वित भोजन के सांस्कृतिक और पोषण संबंधी महत्त्व के विषय में पता लगाइए।
उत्तर

पहले सूची बनाइए, और प्रत्येक खाद्य पदार्थ के लिए वे चारों बातें अभिलेखित कीजिए जो प्रश्न माँगता है — सामग्री, विधि, सूक्ष्मजीव, तथा सांस्कृतिक या पोषण संबंधी महत्त्व।

नमूना सूची (अपने क्षेत्र के व्यंजन इसमें जोड़िए) —

खाद्य पदार्थमुख्य सामग्रीसंक्षेप में विधिमुख्य रूप से उत्तरदायी सूक्ष्मजीव
दहीदूध + एक चम्मच पुराना दहीदूध गुनगुना कीजिए, जामन डालिए, रातभर गरम स्थान पर रखिएलैक्टोबैसिलस और अन्य जीवाणु
इडली और दोसाचावल और उड़द दाल, नमकभिगोकर पीसिए, घोल को गरम स्थान पर तब तक रखिए जब तक वह फूल न जाएलैक्टोबैसिलस, साथ में यीस्ट
भटूरामैदा, दही या खमीरगूँधकर ढके हुए आटे को गरम स्थान पर रखिएलैक्टोबैसिलस अथवा खमीर
पावरोटी, केक, पेस्ट्रीआटा/मैदा, चीनी, खमीरगुनगुने पानी से गूँधकर आटे को फूलने दीजिएखमीर (एक कवक)
कांजीकाली गाजर या चुकंदर, राई, नमक, जलमर्तबान को कुछ दिन धूप में रखिए जब तक वह खट्टा न हो जाएलैक्टिक अम्ल बनाने वाले जीवाणु
बाँस के किण्वित प्ररोह (सोइबम, बाँस का अचार)कोमल बाँस के प्ररोह, नमककतरकर ढके पात्र में कसकर भरिए और सप्ताहों तक रहने दीजिएलैक्टिक अम्ल बनाने वाले जीवाणु
किण्वित सोयाबीन (किनेमा, तुंगरिम्बाई, एक्सोने)उबले सोयाबीनगरम उबले बीजों को लपेटकर एक से तीन दिन तक गरम स्थान पर रखिएबैसिलस समूह के जीवाणु
किण्वित हरी पत्तियाँ और मूली (गुंद्रुक, सिनकी)सरसों या मूली के पत्ते, मूलीमुरझाकर पात्र में बिना हवा के दबाइए, किण्वन के बाद सुखा लीजिएलैक्टिक अम्ल बनाने वाले जीवाणु

सांस्कृतिक और पोषण संबंधी महत्त्व, जिस पर लिखना है: किण्वित खाद्य पदार्थ मूल सामग्री की तुलना में कहीं अधिक समय तक चलते हैं, जो रेफ्रिजरेटर से पहले के समय में अत्यंत महत्त्वपूर्ण था और पहाड़ी क्षेत्रों में सर्दियों में आज भी है; ये पचने में सरल होते हैं; किण्वन ही इन्हें उनका विशिष्ट खट्टा स्वाद और गंध देता है; और इनमें से प्रत्येक व्यंजन किसी विशेष समुदाय और ऋतु से जुड़ा है, इसलिए विधि परिवारों में पीढ़ी-दर-पीढ़ी चलती है।

इन सब में वास्तव में हो क्या रहा है: सूक्ष्मजीव भोजन की शर्करा या स्टार्च पर पल रहा है। ऐसा करते हुए वह पीछे एक उपोत्पाद छोड़ता है — दही, कांजी और बाँस के प्ररोह में लैक्टिक अम्ल, इडली के घोल और आटे में कार्बन डाइऑक्साइड। अम्ल खट्टा स्वाद देता है और चूँकि अधिकांश खराब करने वाले जीव अम्लीय भोजन में नहीं पनप सकते, वही उसे सुरक्षित भी रखता है। इसीलिए किण्वन पकाने की भी विधि है और भंडारण की भी।
संकेत: विधि के लिए परिवार के किसी बुज़ुर्ग से बातचीत कीजिए — विशेष रूप से कितने समय और किस स्थान पर रखते हैं यह पूछिए, और आप पाएँगे कि वे ठीक वही गरमाहट और नमी बता रहे हैं जो सूक्ष्मजीव को चाहिए।
प्र3.
एक आवर्धक काँच और सूक्ष्मदर्शी का उपयोग करके एक वृहत कवक मशरूम के विभिन्न भागों का अध्ययन कीजिए। उच्च कक्षाओं के विद्यार्थियों से सहायता लीजिए एवं अपने विद्यालय की प्रयोगशाला में सूक्ष्मदर्शी के द्वारा मशरूम के विभिन्न भागों की आंतरिक संरचना का अवलोकन कीजिए।
उत्तर

किस क्रम में क्या देखना है —

भागनग्न आँख और आवर्धक काँच सेसूक्ष्मदर्शी से
टोपी (कैप)छाते जैसा ऊपरी भाग; रंग देखिए और यह भी कि सतह चिकनी है या शल्कीयमहीन तंतुओं का सघन रूप से जमा हुआ पुंज
गिल (टोपी के नीचे)पहिये की तीलियों की भाँति डंठल से किनारे तक जाती पतली पट्टियाँसतह पर सूक्ष्म बीजाणु; जल में आरोपित एक टुकड़ा इन्हें स्पष्ट दिखा देता है
डंठलवह तना जो टोपी को थामे रहता है; तोड़कर देखिए कि यह पादप तने की तरह खोखला नहीं हैलंबाई में चलते लंबे तंतु
आधार / कवकजालनीचे की ओर महीन सफ़ेद रुई जैसे तंतु जो उस पदार्थ में फैले हैं जिस पर मशरूम उगा हैपर्णहरित हीन शाखित तंतु — ठीक वही विवरण जो तालिका 2.2 में कवकों के लिए दिया है

बीजाणु-छाप — अवश्य कीजिए: डंठल काटकर हटा दीजिए, टोपी को गिल वाली ओर से सफ़ेद कागज़ पर रखिए, कटोरे से ढककर रातभर छोड़ दीजिए। सुबह टोपी उठाइए — कागज़ पर गिलों के आकार में महीन चूर्ण की आकृति बनी मिलेगी। यही चूर्ण बीजाणु हैं। इसमें से थोड़ा सूक्ष्मदर्शी से देखिए।

मशरूम में हरा रंग क्यों नहीं होता: मशरूम एक कवक है। कवक की कोशिकाओं में कोशिका भित्ति तो होती है परंतु हरित लवक नहीं होते, अत: मशरूम प्रकाश संश्लेषण द्वारा अपना भोजन स्वयं नहीं बना सकता। उसे पुआल, लकड़ी या अपक्षयित पदार्थ पर उगकर उसे विघटित करते हुए भोजन लेना पड़ता है — इसीलिए मशरूम सड़ते लट्ठों और नम खाद में मिलते हैं, और इसीलिए वे भी तालिका 2.2 की फफूँदियों की भाँति विघटनकर्ता हैं।
संकेत: अध्ययन के लिए बाज़ार से खरीदा हुआ अथवा शिक्षक द्वारा दिया गया मशरूम ही लीजिए, और पुस्तक के मृदा वाले निर्देश की भाँति उसे चम्मच या दस्तानों से सँभालिए तथा बाद में हाथ धो लीजिए।
प्र4.
किसी उद्यमी से वार्तालाप कीजिए और मशरूम की खेती के चरणों के संबंध में सूचना प्राप्त कीजिए।
उत्तर

प्रश्नों की लिखित सूची लेकर जाइए, और चरणों को उसी क्रम में लिखिए जिस क्रम में उद्यमी वास्तव में करता है।

ढींगरी (ऑयस्टर) मशरूम की खेती के सामान्य चरण, ताकि आप जो देखें उसे समझ सकें —

  1. माध्यम तैयार कीजिए। धान या गेहूँ के पुआल को काटकर जल में भिगोया जाता है।
  2. पास्तुरीकरण कीजिए। गीले पुआल को कुछ घंटों तक नियंत्रित तापमान पर गरम जल या भाप से उपचारित किया जाता है, फिर ठंडा करके जल निथार दिया जाता है।
  3. स्पॉन मिलाइए। स्पॉन वह अनाज है जिस पर मशरूम का कवक पहले से उग रहा होता है। इसे ठंडे पुआल में परतों में मिलाया जाता है।
  4. थैलियाँ भरिए। मिश्रण को पॉलिथीन की थैलियों में भरकर वायु के लिए छोटे छेद किए जाते हैं और थैलियाँ अँधेरे कमरे में रखी जाती हैं।
  5. कमरे की स्थिति बनाए रखिए। मध्यम तापमान, अधिक आर्द्रता (जल का छिड़काव करके) और कुछ ताज़ी वायु। दो-तीन सप्ताह में थैलियाँ सफ़ेद हो जाती हैं क्योंकि कवक के तंतु पूरे पुआल में फैल जाते हैं।
  6. फलन और तुड़ाई। थैलियाँ प्रकाश और वायु के लिए खोल दी जाती हैं; छोटे-छोटे अंकुर निकलते हैं जो कुछ ही दिनों में मशरूम बन जाते हैं। इन्हें घुमाकर तोड़ा जाता है और उसके बाद दो-तीन बार और फसल मिलती है।
  7. फसल के बाद। बचा हुआ पुआल फेंका नहीं जाता — वह पहले ही आंशिक रूप से विघटित हो चुका होता है और अच्छी खाद बनता है।
पुआल का पास्तुरीकरण क्यों किया जाता है — यही मुख्य चरण है: पुआल सूक्ष्मजीव-रहित नहीं होता। उस पर पहले से वही फफूँदियाँ और जीवाणु होते हैं जो आपने तालिका 2.2 में देखे थे, और वे मशरूम से कहीं तेज़ी से बढ़कर भोजन पहले ले लेते। गीले पुआल को नियंत्रित तापमान तक गरम करने से इनमें से अधिकांश अवांछित सूक्ष्मजीव नष्ट हो जाते हैं, जबकि पुआल स्वयं नष्ट नहीं होता। इसके बाद डाला गया मशरूम का स्पॉन ऐसे माध्यम में आता है जहाँ उसका लगभग कोई प्रतिस्पर्धी नहीं होता, अत: वह पूरे पुआल में निर्बाध फैल जाता है। ध्यान रहे कि पास्तुरीकरण सब कुछ नहीं मारता — यह केवल अवांछित सूक्ष्मजीवों को इतना घटा देता है कि मशरूम को स्पष्ट बढ़त मिल जाए, इसीलिए उगाने वाला कमरे और थैलियों की स्वच्छता का ध्यान फिर भी रखता है।

उद्यमी से पूछने योग्य प्रश्न: स्पॉन कहाँ से खरीदते हैं और कैसे रखते हैं; कमरे का तापमान और आर्द्रता कितनी रखी जाती है; स्पॉनिंग से पहली तुड़ाई तक कितने दिन लगते हैं; एक थैली से कितनी उपज मिलती है; फसल खराब होने का सबसे बड़ा कारण क्या है; मशरूम कहाँ और किस भाव बिकते हैं; आरंभ करने में कितनी लागत आई।

जोड़कर देखिए: मशरूम की खेती, स्पाइरुलाइना की खेती और बायोगैस — तीनों एक ही विचार को आजीविका में बदलते हैं — चुने हुए सूक्ष्मजीव को उसकी आवश्यक स्थितियाँ दीजिए, अवांछित जीवों को दूर रखिए, और जो वह उत्पन्न करे उसे प्राप्त कीजिए।
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