कुतूहल अध्याय 3 खोजबीन और विचार करें

अद्यतन2026-09-05

प्र1.
आपका शरीर सामान्य सर्दी-जुकाम जैसे संक्रमण के प्रति कैसे अनुक्रिया करता है?
उत्तर

शरीर अपनी प्रतिरक्षा प्रणाली के माध्यम से इसका सामना करता है। सर्दी-जुकाम में हमें जो कुछ अनुभव होता है, वह प्रायः इसी संघर्ष का परिणाम है, विषाणु का सीधा प्रभाव नहीं।

क्रमानुसार यह घटित होता है—

  1. विषाणु नाक या मुँह से प्रवेश करके श्वसन तंत्र की भीतरी परत में बस जाता है।
  2. प्रतिरक्षा प्रणाली इसे बाहरी मानकर पहचान लेती है और नाक तथा गले में रक्त एवं रक्षक कोशिकाएँ भेजती है। इससे भीतरी परत में सूजन आती है और अधिक श्लेष्मा बनता है — यही तालिका 3.1 में दिया गया नाक बंद होना, नाक से पानी बहना और गले में खराश है।
  3. छींक और खाँसी विषाणु तथा श्लेष्मा को शरीर से बाहर निकालती हैं। यह बचाव की क्रिया है — और इसी कारण संक्रमण दूसरों तक भी पहुँचता है।
  4. शरीर का तापमान बढ़ सकता है। हल्का ज्वर रोगजनक के लिए परिस्थितियाँ प्रतिकूल बनाता है और प्रतिरक्षा अनुक्रिया को तीव्र करता है।
  5. शरीर में दर्द और थकान इसलिए होती है क्योंकि ऊर्जा सामान्य कार्यों के स्थान पर इस बचाव में लग रही होती है।

अधिकांश लोगों में यह कुछ दिनों में ठीक हो जाता है। इसके पश्चात प्रतिरक्षा प्रणाली उस विशेष विषाणु को स्मरण रखती है, अतः अगली बार वही विषाणु कम कष्ट देता है।

ऐसा क्यों होता है: ज्वर, नाक बहना और थकान संकेत और लक्षण हैं — अर्थात प्रतिरक्षा प्रणाली के कार्य करने का दिखाई देने वाला परिणाम, न कि विषाणु द्वारा की गई क्षति।
संकेत: सर्दी-जुकाम विषाणु से होता है, अतः प्रतिजैविक औषधि इसमें कोई लाभ नहीं देती। घर पर विश्राम कीजिए, तरल पदार्थ लीजिए और खाँसते-छींकते समय मुँह तथा नाक ढकिए जिससे दूसरे संक्रमित न हों।
प्र2.
वर्तमान में हम चेचक या पोलियो जैसे रोग कम ही देखते हैं परंतु मधुमेह और हृदय संबंधी रोग अधिक सामान्य हो गए हैं। ऐसा क्यों है?
उत्तर

क्योंकि इन दोनों वर्गों के रोगों के कारण पूर्णतः भिन्न हैं और इनमें से केवल एक को टीके से रोका जा सकता है।

चेचक, पोलियोमधुमेह, हृदय रोग
संचरणीय — रोगजनक (विषाणु) से होते हैंअसंचरणीय — इनमें कोई रोगजनक नहीं होता
एक व्यक्ति से दूसरे में फैलते हैंएक व्यक्ति से दूसरे में नहीं फैलते
टीकाकरण से रोके जा सकते हैंइनका कोई टीका संभव नहीं
व्यापक टीकाकरण ने संचरण की शृंखला तोड़ दी; 1979 में विश्व से चेचक का उन्मूलन हो गयाये जीवनशैली, आहार और पर्यावरण से जुड़े हैं, जिनमें बहुत परिवर्तन आया है

जब पर्याप्त लोगों का टीकाकरण हो गया तो चेचक और पोलियो के विषाणुओं को प्रवेश के लिए नया शरीर मिलना बंद हो गया और वे समाप्त हो गए। मधुमेह और हृदय रोग का तंत्र भिन्न है। अध्याय इनके बढ़ने के कारण गिनाता है— अधिक प्रसंस्कृत भोजन ग्रहण करना, व्यायाम कम करना और जीवन प्रत्याशा का बढ़ना। इनमें से कोई भी रोगाणु नहीं है, अतः कोई टीका इनसे रक्षा नहीं कर सकता।

ऐसा क्यों होता है: टीका प्रतिरक्षा प्रणाली को किसी रोगजनक को पहचानना सिखाता है। जहाँ पहचानने के लिए कोई रोगजनक ही नहीं है, वहाँ प्रतिरक्षा प्रणाली को प्रशिक्षित नहीं किया जा सकता — इसलिए असंचरणीय रोग की रोकथाम जीवनशैली बदलकर ही संभव है, इंजेक्शन से नहीं।

यही कारण है कि अध्याय कहता है कि आज भारत में अधिकांश मृत्यु असंचरणीय रोगों के कारण होती है, जबकि सौ वर्ष पूर्व संक्रमण ही सबसे बड़ा कारण थे।

प्र3.
क्या जलवायु परिवर्तन नए प्रकार के रोगों की उत्पत्ति का कारण बन सकता है?
उत्तर

हाँ — और इससे भी अधिक निश्चित रूप से, यह बदल देता है कि वर्तमान रोग कहाँ और कब होंगे। भारत में यह अभी से दिखाई देता है।

  • रोगवाहक जनित रोग नए क्षेत्रों तक पहुँचते हैं। मच्छर गर्म और नम परिस्थितियों में पनपते हैं। पृष्ठ 28 का सूचना पट्ट बताता है कि मानसून के आने पर मलेरिया और डेंगू ज्वर के मामलों में वृद्धि होती है। यदि गर्म और नम मौसम वर्ष में अधिक समय तक रहे, या उन पहाड़ी क्षेत्रों तक पहुँच जाए जो पहले बहुत ठंडे थे, तो मच्छर वहाँ भी जीवित रहेंगे — और उनके साथ मलेरिया तथा डेंगू भी पहुँचेंगे।
  • बाढ़ और सूखा पेयजल को दूषित करते हैं। बाढ़ का जल उत्सर्जी पदार्थ को कुओं और पाइपों तक ले जाता है। यही तालिका 3.1 में दिए गए हैजा, आंत्र ज्वर और यकृतशोथ ए का मार्ग है।
  • रोगजनक नई जनसंख्या तक पहुँचते हैं। जब सूखे, बाढ़ या बदलती कृषि भूमि के कारण मनुष्य और जंतु स्थान बदलते हैं तो किसी जंतु समुदाय में शांत पड़ा रोगजनक ऐसे लोगों तक पहुँच सकता है जो कभी उसके संपर्क में नहीं आए और जिनमें उसके विरुद्ध कोई प्रतिरक्षा नहीं है।
  • ताप और वायु प्रदूषण भार बढ़ाते हैं। सूचना पट्ट वायु प्रदूषण को सार्वजनिक स्वास्थ्य आपातस्थिति और स्वास्थ्य संबंधी संकट के प्रमुख कारकों में से एक कहता है; यह अस्थमा तथा अन्य श्वास संबंधी समस्याओं को बढ़ाता है।
ऐसा क्यों होता है: किसी रोगजनक को जीवित रहने का स्थान और यात्रा का मार्ग चाहिए। जलवायु दोनों को तय करती है — रोगवाहक का प्रजनन काल, जल की स्वच्छता, तथा मनुष्य और जंतु कहाँ रहते हैं। जलवायु बदलिए, रोग का मानचित्र बदल जाएगा।
प्र4.
तनाव या चिंता जैसे संवेग हमें किस प्रकार प्रभावित करते हैं एवं रोगी बनाते हैं?
उत्तर

ये केवल मन पर नहीं, शरीर पर भी प्रभाव डालते हैं — यही कारण है कि डबल्यू.एच.ओ. की परिभाषा में शारीरिक कल्याण के साथ मानसिक और सामाजिक कल्याण भी सम्मिलित है।

दीर्घकालिक तनाव या चिंता प्रायः इसी क्रम में प्रकट होती है—

  1. सबसे पहले नींद बाधित होती है। चिंतित मन रात में सतर्क बना रहता है, अतः शरीर को वह विश्राम नहीं मिलता जिसमें वह स्वयं की मरम्मत करता है।
  2. खानपान बदल जाता है। कुछ लोगों की भूख समाप्त हो जाती है और भार घट जाता है; कुछ सामान्य से बहुत अधिक खाने लगते हैं। दोनों ही स्थितियों में शरीर को संतुलित आहार नहीं मिलता।
  3. शारीरिक लक्षण प्रकट होते हैं — सिरदर्द, पेट की गड़बड़ी, थकान, ध्यान केंद्रित करने में कठिनाई। ये लक्षण वास्तविक होते हैं, कल्पित नहीं।
  4. संक्रमण से लड़ने की क्षमता घटती है। अपर्याप्त नींद और अपर्याप्त पोषण प्रतिरक्षा प्रणाली को दुर्बल करते हैं, अतः वे संक्रमण भी पकड़ बना लेते हैं जिन्हें शरीर सामान्यतः सरलता से हरा देता।

क्रियाकलाप 3.1 ठीक यही कथा है — विद्यार्थी को कोई संक्रमण नहीं था, फिर भी उसे सिरदर्द होता था, उसका वजन कम हो गया और वह सो नहीं पाता था। उसका रोग एकाकीपन से आरंभ हुआ।

संकेत: अध्याय स्वयं उपाय बताता है — परिवार और मित्रों के साथ समय बिताना, बातचीत करना, हँसना, पर्याप्त नींद लेना, शारीरिक रूप से सक्रिय रहना और योग, ध्यान अथवा प्राणायाम जैसे सरल श्वास व्यायाम करना। और क्रियाकलाप 3.1 की भाँति, परामर्शदाता या किसी विश्वसनीय बड़े से बात करना समझदारी का कदम है, दुर्बलता नहीं।
प्र5.
रोग के प्रकोप के समय कुछ वर्गों के लोग दूसरे वर्गों की तुलना में अधिक प्रभावित क्यों होते हैं?
उत्तर

क्योंकि रोगजनक भले ही सबके लिए एक हो, संपर्क में आने की मात्रा और प्रतिरोध की क्षमता सबकी एक जैसी नहीं होती।

  • पर्यावरण भिन्न है। जहाँ आवास सघन हैं वहाँ वायु से फैलने वाला रोग कहीं तेज़ी से पहुँचता है। जहाँ शौचालय या सुरक्षित पेयजल नहीं है वहाँ हैजा, आंत्र ज्वर और यकृतशोथ ए सरलता से फैलते हैं — इसी कारण क्रियाकलाप 3.6 के भद्रक स्वच्छता अभियान से अतिसार और संक्रमण के मामले घटे। जहाँ जल रुका रहता है और कचरा नहीं हटाया जाता, वहाँ चित्र 3.3 (ख) की भाँति मच्छर और मक्खियाँ पनपकर रोग फैलाती हैं।
  • प्रतिरक्षा भिन्न है। छोटे बच्चों, वृद्धजनों और पहले से किसी दीर्घकालिक रोग से ग्रस्त व्यक्तियों की रक्षा क्षमता कम होती है, अतः वही संक्रमण उन पर अधिक प्रभाव डालता है।
  • पोषण भिन्न है। जिस शरीर को संतुलित आहार नहीं मिल रहा, वह सशक्त प्रतिरक्षा प्रणाली बनाए नहीं रख सकता।
  • रोकथाम और चिकित्सा की उपलब्धता भिन्न है। जिन्हें समय पर टीके लगे हैं, जो शीघ्र चिकित्सक तक पहुँच सकते हैं और जो घर पर रहकर विश्राम कर सकते हैं, वे शीघ्र स्वस्थ होते हैं।
ऐसा क्यों होता है: स्वास्थ्य जीवनशैली और पर्यावरण पर निर्भर करता है और ये सबके लिए एक समान नहीं होते। रोग का प्रकोप केवल इस पहले से विद्यमान अंतर को दिखाई देने योग्य बना देता है।
क्या आप जानते हैं? यही कारण है कि सार्वजनिक स्वास्थ्य के कार्य — शौचालय बनाना, स्वच्छ जल देना, टीकाकरण अभियान चलाना — एक साथ पूरे समुदाय की रक्षा करते हैं, जो कोई व्यक्ति अकेले नहीं कर सकता।
प्र6.
अपने प्रश्नों को साझा कीजिए
उत्तर

स्वास्थ्य के विषय में अपने प्रश्न बनाइए और फिर उनके उत्तर अध्याय से, किसी विश्वसनीय स्वास्थ्य वेबसाइट से अथवा किसी चिकित्सक या स्वास्थ्यकर्मी से खोजिए। अच्छे प्रश्न प्रायः क्यों, कैसे, कब और यदि ऐसा हो तो से आरंभ होते हैं।

नमूना प्रश्न:

  • यदि टीका किसी रोग का उपचार नहीं कर सकता तो उसे स्वस्थ व्यक्ति को क्यों दिया जाता है?
  • एक ही सर्दी का विषाणु घर के एक सदस्य को रोगी कर देता है और दूसरे को क्यों नहीं?
  • ज्वर उतर जाने के बाद भी चिकित्सक प्रतिजैविक की पूरी खुराक लेने पर बल क्यों देते हैं?
  • मधुमेह किसी रोगाणु से नहीं होता — फिर यह बच्चों में क्यों बढ़ रहा है?
  • जो कीट मुझे काटता है वह मुझे ऐसा रोग कैसे दे देता है जो स्वयं उसे नहीं होता?
  • क्या एकाकीपन को सचमुच एक स्वास्थ्य समस्या कहा जा सकता है?
  • वायु गुणवत्ता सूचकांक कैसे मापा जाता है और आज मेरे नगर का मान मेरे लिए क्या अर्थ रखता है?
यह कीजिए: अपने प्रश्न पर्चियों पर लिखकर एक पात्र में डालिए और कक्षा में प्रत्येक विद्यार्थी एक पर्ची निकालकर उसका उत्तर दे। प्रायः वही प्रश्न सबसे उपयोगी निकलते हैं जो आपके मन में नहीं आए थे।
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