शरीर अपनी प्रतिरक्षा प्रणाली के माध्यम से इसका सामना करता है। सर्दी-जुकाम में हमें जो कुछ अनुभव होता है, वह प्रायः इसी संघर्ष का परिणाम है, विषाणु का सीधा प्रभाव नहीं।
क्रमानुसार यह घटित होता है—
- विषाणु नाक या मुँह से प्रवेश करके श्वसन तंत्र की भीतरी परत में बस जाता है।
- प्रतिरक्षा प्रणाली इसे बाहरी मानकर पहचान लेती है और नाक तथा गले में रक्त एवं रक्षक कोशिकाएँ भेजती है। इससे भीतरी परत में सूजन आती है और अधिक श्लेष्मा बनता है — यही तालिका 3.1 में दिया गया नाक बंद होना, नाक से पानी बहना और गले में खराश है।
- छींक और खाँसी विषाणु तथा श्लेष्मा को शरीर से बाहर निकालती हैं। यह बचाव की क्रिया है — और इसी कारण संक्रमण दूसरों तक भी पहुँचता है।
- शरीर का तापमान बढ़ सकता है। हल्का ज्वर रोगजनक के लिए परिस्थितियाँ प्रतिकूल बनाता है और प्रतिरक्षा अनुक्रिया को तीव्र करता है।
- शरीर में दर्द और थकान इसलिए होती है क्योंकि ऊर्जा सामान्य कार्यों के स्थान पर इस बचाव में लग रही होती है।
अधिकांश लोगों में यह कुछ दिनों में ठीक हो जाता है। इसके पश्चात प्रतिरक्षा प्रणाली उस विशेष विषाणु को स्मरण रखती है, अतः अगली बार वही विषाणु कम कष्ट देता है।