झंझावात और चक्रवात दोनों का आरंभ गरम वायु के ऊपर उठने और निम्न दाब का क्षेत्र बनने से होता है। परंतु चक्रवात को भीतर आती वायु के चक्रण के लिए पृथ्वी के घूर्णन की भी आवश्यकता होती है — अत: यदि पृथ्वी का घूमना रुक जाए तो चक्रवात, जैसा हम जानते हैं, नहीं बनेंगे।
झंझावात कैसे बनता है: स्थल (अथवा समुद्र) गरम होता है, उसके ऊपर की गरम और आर्द्र वायु हल्की होकर ऊपर उठती है और नीचे निम्न दाब का क्षेत्र बन जाता है। आस-पास के उच्च दाब क्षेत्रों से ठंडी वायु आकर उसका स्थान लेती है, गरम होकर स्वयं ऊपर उठती है और इस प्रकार वायु चक्रण की सतत प्रक्रिया चलती रहती है। ऊपर उठती वायु फैलकर ठंडी होती है, उसकी नमी संघनित होकर जल की बूँदें और बादल बनाती है; छोटी बूँदें मिलकर भारी बूँदें बनाती हैं जो वर्षा, ओले या हिम के रूप में गिरती हैं। तीव्र वायु के साथ होने वाली इस वर्षा को झंझावात कहते हैं।
चक्रवात कैसे बनता है: महासागर के गरम जल के ऊपर यही प्रक्रिया चलती रहती है, परंतु जब भी जलवाष्प संघनित होकर वर्षा की बूँदें बनाती है तो वाष्पन के समय ली गई ऊष्मा मुक्त हो जाती है। यह ऊष्मा ऊपर उठती वायु को और गरम कर देती है, अत: वह और ऊपर उठती है और केंद्र का दाब और भी कम हो जाता है। आस-पास के क्षेत्रों से वायु तीव्र गति से आकर ऊपर उठने लगती है। पृथ्वी के घूर्णन के कारण यह गतिमान वायु चक्रण करती है और इस चक्र की पुनरावृत्ति से अत्यधिक निम्न दाब का क्षेत्र बन जाता है जिसके चारों ओर तीव्रगामी वायु घूमती है — यही चक्रवात है।
ऐसा क्यों होता है: चक्रण झंझावात स्वयं उत्पन्न नहीं करता। पुस्तक स्पष्ट कहती है कि गतिमान वायु पृथ्वी के घूर्णन के कारण चक्रण करती है। यदि पृथ्वी न घूमे तो वायु फिर भी निम्न दाब के केंद्र की ओर सीधी दौड़ेगी, भारी वर्षा और तीव्र पवन भी होगी — परंतु भीतर आती वायु के मुड़ने का कोई कारण नहीं होगा, अत: वह शांत अक्षि वाले चक्रण करते तंत्र का रूप नहीं ले पाएगी।