क्योंकि भरी हुई वायु गुब्बारे की आंतरिक दीवारों पर बाहर की ओर दाब आरोपित करती है और रबड़ उस दाब से फैल जाती है।
प्रत्येक फूँक उसी छोटे स्थान में और वायु भर देती है। भीतर की वायु रबड़ को भीतर से धकेलती है; बाहर का वायुमंडल उसे बाहर से दबाता है। जब तक भीतर का दाब अधिक है, रबड़ फैलती जाती है और गुब्बारा बड़ा होता जाता है। जब खिंची हुई रबड़ भीतर के अतिरिक्त दाब को संतुलित करने योग्य तनी हो जाती है, तब फैलना रुक जाता है।