कुतूहल अध्याय 7 क्रियाकलाप 7.1

अद्यतन2026-09-05

प्र1.
आप क्या देखते हैं?
उत्तर

चॉक निरंतर छोटे-से-छोटे टुकड़ों में टूटता जाता है और किसी भी अवस्था में चॉक होना बंद नहीं करता।

  • टुकड़ा दो भागों में टूटता है (चित्र 7.1, ख), फिर वे भाग भी टूटते हैं — जब तक कि टुकड़े इतने छोटे न हो जाएँ कि उन्हें अँगुलियों से पकड़कर तोड़ना कठिन हो जाए।
  • जहाँ हाथ रुकते हैं वहाँ ओखल और मूसल काम आते हैं। पीसने पर वे टुकड़े महीन सफ़ेद चूर्ण में बदल जाते हैं (चित्र 7.1, ग)।
  • आवर्धक लेंस से देखने पर (चित्र 7.1, घ) यह चूर्ण कोई चिकना लेप नहीं दिखता — यह अलग-अलग सूक्ष्म कणों की बहुत बड़ी संख्या है, और प्रत्येक कण सफ़ेद तथा चॉक जैसा ही है।
इससे क्या पता चलता है: चॉक का टुकड़ा कभी भी एक अखंड, सतत पिंड नहीं था। वह अनेक छोटी इकाइयों का संकुलन था और तोड़ना उन्हें केवल पृथक करता है। और अधिक पीसने पर कण और भी महीन ही होंगे।
प्र2.
क्या दिखाई देने वाला प्रत्येक कण अभी भी चॉक का ही कण है?
उत्तर

हाँ — और आवर्धक लेंस से आप इसे स्वयं जाँच सकते हैं। चूर्ण के प्रत्येक कण का रंग वही सफ़ेद, स्पर्श वही धूलभरा और प्रकृति वही चॉक जैसी है जो मूल टुकड़े की थी।

यह एक अवलोकन ही पूरे खंड का विचार अपने में समेटे है। यदि चॉक को तोड़ने से कुछ और बन जाता तो चूर्ण दिखने और व्यवहार में भिन्न होता। ऐसा नहीं होता। अत: चॉक का टुकड़ा एक जैसी अनेक इकाइयों से बना होगा और तोड़ना केवल उन इकाइयों को एक-दूसरे से अलग करता है।

करके देखिए: इस चूर्ण को थोड़ा-सा श्यामपट्ट पर रगड़िए। यह अब भी लिखता है। कोई पदार्थ अपने गुणधर्म उस सबसे छोटे कण तक बनाए रखता है जिसे आप बना सकते हैं — कणीय मॉडल का यही पहला दावा है।
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