प्र1.
आप क्या देखते हैं?
उत्तर
चॉक निरंतर छोटे-से-छोटे टुकड़ों में टूटता जाता है और किसी भी अवस्था में चॉक होना बंद नहीं करता।
- टुकड़ा दो भागों में टूटता है (चित्र 7.1, ख), फिर वे भाग भी टूटते हैं — जब तक कि टुकड़े इतने छोटे न हो जाएँ कि उन्हें अँगुलियों से पकड़कर तोड़ना कठिन हो जाए।
- जहाँ हाथ रुकते हैं वहाँ ओखल और मूसल काम आते हैं। पीसने पर वे टुकड़े महीन सफ़ेद चूर्ण में बदल जाते हैं (चित्र 7.1, ग)।
- आवर्धक लेंस से देखने पर (चित्र 7.1, घ) यह चूर्ण कोई चिकना लेप नहीं दिखता — यह अलग-अलग सूक्ष्म कणों की बहुत बड़ी संख्या है, और प्रत्येक कण सफ़ेद तथा चॉक जैसा ही है।
इससे क्या पता चलता है: चॉक का टुकड़ा कभी भी एक अखंड, सतत पिंड नहीं था। वह अनेक छोटी इकाइयों का संकुलन था और तोड़ना उन्हें केवल पृथक करता है। और अधिक पीसने पर कण और भी महीन ही होंगे।