कुतूहल अध्याय 7 जिज्ञासा बनाए रखें

अद्यतन2026-09-05

प्र1.
सही विकल्प चुनिए— ठोस पदार्थों और द्रवों में मूल अंतर यह है कि घटक कण (क) ठोस पदार्थों में सुसंकुलित होते हैं जबकि द्रवों में स्थिर होते हैं। (ख) ठोस पदार्थों में एक दूसरे से अधिक दूर होते हैं और द्रवों में उनकी नियत स्थिति होती है। (ग) ठोस पदार्थों में सदैव गति करते रहते हैं और द्रवों में उनकी नियत स्थिति होती है। (घ) ठोस पदार्थों में सुसंकुलित होते हैं और द्रवों में एक स्थान से दूसरे स्थान तक गति करते हैं।
उत्तर

(घ) ठोस पदार्थों में सुसंकुलित होते हैं और द्रवों में एक स्थान से दूसरे स्थान तक गति करते हैं।

केवल यही कथन दोनों भागों में सही है। ठोस में कण दृढ़ता से संकुलित होते हैं और अत्यंत प्रबल आकर्षण बलों द्वारा नियत स्थितियों पर बँधे रहते हैं, अत: वे केवल कंपन कर सकते हैं। द्रव में आकर्षण कुछ दुर्बल और अंतराकणीय स्थान कुछ अधिक होता है, अत: कण एक-दूसरे के पास से होकर गति कर सकते हैं — इसीलिए आप जल में अँगुली घुमा सकते हैं, पत्थर में नहीं।

शेष विकल्प क्यों गलत हैं:
  • (क) — पहला भाग सही है, परंतु द्रव के कण स्थिर कदापि नहीं होते; उन्हीं की गति पूरे गिलास में पोटैशियम परमैंगनेट को फैलाती है।
  • (ख) — दोनों भाग उलटे हैं। ठोस के कण दूर नहीं, निकट होते हैं; और नियत स्थिति द्रवों में नहीं, ठोसों में होती है।
  • (ग) — ठोस के कण एक स्थान से दूसरे स्थान तक गति करते ही नहीं, और द्रव के कणों की कोई नियत स्थिति नहीं होती।
प्र2.
निम्नलिखित में से कौन-से कथन सत्य हैं? असत्य कथनों को सत्य कथन के रूप में लिखिए। (क) बर्फ का जल में पिघलना किसी ठोस का द्रव में रूपांतरण का एक उदाहरण है। (ख) गलन प्रक्रिया में रूपांतरण के समय अंतराकणीय आकर्षणों में कमी होती है। (ग) ठोस पदार्थों की एक निश्चित आकृति और निश्चित आयतन होता है। (घ) ठोस पदार्थों में अंतराकणीय अन्योन्य क्रियाएँ अति प्रबल होती हैं और अंतराकणीय स्थान अति सूक्ष्म होते हैं। (ङ) जब हम कक्ष के किसी कोने में कपूर को गरम करते हैं तो उसकी सुगंध कक्ष के सभी कोनों में पहुँच जाती है। (च) गरम करने पर हम कपूर को ऊर्जा दे रहे हैं और यह ऊर्जा गंध के रूप में मुक्त होती है।
उत्तर

कथन (क), (ख), (ग), (घ) और (ङ) सत्य हैं। केवल (च) असत्य है।

कथनसत्य / असत्यकारण
(क)सत्यबर्फ ठोस है और जल द्रव, अत: बर्फ का पिघलना ठीक वही परिवर्तन है जो चित्र 7.4 में दर्शाया गया है
(ख)सत्यगरम करने पर कंपन इतने तीव्र हो जाते हैं कि कण अपनी नियत स्थिति छोड़ने लगते हैं; अंतराकणीय दूरी बढ़ती है और आकर्षण बल दुर्बल हो जाते हैं
(ग)सत्यप्रबल आकर्षण और न्यूनतम अंतराकणीय स्थान प्रत्येक कण को उसके स्थान पर बाँधे रखते हैं, अत: ठोस अपनी आकृति और आयतन दोनों बनाए रखता है
(घ)सत्ययही ठोस अवस्था के दो मूल लक्षण हैं; इन सूक्ष्म स्थानों में कुछ भी विद्यमान नहीं होता, वायु भी नहीं
(ङ)सत्यवही जो आप क्रियाकलाप 7.9 में अगरबत्ती के साथ देखते हैं — कण पूरे कक्ष में फैल जाते हैं
(च)असत्यआपकी नाक तक ऊर्जा नहीं, कपूर के कण पहुँचते हैं

(च) का सही रूप: गरम करने पर हम कपूर को ऊर्जा दे रहे हैं। यह ऊर्जा उसके कणों की गति इतनी बढ़ा देती है कि वे ठोस से मुक्त होकर कक्ष की वायु में फैल जाते हैं; हमें जो गंध अनुभव होती है वह इन्हीं कपूर-कणों के नाक तक पहुँचने से होती है, ऊर्जा के गंध के रूप में मुक्त होने से नहीं।

मूल कथन गलत क्यों है: गंध ऊर्जा का कोई रूप नहीं है। यह किसी पदार्थ के वास्तविक कणों के हमारी नाक तक पहुँचने पर होने वाली अनुभूति है। दी गई ऊर्जा का काम अलग है — वह कणों को ठोस से मुक्त करती है और उन्हें गतिशील बनाए रखती है।
प्र3.
सत्यता सहित सही उत्तर का चयन कीजिए। यदि हम किसी कुर्सी से सभी घटक कण हटा पाते तो क्या होता? (क) कुछ भी नहीं बदलता (ख) कणों की हानि के कारण कुर्सी का भार कम हो जाता (ग) कुर्सी का कुछ भी नहीं बचता
उत्तर

(ग) कुर्सी का कुछ भी नहीं बचता।

सत्यता (औचित्य)। कुर्सी कोई ऐसी वस्तु नहीं है जो कणों को अपने भीतर रखती हो, जैसे डिब्बा कंचों को रखता है। कुर्सी स्वयं घटक कणों की एक वृहत संख्या ही है जो अंतराकणीय आकर्षणों द्वारा जुड़ी हुई कुर्सी के आकार में व्यवस्थित है। उसकी लकड़ी, उसका भार, उसकी कठोरता और उसकी आकृति — सब उन्हीं कणों और उनके बीच के बलों के गुणधर्म हैं।

प्रत्येक कण हटा दीजिए तो कुर्सी बनने के लिए कोई पदार्थ ही शेष नहीं रहेगा — न लकड़ी, न पाए, न बैठने का भाग, न भार, कुछ भी नहीं। अंतराकणीय स्थान भी शेष नहीं रहेंगे, क्योंकि जहाँ कण ही न हों वहाँ कणों के बीच का स्थान हो ही नहीं सकता।

अन्य विकल्प क्यों विफल हैं:
  • (क) यह मानता है कि कुर्सी अपने कणों से अलग कोई अतिरिक्त वस्तु है जो स्वयं बनी रह सकती है। पूरा अध्याय दिखाता है कि ऐसा नहीं है: चॉक के टुकड़े को पर्याप्त तोड़ते जाइए तो अंत में उसके कण ही बचते हैं, और कुछ नहीं।
  • (ख) यह कणों को कुर्सी का एक भाग मात्र मानता है, मानो उन्हें हटाने पर हल्की कुर्सी बच जाएगी। परंतु वे कुर्सी का सब कुछ हैं। किसी वस्तु का सब कुछ हटा देने पर उसका हल्का रूप नहीं बचता।
प्र4.
गैसें सरलतापूर्वक क्यों मिश्रित हो जाती हैं जबकि ठोस पदार्थ मिश्रित नहीं होते। ऐसा क्यों?
उत्तर

क्योंकि गैस में कण यात्रा करने के लिए स्वतंत्र हैं और ठोस में नहीं

गैसों में। अंतराकणीय आकर्षण नगण्य और अंतराकणीय स्थान अधिकतम होता है। प्रत्येक कण सभी दिशाओं में स्वतंत्र गति करता है और कभी रुकता नहीं। दो गैसों को पास लाइए और प्रत्येक के कण दूसरी के कणों के बीच के विस्तृत स्थानों में चले जाते हैं, टकराते हैं, और धकेले जाकर आगे बढ़ते जाते हैं — जब तक दोनों एकसमान रूप से न फैल जाएँ। इसके लिए न विलोडन चाहिए, न हिलाना, न गरम करना — क्रियाकलाप 7.9 में सुगंध स्वयं पूरा कक्ष पार कर लेती है।

ठोसों में। अंतराकणीय आकर्षण अत्यंत प्रबल और अंतराकणीय स्थान न्यूनतम होता है। प्रत्येक कण नियत स्थिति पर बँधा है और केवल इधर-उधर कंपन कर सकता है; वह अपने पड़ोसियों के पास से होकर नहीं जा सकता और ठोस को छोड़ भी नहीं सकता। अत: दो ठोसों को साथ रखने पर एक से दूसरे में कुछ भी नहीं जा सकता। वे केवल अपनी सतहों पर स्पर्श करते हैं।

दो चूर्णों को मिलाने का क्या? हल्दी और नमक को साथ पीसने और हिलाने से दाने मिलते हैं, कण नहीं। ध्यान से देखिए तो प्रत्येक दाना अब भी शुद्ध हल्दी या शुद्ध नमक ही है। दो गैसों के मिश्रण में ‘दाने’ जैसी कोई वस्तु होती ही नहीं — वहाँ मिश्रण सबसे नीचे के स्तर तक होता है।
प्र5.
जब काँच के गिलास में रखा दूध मेज पर छलक जाता है तो वह बहता है और फैल जाता है परंतु काँच के गिलास की आकृति वही रहती है। इस कथन को सत्यापित कीजिए।
उत्तर

क्योंकि दूध द्रव है और गिलास ठोस, और दोनों में यह अंतर है कि उनके कण कितनी प्रबलता से बँधे हैं तथा कितनी स्वतंत्रता से गति कर सकते हैं।

दूध बहता और फैलता है। द्रव में अंतराकणीय आकर्षण ठोस की अपेक्षा कुछ दुर्बल होते हैं, अत: कण एक-दूसरे के पास से होकर गति कर सकते हैं — यद्यपि केवल सीमित स्थान के भीतर। गिलास के भीतर वह सीमित स्थान दीवारें देती हैं और दूध गिलास की आकृति ले लेता है। मेज पर छलकने के बाद कोई दीवार नहीं बचती, अत: कणों को रोकने वाला कुछ नहीं है; वे एक-दूसरे पर सरक जाते हैं और दूध पतली परत के रूप में फैलकर मेज की सतह की आकृति ले लेता है। उसका आयतन तब भी नहीं बदलता — उतना ही दूध अब ऊँचा और सँकरा न रहकर चौड़ा और उथला हो गया है।

गिलास अपनी आकृति बनाए रखता है। ठोस में कण सुसंकुलित होते हैं और अत्यंत प्रबल अंतराकणीय आकर्षण प्रत्येक कण को नियत स्थिति पर रखते हैं। वे केवल कंपन कर सकते हैं, एक-दूसरे के पास से होकर नहीं जा सकते। अत: काँच की आकृति और आयतन निश्चित रहते हैं जिन्हें गिरना नहीं बदलता — आघात अधिक हो तो वह चटक सकता है, परंतु मेज पर बहेगा कभी नहीं।

याद रखने योग्य एक वाक्य: एक ही घटना, एक ही मेज, एक ही तापमान — फिर भी परिणाम पूर्णत: भिन्न; और दोनों पदार्थों में अंतर केवल उनके अंतराकणीय आकर्षणों की प्रबलता का है।
प्र6.
जब बर्फ पिघलती है और वह जल वाष्प में रूपांतरित होती है तो कणों की व्यवस्था में होने वाले परिवर्तनों को चित्र द्वारा निरूपित कीजिए।
उत्तर

उन्हीं कणों की तीन व्यवस्थाएँ, जिन्हें अवस्था के दो परिवर्तन जोड़ते हैं:

गलन0 °C परक्वथन100 °C परबर्फ (ठोस)जल (द्रव)जल वाष्प (गैस)नियत स्थिति, केवल कंपनसीमित स्थान में गतिसभी दिशाओं में स्वतंत्र गति
आवर्धित व्यवस्थात्मक चित्र। बाएँ से दाएँ अंतराकणीय स्थान बढ़ता जाता है और अंतराकणीय आकर्षण दुर्बल होता जाता है — परंतु कण तीनों में बिलकुल एक जैसे ही हैं।

प्रत्येक अवस्था क्या दर्शाती है और क्यों:

  • बर्फ। कण सुसंकुलित, प्रबल आकर्षण द्वारा नियत स्थितियों पर बँधे। वे केवल कंपन कर सकते हैं। अंतराकणीय स्थान न्यूनतम, अत: बर्फ की आकृति और आयतन निश्चित।
  • गलनांक तक गरम करना। दी गई ऊष्मीय ऊर्जा आकर्षण बलों को अप्रभावी करने में लगती है। कंपन इतने तीव्र हो जाते हैं कि कण अपनी नियत स्थिति छोड़ देते हैं; अंतराकणीय दूरी में अल्प वृद्धि होती है, आकर्षण दुर्बल हो जाते हैं और बर्फ जल बन जाती है।
  • जल। कण कुछ विरल संकुलित, गतिशील — परंतु फिर भी एक-दूसरे के निकट और सीमित स्थान के भीतर। आयतन निश्चित, आकृति निश्चित नहीं।
  • क्वथनांक तक गरम करना। कणों की गति इतनी तीव्र हो जाती है कि वे एक-दूसरे से दूर हट जाते हैं, आकर्षण समाप्तप्राय हो जाते हैं और कण द्रव से मुक्त हो जाते हैं।
  • जल वाष्प। आकर्षण नगण्य, अंतराकणीय स्थान अधिकतम, कण सभी दिशाओं में स्वतंत्र गति करते हैं। न आकृति निश्चित, न आयतन।
कॉपी में बनाते समय: तीनों बॉक्सों में एक ही आकार के, एक ही संख्या में वृत्त बनाइए। बदलना केवल उनका अंतराकणीय स्थान और व्यवस्था चाहिए। गैस के लिए बड़े वृत्त बनाना यह कहेगा कि गरम करने पर कण स्वयं फैल जाते हैं, जो सही नहीं है।
क्या आप जानते हैं? जल को वाष्प बनने के लिए 100 °C तक पहुँचना आवश्यक नहीं। वाष्प का निर्माण प्रत्येक तापमान पर, धीरे-धीरे और केवल सतह से होता रहता है — यही धीमी प्रक्रिया वाष्पन है, और इसी कारण छलका हुआ जल साधारण दिन में भी सूख जाता है।
प्र7.
निम्नलिखित में उपस्थित कणों को निरूपित करता हुआ चित्र आरेखित कीजिए — (क) ऐलुमिनियम पर्णिका (ख) ग्लिसरीन (ग) मेथेन गैस
उत्तर

ऐलुमिनियम पर्णिका ठोस है, ग्लिसरीन द्रव और मेथेन गैस — अत: तीनों चित्र वही तीन मानक व्यवस्थाएँ हैं, एक ही पैमाने पर बनाई गईं।

(क) ऐलुमिनियम पर्णिका(ख) ग्लिसरीन(ग) मेथेन गैसठोस — संकुलित और नियतद्रव — कुछ अधिक स्थानगैस — दूर-दूर, स्वतंत्र
तीनों बॉक्स एक ही आकार के हैं और उनमें कण भी एक ही आकार के हैं। भिन्न केवल अंतराकणीय स्थान और गति की स्वतंत्रता है।
पदार्थअवस्थाचित्र कैसे बनाएँक्यों
ऐलुमिनियम पर्णिकाठोसएक जैसे वृत्त, नियमित पंक्तियों में लगभग स्पर्श करते हुए, पूरे बॉक्स को भरते हुएअंतराकणीय आकर्षण अधिकतम, स्थान न्यूनतम, कण केवल नियत स्थिति पर कंपन करते हैं
ग्लिसरीनद्रववही वृत्त, कुछ विरल और अनियमित रूप से रखे हुए, फिर भी निकट और बॉक्स को भरते हुएआकर्षण ठोस से कुछ दुर्बल; कण गति करते हैं, परंतु केवल सीमित स्थान के भीतर
मेथेन गैसगैसकेवल चार-पाँच वृत्त, दूर-दूर बिखरे हुए, बीच में बड़े रिक्त स्थानआकर्षण नगण्य, अंतराकणीय स्थान अधिकतम, कण सभी दिशाओं में स्वतंत्र गति करते हैं
दो भूलें जिनसे बचें: गैस के कणों को ठोस के कणों से बड़ा न बनाइए — कण प्रत्येक अवस्था में एक जैसे ही होते हैं। और रिक्त स्थानों को छायांकित न कीजिए: अंतराकणीय स्थानों में कुछ भी विद्यमान नहीं होता, वायु भी नहीं।
प्र8.
चित्र 7.16 (क) का अवलोकन कीजिए जिसमें एक ऐसी मोमबत्ती का चित्र है जिसे कुछ समय जलने के पश्चात बुझाया गया है। चित्र में मोम की विभिन्न अवस्थाओं को पहचानिए और चित्र 7.16 (ख) में दर्शाई गई कणों की व्यवस्था के साथ उनका मिलान कीजिए।
उत्तर

अभी-अभी बुझाई गई मोमबत्ती में एक ही पदार्थ — मोम — की तीनों अवस्थाएँ एक साथ दिखाई देती हैं।

चित्र 7.16 (क) में कहाँ दिखता हैमोम की अवस्थाचित्र 7.16 (ख) की कौन-सी व्यवस्था
मोमबत्ती का पिंड, तथा किनारों से बहकर जम चुका सफ़ेद मोमठोसवह बॉक्स जिसमें कण सुसंकुलित होकर उसे पूरा भर देते हैं (ऊपर बाईं ओर वाला)
बत्ती के चारों ओर बने गड्ढे में पिघले मोम का तालाब तथा नीचे बहती बूँदेंद्रववह बॉक्स जिसमें कण कुछ विरल संकुलित हैं, रिक्त स्थान कुछ अधिक हैं पर बॉक्स फिर भी भरा है (ऊपर दाईं ओर वाला)
अभी-अभी बुझी बत्ती से उठती सफ़ेद लटगैस (मोम की वाष्प)वह बॉक्स जिसमें केवल कुछ ही कण, दूर-दूर हैं और अधिकांश भाग रिक्त है (नीचे वाला)
एक ही मोमबत्ती तीनों अवस्थाएँ कैसे दिखाती है: ज्वाला बत्ती के पास के ठोस मोम को गरम करती है। उसके कणों की ऊष्मीय ऊर्जा बढ़ती है, अंतराकणीय आकर्षण दुर्बल हो जाते हैं और मोम पिघलकर वह तालाब बना देता है जो आप देखते हैं। वही द्रव बत्ती में ऊपर चढ़ता है, और गरम होकर मोम की वाष्प में बदल जाता है — वस्तुतः यही वाष्प जलती है, ठोस मोम नहीं। ज्वाला बुझा दीजिए तो बची हुई वाष्प बिना जले निकल जाती है और वही सफ़ेद लट के रूप में दिखती है। ठंडा होने पर पूरा क्रम उलटा चलता है: वाष्प संघनित होती है, तालाब जम जाता है और किनारों पर ठोस मोम रह जाता है।
स्वयं जाँचिए: मोमबत्ती बुझाने के तुरंत बाद जलती हुई तीली उस सफ़ेद लट में ले जाइए। ज्वाला लट के सहारे नीचे उतरकर बत्ती को पुनः जला देती है — यही प्रमाण है कि वह लट धुआँ नहीं, मोम की वाष्प है।
प्र9.
समुद्र के जल का स्वाद नमकीन क्यों होता है जबकि इसमें नमक दिखाई भी नहीं देता है? समझाइए।
उत्तर

क्योंकि नमक घुला हुआ है — वह पृथक घटक कणों के रूप में जल में फैला हुआ है और वे कण देखे जाने के लिए बहुत ही सूक्ष्म हैं।

घुलने पर नमक अपने घटक कणों में टूट जाता है। ये कण अत्यंत सूक्ष्म होते हैं, इतने कि उन्हें किसी सामान्य सूक्ष्मदर्शी से भी नहीं देखा जा सकता, और वे जल के कणों के बीच पहले से विद्यमान अंतराकणीय स्थानों में चले जाते हैं। इसके बाद जल-कणों की निरंतर गति उन्हें पूरे जल में एकसमान रूप से फैला देती है। ऐसा हो जाने पर नमक का कोई दाना कहीं नहीं बचता जिसे आँख खोज सके — परंतु समुद्र की प्रत्येक बूँद में नमक के कण उपस्थित रहते हैं और जीभ उन्हें तत्काल पहचान लेती है।

यह ठीक क्रियाकलाप 7.2 है, बहुत बड़े पैमाने पर। दो छोटे चम्मच चीनी एक गिलास जल में पूर्णतः लुप्त हो जाती है, फिर भी सबसे ऊपरी सतह से लिया गया चम्मच मीठा लगता है। क्रियाकलाप 7.7 दूसरा प्रमाण जोड़ता है: स्तर ‘ब’ से घटकर ‘स’ पर आ जाता है, जो दर्शाता है कि घुले हुए कण पहले से विद्यमान स्थान में समा गए हैं।

सामान्य निष्कर्ष: अदृश्य होने का अर्थ अनुपस्थित होना नहीं है। देखना द्रव्य को पहचानने का केवल एक उपाय है; स्वाद, गंध और आयतन में परिवर्तन भी उतने ही उपाय हैं — और इस अध्याय में यही उपाय काम आते हैं।
क्या आप जानते हैं? यह नमक वहाँ उसी मार्ग से पहुँचा है जिससे समुद्र तट के कंकड़। बहती नदियाँ चट्टानों को घिसती हैं (पृष्ठ 99); रेत और मिट्टी के साथ वे घुले हुए लवण भी समुद्र तक ले जाती हैं। समुद्र से जल वाष्पन द्वारा उड़ता रहता है, परंतु नमक के कण वहीं रह जाते हैं — इसलिए समुद्र और अधिक खारा होता जाता है।
प्र10.
चावल के दाने और चावल के आटे को जब विभिन्न पात्रों में रखा जाता है तो वे पात्र का आकार ले लेते हैं। क्या वे ठोस हैं या द्रव? व्याख्या कीजिए।
उत्तर

दोनों ठोस हैं। पात्र की आकृति ढेर लेता है, पदार्थ नहीं।

आँख से नहीं, कणीय कसौटी से जाँचिए:

  • एक दाने को देखिए। चावल के एक दाने की अपनी निश्चित आकृति और अपना निश्चित आयतन है, और वह उन्हें हर जगह बनाए रखता है। उसके घटक कण सुसंकुलित हैं, प्रबल आकर्षण द्वारा नियत स्थितियों पर बँधे हैं और केवल कंपन कर सकते हैं। ठोस की यही परिभाषा है। चावल का आटा उसी को और महीन पीसा हुआ रूप है — उसका प्रत्येक कण अब भी ठोस चावल का छोटा टुकड़ा ही है, ठीक वैसे ही जैसे क्रियाकलाप 7.1 में पिसी हुई चॉक का प्रत्येक कण चॉक ही था।
  • पूछिए कि वास्तव में गति कौन कर रहा है। पात्र को झुकाने पर दाने एक-दूसरे पर लुढ़कते हैं। प्रत्येक दाने के भीतर कुछ भी अपने स्थान से नहीं हिलता। सच्चे द्रव में कण स्वयं एक-दूसरे के पास से सरकते हैं और उनके भीतर कोई और छोटी वस्तु होती ही नहीं।
  • फिर से उँडेलिए। चावल वही गिने जा सकने वाले दाने बनकर वापस आ जाता है, अपरिवर्तित। उँडेला हुआ जल पृथक, एक जैसे टुकड़ों के रूप में वापस नहीं आता।
कसौटीचावल के दाने / चावल का आटासच्चा द्रव, जैसे जल
क्या ढेर लगाया जा सकता है?हाँ — चावल या आटे का ढेर ढलवाँ सतह बनाए रखता हैनहीं — बहकर सतह समतल कर लेता है
क्या भीतर दिखाई देने वाले रिक्त स्थान हैं?हाँ, दानों के बीच वायु से भरे रिक्त स्थाननहीं, द्रव सतत होता है
क्या प्रत्येक टुकड़ा अपनी आकृति बनाए रखता है?हाँ, प्रत्येक दानानहीं, जल में टुकड़े होते ही नहीं
यह प्रश्न अच्छा भ्रम क्यों उत्पन्न करता है: बहना और पात्र को भर देना द्रव जैसा व्यवहार लगता है, अत: केवल उसी से निर्णय करने का मन होता है। परंतु ये गुण छोटे ठोस टुकड़ों के ढेर के हैं। अवस्था का निर्णय इस बात से होता है कि घटक कण किस प्रकार व्यवस्थित और बँधे हैं — और चावल में वे नियत स्थितियों पर बँधे हैं।
पृष्ठ 98 से जोड़िए: यह वही तर्क है जो रेत का ढेर लगाने वाले आरंभिक प्रश्न में था। रेत उँडेली जा सकती है, फिर भी रेत निस्संदेह ठोस है।
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