कुतूहल अध्याय 9 जिज्ञासा जीवित रखें

अद्यतन2026-09-05

प्र1.
बताइए कि नीचे दिए गए कथन सत्य हैं अथवा असत्य। असत्य कथन या कथनों को सत्य बनाइए। (क) ऑक्सीजन गैस ठंडे पानी की अपेक्षा गरम पानी में अधिक घुलनशील होती है। (ख) रेत और पानी का मिश्रण एक विलयन है। (ग) किसी वस्तु द्वारा घेरे गए स्थान को उसका द्रव्यमान कहते हैं। (घ) असंतृप्त विलयन में संतृप्त विलयन की अपेक्षा अधिक विलेय घुला हुआ होता है। (ङ) वायुमंडल में उपस्थित विभिन्न गैसें भी एक समरूपी मिश्रण है।
उत्तर
कथनसत्य / असत्यसुधारा हुआ कथन
(क) ऑक्सीजन गैस ठंडे पानी की अपेक्षा गरम पानी में अधिक घुलनशील होती है।असत्यऑक्सीजन गैस गरम पानी की अपेक्षा ठंडे पानी में अधिक घुलनशील होती है।
(ख) रेत और पानी का मिश्रण एक विलयन है।असत्यरेत और पानी का मिश्रण एक विषमरूप मिश्रण है, विलयन नहीं।
(ग) किसी वस्तु द्वारा घेरे गए स्थान को उसका द्रव्यमान कहते हैं।असत्यकिसी वस्तु द्वारा घेरे गए स्थान को उसका आयतन कहते हैं।
(घ) असंतृप्त विलयन में संतृप्त विलयन की अपेक्षा अधिक विलेय घुला हुआ होता है।असत्यसमान तापमान पर असंतृप्त विलयन में संतृप्त विलयन की अपेक्षा कम विलेय घुला हुआ होता है।
(ङ) वायुमंडल में उपस्थित विभिन्न गैसें भी एक समरूपी मिश्रण है।सत्य
प्रत्येक का कारण:
  • (क) घुली हुई गैस का कण जल-कणों के बीच ढीला-ढाला टिका रहता है। गरम करने पर उसे निकल भागने योग्य ऊर्जा मिल जाती है, अतः गरम जल कम ऑक्सीजन रखता है — इसी से उथले गरम जल में मछलियों को कष्ट होता है।
  • (ख) रेत घुलती नहीं। उसके कण दिखाई देते रहते हैं और तली में बैठ जाते हैं, अतः घटक समान रूप से वितरित नहीं होते।
  • (ग) द्रव्यमान पदार्थ की मात्रा है (ग्राम, किलोग्राम); आयतन घेरा गया स्थान है (cm³, mL, m³)। ये दो भिन्न राशियाँ हैं और इनका अनुपात घनत्व है।
  • (घ) संतृप्त का अर्थ है कि अधिकतम संभव मात्रा पहले ही घुल चुकी है। असंतृप्त का अर्थ है कि विलयन अभी उस अधिकतम से नीचे है, अतः उसमें कम ही घुला होगा।
  • (ङ) वायु गैसों का विलयन है — नाइट्रोजन, ऑक्सीजन, कार्बन डाइऑक्साइड आदि समान रूप से फैली रहती हैं और कोई घटक पृथक रूप से दिखाई नहीं देता।
प्र2.
रिक्त स्थानों की पूर्ति कीजिए— (क) किसी ठोस का आयतन विस्थापन विधि द्वारा मापा जा सकता है जहाँ ठोस को जल में __________ जाता है और जल स्तर की __________ मापी जाती है। (ख) किसी विशिष्ट तापमान पर __________ में घुली __________ की अधिकतम मात्रा उस तापमान पर उसकी विलेयता कहलाती है। (ग) प्राय: तापमान में वृद्धि से घनत्व __________ है। (घ) वह विलयन जिसमें ग्लूकोस जल में पूर्णतः घुल गया हो तथा दिए गए तापमान पर और अधिक ग्लूकोस नहीं घुल सकता, ग्लूकोस का __________ विलयन कहलाता है।
उत्तर
रिक्त स्थानउत्तर
(क) ठोस को जल में _____ जाता है और जल स्तर की _____ मापी जाती हैडुबोया … वृद्धि
(ख) किसी विशिष्ट तापमान पर _____ में घुली _____ की अधिकतम मात्राविलायक की निश्चित मात्रा (100 mL) … विलेय
(ग) प्राय: तापमान में वृद्धि से घनत्व _____ हैघटता
(घ) … ग्लूकोस का _____ विलयन कहलाता हैसंतृप्त
ये उत्तर क्यों हैं:
  • (क) डूबा हुआ ठोस अपने ही आयतन के बराबर जल हटा देता है, और उस जल के पास ऊपर उठने के अतिरिक्त कोई मार्ग नहीं — अतः स्तर की वृद्धि ठोस के आयतन के बराबर होती है।
  • (ख) विलेयता एक अधिकतम मात्रा है, वह किसी विशेष विलायक में उस विलेय का गुण है, और वह विलायक की निश्चित मात्रा (100 mL) तथा निश्चित तापमान के लिए बताई जाती है। इनमें से कोई एक भी छोड़ दीजिए तो वह संख्या अर्थहीन हो जाती है।
  • (ग) गरम करने पर कण दूर-दूर हो जाते हैं और आयतन बढ़ता है जबकि द्रव्यमान वही रहता है। घनत्व = द्रव्यमान/आयतन, अतः घनत्व घट जाता है।
  • (घ) "पूर्णतः घुल गया हो और उस तापमान पर और न घुल सके" — यही संतृप्त विलयन की परिभाषा है।
प्र3.
आप जल से भरे गिलास में तेल डालते हैं। तेल ऊपर तैरने लगता है। इससे आपको क्या ज्ञात होता है? (क) तेल जल से अधिक सघन होता है। (ख) जल तेल से अधिक सघन होता है। (ग) तेल और जल का घनत्व समान होता है। (घ) तेल जल में घुल जाता है।
उत्तर

(ख) जल तेल से अधिक सघन होता है।

जल का घनत्व ≈ 1 g/mL
खाद्य तेल का घनत्व ≈ 0.91 g/mL (पृष्ठ 141 के 1 लीटर / 910 g वाले पैकेट से)

0.91 g/mL < 1 g/mL, अतः तेल जल के ऊपर आ जाता है

अन्य विकल्प क्यों गलत हैं —

  • (क) यदि तेल अधिक सघन होता तो वह डूबकर जल के नीचे बैठ जाता, जो होता नहीं है।
  • (ग) यदि दोनों के घनत्व समान होते तो किसी एक के ऊपर आने का कोई कारण ही न होता; दोनों जहाँ रखे जाते वहीं बने रहते।
  • (घ) तेल जल में घुलता ही नहीं — इसीलिए दो अलग परतें दिखाई देती हैं। यदि घुल जाता तो एक ही स्वच्छ समरूप द्रव मिलता।
ऐसा क्यों होता है: जब दो ऐसे द्रव साथ रखे जाएँ जो आपस में नहीं मिलते, तब जो प्रत्येक मिलीलीटर में कम द्रव्यमान भरता है वह ऊपर आ जाता है। जल के कण एक-दूसरे को प्रबलता से आकर्षित करके सिमट जाते हैं और ऊपर की तेल की परत को दबा देते हैं।
प्र4.
किसी पत्थर की मूर्ति का वजन 225 g है और इसका आयतन 90 cm³ है। इसके घनत्व का परिकलन कीजिए और पूर्वानुमान लगाइए कि यह मूर्ति जल में तैरेगी अथवा डूबेगी।
उत्तर
द्रव्यमान = 225 g, आयतन = 90 cm³

घनत्व = द्रव्यमान / आयतन
घनत्व = 225 g ÷ 90 cm³
घनत्व = 2.5 g/cm³

जल का घनत्व = 1 g/cm³
2.5 g/cm³ > 1 g/cm³ → मूर्ति डूब जाएगी

जल के सापेक्ष उसका आपेक्षिक घनत्व 2.5 ÷ 1 = 2.5 है, एक ऐसी संख्या जिसका कोई मात्रक नहीं — अर्थात मूर्ति जल से ढाई गुना सघन है।

यह क्यों डूबेगी: 90 cm³ जल का द्रव्यमान 90 g होता है; उतने ही 90 cm³ इस पत्थर का द्रव्यमान 225 g है। जितना स्थान वह घेरती है उसकी तुलना में मूर्ति कहीं अधिक भारी है, अतः वह जल में ऊपर नहीं ठहर सकती।
प्र5.
निम्नलिखित में से कौन सा कथन सर्वाधिक उपयुक्त है? अन्य कथन उपयुक्त क्यों नहीं हैं? (क) एक संतृप्त विलयन किसी निश्चित तापमान पर और अधिक विलेय घोल सकता है। (ख) किसी दिए गए तापमान पर एक असंतृप्त विलयन में विलेय की अधिकतम संभव मात्रा घुल गई है। (ग) एक निश्चित तापमान पर संतृप्त विलयन में और अधिक विलेय नहीं घुल सकता है। (घ) एक संतृप्त विलयन केवल उच्च तापमान पर बनता है।
उत्तर

सर्वाधिक उपयुक्त कथन है (ग) एक निश्चित तापमान पर संतृप्त विलयन में और अधिक विलेय नहीं घुल सकता है। यही संतृप्तता की परिभाषा है।

कथनयह उपयुक्त क्यों नहीं है
(क) संतृप्त विलयन और अधिक विलेय घोल सकता हैयह असंतृप्त विलयन का वर्णन है। संतृप्त विलयन अपनी सीमा तक पहुँच चुका होता है; अतिरिक्त विलेय तली पर बैठ जाता है।
(ख) असंतृप्त विलयन में अधिकतम संभव मात्रा घुल गई हैदोनों शब्द आपस में बदल गए हैं। अधिकतम मात्रा घुली होना ही विलयन को संतृप्त बनाता है; असंतृप्त का अर्थ है कि वह अभी अधिकतम से नीचे है।
(घ) संतृप्त विलयन केवल उच्च तापमान पर बनता हैविलयन किसी भी तापमान पर संतृप्त हो सकता है। ठंडा जल कम विलेय से संतृप्त हो जाता है और गरम जल अधिक से — क्रियाकलाप 9.1 कक्ष तापमान पर ही नमक का संतृप्त विलयन बनाता है।
(ग) की शब्दावली इतनी सावधान क्यों है: "एक निश्चित तापमान पर" वाक्यांश पर ध्यान दीजिए। संतृप्तता विलयन की स्थायी अवस्था नहीं है — उसे गरम कीजिए और वही द्रव असंतृप्त हो जाता है, क्योंकि उसकी सीमा ऊपर खिसक जाती है। संतृप्तता का कोई भी कथन जिसमें तापमान न हो, अधूरा है।
प्र6.
आपके पास 2 लीटर आयतन की एक बोतल है। आप इसमें 500 mL जल भरते हैं। बोतल में और कितना जल भरा जा सकता है?
उत्तर
बोतल की क्षमता = 2 L
1 L = 1000 mL, अतः 2 L = 2 × 1000 = 2000 mL

पहले से भरा जल = 500 mL

शेष रिक्त स्थान = 2000 mL − 500 mL
शेष रिक्त स्थान = 1500 mL = 1.5 L
पहले मात्रक बदलना क्यों आवश्यक है: 2 में से 500 घटाया नहीं जा सकता — दोनों संख्याएँ भिन्न मात्रकों में हैं। दोनों को एक ही मात्रक (यहाँ मिलीलीटर) में लाने पर घटाना सार्थक हो जाता है। आयतन के किसी भी प्रश्न में सबसे पहले यही जाँचिए।
संकेत: 1500 mL = 1500 cm³ भी है, क्योंकि 1 mL = 1 cm³। और चूँकि जल का घनत्व लगभग 1 g/mL है, इतने जल का द्रव्यमान लगभग 1500 g अर्थात 1.5 kg होगा।
प्र7.
किसी वस्तु का द्रव्यमान 400 g और आयतन 40 cm³ है। इसका घनत्व क्या है?
उत्तर
द्रव्यमान = 400 g, आयतन = 40 cm³

घनत्व = द्रव्यमान / आयतन
घनत्व = 400 g ÷ 40 cm³
घनत्व = 10 g/cm³

जल के सापेक्ष इसका आपेक्षिक घनत्व 10 ÷ 1 = 10 है। यह वस्तु जल से दस गुना सघन है, अतः जल में डूब जाएगी।

इस संख्या का अर्थ: इस वस्तु का प्रत्येक घन सेंटीमीटर 10 g पदार्थ रखता है, जबकि 1 cm³ जल में केवल लगभग 1 g होता है। इतने ऊँचे घनत्व भारी धातुओं के होते हैं — सीसा लगभग 11.3 g/cm³ और चाँदी लगभग 10.5 g/cm³।
प्र8.
चित्र 9.25 (क) और 9.25 (ख) का विश्लेषण कीजिए। बिना छिला हुआ संतरा जल में क्यों तैरता है एवं छिला हुआ संतरा जल में क्यों डूब जाता है? व्याख्या कीजिए।
उत्तर

छिलका असंख्य सूक्ष्म वायु-कोष्ठों से भरा होता है। वह संतरे में आयतन तो बहुत जोड़ता है पर द्रव्यमान बहुत थोड़ा, इसलिए बिना छिले पूरे फल का औसत घनत्व 1 g/cm³ से नीचे रहता है और वह तैरता है (चित्र 9.25, क)। छिलका उतारते ही वह हल्की, वायु-भरी परत हट जाती है; जो बचता है वह रसीला सघन गूदा है जिसका घनत्व 1 g/cm³ से कुछ अधिक होता है, अतः वह डूब जाता है (चित्र 9.25, ख)।

बिना छिला संतरा (चित्र 9.25, क)छिला हुआ संतरा (चित्र 9.25, ख)
द्रव्यमानकुछ अधिक (छिलका सहित)कुछ कम
आयतनकहीं अधिक — मोटा स्पंजी छिलकाकहीं कम
औसत घनत्व = द्रव्यमान/आयतन1 g/cm³ से कम1 g/cm³ से अधिक
जल में परिणामतैरता हैडूब जाता है
ऐसा क्यों होता है: यह विरोधाभास लगता है — द्रव्यमान घटाने पर संतरा डूब गया — परंतु घनत्व एक अनुपात है। छिलका उतारने से द्रव्यमान थोड़ा घटता है और आयतन बहुत अधिक; भिन्न के हर में से अंश की अपेक्षा अधिक घटाने पर अनुपात बढ़ जाता है। छिलके में फँसी वायु ठीक वही काम कर रही है जो बुरादे के लिए खोखली कोशिकाएँ और चाटी के लिए खोखला बाँस करता है।
यह करके देखिए: एक ही आकार के दो संतरे लीजिए, एक छिला हुआ और एक बिना छिला। और पृष्ठ 140 की चेतावनी स्मरण रखिए — घनत्व ही तैरने का एकमात्र कारक नहीं है, परंतु इस जोड़ी में निर्णायक कारक वही है।
प्र9.
किसी वस्तु ‘क’ का द्रव्यमान 200 g और आयतन 40 cm³ है। वस्तु ‘ख’ का द्रव्यमान 240 g और आयतन 60 cm³ है। किस वस्तु का घनत्व सघन है?
उत्तर
वस्तु ‘क’: घनत्व = 200 g ÷ 40 cm³ = 5 g/cm³
वस्तु ‘ख’: घनत्व = 240 g ÷ 60 cm³ = 4 g/cm³

5 g/cm³ > 4 g/cm³ → वस्तु ‘क’ अधिक सघन है
भारी वस्तु अधिक सघन क्यों नहीं है: ‘ख’ का द्रव्यमान अधिक है — 240 g बनाम 200 g — फिर भी वह दोनों में कम सघन है, क्योंकि वह द्रव्यमान 40 cm³ के स्थान पर 60 cm³ में फैला है। घनत्व द्रव्यमान से भिन्न प्रश्न पूछता है: "पदार्थ कितना है?" नहीं, बल्कि "प्रत्येक इकाई स्थान में पदार्थ कितना भरा है?" उचित तुलना के लिए आयतन से भाग देना अनिवार्य है।
स्वयं जाँचिए: दोनों को एक ही आयतन पर लाइए। 120 cm³ में ‘क’ का 600 g होगा और ‘ख’ का केवल 480 g — वही निष्कर्ष, बिना भाग दिए।
प्र10.
रीमा के पास प्रतिरूपण मृदा (मॉडलिंग क्ले) का एक टुकड़ा है जिसका वजन 120 g है। वह पहले इसे एक ठोस घन के रूप में ढालती है जिसका आयतन 60 cm³ है। इसके पश्चात वह इसे एक पतले पत्रक के रूप में समतल करती है। अनुमान लगाइए कि इसके घनत्व पर क्या प्रभाव पड़ेगा?
उत्तर

कोई प्रभाव नहीं पड़ेगा — घनत्व ठीक वही रहेगा, 2 g/cm³।

घन के रूप में: घनत्व = 120 g ÷ 60 cm³ = 2 g/cm³

पतले पत्रक के रूप में:
द्रव्यमान = अब भी 120 g (न कुछ जोड़ा गया, न हटाया गया)
आयतन = अब भी 60 cm³ (मृदा केवल पुनः व्यवस्थित हुई है, न दबाई गई न खींची गई)
घनत्व = 120 g ÷ 60 cm³ = 2 g/cm³
ऐसा क्यों होता है: समतल करने से आकृति बदलती है, पदार्थ की मात्रा और घेरा गया स्थान नहीं। जैसा अध्याय कहता है, पदार्थ का घनत्व उसके आकार या आकृति पर निर्भर नहीं करता; वह केवल तापमान और दाब पर निर्भर करता है। इनमें से कुछ भी नहीं बदला, अतः घनत्व भी नहीं बदलेगा।
संकेत: मृदा का पतला पत्रक जल पर तैर भी सकता है जबकि घन डूब जाता है — पर यह घनत्व का परिवर्तन नहीं है। यह आकृति का परिवर्तन है, और ठीक इसी कारण इस्पात का जहाज़ तैरता है जबकि इस्पात की कील नहीं।
प्र11.
लोहे के एक ब्लॉक का द्रव्यमान 600 g और घनत्व 7.9 g/cm³ है। इसका आयतन क्या होगा?
उत्तर

घनत्व के सूत्र को आयतन के लिए पुनर्व्यवस्थित कीजिए।

घनत्व = द्रव्यमान / आयतन   →   आयतन = द्रव्यमान / घनत्व

आयतन = 600 g ÷ 7.9 g/cm³
आयतन = 75.95 cm³ (लगभग 76 cm³)

उलटकर जाँचिए: 75.95 cm³ × 7.9 g/cm³ = 600.0 g। ✔

उत्तर इतना छोटा क्यों है: 600 g जल 600 cm³ स्थान भरेगा — एक बड़ी बोतल का लगभग आधा। उतने ही 600 g लोहे को 76 cm³ से भी कम स्थान चाहिए, अर्थात लगभग 4 cm भुजा का एक टुकड़ा, क्योंकि लोहा प्रत्येक घन सेंटीमीटर में 7.9 g भरता है। ऊँचे घनत्व का व्यावहारिक अर्थ यही है।
संकेत: भाग देते समय मात्रकों पर ध्यान रखिए: g ÷ (g/cm³) = cm³। यदि आपके मात्रक आयतन के रूप में न आएँ तो आपने सूत्र उलटा लगाया है।
प्र12.
आपको चित्र 9.26 (क) और 9.26 (ख) में दर्शाए अनुसार एक प्रयोगात्मक व्यवस्था दी गई है। परखनली (चित्र 9.26, ख) को गरम जल (~70 °C) से भरे बीकर में रखने पर काँच की नली में जल के स्तर में वृद्धि हो जाती है। यह घनत्व को किस प्रकार प्रभावित करता है?
उत्तर

जल का घनत्व घट जाता है। काँच की नली में स्तर का ऊपर उठना ही इस बात का दिखाई देने वाला चिह्न है कि जल फैल गया है।

परखनली में जल का द्रव्यमान: अपरिवर्तित — नली कॉर्क से बंद है, न कुछ भीतर आता है न बाहर जाता है
उसी जल का आयतन: बढ़ जाता है — इसीलिए काँच की नली में स्तर ऊपर चढ़ता है

घनत्व = द्रव्यमान / आयतन
वही द्रव्यमान ÷ बढ़ा हुआ आयतन = कम घनत्व
ऐसा क्यों होता है: गरम करने पर जल के कणों को अधिक ऊर्जा मिलती है, वे तेज़ चलते हैं और एक-दूसरे से कुछ और दूर हट जाते हैं। उतने ही कणों को — अर्थात उतने ही द्रव्यमान को — अब अधिक स्थान चाहिए, और संकीर्ण काँच की नली थोड़े-से विस्तारण को भी स्तर की बड़ी वृद्धि के रूप में दिखा देती है। यही खंड 9.5.2 का सामान्य नियम है: गरम करने पर पदार्थ का घनत्व घटता है और ठंडा करने पर बढ़ता है।
क्या आप जानते हैं? यही प्रभाव बताता है कि गरम वायु ऊपर क्यों उठती है और गरम वायु का गुब्बारा कैसे उड़ता है (चित्र 9.22), तथा यही क्रियाकलाप 9.2 में उपयोग किए गए द्रव तापमापी का कार्य-सिद्धांत भी है — बल्ब का द्रव भी ठीक इसी प्रकार संकीर्ण नली में फैलकर ऊपर चढ़ता है।
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