कुतूहल अध्याय 9 पाठ्य प्रश्न

अद्यतन2026-09-05

प्र1.
क्या गैसें भी जल में घुलती हैं?
उत्तर

हाँ। ऑक्सीजन सहित अनेक गैसें जल में घुलती हैं, यद्यपि ऑक्सीजन जल में सीमित मात्रा में ही घुलती है।

मात्रा भले ही अल्प हो, तालाब, नदी या समुद्र का समस्त जीवन उसी पर निर्भर है। मछलियाँ, जलीय पौधे और अन्य जीव अपनी ऑक्सीजन जल से ही लेते हैं, ऊपर की वायु से नहीं, और यही घुली हुई ऑक्सीजन उन्हें जीवित रखती है।

ऐसा क्यों होता है: जल की सतह पर गैस के कण निरंतर टकराते रहते हैं और उनमें से कुछ जल-कणों के बीच के रिक्त स्थानों में फिसलकर वहीं रुक जाते हैं। गैस के कण पहले से ही दूर-दूर होते हैं और आपस में कसकर बँधे नहीं होते, इसलिए उन्हें नमक के क्रिस्टल की भाँति तोड़ना नहीं पड़ता — परंतु जल उनमें से थोड़े ही कणों को रख पाता है, इसीलिए गैस की विलेयता कम होती है।
क्या आप जानते हैं? ठंडे पेय की फुसफुसाहट दाब के अंतर्गत जल में घुली कार्बन डाइऑक्साइड है। बोतल खोलते ही दाब घटता है और गैस विलयन से निकलकर बुलबुलों के रूप में बाहर आती है।
प्र2.
जल में गैसों का यह मिश्रण समरूप है या विषमरूप?
उत्तर

यह समरूप मिश्रण है, अर्थात विलयन। गैसें जल में समान रूप से घुलती हैं; वे दिखाई नहीं देतीं, बुलबुलों के रूप में ऊपर नहीं उठतीं, और किसी भी गहराई से लिए गए नमूने में उतनी ही घुली गैस मिलेगी।

ऐसा क्यों होता है: घुली हुई गैस जल-कणों के बीच के रिक्त स्थानों में पृथक कणों के रूप में उपस्थित रहती है, ठीक वैसे ही जैसे घुला हुआ नमक। इतने छोटे और इतने समान रूप से फैले कण किसी आवर्धक युक्ति से भी नहीं देखे जा सकते, और यही समरूप मिश्रण की कसौटी है।
संकेत: कुछ देर रखे जल के गिलास की भीतरी दीवार पर जो बुलबुले चिपके दिखते हैं, वे जल के गरम होने पर विलयन से बाहर आई गैस हैं — वे घुली हुई गैस नहीं हैं।
प्र3.
क्या तापमान द्रवों में गैसों की विलेयता को भी प्रभावित करता है? यदि हाँ, तो कैसे?
उत्तर

हाँ, और ठोसों से उलटे ढंग से — तापमान बढ़ने पर गैसों की विलेयता सामान्यतः घटती है। ठंडे जल में अधिक ऑक्सीजन घुली रहती है; जल गरम होते ही घुली ऑक्सीजन निकल जाती है।

विलेयतापमान बढ़ाने का प्रभावअध्याय का उदाहरण
अधिकांश ठोसविलेयता बढ़ती हैजल में बेकिंग सोडा, 20 °C → 70 °C
गैसेंविलेयता घटती हैग्रीष्म ऋतु में तालाब के जल में ऑक्सीजन
ऐसा क्यों होता है: घुली हुई गैस का कण जल-कणों के बीच केवल ढीले-ढाले ढंग से टिका रहता है। गरम करने पर उसे इतनी ऊर्जा मिल जाती है कि वह छूटकर ऊपर की वायु में निकल जाए। ठोस के लिए यही ऊष्मा क्रिस्टल से कण तोड़ने में लगती है, जिससे घुलना सरल होता है; गैस में तोड़ने को कुछ है ही नहीं, इसलिए अतिरिक्त ऊर्जा केवल उसे निकलने में सहायता करती है।
क्या आप जानते हैं? इसी कारण ग्रीष्म की दोपहर में उथले तालाब की मछलियाँ कष्ट में रहती हैं, और किसी कारखाने से नदी में छोड़ा गया गरम जल बिना किसी प्रदूषक के भी जलीय जीवन को हानि पहुँचा सकता है।
प्र4.
मैंने देखा है कि कुछ विषमरूप मिश्रणों, जैसे— जल में बुरादे वाले मिश्रण में बुरादा तैरता है जबकि रेत और जल के मिश्रण में रेत डूब जाता है। मुझे आश्चर्य होता है कि ऐसा क्यों होता है?
उत्तर

घनत्व के कारण — अर्थात इकाई आयतन में भरे द्रव्यमान के कारण। बुरादे का घनत्व जल से कम है, इसलिए वह तैरता है; रेत का घनत्व जल से कहीं अधिक है, इसलिए वह डूब जाती है।

घनत्व = द्रव्यमान / आयतन
जल ≈ 1 g/cm³    लकड़ी और बुरादा: 1 g/cm³ से कम    रेत: लगभग 2.6 g/cm³
ऐसा क्यों होता है: लकड़ी भीतर से ठोस नहीं होती — वह वायु से भरी सूक्ष्म खोखली कोशिकाओं से बनी होती है, अतः लकड़ी का टुकड़ा अपने आयतन में बहुत कम द्रव्यमान समेटता है। रेत चट्टान के कण हैं जिनके भीतर वायु नहीं फँसी होती, इसलिए उतने ही आयतन में कहीं अधिक द्रव्यमान होता है। इनमें से कोई भी घुलता नहीं, अतः दोनों ही मिश्रण विषमरूप रहते हैं; अंतर केवल इतना है कि कण ऊपर बैठते हैं या तली में।
संकेत: पुस्तक पृष्ठ 140 पर एक महत्वपूर्ण चेतावनी देती है — घनत्व ही एकमात्र कारक नहीं है जो तैरना तय करता है। इस्पात का जहाज़ तैरता है यद्यपि इस्पात जल से कहीं अधिक सघन है, क्योंकि उसे विशेष आकृति दी जाती है और उसमें वायु बंद रहती है।
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