कुतूहल अध्याय 9 वैज्ञानिक परिचय

अद्यतन2026-09-05

प्र1.
असीमा चटर्जी ने औषधीय पौधों पर कार्य करने की प्रेरणा कहाँ से प्राप्त की।
उत्तर

भारत की अपनी सुदीर्घ पादप-औषधि परंपरा से। आयुर्वेद, सिद्ध और अन्य भारतीय पद्धतियाँ शताब्दियों से जड़ी-बूटियों द्वारा रोगों का उपचार करती आ रही थीं, और असीमा चटर्जी ने यह खोजना आरंभ किया कि प्रत्येक पौधे का कौन-सा रासायनिक यौगिक वास्तव में उपचार करता है — अर्थात पारंपरिक ज्ञान को परखी हुई रसायन-विद्या में बदलना।

उनकी विधि इसी अध्याय के रसायन का उपयोग है। किसी पौधे से उपयोगी यौगिक निकालने के लिए कुटी हुई जड़ी-बूटी को चुने हुए विलायक — जल, ऐल्कोहॉल अथवा हाइड्रो-ऐल्कोहॉलिक मिश्रण — में घोला जाता है ताकि वांछित यौगिक विलयन में आ जाए और शेष अधिकांश भाग न आए। सही विलायक चुनना और फिर घुले हुए भाग को पृथक तथा शुद्ध करना — इसी प्रकार उन्होंने यौगिक पृथक किए और अपस्मार-रोधी तथा मलेरिया-रोधी औषधियाँ विकसित कीं।

उपलब्धिविवरण
विज्ञान में डॉक्टरेटजानकी अम्माल के बाद यह उपाधि अर्जित करने वाली दूसरी भारतीय महिला
शांति स्वरूप भटनागर पुरस्काररसायन विज्ञान के क्षेत्र में यह पुरस्कार पाने वाली पहली महिला
पद्मभूषणविज्ञान में योगदान के लिए राष्ट्र द्वारा सम्मानित
विलायक क्यों महत्वपूर्ण है: कोई यौगिक केवल उसी विलायक में घुलता है जिसके कण उसे आकर्षित करते हैं। केवल जल का उपयोग करने पर वे यौगिक पीछे रह जाते हैं जिन्हें जल नहीं घोल सकता; ऐल्कोहॉल मिलाने पर बिलकुल दूसरा समूह घुलकर निकलता है। विलायक चुनकर रसायनज्ञ यह चुनता है कि पौधे से क्या बाहर आएगा।
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