गंगा अध्याय 1 अलग-अलग और साथ-साथ

अद्यतन2026-09-06

प्र1.
“दो-चार बार मोती ने गाड़ी को सड़क की खाई में गिराना चाहा; पर हीरा ने संभाल लिया। वह ज्यादा सहनशील था।” 1. कहानी के आधार पर हीरा और मोती की विशेषताएँ लिखिए। (संकेत— धैर्यवान, गुस्सैल, मेहनती, शांत, सहनशील आदि)
उत्तर

दोनों बैल एक-जैसे दिखते हैं, पर स्वभाव में अलग हैं। नीचे हर विशेषता के साथ कहानी का प्रमाण भी दिया गया है।

हीराप्रमाणमोतीप्रमाण
सहनशील और धैर्यवान“दो-चार बार मोती ने गाड़ी को सड़क की खाई में गिराना चाहा; पर हीरा ने संभाल लिया। वह ज्यादा सहनशील था।”गुस्सैल और उग्र“मोती का गुस्सा काबू के बाहर हो गया। हल लेकर भागा।”
विवेकी और दूरदर्शी“भागना व्यर्थ है।” और गराँव खुलने पर — “कल इस अनाथ पर आफत आएगी।”साहसी और निडर“कहो तो दिखा दूँ कुछ मजा मैं भी। लाठी लेकर आ रहा है।”
धर्मपरायण / मर्यादावादी“नहीं। हमारी जाति का यह धर्म नहीं है।”; “गिरे हुए बैरी पर सींग न चलाना चाहिए।”व्यावहारिक और स्पष्टवादी“यह सब ढोंग है। बैरी को ऐसा मारना चाहिए कि फिर न उठे।”
नेतृत्व करने वाला और योजनाकारसाँड़ के समय — “उपाय यही है कि उस पर दोनों जने एक साथ चोट करें। मैं आगे से रगेदता हूँ, तुम पीछे से रगेदो।”दृढ़ और अडिग मित्र“तुम मुझे इतना स्वार्थी समझते हो, हीरा?” — दीवार गिरने के बाद भी नहीं भागा।
दृढ़-संकल्प“जोर तो मारता ही जाऊँगा, चाहे कितने ही बंधन पड़ते जाएँ।”परोपकारी“मोती ने दोनों गधों को सींगों से मार-मारकर बाड़े के बाहर निकाला।”
भावुक और आशावादी“एक बार भगवान ने उस लड़की के रूप में हमें बचाया था। क्या अब न बचाएँगे?”आत्माभिमानी“अगर वह मुझे पकड़ता, तो मैं बे-मारे न छोड़ता।” और “मर जाऊँगा; पर उसके काम तो न आऊँगा।”
दोनों में समान क्या है: मेहनती, स्वाभिमानी, वफ़ादार, बुद्धिमान और एक-दूसरे के प्रति अटूट प्रेम रखने वाले। दोनों ही मार खाकर भी झुके नहीं और दोनों ही अपने घर लौट आए।
प्र2.
2. हीरा और मोती की विशेषताएँ कुछ-कुछ समान और कुछ-कुछ अलग हैं, किंतु उनकी भिन्न विशेषताएँ एक-दूसरे को पूरा करती हैं। कैसे?
उत्तर

दोनों की भिन्नताएँ आपस में टकराती नहीं, एक-दूसरे की कमी भरती हैं। यही उनकी जोड़ी की ताकत है।

प्रसंगअकेले हीरा होता तोअकेले मोती होता तोदोनों साथ थे, इसलिए
गया की मारचुपचाप सहता रहता; मार बढ़ती जाती।पहले ही दिन किसी को गिरा देता और शायद गोली-लाठी का शिकार हो जाता।मोती के तेवर से गया रुक गया, और हीरा के संयम से बात हिंसा तक नहीं पहुँची — “इस वक्त टाल जाना ही मसलहत है।”
साँड़ का सामना“भागना कायरता है” कहकर अकेला भिड़ता और मारा जाता — साँड़ “पूरा हाथी” था।क्रोध में सीधे टकराता, पर एक शत्रु से अकेले लड़ने में साँड़ ही उस्ताद था।हीरा ने योजना बनाई और मोती ने साहस दिया — “साँड़ को भी संगठित शत्रुओं से लड़ने का तजुरबा न था।” विजय हुई।
छोटी लड़की का गराँव खोलनावह चिंता तो करता, पर शायद वहीं रुक जाता।तुरंत भाग निकलता — पर लड़की पर आफत आ जाती।हीरा की चिंता से लड़की बच गई (उसने स्वयं शोर मचा दिया) और मोती की तेज़ी से दोनों भाग भी निकले।
काँजीहौसअकेला दीवार पर चोट करता, डंडे खाकर बँध जाता और वहीं रह जाता।दीवार तोड़कर अकेला भाग जाता, पर संकल्प की वह चिंगारी न होती जो हीरा ने दी।हीरा ने शुरुआत और विचार दिया (“सोचो, दीवार खुद जाती तो कितनी जानें बच जातीं”), मोती ने ताकत और अंत तक जुटे रहना — नौ-दस प्राणी बच गए।
दढ़ियल से मुक्ति“भगवान की दया है” कहकर प्रतीक्षा करता।पहले ही रास्ते में उस पर टूट पड़ता।हीरा ने घर तक पहुँचने का धैर्य रखा और मोती ने द्वार पर आकर सींग चलाया — दोनों काम सही समय पर हुए।
सार: हीरा मस्तिष्क है और मोती भुजा; हीरा संयम है और मोती साहस। अकेला संयम दब जाता है और अकेला साहस टूट जाता है। दोनों मिलकर वह बन जाते हैं जो कोई अकेला नहीं बन सकता था। यही ‘अलग-अलग और साथ-साथ’ शीर्षक का अर्थ भी है — भिन्नता कमी नहीं, पूरकता है।
प्र3.
3. आपकी कक्षा में भी कुछ-कुछ समान और कुछ-कुछ भिन्न विशेषताओं वाले सहपाठी हैं। सबकी आवश्यकताएँ भी थोड़ी समान और थोड़ी भिन्न हैं। बताइए कि आप भिन्न विशेषताओं वाले सहपाठी से अपने लिए कैसा व्यवहार चाहते हैं? उनसे पता कीजिए कि वे आपसे अपने लिए कैसा व्यवहार चाहते हैं? (संकेत— क्या-क्या करें और क्या-क्या न करें, कैसे पढ़ाई खेल आदि में एक-दूसरे की सहायता करें और साथ दें)
उत्तर

यह कक्षा में करने की गतिविधि है। इसे तीन चरणों में कीजिए —

  1. अपनी सूची बनाइए — कागज़ पर दो खाने बनाइए: ‘मैं चाहता/चाहती हूँ कि मेरे साथी ऐसा करें’ और ‘ऐसा न करें’।
  2. जोड़ी बनाकर पूछिए — ऐसे सहपाठी को चुनिए जो आपसे भिन्न हो — जो अलग भाषा या बोली बोलता हो, अलग खेल पसंद करता हो, धीरे पढ़ता हो या बहुत तेज़ हो, या जिसे देखने-सुनने-चलने में कोई कठिनाई हो। उसकी दोनों सूचियाँ सुनिए और लिख लीजिए।
  3. तुलना कीजिए — देखिए कि दोनों की सूचियों में कौन-सी बातें एक जैसी हैं। प्रायः यह देखकर सबसे बड़ी सीख मिलती है कि जो हम दूसरों से चाहते हैं, वही दूसरे भी हमसे चाहते हैं।
क्या करेंक्या न करें
नाम से पुकारें और पूरी बात सुनेंउपनाम रखकर चिढ़ाएँ या बीच में टोकें
समझ न आने पर बिना झिझक पूछने दें और धैर्य से समझाएँ“इतना भी नहीं आता?” जैसे वाक्य कहें
खेल की टीम में सबको बारी देंकमज़ोर खिलाड़ी को हमेशा अंत में चुनें या बाहर बैठाएँ
उसकी भाषा, बोली, खाने और त्योहार के बारे में जिज्ञासा से पूछेंउसकी बोली या उच्चारण की नकल उतारकर हँसें
अनुपस्थित रहने पर नोट्स दें; किसी को लिखने में कठिनाई हो तो सहायक बनेंकिसी की कठिनाई को उसकी कमी बताकर चर्चा करें
गलती हो जाने पर सीधे क्षमा माँग लेंगुट बनाकर किसी एक को अलग-थलग कर दें
नमूना उत्तर: “मैं गणित में ठीक हूँ पर चित्र बनाना मुझे नहीं आता। मेरे सहपाठी रोहन को गणित कठिन लगता है, पर उसके बनाए चित्र पूरी कक्षा में सबसे अच्छे होते हैं। मैं चाहता हूँ कि जब मैं विज्ञान की कॉपी में आरेख बनाऊँ तो वह हँसे नहीं, बल्कि दिखा दे कि रेखाएँ कैसे सीधी खींचनी हैं। उससे पूछने पर उसने कहा कि वह चाहता है कि जब वह सवाल हल न कर पाए तो मैं उत्तर बताकर आगे न बढ़ जाऊँ, बल्कि यह समझाऊँ कि हल का पहला कदम क्या है। हम दोनों ने तय किया कि हर शनिवार आधा घंटा एक-दूसरे को यही सिखाएँगे। जैसे हीरा और मोती की भिन्न विशेषताएँ एक-दूसरे को पूरा करती थीं, वैसे ही हम दोनों की भिन्नता हमारे काम आ रही है।”
प्र4.
4. “दोनों आमने-सामने या आस-पास बैठे हुए एक-दूसरे से मूक-भाषा में विचार-विनिमय करते थे।” कहानी में अनेक स्थानों पर ‘मूक-भाषा’ का उल्लेख किया गया है। आपके विचार से हीरा और मोती किस प्रकार आपस में बातें किया करते होंगे? अनुमान और कल्पना से बताइए।
उत्तर

‘मूक-भाषा’ का अर्थ है — बिना ध्वनि के, शरीर और भाव से की गई बात। पशु सचमुच इसी तरह संवाद करते हैं। कहानी में जो संकेत मिलते हैं, उन्हीं के आधार पर अनुमान लगाया जा सकता है।

माध्यमकैसे बात बनती होगीकहानी का आधार
आँखेंकनखियों से देखना = ‘अभी चुप रहो’; टकटकी लगाना = चिंता; आँखों का भर आना = विवशता।“एक-दूसरे को कनखियों से देखा और लेट गए।”; “दोनों ने एक-दूसरे को भीत नेत्रों से देखा और सिर झुका लिया।”; “मोती ने आँखों में आँसू लाकर कहा…”
सींग और सिरसींग मिलाना = हँसी-मज़ाक और अपनापन; सींग नीचे करना = विरोध और चेतावनी; सिर झुकाना = हार मानना या स्नेह।“कभी-कभी दोनों सींग भी मिला लिया करते थे— … केवल विनोद के भाव से”; “मारता तो दोनों सींग नीचे करके हुँकारते।”
पूँछ, कान और खुरपूँछ खड़ी होना = प्रसन्नता और उत्साह; कान खड़े करना = आहट लेना; पैर पटकना = अधीरता या क्रोध।“दोनों की पूँछें खड़ी हो गईं।”; “रह-रहकर आहट ले लेते थे।”
स्पर्श और गंधचाटना और सूँघना = प्रेम, सांत्वना और थकान मिटाना; हाथ चाटना = कृतज्ञता।“दोनों एक-दूसरे को चाटकर और सूँघकर अपना प्रेम प्रकट करते”; “एक-दूसरे को चाट-चूटकर अपनी थकान मिटा लिया करते।”; “दोनों सिर झुकाकर उसका हाथ चाटने लगे।”
ध्वनि और साँसहुँकारना, डकार लेना, नाक से फुफकारना — इनसे आक्रोश, तृप्ति या चेतावनी सूचित होती है।“सींग नीचे करके हुँकारते”; “पहले दोनों ने डकार ली।”
साथ-साथ किया गया कामदोनों का एक साथ उठना, एक साथ मुँह हटाना — यह बिना कहे बनी सहमति है, संवाद का सबसे पक्का रूप।“एक मुँह हटा लेता, तो दूसरा भी हटा लेता था।”; “दोनों ने अपनी मूक-भाषा में सलाह की।”
कल्पना का एक दृश्य: काँजीहौस की उस रात हीरा ने केवल इतना किया होगा कि अपने नुकीले सींग दीवार की ओर घुमाकर मोती की आँखों में देखा हो — और मोती समझ गया होगा कि ‘चलो, अब यहाँ से निकलना है’। इसी को प्रेमचंद ने संवाद में बदल दिया। असल में लेखक ने वह लिख दिया है जो बैल कह नहीं सकते थे, पर कह रहे थे। यही इस कहानी का सबसे सुंदर शिल्प है।
प्र5.
5. आप भी अनेक अवसरों पर बिना शब्दों का उच्चारण किए संवाद करते हैं। कब-कब? कहाँ-कहाँ? कुछ उदाहरण लिखिए।
उत्तर

हम दिन में जितना बोलकर कहते हैं, उससे कम नहीं, बल्कि कई बार अधिक बिना बोले कह देते हैं। कुछ अवसर —

कहाँसंकेतअर्थ
कक्षा मेंहाथ उठाना“मुझे उत्तर आता है / मुझे कुछ पूछना है।”
शिक्षक का भौंह चढ़ाकर देखना“शोर बंद करो।”
परीक्षा में मित्र का कंधे उचकाना“मुझे भी नहीं आ रहा।”
घर मेंमाँ का चम्मच नीचे रखकर देखना“बहुत हो गया, अब चुप।”
पिता का सिर हिलाकर हामी भरना“हाँ, जाओ।”
खेल के मैदान मेंक्रिकेट में कीपर का इशारा, फुटबॉल में हाथ उठाकर पास माँगना“गेंद मेरी ओर करो / मैं खाली हूँ।”
अंपायर की उँगली ऊपर उठना“आउट।”
सड़क परयातायात पुलिस का हाथ का इशारा; लाल-हरी बत्ती; ज़ेबरा क्रॉसिंग“रुको / चलो / यहाँ से पार करो।”
वाहन का हॉर्न या इंडिकेटर“मैं मुड़ रहा हूँ।”
सार्वजनिक स्थानों पररेलवे स्टेशन, अस्पताल और हवाई अड्डे के चिह्न (तीर, कूड़ेदान, मौन का चिह्न, दिव्यांग-चिह्न)पूरी सूचना बिना भाषा के — इसीलिए हर भाषा का यात्री समझ लेता है।
भावों मेंमुस्कुराना, गले लगाना, आँख चुराना, पीठ थपथपाना, आँसूस्वागत, स्नेह, अपराध-बोध, शाबाशी, दुख — इनके लिए शब्द प्रायः कम पड़ जाते हैं।
औपचारिक सांकेतिक भाषाभारतीय सांकेतिक भाषा (ISL), ब्रेल के साथ प्रयुक्त स्पर्श-संकेतमूक-बधिर मित्रों के लिए यह पूरी और नियमबद्ध भाषा है — इशारा नहीं, भाषा
सोचिए: इनमें से अधिकांश संकेत ऐसे हैं जिन्हें हमने कभी सीखा नहीं, फिर भी सब समझते हैं। इसीलिए प्रेमचंद ने लिखा था कि हीरा-मोती में “कोई ऐसी गुप्त शक्ति थी जिससे … मनुष्य वंचित है” — वह शक्ति मनुष्य में भी है, बस हम शब्दों पर इतना भरोसा करने लगे हैं कि उसे भूल जाते हैं।
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