प्र1.
1. “वह अपना धर्म छोड़ दे लेकिन हम अपना धर्म क्यों छोड़ें!” कहानी के अनुसार हीरा और मोती सदैव ध्यान रखते थे कि कौन-से कार्य करने योग्य हैं और कौन-से नहीं। वे कौन-कौन से कार्य कभी नहीं करते थे?
उत्तर
हीरा और मोती के लिए ‘धर्म’ का अर्थ पूजा-पाठ नहीं, आचरण की मर्यादा है। कहानी में उनकी छह वर्जनाएँ साफ़ दिखती हैं —
- स्त्री पर सींग नहीं चलाते। मोती ने मालकिन को फेंक देने की बात कही तो हीरा ने रोका — “लेकिन औरत जात पर सींग चलाना मना है, यह भूले जाते हो।”
- गिरे हुए शत्रु पर वार नहीं करते। साँड़ को हराने के बाद — “गिरे हुए बैरी पर सींग न चलाना चाहिए।” और सचमुच, “साँड़ बेदम होकर गिर पड़ा। तब दोनों ने उसे छोड़ दिया।”
- निर्दोष को हानि नहीं पहुँचाते। गया को मारने का मौका था, पर हीरा ने सोचा कि “वह प्यारी लड़की, जो हमें रोटियाँ खिलाती है, उसी की लड़की है… यह बेचारी अनाथ न हो जाएगी?” अपने बदले के लिए किसी अनाथ को और अनाथ नहीं बनाया।
- अपने उपकारी को संकट में नहीं डालते। गराँव खुल जाने पर भी वे रुक गए — “कल इस अनाथ पर आफत आएगी। सब इसी पर संदेह करेंगे।”
- कायरता नहीं दिखाते। साँड़ के सामने से भागने के सुझाव पर हीरा का उत्तर — “भागना कायरता है।”
- मित्र को संकट में अकेला नहीं छोड़ते। “हीरा ने देखा, संगी संकट में है, तो लौट पड़ा। फँसेंगे तो दोनों फँसेंगे।” और मोती ने दीवार गिरने के बाद भी भागने से इनकार कर दिया।
ध्यान देने की बात: ये सब वे काम हैं जिनसे उन्हें लाभ हो सकता था — गया को मारकर वे छूट सकते थे, मालकिन को फेंककर बदला ले सकते थे, अकेले भागकर मोती बच सकता था। पर उन्होंने हर बार लाभ के बजाय मर्यादा चुनी। इसीलिए हीरा कहता है — “वह अपना धर्म छोड़ दे, लेकिन हम अपना धर्म क्यों छोड़ें?” यही वाक्य कहानी की नैतिक ऊँचाई है: दूसरे के अन्याय को अपने अन्याय का बहाना नहीं बनाया जा सकता।