गंगा अध्याय 1 हमारी धरोहर और संस्कृति

अद्यतन2026-09-06

प्र1.
1. “वह अपना धर्म छोड़ दे लेकिन हम अपना धर्म क्यों छोड़ें!” कहानी के अनुसार हीरा और मोती सदैव ध्यान रखते थे कि कौन-से कार्य करने योग्य हैं और कौन-से नहीं। वे कौन-कौन से कार्य कभी नहीं करते थे?
उत्तर

हीरा और मोती के लिए ‘धर्म’ का अर्थ पूजा-पाठ नहीं, आचरण की मर्यादा है। कहानी में उनकी छह वर्जनाएँ साफ़ दिखती हैं —

  1. स्त्री पर सींग नहीं चलाते। मोती ने मालकिन को फेंक देने की बात कही तो हीरा ने रोका — “लेकिन औरत जात पर सींग चलाना मना है, यह भूले जाते हो।”
  2. गिरे हुए शत्रु पर वार नहीं करते। साँड़ को हराने के बाद — “गिरे हुए बैरी पर सींग न चलाना चाहिए।” और सचमुच, “साँड़ बेदम होकर गिर पड़ा। तब दोनों ने उसे छोड़ दिया।”
  3. निर्दोष को हानि नहीं पहुँचाते। गया को मारने का मौका था, पर हीरा ने सोचा कि “वह प्यारी लड़की, जो हमें रोटियाँ खिलाती है, उसी की लड़की है… यह बेचारी अनाथ न हो जाएगी?” अपने बदले के लिए किसी अनाथ को और अनाथ नहीं बनाया।
  4. अपने उपकारी को संकट में नहीं डालते। गराँव खुल जाने पर भी वे रुक गए — “कल इस अनाथ पर आफत आएगी। सब इसी पर संदेह करेंगे।”
  5. कायरता नहीं दिखाते। साँड़ के सामने से भागने के सुझाव पर हीरा का उत्तर — “भागना कायरता है।”
  6. मित्र को संकट में अकेला नहीं छोड़ते। “हीरा ने देखा, संगी संकट में है, तो लौट पड़ा। फँसेंगे तो दोनों फँसेंगे।” और मोती ने दीवार गिरने के बाद भी भागने से इनकार कर दिया।
ध्यान देने की बात: ये सब वे काम हैं जिनसे उन्हें लाभ हो सकता था — गया को मारकर वे छूट सकते थे, मालकिन को फेंककर बदला ले सकते थे, अकेले भागकर मोती बच सकता था। पर उन्होंने हर बार लाभ के बजाय मर्यादा चुनी। इसीलिए हीरा कहता है — “वह अपना धर्म छोड़ दे, लेकिन हम अपना धर्म क्यों छोड़ें?” यही वाक्य कहानी की नैतिक ऊँचाई है: दूसरे के अन्याय को अपने अन्याय का बहाना नहीं बनाया जा सकता।
प्र2.
2. “गिरे हुए बैरी पर सींग न चलाना चाहिए।” “लेकिन औरत जात पर सींग चलाना मना है, यह भूले जाते हो।” हीरा के ये कथन किन भारतीय मूल्यों की ओर संकेत करते हैं?
उत्तर

हीरा के ये दोनों कथन भारतीय परंपरा के उन मूल्यों की ओर संकेत करते हैं जो युद्ध में भी मर्यादा बनाए रखने पर बल देते हैं।

कथनजिस मूल्य की ओर संकेतउसका अर्थ
“गिरे हुए बैरी पर सींग न चलाना चाहिए।”युद्ध-धर्म / क्षात्र-धर्मनिहत्थे, घायल, पीठ फेरकर भागते या गिरे हुए शत्रु पर वार न करना। महाभारत और रामायण से चली आ रही यह मर्यादा भारतीय युद्ध-नीति का मूल नियम रही है।
करुणा और क्षमाजो अब हानि नहीं पहुँचा सकता, उस पर दया करना। शक्ति का उद्देश्य रक्षा है, प्रतिशोध नहीं।
अहिंसा की सीमा-रेखाअहिंसा का अर्थ लड़ना ही नहीं है — अर्थ यह है कि हिंसा वहीं तक हो जहाँ तक आत्मरक्षा के लिए आवश्यक हो। एक कदम आगे बढ़ते ही वह क्रूरता बन जाती है।
“औरत जात पर सींग चलाना मना है।”नारी के प्रति सम्मान और रक्षा-भावभारतीय समाज में स्त्री पर हाथ उठाना सबसे निंदनीय आचरण माना गया है, चाहे वह स्त्री स्वयं अन्याय कर रही हो। मालकिन ने उन्हें भूखा रखा था, फिर भी हीरा ने यह वर्जना नहीं तोड़ी।
निर्बल पर बल का प्रयोग न करनाअपने से कमज़ोर पर शक्ति दिखाना वीरता नहीं, कायरता है। हीरा-मोती का बल साँड़ और दढ़ियल के लिए है, घर की स्त्री के लिए नहीं।
एक ज़रूरी स्पष्टीकरण: ‘औरत जात पर सींग चलाना मना है’ को आज इस अर्थ में नहीं लेना चाहिए कि स्त्री कमज़ोर है। इसका सही और आधुनिक अर्थ यह है — जो निहत्था है और जिससे सीधा खतरा नहीं है, उस पर बल का प्रयोग नहीं करना चाहिए। प्रेमचंद ने यह वाक्य पशु के मुँह से कहलवाकर मनुष्य पर व्यंग्य भी किया है: जिन मर्यादाओं को मनुष्य भूल जाता है, उन्हें ये ‘बुद्धिहीन’ समझे जाने वाले बैल याद रखते हैं।
प्र3.
3. “दूसरे दिन गया ने बैलों को हल में जोता” (क) खेतों में जुताई के लिए बैल और हल कृषि के पारंपरिक उपकरण हैं। कृषि के अन्य पारंपरिक और आधुनिक उपकरणों तथा उनके उपयोग के विषय में पता लगाइए और लिखिए।
उत्तर

भारतीय खेती के उपकरणों को दो वर्गों में देखा जा सकता है — पारंपरिक (जिनमें पशु-शक्ति और मानव-श्रम लगता है) और आधुनिक (जिनमें इंजन या बिजली की शक्ति लगती है)।

वर्गउपकरणउपयोग
पारंपरिकहल (लकड़ी का, फाल लगा हुआ)मिट्टी को पलटकर जोतना, ताकि वह भुरभुरी हो और बीज जम सके। कहानी में यही उपकरण है।
जुआ, जोत और रस्सीदो बैलों को जोड़कर हल या गाड़ी से बाँधना। कहानी में मोती ने इन्हीं को तोड़ डाला था — “हल, रस्सी, जुआ, जोत, सब टूट-टाट कर बराबर हो गया।”
पटेला / हेंगा (सुहागा)जुते हुए खेत को समतल करना और ढेले तोड़ना।
कुदाल और फावड़ाक्यारी बनाना, मेड़ बाँधना, नाली खोदना, गुड़ाई करना।
खुरपीखरपतवार (घास-फूस) निकालना।
हँसिया / दराँतीफ़सल की कटाई करना।
पुर / रहट / ढेंकलीकुएँ से पानी निकालकर खेत की सिंचाई करना। कहानी में उल्लेख है — “इसी कुएँ पर हम पुर चलाने आया करते थे।”
बैलगाड़ीखाद, बीज और उपज की ढुलाई।
सूप, ओखली-मूसल, चक्कीअनाज फटकना, कूटना और पीसना।
आधुनिकट्रैक्टरजुताई, ढुलाई और अन्य यंत्रों को चलाने की मुख्य शक्ति।
कल्टीवेटर / रोटावेटर / डिस्क हैरोतेज़ी से जुताई और मिट्टी को बारीक करना।
सीड ड्रिल (बीज-बुआई यंत्र)बीज को समान दूरी और समान गहराई पर बोना — इससे बीज कम लगता है और उपज बढ़ती है।
थ्रेशरकटी फ़सल से दाना अलग करना।
हार्वेस्टर / कंबाइन हार्वेस्टरकटाई, गहाई और सफ़ाई — तीनों काम एक साथ।
पंप सेट और ट्यूबवेलभूजल से सिंचाई।
ड्रिप और स्प्रिंकलर सिंचाईबूँद-बूँद या फुहार से पानी देना — जल की बड़ी बचत।
स्प्रेयर और ड्रोनखाद, कीटनाशक और पोषक तत्वों का छिड़काव; ड्रोन से फ़सल की निगरानी भी।
पता लगाने का तरीका: अपने गाँव या आस-पास के किसी किसान से बात कीजिए और पूछिए कि उनके दादा के समय कौन-से औज़ार चलते थे और आज कौन-से चलते हैं। हर औज़ार का स्थानीय नाम भी लिखिए — जैसे कहीं हल को ‘नागर’ और सुहागे को ‘पटेला’ कहते हैं। यही आपके उत्तर को सबसे अलग बनाएगा।
सोचने की बात: मशीनों ने काम आसान और तेज़ किया है, पर छोटे किसान के लिए बैल आज भी सस्ते और उपयोगी हैं — वे ईंधन नहीं माँगते, गोबर से खाद देते हैं और छोटे खेतों में मुड़ भी जाते हैं, जहाँ ट्रैक्टर नहीं मुड़ पाता।
प्र4.
3. (ख) भारत में बैल केवल पशु नहीं बल्कि कृषि संस्कृति का अभिन्न अंग हैं। लिखिए कि भारतीय गाँवों एवं शहरों में भी बैल किस-किस काम में सहायक होते हैं?
उत्तर

बैल भारतीय जीवन में केवल ‘काम का जानवर’ नहीं, संस्कृति का हिस्सा हैं। उनकी उपयोगिता तीन स्तरों पर देखी जा सकती है।

क्षेत्रबैल का काम
गाँव — खेतीहल से जुताई; सुहागा/पटेला खींचकर खेत समतल करना; बीज बोने की कूँड़ बनाना; कुएँ से पुर या रहट चलाकर सिंचाई; खलिहान में दाँय चलाकर (गोल घुमाकर) अनाज की गहाई; कोल्हू चलाकर गन्ने का रस और सरसों का तेल निकालना।
गाँव — ढुलाईबैलगाड़ी से खाद, बीज, अनाज, गन्ना, भूसा, लकड़ी और ईंट-गिट्टी की ढुलाई; बारात, मेला और विवाह में सवारी; कच्चे और सँकरे रास्तों पर जहाँ ट्रैक्टर नहीं जा सकता, वहाँ आज भी बैलगाड़ी ही चलती है।
शहर और कस्बेमंडी, ईंट-भट्ठे और निर्माण-स्थलों पर छोटी दूरी की सस्ती ढुलाई; सब्ज़ी-मंडी तक माल पहुँचाना; कुछ शहरों में आज भी बैलगाड़ी से कचरा और सामान ढोया जाता है; प्रदर्शनी, फ़िल्म-शूटिंग और सांस्कृतिक जुलूसों में भी बैलगाड़ी दिखती है।
अप्रत्यक्ष उपयोगगोबर से जैविक खाद और गोबर-गैस; गोमूत्र से जैविक कीटनाशक; गोबर के उपले ईंधन के रूप में; खेत की उर्वरता बनाए रखने में सहायक — यानी बैल एक चलती-फिरती जैविक खाद-इकाई भी है।
संस्कृति और उत्सवपोला (महाराष्ट्र, छत्तीसगढ़) और बैल पोला में बैलों को सजाकर पूजा जाता है; मट्टू पोंगल (तमिलनाडु) में मवेशियों की पूजा; कर्नाटक का कंबाला और तमिलनाडु का जल्लीकट्टू; गोवर्धन पूजा में गोवंश का सम्मान; नंदी शिव के वाहन के रूप में हर शिव-मंदिर के सामने विराजमान हैं।
भाषा और लोक-जीवन‘बछिया का ताऊ’, ‘बैल की तरह जुतना’, ‘गोईं’ जैसे मुहावरे और शब्द; लोकगीतों, कहावतों और चित्रकलाओं में बैल का बार-बार आना — प्रेमचंद की यह कहानी स्वयं इसका प्रमाण है।
निष्कर्ष: इसीलिए भारतीय किसान बैल को ‘मवेशी’ नहीं, परिवार का सदस्य मानता है — उसे नाम देता है (हीरा, मोती), उसके सींग रँगता है, गले में घंटी बाँधता है और त्योहार पर उसकी पूजा करता है। कहानी में झूरी का बैलों को गले लगाना और मालकिन का उनके माथे चूमना इसी सांस्कृतिक रिश्ते की झलक है।
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