यह प्रसंग इसलिए महत्वपूर्ण है कि यहाँ नियम तो लागू हुआ, पर न्याय नहीं हुआ। दोनों पक्ष अलग-अलग देखिए।
| यह न्याय कैसे है | यह अन्याय कैसे है |
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| बैलों ने सचमुच दूसरे का खेत चरा — “सामने मटर का खेत था ही। मोती उसमें घुस गया।” हीरा ने मना भी किया था, “पर उसने एक न सुनी।” | दंड का असली दोषी बैल नहीं, वे लोग हैं जिन्होंने उन्हें भूखा रखा और भागने पर मजबूर किया। भूख से व्याकुल प्राणी का चरना अपराध कम, विवशता अधिक है। |
| किसान का खेत ही उसकी रोज़ी है। यदि आवारा पशु फ़सल चर जाएँ तो किसान का पूरा वर्ष चौपट हो जाए। इसीलिए काँजीहौस जैसी व्यवस्था बनी — पशु पकड़े जाएँ, कुछ दंड लेकर छोड़े जाएँ। | दंड का तरीका क्रूर है। “सारा दिन बीत गया और खाने को एक तिनका भी न मिला।” फिर “एक सप्ताह तक दोनों मित्र वहाँ बँधे पड़े रहे। किसी ने चारे का एक तृण भी न डाला।” भूखा रखना किसी भी नियम में दंड नहीं है — यह यातना है। |
| खेत का मालिक अपनी फ़सल की रक्षा के लिए कानून का सहारा ले रहा है, अपने हाथ से बदला नहीं ले रहा — यह भी एक तरह की सभ्यता है। | दंड अनुपात से बाहर है। थोड़े-से मटर चरने का दंड एक सप्ताह की भूख, डंडे और अंत में नीलाम — यानी कसाई जैसे दढ़ियल के हाथ बिक जाना और प्राणों का संकट। |
| — | जिनका कोई दोष नहीं, वे भी वहीं मर रहे हैं — “कई तो इतने कमजोर हो गए थे कि खड़े भी न हो सकते थे।” और मालिक को सूचना दिए बिना ही उसका पशु बेच दिया गया, जबकि झूरी कहता है — “किसी को मेरे बैल नीलाम करने का क्या अख़्तियार है?” |