गंगा अध्याय 1 पशुओं के लिए कानून

अद्यतन2026-09-06

प्र1.
1. बैलों का काँजीहाउस में बंद होना न्याय और अन्याय दोनों को दर्शाता है। कैसे?
उत्तर

यह प्रसंग इसलिए महत्वपूर्ण है कि यहाँ नियम तो लागू हुआ, पर न्याय नहीं हुआ। दोनों पक्ष अलग-अलग देखिए।

यह न्याय कैसे हैयह अन्याय कैसे है
बैलों ने सचमुच दूसरे का खेत चरा — “सामने मटर का खेत था ही। मोती उसमें घुस गया।” हीरा ने मना भी किया था, “पर उसने एक न सुनी।”दंड का असली दोषी बैल नहीं, वे लोग हैं जिन्होंने उन्हें भूखा रखा और भागने पर मजबूर किया। भूख से व्याकुल प्राणी का चरना अपराध कम, विवशता अधिक है।
किसान का खेत ही उसकी रोज़ी है। यदि आवारा पशु फ़सल चर जाएँ तो किसान का पूरा वर्ष चौपट हो जाए। इसीलिए काँजीहौस जैसी व्यवस्था बनी — पशु पकड़े जाएँ, कुछ दंड लेकर छोड़े जाएँ।दंड का तरीका क्रूर है। “सारा दिन बीत गया और खाने को एक तिनका भी न मिला।” फिर “एक सप्ताह तक दोनों मित्र वहाँ बँधे पड़े रहे। किसी ने चारे का एक तृण भी न डाला।” भूखा रखना किसी भी नियम में दंड नहीं है — यह यातना है।
खेत का मालिक अपनी फ़सल की रक्षा के लिए कानून का सहारा ले रहा है, अपने हाथ से बदला नहीं ले रहा — यह भी एक तरह की सभ्यता है।दंड अनुपात से बाहर है। थोड़े-से मटर चरने का दंड एक सप्ताह की भूख, डंडे और अंत में नीलाम — यानी कसाई जैसे दढ़ियल के हाथ बिक जाना और प्राणों का संकट।
जिनका कोई दोष नहीं, वे भी वहीं मर रहे हैं — “कई तो इतने कमजोर हो गए थे कि खड़े भी न हो सकते थे।” और मालिक को सूचना दिए बिना ही उसका पशु बेच दिया गया, जबकि झूरी कहता है — “किसी को मेरे बैल नीलाम करने का क्या अख़्तियार है?”
निष्कर्ष: काँजीहौस का उद्देश्य न्यायपूर्ण है, पर उसका व्यवहार अन्यायपूर्ण। प्रेमचंद यहाँ एक बड़ी बात कह रहे हैं — कोई व्यवस्था तब तक न्यायपूर्ण नहीं कही जा सकती जब तक वह अपने अधीन प्राणी की मूलभूत ज़रूरतों (भोजन, पानी, सुरक्षा) की रक्षा न करे। और स्वतंत्रता आंदोलन के रूपक में काँजीहौस ‘जेल’ है — जहाँ नियम के नाम पर वही होता था जो यहाँ बैलों के साथ हुआ।
प्र2.
2. यदि आपको अवसर मिले तो आप बैलों की ओर से कौन-कौन से कानूनी अधिकार माँगेंगे?
उत्तर

बैलों की ओर से मैं ये अधिकार माँगूँगा। हर अधिकार के साथ कहानी का वह प्रसंग भी दे रहा हूँ जिसके कारण वह ज़रूरी लगता है।

अधिकारइसका अर्थकहानी में इसका उल्लंघन
1. भोजन और स्वच्छ जल का अधिकारजिस पशु से काम लिया जाए, उसे पेट-भर पौष्टिक चारा (भूसा, खली, चोकर, दाना) और पानी मिलना अनिवार्य हो।“सूखे भूसे के सिवा कुछ न दूँगी, खाएँ चाहे मरें।” और काँजीहौस में एक सप्ताह तक अन्न का एक दाना नहीं।
2. मार-पीट और क्रूरता से सुरक्षा का अधिकारपशु को डंडे, चाबुक या नुकीले उपकरण से पीटना दंडनीय अपराध हो।“उस निर्दयी ने हीरा की नाक पर खूब डंडे जमाए”; “कल की शरारत का मजा चखाया”; चौकीदार ने “कई डंडे रसीद किए”।
3. काम के घंटों और विश्राम का अधिकारजोतने-चलाने की एक सीमा हो, बीच में विश्राम और छाया मिले, तथा बीमार या घायल पशु से काम न लिया जाए।“दोनों दिन-भर जोते जाते, डंडे खाते, अड़ते।”
4. चिकित्सा का अधिकारघाव, चोट या रोग की स्थिति में पशु-चिकित्सक की सेवा मिले।नाक पर डंडे पड़ने और साँड़ से लड़ने के बाद किसी ने उनके घाव नहीं देखे।
5. स्वामी को सूचना दिए बिना नीलाम न होने का अधिकारपकड़े गए पशु के गले के गराँव, दागी पहचान या पंचायत के माध्यम से मालिक को खोजा जाए और सुनवाई का अवसर दिया जाए।झूरी को कुछ पता ही नहीं चला और बैल बिक गए — “मैं मवेशीखाने से नीलाम लिए आता हूँ।”
6. काँजीहौस/बाड़े में न्यूनतम सुविधाओं का अधिकारबंद रखने की जगह में चारा, पानी, छाया, हवा और सफ़ाई अनिवार्य हो; समय-समय पर निरीक्षण हो।“सब जमीन पर मुरदों की तरह पड़े थे।” बैलों ने “दीवार की नमकीन मिट्टी चाटनी शुरू की”।
7. साथी से न बिछड़ने और वृद्धावस्था में देखभाल का अधिकारजोड़ी के पशु साथ रखे जाएँ; काम के अयोग्य हो जाने पर उन्हें कसाई को न बेचा जाए, गोशाला या पशु-आश्रय में रखा जाए।दढ़ियल का खरीदना — “यह आदमी छुरी चलाएगा। देख लेना।”
जानने योग्य: भारत में पशुओं की रक्षा के लिए पशु क्रूरता निवारण अधिनियम, 1960 बना हुआ है, और संविधान का अनुच्छेद 51(क)(छ) हर नागरिक का मौलिक कर्तव्य बताता है कि वह जीवमात्र के प्रति दया रखे। यानी प्रेमचंद ने जो बात 1930 के दशक में कहानी के रूप में कही, वह आगे चलकर कानून की भाषा में भी लिखी गई।
प्र3.
3. मान लीजिए कि हीरा-मोती अपने साथ हुए अन्याय की शिकायत करना चाहते हैं। उनकी ओर से उनकी शिकायत थानाध्यक्ष को करते हुए एक पत्र लिखिए। (संकेत— “थानाध्यक्ष महोदय, हमारा नाम… है। हमारे साथ अन्याय हुआ है…।”)
उत्तर

शिकायती पत्र का ढाँचा याद रखिए — सेवा में / पता / विषय / संबोधन / घटना का क्रम-वार विवरण / माँग / धन्यवाद / भवदीय, नाम-पता-दिनांक। भाषा शिष्ट और तथ्य क्रम में हों।

नमूना उत्तर:

सेवा में,
थानाध्यक्ष महोदय,
थाना — बेलपुर
जिला — वाराणसी (उत्तर प्रदेश)

विषय — हमारे साथ हुई क्रूरता, अवैध बंधक और अवैध नीलामी की शिकायत।

महोदय,

सविनय निवेदन है कि हमारे नाम हीरा और मोती हैं। हम पछाईं जाति के दो बैल हैं और गाँव के किसान झूरी के यहाँ रहते हैं। वर्षों से हम उनका हल खींचते हैं, गाड़ी जोतते हैं और कुएँ पर पुर चलाते हैं। हमने कभी दाने-चारे की शिकायत नहीं की। परंतु पिछले कुछ सप्ताहों में हमारे साथ जो हुआ, उसकी शिकायत हम आपके समक्ष रख रहे हैं —

  1. हमारे मालिक झूरी ने हमें अपने साले गया के यहाँ भेजा। वहाँ हमें केवल सूखा भूसा दिया गया, जबकि उसी नाँद के पास उसके अपने बैलों को खली और चूनी दी जाती रही।
  2. गया ने हमें मोटी रस्सियों से बाँधा और बार-बार डंडों से पीटा। एक दिन उसने हीरा की नाक पर इतने डंडे मारे कि नाक से खून बहने लगा। हमारे विरुद्ध कोई अपराध नहीं था; हमारा दोष केवल इतना था कि हम अपने घर लौट जाना चाहते थे।
  3. घर में यह भी तय हुआ कि हमारी नाकों में नाथ डाल दी जाए, जिससे हमें और पीड़ा होती।
  4. भूख से व्याकुल होकर हमने एक खेत में मटर चर ली, यह हमारी भूल थी और हम इसके लिए क्षमाप्रार्थी हैं। किंतु इसका दंड यह मिला कि हमें काँजीहौस में बंद कर दिया गया, जहाँ लगातार एक सप्ताह तक हमें चारे का एक तिनका भी नहीं दिया गया। हमें केवल पानी दिखा दिया जाता था। वहाँ बंद अन्य पशु भी भूख से अधमरे पड़े थे।
  5. अंत में, हमारे मालिक झूरी को कोई सूचना दिए बिना हमें डुग्गी बजवाकर नीलाम कर दिया गया और एक दढ़ियल व्यक्ति ने हमें खरीद लिया, जिसके व्यवहार से स्पष्ट था कि वह हमें वध के लिए ले जा रहा था।

अतः आपसे विनम्र निवेदन है कि —

  • क्रूरता करने वालों के विरुद्ध पशु क्रूरता निवारण अधिनियम के अंतर्गत उचित कार्रवाई की जाए;
  • काँजीहौस में बंद पशुओं के लिए चारे, पानी और छाया की व्यवस्था अनिवार्य कराई जाए तथा उसका नियमित निरीक्षण हो;
  • किसी भी पशु को नीलाम करने से पूर्व उसके स्वामी को खोजकर सूचना देने का नियम बनाया जाए;
  • और हमारी नीलामी को अवैध घोषित कर हमें हमारे स्वामी झूरी के पास रहने दिया जाए।

हम बोल नहीं सकते, इसीलिए यह पत्र लिखवाना पड़ा। आशा है आप हमारी पीड़ा समझेंगे।

धन्यवाद।

भवदीय,
हीरा और मोती
द्वारा — झूरी, ग्राम बेलपुर, जिला वाराणसी
दिनांक — 12 अगस्त 20XX

Tip: शिकायती पत्र में भावुक भाषा से ज़्यादा असर क्रम-वार तथ्यों का होता है। इसलिए घटनाएँ बिंदुवार लिखिए और अंत में स्पष्ट माँगें रखिए। अपनी भूल हो तो उसे भी स्वीकार कर लीजिए — इससे पत्र की विश्वसनीयता बढ़ती है, जैसे यहाँ मटर चरने की बात मानी गई है।
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