गीत लिखते समय तीन बातें ध्यान रखिए — तुक (पंक्तियों के अंत की एक-सी ध्वनि), टेक (वह पंक्ति जो हर अंतरे के बाद लौटे), और लय (हर पंक्ति में लगभग बराबर मात्राएँ, ताकि सब मिलकर गा सकें)।
टेक —
हीरा-मोती, हीरा-मोती, गाँव तुम्हारा गाता है,
जो सिर ऊँचा रखकर जीता, वही हमें भाता है॥
पछाईं जाति के दो साथी, सुंदर और सजीले,
काम में चौकस, डील में ऊँचे, मन के बड़े रसीले।
बिन बोले ही बात समझ लें, ऐसा नाता है —
जो सिर ऊँचा रखकर जीता, वही हमें भाता है॥
रातों-रात पगहिया तोड़ी, लौट पड़े निज द्वारे,
कीचड़ सने खड़े थे आकर, आँखों में थे तारे।
जिसको अपना घर प्यारा हो, वह क्यों घबराता है —
जो सिर ऊँचा रखकर जीता, वही हमें भाता है॥
सूखा भूसा, डंडे-लाठी, भूख भरी थी रातें,
फिर भी पाँव नहीं उठवाए, मानी नहीं वे बातें।
जो न झुके अन्याय के आगे, वह ही जग जीता है —
जो सिर ऊँचा रखकर जीता, वही हमें भाता है॥
साँड़ बड़ा था हाथी जैसा, दोनों डटकर भिड़ गए,
मिलकर वार किया जब दोनों, उसके तेवर उड़ गए।
जुड़कर लड़ने वाले को ही जीत बुलाती है —
जो सिर ऊँचा रखकर जीता, वही हमें भाता है॥
तोड़ी बंदीगृह की दीवार, छूटे कितने प्राणी,
खुद बँधकर भी साथी न छोड़ा — यही बड़ी कुर्बानी।
सच्चा मीत वही है जो दुख में साथ निभाता है —
जो सिर ऊँचा रखकर जीता, वही हमें भाता है॥