प्र1.
“दोनों सिर झुकाकर उसका हाथ चाटने लगे। दोनों की पूँछें खड़ी हो गईं।” इस वाक्य को पढ़कर आँखों के सामने एक दृश्य-सा बन जाता है। आप जानते हैं कि भाषा की इस विशेषता को चित्रात्मकता कहते हैं। ‘दो बैलों की कथा’ कहानी में ऐसी अनेक विशेषताएँ हैं जो इसे अद्भुत और प्रभावपूर्ण बनाती हैं। नीचे इस कहानी में आए कुछ विशेष बिंदुओं को उदाहरण के साथ दिया गया है। आप भी एक-एक उदाहरण खोजकर तालिका में लिखिए— (चित्रात्मक भाषा, संवादात्मकता, विरोधाभास, व्यंग्य, संघर्ष, अतिशयोक्ति, संदेह/उलझन)
उत्तर
पुस्तक में ‘उदाहरण 1’ भरा हुआ है और ‘उदाहरण 2’ का खाना खाली छोड़ा गया है (चित्रात्मक भाषा में दोनों भरे हैं)। नीचे पूरी तालिका दी जा रही है — खाली खाने कहानी से खोजकर भरे गए हैं।
| विशेषता | विशेषता का अर्थ | उदाहरण 1 (पुस्तक में दिया हुआ) | उदाहरण 2 (खोजकर भरा गया) |
|---|---|---|---|
| चित्रात्मक भाषा | शब्दों के माध्यम से पाठक के मन में स्पष्ट और जीवंत चित्र या छवियाँ बनाना। | घुटने तक पाँव कीचड़ से भरे हैं। | सहसा घर का द्वार खुला और वही लड़की निकली। |
| संवादात्मकता | कथ्य को आगे बढ़ाने के लिए, पात्रों के विचार, भाव आदि व्यक्त करने के लिए बातचीत और संवादों का प्रयोग। | मर जाऊँगा, पर उसके काम तो न आऊँगा। | “अब तो नहीं सहा जाता, हीरा!” / “क्या करना चाहते हो?” / “एकाध को सींगों पर उठाकर फेंक दूँगा।” — (इसी तरह: “भागना कायरता है।” / “तो फिर यहीं मरो। बंदा तो नौ-दो-ग्यारह होता है।”) |
| विरोधाभास | एक ही प्रसंग या रचना में दो विपरीत या परस्पर विरोधी बातें एक साथ मौजूद होना। | झूरी बैलों को देखकर स्नेह से गद्गद हो गया। झूरी की स्त्री ने बैलों को द्वार पर देखा, तो जल उठी। | “दोनों की आँखों में विद्रोहमय स्नेह झलक रहा है।” — विद्रोह और स्नेह एक साथ। (दूसरा: वही मालकिन जो ‘नमक-हराम’ कहकर सूखा भूसा देती है, अंत में “आकर दोनों के माथे चूम” लेती है।) |
| व्यंग्य | वह शैली जिसमें मजाक, हास्य या कटाक्ष (चुभते हुए संकेतों) के माध्यम से किसी दोष, कुरीति, अन्याय, पाखंड या कमजोरी को प्रकट किया जाता है। | भारतवासियों की अफ्रीका में क्या दुर्दशा हो रही है? अगर वे भी ईंट का जवाब पत्थर से देना सीख जाते तो शायद सभ्य कहलाने लगते। | “ऋषियों-मुनियों के जितने गुण हैं, वे सभी उसमें पराकाष्ठा को पहुँच गए हैं; पर आदमी उसे बेवकूफ कहता है। सद्गुणों का इतना अनादर कहीं नहीं देखा।” (दूसरा: “जापान की मिसाल सामने है। एक ही विजय ने उसे संसार की सभ्य जातियों में गण्य बना दिया।”) |
| संघर्ष | दो विरोधी शक्तियों, विचारों, इच्छाओं या परिस्थितियों का आपस में टकराना। | उससे भिड़ना जान से हाथ धोना है; लेकिन न भिड़ने पर भी जान बचती नहीं नजर आती। (बैल बनाम साँड़) | “जोर तो मारता ही जाऊँगा, चाहे कितने ही बंधन पड़ते जाएँ।” (बैल बनाम काँजीहौस/व्यवस्था) (भीतरी संघर्ष का उदाहरण: “गिरे हुए बैरी पर सींग न चलाना चाहिए।” / “यह सब ढोंग है।” — हीरा बनाम मोती, यानी अहिंसा बनाम प्रतिकार।) |
| अतिशयोक्ति | किसी पात्र, घटना, भाव या वस्तु का वर्णन इतना बढ़ाकर करना कि वह असंभव या अविश्वसनीय लगे। | झूरी इन्हें फूल की छड़ी से भी न छूता था। उसकी टिटकार पर दोनों उड़ने लगते थे। | “झूरी के साले गया को घर तक गोईं ले जाने में दाँतों पसीना आ गया।” (दूसरा: “साँड़ पूरा हाथी है।” तीसरा: “दोनों की बोटी-बोटी काँप रही थी।”) |
| संदेह/उलझन | जब पात्र किसी निर्णय पर नहीं पहुँच पाता। | सारा दिन बीत गया और खाने को एक तिनका भी न मिला। समझ ही में न आता था, यह कैसा स्वामी है? | “अपना यों बेचा जाना उन्हें अच्छा लगा या बुरा, कौन जाने”। (दूसरा: गराँव खुल जाने पर भी — “उसने गराँव खोल दिया, पर दोनों चुपचाप खड़े रहे।… हीरा ने कहा— चलें तो, लेकिन कल इस अनाथ पर आफत आएगी।” तीसरा: काँजीहौस के गधे — “अभी तक खड़े सोच रहे थे कि भागें या न भागें।”) |
इन विशेषताओं को पहचानने का तरीका: चित्रात्मकता ढूँढ़नी हो तो ऐसा वाक्य खोजिए जिसे पढ़ते ही आँखों के आगे दृश्य बन जाए (रंग, गति, मुद्रा)। अतिशयोक्ति वहाँ है जहाँ बात शब्दशः असंभव हो — बैल सचमुच ‘उड़ने’ नहीं लगते। विरोधाभास वहाँ है जहाँ दो उलटी बातें एक ही साँस में कही जाएँ। और व्यंग्य वहाँ है जहाँ लेखक तारीफ़ जैसा कुछ कहता दिखे, पर चोट कहीं और कर रहा हो।