प्र1.
प्रायः कहानी के प्रारंभ में ही कहानी के मुख्य चरित्र, कहानी का समय, कहानी की भाषा, घटनाओं आदि के कुछ संकेत मिलने लगते हैं। प्रेमचंद की इस कहानी में भी ऐसे संकेत हैं। आप कहानी के ऐसे संकेत/बिंदुओं को ढूँढ़कर लिखिए।
उत्तर
‘दो बैलों की कथा’ का आरंभ बड़ा चतुर है — कहानी शुरू होने से पहले ही लेखक गधे पर एक छोटा-सा निबंध लिख देता है, और उसी निबंध में आगे की पूरी कहानी के बीज छिपा देता है। नीचे संकेत क्रम से दिए गए हैं।
| किसका संकेत | आरंभ की कौन-सी पंक्ति | वह आगे किस रूप में खुलता है |
|---|---|---|
| शीर्षक ही पहला संकेत | ‘दो बैलों की कथा’ — ‘कथा’ शब्द पंचतंत्र-हितोपदेश की पशु-कथा परंपरा की ओर इशारा करता है। | पशु मनुष्यों की तरह सोचते, बोलते और नैतिक बहस करते हैं। |
| मुख्य चरित्र | “झूरी के दोनों बैलों के नाम थे हीरा और मोती। दोनों पछाईं जाति के थे— देखने में सुंदर, काम में चौकस, डील में ऊँचे।” | दो नाम, दो स्वभाव और पूरी कहानी का केंद्र। ‘हीरा’ और ‘मोती’ — दोनों बहुमूल्य रत्नों के नाम हैं, यानी लेखक की दृष्टि में ये मामूली पशु नहीं। |
| मूल विषय (सीधापन बनाम प्रतिकार) | “गधा सचमुच बेवकूफ है, या उसके सीधेपन, उसकी निरापद सहिष्णुता ने उसे यह पदवी दे दी है, इसका निश्चय नहीं किया जा सकता।” | यही प्रश्न कहानी के अंत तक चलता है और अंतिम संवाद में लौट आता है — “हमारी जान को कोई जान ही नहीं समझता।” / “इसीलिए कि हम इतने सीधे हैं।” |
| देश-काल और राजनीतिक संकेत | “देखिए न, भारतवासियों की अफ्रीका में क्या दुर्दशा हो रही है? … अगर वे भी ईंट का जवाब पत्थर से देना सीख जाते, तो शायद सभ्य कहलाने लगते। जापान की मिसाल सामने है।” | यह वाक्य साफ़ बता देता है कि कहानी पराधीन भारत की है और असल विषय पशु नहीं, पराधीन जाति का स्वाभिमान है। |
| बैल का स्वभाव (आगे की घटनाओं का बीज) | “बैल कभी-कभी मारता भी है, कभी-कभी अड़ियल बैल भी देखने में आता है। और भी कई रीतियों से अपना असंतोष प्रकट कर देता है।” | ‘मारना’ → साँड़ और दढ़ियल पर सींग चलाना। ‘अड़ियल होना’ → गया के हल में पाँव न उठाना। ‘असंतोष प्रकट करना’ → नाँद में मुँह न डालना और रस्सी तोड़ना। |
| मित्रता और मूक-भाषा | “दोनों … एक-दूसरे से मूक-भाषा में विचार-विनिमय करते थे… अवश्य ही उनमें कोई ऐसी गुप्त शक्ति थी जिससे … मनुष्य वंचित है।” | पूरी कहानी के संवाद इसी ‘मूक-भाषा’ में होते हैं — कहानी की सबसे बड़ी शिल्प-युक्ति यहीं घोषित हो जाती है। |
| परिवेश और भाषा | “नाँद में खली-भूसा पड़ जाने के बाद दोनों साथ उठते…”, “हल या गाड़ी में जोत दिए जाते” | भाषा गँवई और मुहावरेदार है — पगहिया, चरनी, गराँव, थान, टिटकार, डुग्गी, काँजीहौस। परिवेश पूरी तरह उत्तर भारतीय ग्रामीण है। |
| कथा-विन्यास का संकेत | “संयोग की बात, झूरी ने एक बार गोईं को ससुराल भेज दिया।” | यह वाक्य कहानी का संघर्ष-बिंदु है। इससे पहले सब कुछ परिचय है; इसके बाद हर घटना इसी से जन्मती है। |
सीख: अच्छी कहानी का आरंभ केवल ‘शुरुआत’ नहीं होता — वह एक वादा होता है। प्रेमचंद पहले पृष्ठ पर ही बता देते हैं कि विषय क्या है (सीधेपन का अनादर), पात्र कौन हैं, भाषा कैसी होगी और कहानी किस दिशा में जाएगी। कहानी पढ़ते समय पहला पृष्ठ ध्यान से पढ़िए — आधी कहानी वहीं खुल जाती है।