प्र1.
“सीधे दौड़ते चले गए। यहाँ तक कि मार्ग का ज्ञान न रहा। जिस परिचित मार्ग से आए थे, उसका यहाँ पता न था। नए-नए गाँव मिलने लगे।” 1. हीरा-मोती अपने घर के मार्ग से भटक गए थे। क्या कभी आपके साथ ऐसा हुआ है कि आप रास्ता भूल गए या भटक गए? तब आपने अपने मार्ग का पता कैसे लगाया था?
उत्तर
यह आपके अपने अनुभव का प्रश्न है। उत्तर लिखते समय चार बातें रखिए — कहाँ भटके, कैसे भटके, क्या महसूस हुआ, और रास्ता कैसे मिला।
नमूना उत्तर: “पिछले वर्ष हम परिवार के साथ एक बड़े मेले में गए थे। भीड़ में झूलों की ओर देखते-देखते मैं पिताजी से बिछड़ गया। पहले तो मुझे लगा कि वे पास ही होंगे, पर दो-तीन मिनट में चारों ओर अनजान चेहरे थे और मेरा गला सूखने लगा। पहले मन हुआ कि दौड़कर ढूँढ़ूँ, पर तभी मुझे विद्यालय में सिखाई बात याद आई — भटक जाओ तो दौड़ो मत, रुक जाओ। मैं वहीं एक बड़े खंभे के पास खड़ा हो गया, जो दूर से दिखता था। फिर मैंने आस-पास देखा और मुझे मेले का सूचना-केंद्र (announcement counter) दिखाई दिया। वहाँ बैठी महिला ने मेरा और पिताजी का नाम पूछकर ध्वनि-विस्तारक यंत्र से घोषणा कर दी। दस मिनट बाद पिताजी वहाँ पहुँच गए। उस दिन के बाद से मैंने अपने पिता का मोबाइल नंबर याद कर लिया है और जहाँ भी जाता हूँ, पहले यह देख लेता हूँ कि सूचना-केंद्र या पुलिस-सहायता केंद्र किधर है।”
कहानी से तुलना: हीरा-मोती के पास न नक्शा था, न भाषा — फिर भी वे अंत में घर पहुँचे। कैसे? पहचान के चिह्नों से — “वही खेत, वही बाग, वही गाँव मिलने लगे… इसी कुएँ पर हम पुर चलाने आया करते थे; यही कुआँ है।” रास्ता खोजने का सबसे पुराना तरीका यही है — जाने-पहचाने चिह्न ढूँढ़ना। इसीलिए किसी नई जगह जाते समय रास्ते के दो-तीन बड़े चिह्न (मंदिर, पुल, बड़ा पेड़, पेट्रोल पंप) याद कर लेने चाहिए।