डायरी (दैनंदिनी) के तीन नियम याद रखिए — दिनांक और स्थान ऊपर, उत्तम पुरुष (मैं/हम) में लेखन, और घटना से अधिक भाव। डायरी किसी को सुनाने के लिए नहीं, अपने-आप से बात करने के लिए लिखी जाती है, इसलिए भाषा सहज और भीतरी हो।
काँजीहौस, कहीं अनजान गाँव में
बुधवार, रात
आज का दिन मेरे जीवन का सबसे भारी दिन रहा।
सुबह जब हम मटर के खेत के पास खड़े थे, तब तक सब ठीक था। रात-भर की भूख के बाद मोती से रहा न गया और वह खेत में घुस गया। मैंने रोका भी — “मत जाओ” — पर उसने एक न सुनी। अभी उसने चार ही ग्रास खाए थे कि लाठियाँ लिए दो आदमी दौड़ पड़े। मैं मेड़ पर था, निकल भी सकता था। पर पीछे मुड़कर देखा तो मोती के खुर कीचड़ में धँसे थे और वह हिल तक न पा रहा था। मैंने सोचा — फँसेंगे तो दोनों फँसेंगे। और मैं लौट पड़ा।
अब हम इस बाड़े में बंद हैं। सारा दिन बीत गया और खाने को एक तिनका भी नहीं मिला। ऐसी भूख हमने कभी नहीं जानी। हमने दीवार की नमकीन मिट्टी चाटकर देखी, पर उससे भला क्या तृप्ति होती। सारा दिन हम फाटक की ओर टकटकी लगाए खड़े रहे कि कोई चारा लेकर आए — कोई नहीं आया।
यहाँ हमारे जैसे और भी हैं — तीन घोड़ियाँ, कुछ बकरियाँ, भेड़ें और दो गधे। सब ज़मीन पर मुरदों की तरह पड़े हैं। कई तो इतने कमजोर हैं कि खड़े भी नहीं हो पाते। यह देखकर मेरे भीतर भूख से बड़ी कोई चीज़ जल उठी है — गुस्सा। समझ ही में नहीं आता, यह कैसा स्वामी है, जो अपने बंदियों को भूखा मारता है!
गया के घर में मार पड़ती थी, पर वहाँ एक छोटी लड़की तो थी जो रात में चुपके से दो रोटियाँ दे जाती थी। उन दो रोटियों से पेट कहाँ भरता था, पर हृदय भर जाता था। आज वह भी नहीं है। नाक पर पड़े डंडों का दर्द अब भी बाकी है और मोती की देह भी काँप रही है, यद्यपि वह कहता कुछ नहीं।
पर मैंने एक बात तय कर ली है। मैं यहाँ पड़े-पड़े नहीं मरूँगा। इस दीवार की मिट्टी कच्ची है — मैंने सींग गड़ाकर देख लिया है, एक चिप्पड़ निकल भी आया। कल रात मैं फिर जोर लगाऊँगा। मार पड़ेगी, बंधन पड़ेंगे, पर जोर तो मारता ही जाऊँगा। सोचता हूँ — अगर दीवार खुद गई, तो केवल हम दो नहीं, ये सब भाई बच जाएँगे।
और मन में कहीं यह विश्वास भी बैठा है कि हमारा झूरी हमें ढूँढ़ेगा। एक बार भगवान ने उस लड़की के रूप में हमें बचाया था। क्या अब न बचाएँगे?
— हीरा