गंगा अध्याय 1 सृजन

अद्यतन2026-09-06

प्र1.
1. हीरा और मोती की दैनंदिनी — कहानी में हीरा और मोती आपस में मनुष्यों की तरह बातें करते दिखते हैं। कल्पना कीजिए कि वे लिख-पढ़ भी सकते हैं। हीरा या मोती की नजर से उस दिन की डायरी लिखिए जब उन्हें काँजीहाउस ले जाया गया। कैसे लिखें— “आज का दिन…” से आरंभ करें। भावनाएँ लिखें (भूख, गुस्सा, दर्द)। अंत में आशा या संकल्प लिखें। (संकेत— “आज हमें काँजीहाउस में बंद किया गया। भूख से पेट जल रहा है। पर विश्वास है कि झूरी हमें वापस ले जाएगा।”)
उत्तर

डायरी (दैनंदिनी) के तीन नियम याद रखिए — दिनांक और स्थान ऊपर, उत्तम पुरुष (मैं/हम) में लेखन, और घटना से अधिक भाव। डायरी किसी को सुनाने के लिए नहीं, अपने-आप से बात करने के लिए लिखी जाती है, इसलिए भाषा सहज और भीतरी हो।

नमूना उत्तर (हीरा की दैनंदिनी):

काँजीहौस, कहीं अनजान गाँव में
बुधवार, रात

आज का दिन मेरे जीवन का सबसे भारी दिन रहा।

सुबह जब हम मटर के खेत के पास खड़े थे, तब तक सब ठीक था। रात-भर की भूख के बाद मोती से रहा न गया और वह खेत में घुस गया। मैंने रोका भी — “मत जाओ” — पर उसने एक न सुनी। अभी उसने चार ही ग्रास खाए थे कि लाठियाँ लिए दो आदमी दौड़ पड़े। मैं मेड़ पर था, निकल भी सकता था। पर पीछे मुड़कर देखा तो मोती के खुर कीचड़ में धँसे थे और वह हिल तक न पा रहा था। मैंने सोचा — फँसेंगे तो दोनों फँसेंगे। और मैं लौट पड़ा।

अब हम इस बाड़े में बंद हैं। सारा दिन बीत गया और खाने को एक तिनका भी नहीं मिला। ऐसी भूख हमने कभी नहीं जानी। हमने दीवार की नमकीन मिट्टी चाटकर देखी, पर उससे भला क्या तृप्ति होती। सारा दिन हम फाटक की ओर टकटकी लगाए खड़े रहे कि कोई चारा लेकर आए — कोई नहीं आया।

यहाँ हमारे जैसे और भी हैं — तीन घोड़ियाँ, कुछ बकरियाँ, भेड़ें और दो गधे। सब ज़मीन पर मुरदों की तरह पड़े हैं। कई तो इतने कमजोर हैं कि खड़े भी नहीं हो पाते। यह देखकर मेरे भीतर भूख से बड़ी कोई चीज़ जल उठी है — गुस्सा। समझ ही में नहीं आता, यह कैसा स्वामी है, जो अपने बंदियों को भूखा मारता है!

गया के घर में मार पड़ती थी, पर वहाँ एक छोटी लड़की तो थी जो रात में चुपके से दो रोटियाँ दे जाती थी। उन दो रोटियों से पेट कहाँ भरता था, पर हृदय भर जाता था। आज वह भी नहीं है। नाक पर पड़े डंडों का दर्द अब भी बाकी है और मोती की देह भी काँप रही है, यद्यपि वह कहता कुछ नहीं।

पर मैंने एक बात तय कर ली है। मैं यहाँ पड़े-पड़े नहीं मरूँगा। इस दीवार की मिट्टी कच्ची है — मैंने सींग गड़ाकर देख लिया है, एक चिप्पड़ निकल भी आया। कल रात मैं फिर जोर लगाऊँगा। मार पड़ेगी, बंधन पड़ेंगे, पर जोर तो मारता ही जाऊँगा। सोचता हूँ — अगर दीवार खुद गई, तो केवल हम दो नहीं, ये सब भाई बच जाएँगे।

और मन में कहीं यह विश्वास भी बैठा है कि हमारा झूरी हमें ढूँढ़ेगा। एक बार भगवान ने उस लड़की के रूप में हमें बचाया था। क्या अब न बचाएँगे?

— हीरा

Tip: डायरी में तीनों भाव क्रम से आने चाहिए — पहले घटना (क्या हुआ), फिर भाव (भूख, दर्द, गुस्सा, अकेलापन), और अंत में संकल्प या आशा। ऊपर के नमूने में यही क्रम है। ध्यान दीजिए कि इसमें कहानी की अपनी पंक्तियाँ घुला-मिलाकर रखी गई हैं — इससे डायरी पात्र की आवाज़ में लगती है, आपकी अपनी आवाज़ में नहीं।
प्र2.
2. आज के समाचार — मान लीजिए आप एक स्थानीय समाचार पत्र के संवाददाता हैं। अपने समाचार पत्र के लिए बैलों के काँजीहाउस से भागने का समाचार लिखिए। कैसे लिखें— शीर्षक दें। घटना का विवरण (कहाँ, कब, क्या हुआ)। परिणाम और लोगों की प्रतिक्रिया। (संकेत शीर्षक — ‘दो बहादुर बैलों ने तोड़ी बेड़ियाँ’)
उत्तर

समाचार लेखन के नियम — शीर्षक, उपशीर्षक, स्थान और दिनांक-रेखा, पहला अनुच्छेद जिसमें क्या-कब-कहाँ-कौन-कैसे-क्यों छहों प्रश्नों के उत्तर हों, फिर ब्यौरा, फिर लोगों की प्रतिक्रिया, और अंत में आगे क्या होगा। भाषा तटस्थ हो — संवाददाता अपनी राय नहीं देता, तथ्य और उद्धरण देता है।

नमूना उत्तर:

दो बहादुर बैलों ने तोड़ी बेड़ियाँ
काँजीहौस की दीवार गिराकर नौ-दस पशुओं को कराया मुक्त; एक बैल फिर पकड़ा गया

बेलपुर (निज संवाददाता), 12 अगस्त। बीती रात नगर के मवेशीखाने (काँजीहौस) में उस समय हड़कंप मच गया, जब वहाँ बंद दो बैलों ने कच्ची दीवार का लगभग आधा हिस्सा गिरा दिया और उसमें बंद तीन घोड़ियों, कई बकरियों, भेड़ों तथा दो गधों को बाहर निकलने का रास्ता दे दिया।

क्या हुआ — प्रत्यक्षदर्शियों के अनुसार दोनों बैल दो दिन पहले पास के खेत में मटर चरते हुए पकड़े गए थे और तब से बाड़े में बंद थे। बताया जाता है कि इस अवधि में उन्हें चारा नहीं दिया गया। रात के लगभग नौ बजे एक बैल ने दीवार में सींग गड़ाकर मिट्टी गिरानी शुरू की। चौकीदार ने हाजिरी लेते समय उसे देख लिया और डंडे मारकर मोटी रस्सी से बाँध दिया। इसके बाद दूसरे बैल ने लगभग दो घंटे की लगातार टक्करों से दीवार ऊपर से लगभग एक हाथ गिरा दी और अगले धक्के में आधी दीवार भरभराकर गिर पड़ी।

परिणाम — दीवार गिरते ही अधमरे पड़े सभी पशु उठ खड़े हुए और भाग निकले। दो गधे भय के कारण खड़े रह गए, जिन्हें बैल ने सींगों से ठेलकर बाहर किया। उल्लेखनीय है कि दीवार तोड़ने वाला बैल स्वयं नहीं भागा — वह अपने बँधे हुए साथी के पास लौट आया और वहीं बैठ गया। सुबह उसे भी मोटी रस्सी से बाँध दिया गया।

लोगों की प्रतिक्रिया — सुबह घटनास्थल पर भीड़ जमा रही। गाँव के एक बुजुर्ग ने कहा, “ऐसे बैल किसी के पास न होंगे।” एक अन्य ग्रामीण का कहना था, “बैल नहीं हैं वे, उस जनम के आदमी हैं।” वहीं कई लोगों ने मवेशीखाने की व्यवस्था पर प्रश्न उठाते हुए कहा कि बंद पशुओं को दिनों तक भूखा रखना क्रूरता है और इसी कारण यह स्थिति बनी।

आगे क्या — काँजीहौस के मुंशी ने बताया कि टूटी दीवार की मरम्मत कराई जा रही है। पशु-प्रेमियों ने प्रशासन से माँग की है कि बाड़े में चारे, पानी और छाया की व्यवस्था अनिवार्य की जाए तथा किसी भी पशु को नीलाम करने से पहले उसके स्वामी को सूचित किया जाए।

Tip: समाचार में ‘बेचारे बैल’, ‘निर्दयी चौकीदार’ जैसे भावुक विशेषण मत लगाइए। संवाददाता का काम है — तथ्य दिखाना और लोगों के शब्द ज्यों-के-त्यों उद्धृत करना; राय पाठक स्वयं बना लेगा। ऊपर के नमूने में जो कुछ ‘भावुक’ लगता है, वह भी ग्रामीणों के उद्धरण के रूप में आया है।
प्र3.
3. कहानी का नया अंत — यदि बैल वापस न लौटते तो कहानी का अंत कैसे होता? कहानी का नया अंत लिखिए। कैसे लिखें— बैलों की नई जगह। झूरी की स्थिति। (संकेत— “हीरा और मोती अब एक बूढ़े किसान के घर शांति से रह रहे हैं।”)
उत्तर

नया अंत लिखते समय दो बातें ध्यान में रखिए — (1) अंत कहानी के पात्रों के स्वभाव के अनुरूप हो; हीरा वहाँ भी सहनशील रहेगा और मोती वहाँ भी उग्र। (2) अंत कहानी के मूल भाव से जुड़ा रहे — स्वाभिमान, मित्रता और स्वतंत्रता का संघर्ष।

नमूना उत्तर — ‘नई मिट्टी’

दढ़ियल की रस्सी में बँधे दोनों मित्र चले जा रहे थे। रास्ता अनजाना था; न वही कुआँ मिला, न वही बाग। हीरा ने मूक-भाषा में कहा — “अब घर का रास्ता पीछे छूट गया, भाई।” मोती ने केवल इतना उत्तर दिया — “तो क्या हुआ? जब तक साथ हैं, तब तक कुछ नहीं छूटा।”

सूरज ढलते-ढलते वे एक छोटे-से गाँव के छोर पर पहुँचे। वहाँ एक बूढ़ा किसान अपने सूखे खेत के किनारे बैठा था। उसके पास एक ही बैल था, वह भी बूढ़ा। दढ़ियल ने दाम बताए। बूढ़े ने अपनी गाँठ खोली, गिनती की और सिर हिला दिया — इतने पैसे उसके पास नहीं थे। तब उसने अपनी कलाई से चाँदी का कड़ा उतारकर रख दिया, जो उसकी मरहूम पत्नी की निशानी थी, और कहा — “ले जा। पर इन्हें छुरी के पास मत ले जाना। ये काम के जानवर हैं, माँस के नहीं।”

दढ़ियल बुदबुदाता हुआ चला गया। बूढ़े ने दोनों की पीठ सहलाई, नाँद में भूसे के साथ थोड़ी खली डाली और बोला — “खाओ। आज से यही तुम्हारा थान है।”

मोती ने मूक-भाषा में कहा — “यह आदमी अच्छा है, पर यह झूरी नहीं है।” हीरा ने उत्तर दिया — “झूरी नहीं है, पर इसने अपनी सबसे प्यारी चीज़ देकर हमें बचाया है। जो अपना सब कुछ देकर किसी को बचाए, वह पराया नहीं होता।”

उधर बेलपुर में झूरी दिन-भर द्वार पर बैठा रहता। जब भी दूर से कोई सफ़ेद जोड़ी दिखती, वह उठ खड़ा होता और फिर धीरे से बैठ जाता। उसने आस-पास के तीन-तीन मवेशीखाने छान मारे, थाने में रपट भी लिखवाई, पर कहीं पता न चला। खाली थान से गुज़रते हुए वह हर बार वहाँ की मिट्टी को हाथ से समतल कर देता, मानो कोई आने ही वाला हो। मालकिन अब उन्हें ‘नमक-हराम’ नहीं कहती थीं। एक शाम उन्होंने आँचल से आँखें पोंछकर इतना ही कहा — “मैंने ही सूखा भूसा डलवाया था।”

और उस दूर के गाँव में, हर साँझ जब बूढ़ा किसान नाँद भरता, हीरा और मोती एक बार पूरब की ओर मुँह उठाकर देख लेते — जिधर से वे आए थे। फिर साथ-साथ नाँद में मुँह डालते। एक मुँह हटा लेता, तो दूसरा भी हटा लेता।

यह अंत क्यों काम करता है: इसमें कहानी की तीन चीज़ें जीवित रहती हैं — बैलों की जोड़ी और उनका आपसी स्वभाव, अच्छे मनुष्य के प्रति उनकी कृतज्ञता, और अंत की वही मूक-भाषा वाली छवि जिससे कहानी शुरू हुई थी (“एक मुँह हटा लेता, तो दूसरा भी हटा लेता था”)। साथ ही यह अंत मूल कहानी से अधिक करुण है, क्योंकि इसमें बैल बच तो जाते हैं, पर घर नहीं लौटते — और झूरी की प्रतीक्षा अधूरी रह जाती है।
दूसरा संभव अंत (संक्षेप में): बैल दढ़ियल के हाथ से न बच पाते और मोती लड़ते हुए मारा जाता; हीरा को कोई राहगीर छुड़ा लेता और वह वर्षों बाद अकेला झूरी के द्वार पर आ खड़ा होता। यह अंत और भी मार्मिक होगा, पर तब कहानी का संदेश बदल जाएगा — तब वह संघर्ष की विजय नहीं, संघर्ष की कीमत की कहानी बन जाएगी। नया अंत लिखते समय यह तय कर लीजिए कि आप कौन-सा संदेश देना चाहते हैं।
प्र4.
4. चित्रकथा लेखन — नीचे ‘दो बैलों की कथा’ की एक घटना को चित्रकथा के रूप में दिया गया है। इन घटनाओं को पहचानिए। प्रत्येक घटना के लिए उपयुक्त संवाद और घटनाक्रम बताने वाले वाक्य लिखिए। कैसे लिखें— हर चित्र के लिए एक छोटा संवाद बनाकर लिखिए। दृश्य का क्रम— बंद करना, भागने की योजना, दीवार तोड़ना, आजादी। (संकेत— चित्र 4: “अब हम आजाद हैं।”)
उत्तर

पुस्तक के पृष्ठ 25 पर चार चित्र दिए गए हैं। चारों मिलकर काँजीहौस वाला प्रसंग (कहानी का चौथा भाग) बनाते हैं। नीचे हर चित्र की पहचान, घटनाक्रम-वाक्य और संवाद दिए गए हैं।

चित्रचित्र में क्या दिख रहा हैघटना (घटनाक्रम बताने वाला वाक्य)संवाद
1ऊँची कच्ची दीवार से घिरे बाड़े में बहुत-से पशु — दो सफ़ेद बैल, एक भैंसा, गधे और बकरियाँ। कुछ ज़मीन पर पड़े हैं, एक गधा झाड़ी चबा रहा है। कहीं कोई नाँद या चारा नहीं दिखता।बंद करना — मटर के खेत में पकड़े जाने के बाद हीरा और मोती काँजीहौस में बंद कर दिए गए। सारा दिन बीत गया, पर खाने को एक तिनका भी न मिला।मोती: “यह कैसा स्वामी है, जो बंदियों को भूखा मारता है!”
हीरा: “देखो भाई, यहाँ सब मुरदों की तरह पड़े हैं। किसी की देह में जान नहीं है।”
2दो बैल आमने-सामने सिर जोड़े खड़े हैं, दोनों के ऊपर विचार-बुलबुले (thought bubbles) बने हैं; पीछे दीवार में एक चमकता हुआ छेद दिख रहा है, जिसके पास तीसरा बैल खड़ा है। पृष्ठभूमि रात की है।भागने की योजना — रात होते ही दोनों मित्रों ने मूक-भाषा में सलाह की और तय किया कि दीवार तोड़कर यहाँ से निकलना है।हीरा: “अब तो नहीं रहा जाता, मोती! यहाँ से भागने का कोई उपाय निकालना चाहिए।”
मोती: “आओ दीवार तोड़ डालें!”
हीरा: “सोचो, दीवार खुद जाती तो कितनी जानें बच जातीं।”
3दोनों बैल सींग गड़ाकर दीवार पर टक्कर मार रहे हैं; ईंटें और मिट्टी उड़ रही हैं, दीवार में बड़ी दरार पड़ चुकी है और उससे रोशनी छन रही है।दीवार तोड़ना — हीरा ने सींग गड़ाकर पहला चिप्पड़ गिराया और डंडे खाकर बँध जाने के बाद मोती ने लगभग दो घंटे की जोर-आजमाई से आधी दीवार गिरा दी।हीरा: “जोर तो मारता ही जाऊँगा, चाहे कितने ही बंधन पड़ते जाएँ।”
मोती: “हाँ, यह बात तो है। अच्छा, तो ला, फिर मैं भी जोर लगाता हूँ।”
4दीवार का बड़ा हिस्सा गिर चुका है; उसी दरार से एक सफ़ेद बैल और कई गधे कूदते-दौड़ते बाहर निकल रहे हैं। सबकी चाल में उत्साह है।आजादी — दीवार गिरते ही अधमरे पड़े सभी जानवर चेत उठे — घोड़ियाँ, बकरियाँ और भेड़ें भाग निकलीं। डरकर खड़े रह गए दोनों गधों को मोती ने सींगों से ठेलकर बाहर निकाला।मोती: “अब हम आजाद हैं! तुम दोनों क्यों नहीं भाग जाते?”
गधा: “जो कहीं फिर पकड़ लिए जाएँ!”
मोती: “अभी तो भागने का अवसर है — चलो, निकलो बाहर!”
चित्रकथा लिखने के तीन नियम: (1) संवाद छोटे हों — बुलबुले में दो पंक्तियों से अधिक नहीं समातीं। (2) हर चित्र के नीचे लिखा वाक्य घटना बताए, संवाद भाव बताए — दोनों एक बात न दोहराएँ। (3) चारों चित्र मिलकर एक पूरी घटना बनें — यहाँ क्रम है: कैद → योजना → संघर्ष → मुक्ति, जो किसी भी स्वतंत्रता-कथा का क्रम है।
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