गंगा अध्याय 1 मेरे अनुभव मेरे विचार

अद्यतन2026-09-06

प्र1.
1. “दोस्तों में घनिष्ठता होते ही धौल-धप्पा होने लगता है। इसके बिना दोस्ती कुछ फुसफुसी, कुछ हल्की-सी रहती है, जिस पर ज्यादा विश्वास नहीं किया जा सकता।” क्या आप इस बात से सहमत हैं? आपको ऐसा क्यों लगता है? अपने अनुभवों के आधार पर बताइए।
उत्तर

हाँ, मैं इस बात से बहुत हद तक सहमत हूँ — पर एक स्पष्ट सीमा के साथ, जिसे प्रेमचंद ने स्वयं खींच रखी है।

सहमति क्यों —

  • औपचारिकता दूरी की निशानी है। जिन दोस्तों के बीच बहुत तमीज़, बहुत ‘आप-जनाब’ रह जाए, वहाँ प्रायः यह डर भी रहता है कि कहीं दूसरा बुरा न मान जाए। जहाँ यह डर न हो, वहीं खुलकर हँसी-मज़ाक हो पाता है।
  • छेड़खानी विश्वास की परीक्षा है। जो मित्र मज़ाक सह लेता है, वह यह भी सिद्ध कर देता है कि वह आपकी नीयत पर संदेह नहीं करता। इसीलिए लेखक ऐसी दोस्ती को ‘फुसफुसी’ नहीं कहता।
  • कहानी में इसका ठीक चित्र मिलता है। हीरा-मोती “कभी-कभी दोनों सींग भी मिला लिया करते थे— विग्रह के नाते से नहीं, केवल विनोद के भाव से, आत्मीयता के भाव से।” यानी सींग मिलाना लड़ाई नहीं, प्रेम का खेल था।

पर सीमा भी कहानी ही बताती है — मटर के खेत के पास खेल-खेल में मोती ने हीरा को धक्का देकर खाई में गिरा दिया। “तब उसे भी क्रोध आया। संभलकर उठा और फिर मोती से भिड़ गया।” उस क्षण मोती ने स्वयं किनारा कर लिया — “मोती ने देखा— खेल में झगड़ा हुआ चाहता है तो किनारे हट गया।” यही असली सीख है: मज़ाक तभी तक मज़ाक है जब तक दोनों हँस रहे हों। जहाँ एक का चेहरा बदल जाए, वहाँ रुक जाना ही मित्रता है।

नमूना उत्तर (अपने अनुभव से): “मेरे दो तरह के मित्र हैं। एक वे, जिनसे मैं केवल कक्षा की बातें करता हूँ — नमस्ते, नोट्स, परीक्षा। दूसरे वे, जो मेरा बस्ता छिपा देते हैं, मेरी टिफ़िन से आधा परांठा उठा लेते हैं और मेरे नाम का उपनाम रखकर चिढ़ाते हैं। जिस दिन मेरी दादी अस्पताल में थीं, फ़ोन दूसरे वाले मित्र का ही आया था, पहले वाले का नहीं। तब मुझे समझ आया कि जो मुझसे ‘धौल-धप्पा’ कर सकता है, वही मेरे कंधे पर हाथ भी रख सकता है। पर एक बार उसने मेरे मोटे चश्मे पर मज़ाक किया, तो मैंने कह दिया कि यह मुझे अच्छा नहीं लगता — और उसने फिर कभी नहीं किया। सच्ची दोस्ती में यह ‘ना’ भी चलती है, इसीलिए वह टिकती है।”
प्र2.
2. “हीरा ने तिरस्कार किया— गिरे हुए बैरी पर सींग न चलाना चाहिए।” “यह सब ढोंग है। बैरी को ऐसा मारना चाहिए कि फिर न उठे।” आपका इस संबंध में क्या विचार है? आप किसके साथ हैं— हीरा के या मोती के या दोनों के? क्यों?
उत्तर

मेरा उत्तर है — मैं दोनों के साथ हूँ, पर अलग-अलग समय पर। लड़ते समय मोती ठीक है, और लड़ाई जीत लेने के बाद हीरा ठीक है।

पक्षतर्ककहानी से प्रमाणकमज़ोरी
हीरा — “गिरे हुए बैरी पर सींग न चलाना चाहिए।”युद्ध का उद्देश्य शत्रु को मिटाना नहीं, अन्याय रोकना है। जो गिर गया, वह अब खतरा नहीं रहा; उस पर वार करना बदला है, न्याय नहीं। यह भारतीय युद्ध-नीति का पुराना नियम भी है।साँड़ “बेदम होकर गिर पड़ा। तब दोनों ने उसे छोड़ दिया।” यही ‘छोड़ देना’ उन्हें साँड़ से ऊपर उठा देता है। हीरा का यह भी कथन — “वह अपना धर्म छोड़ दे, लेकिन हम अपना धर्म क्यों छोड़ें?”यदि यह नियम हर जगह लगाया जाए, तो अत्याचारी बार-बार उठकर फिर हमला करता रहेगा।
मोती — “बैरी को ऐसा मारना चाहिए कि फिर न उठे।”जो अन्याय करने पर तुला है, उसे केवल भगा देना पर्याप्त नहीं; उसे इतना अशक्त कर देना चाहिए कि वह फिर वही न कर सके। नरमी को अत्याचारी कमज़ोरी समझता है।मोती के तेवर देखकर ही गया ने उस दिन मारपीट टाल दी। दढ़ियल को उसने गाँव के बाहर तक खदेड़ा, तभी वह लौटा नहीं। लेखक का व्यंग्य भी उसी ओर है — “अगर वे भी ईंट का जवाब पत्थर से देना सीख जाते, तो शायद सभ्य कहलाने लगते।”बदला अंतहीन हो जाता है और मारने वाला स्वयं वही बन जाता है जिससे वह लड़ रहा था।
मेरा निष्कर्ष: मोती का साहस चाहिए, हीरा का संयम चाहिए। साँड़ पर सींग भोंकना ठीक था — वह हमला कर रहा था। पर गिरे हुए साँड़ को मार डालना ठीक न होता — वह अब लाचार था। इसीलिए प्रेमचंद ने दोनों बैलों को एक-दूसरे का पूरक बनाया है: अकेला हीरा दब जाता, अकेला मोती अत्याचारी बन जाता; दोनों साथ हैं, इसलिए वे न कायर हैं न क्रूर। स्वतंत्रता आंदोलन में भी यही दो धाराएँ साथ-साथ चलीं — एक ओर अहिंसक सत्याग्रह, दूसरी ओर क्रांतिकारियों का सशस्त्र प्रतिकार।
प्र3.
3. “हम और तुम इतने दिनों एक साथ रहे। आज तुम विपत्ति में पड़ गए तो मैं तुम्हें छोड़कर अलग हो जाऊँ?” क्या कभी आपने किसी विपत्ति या चुनौती का सामना अपने किसी मित्र या परिजन के साथ मिलकर किया है? उस घटना के विषय में बताइए।
उत्तर

यह प्रश्न आपके अपने जीवन का है, इसलिए इसका उत्तर आपको स्वयं लिखना है। अच्छा उत्तर लिखने के लिए इन पाँच बातों को क्रम से रखिए —

  1. कब और कहाँ — घटना का समय और जगह, दो पंक्तियों में।
  2. चुनौती क्या थी — कठिनाई ठीक-ठीक बताइए, ताकि पढ़ने वाले को उसका बोझ महसूस हो।
  3. साथ किसने दिया और कैसे — केवल ‘मदद की’ मत लिखिए; बताइए कि उसने कौन-सा काम अपने ऊपर लिया।
  4. आपने क्या महसूस किया — यही उत्तर की जान है। मोती के आँसू वाला वाक्य इसीलिए याद रह जाता है।
  5. क्या सीखा — एक वाक्य में।
नमूना उत्तर: “पिछले वर्ष हमारे विद्यालय की विज्ञान प्रदर्शनी से दो दिन पहले मेरा और मेरे मित्र आदित्य का बनाया हुआ जल-शोधन मॉडल मेज़ से गिरकर टूट गया। मेरा तो हाथ-पाँव ही फूल गए, क्योंकि उसमें हमारी तीन हफ़्ते की मेहनत लगी थी। मैंने कहा कि अब हम नाम वापस ले लेते हैं। आदित्य ने केवल इतना कहा — ‘अकेले होते तो शायद छोड़ देते; दो हैं तो क्यों छोड़ें?’ उस शाम हम दोनों उसके घर की छत पर बैठे रहे। उसने टूटी बोतलों की जगह पुरानी बाल्टियाँ ढूँढ़ीं, मैंने रेत और कोयले की परतें फिर से बनाईं। रात के ग्यारह बजे तक काम चला और उसकी माँ हमें बीच-बीच में चाय देती रहीं। प्रदर्शनी में हमारा मॉडल पहले जैसा सुंदर तो नहीं था, पर वह काम कर रहा था और हमें सांत्वना पुरस्कार मिला। मुझे पुरस्कार से ज़्यादा वह वाक्य याद रह गया। उस दिन मुझे समझ आया कि विपत्ति का बोझ आधा नहीं होता — बँटने पर वह उठाने लायक हो जाता है। हीरा के लिए मोती ने भी यही किया था: वह भाग सकता था, पर उसने बंधन में पड़े मित्र के पास लौटकर सो जाना चुना।”
Tip: ऐसे प्रश्न में सच्ची छोटी घटना लिखिए। बहुत बड़ी और नाटकीय घटना गढ़ने से उत्तर नकली लगने लगता है। परीक्षक भाव देखता है, घटना का आकार नहीं।
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