हाँ, मैं इस बात से बहुत हद तक सहमत हूँ — पर एक स्पष्ट सीमा के साथ, जिसे प्रेमचंद ने स्वयं खींच रखी है।
सहमति क्यों —
- औपचारिकता दूरी की निशानी है। जिन दोस्तों के बीच बहुत तमीज़, बहुत ‘आप-जनाब’ रह जाए, वहाँ प्रायः यह डर भी रहता है कि कहीं दूसरा बुरा न मान जाए। जहाँ यह डर न हो, वहीं खुलकर हँसी-मज़ाक हो पाता है।
- छेड़खानी विश्वास की परीक्षा है। जो मित्र मज़ाक सह लेता है, वह यह भी सिद्ध कर देता है कि वह आपकी नीयत पर संदेह नहीं करता। इसीलिए लेखक ऐसी दोस्ती को ‘फुसफुसी’ नहीं कहता।
- कहानी में इसका ठीक चित्र मिलता है। हीरा-मोती “कभी-कभी दोनों सींग भी मिला लिया करते थे— विग्रह के नाते से नहीं, केवल विनोद के भाव से, आत्मीयता के भाव से।” यानी सींग मिलाना लड़ाई नहीं, प्रेम का खेल था।
पर सीमा भी कहानी ही बताती है — मटर के खेत के पास खेल-खेल में मोती ने हीरा को धक्का देकर खाई में गिरा दिया। “तब उसे भी क्रोध आया। संभलकर उठा और फिर मोती से भिड़ गया।” उस क्षण मोती ने स्वयं किनारा कर लिया — “मोती ने देखा— खेल में झगड़ा हुआ चाहता है तो किनारे हट गया।” यही असली सीख है: मज़ाक तभी तक मज़ाक है जब तक दोनों हँस रहे हों। जहाँ एक का चेहरा बदल जाए, वहाँ रुक जाना ही मित्रता है।