गंगा अध्याय 1 मेरी कल्पना मेरे अनुमान

अद्यतन2026-09-06

प्र1.
1. “उसने उनके माथे सहलाए और बोली— खोले देती हूँ। चुपके से भाग जाओ…” यदि आप वह छोटी लड़की होते, तो बैलों की मदद किस प्रकार करते?
उत्तर

लड़की के पास न शक्ति थी, न अधिकार, न कोई सहारा — फिर भी उसने वह सब किया जो उसके बस में था। उसकी जगह होकर मदद के तीन स्तर हो सकते हैं।

स्तरक्या करता/करतीक्यों
तुरंत की मददरोज़ चोरी-छिपे रोटी, गुड़, चोकर और पानी पहुँचाता; घाव पर हल्दी-तेल लगाता; रात में गराँव ढीला कर देता ताकि गरदन न छिले।भूख और चोट का इलाज सबसे पहले चाहिए। लड़की ने भी यही किया — और इसी की ‘बरकत’ थी कि दोनों दुर्बल न हुए।
बचाव की मददवही करता जो उसने किया — गराँव खोल देता और भागने का समय ऐसा चुनता जब सब सो चुके हों। साथ ही, जैसा उसने चतुराई से किया, ऊँची आवाज़ में शोर मचा देता (“ओ दादा! दादा! दोनों बैल भागे जा रहे हैं!”) ताकि किसी को मुझ पर संदेह न हो।यह उसकी सबसे बड़ी समझदारी थी — उसने बैलों को भी बचाया और अपने ऊपर से आरोप भी हटा लिया। हीरा को यही चिंता थी — “कल इस अनाथ पर आफत आएगी।”
स्थायी मददगाँव के बड़े-बूढ़ों, दादा या पंचायत को बताता कि बैल भूखे रखे जा रहे हैं और मारे जा रहे हैं; झूरी तक खबर पहुँचवाता कि उसके बैल किस हाल में हैं।भगाना एक रात की मदद है; सच्ची मदद यह है कि अत्याचार रुके। झूरी को पता चलते ही वह अपने बैल वापस ले आता।
नमूना उत्तर: “यदि मैं वह छोटी लड़की होती, तो सबसे पहले वही करती जो उसने किया — अपने हिस्से की रोटियाँ उन्हें खिलाती, क्योंकि भूख से बड़ा दुख उस समय उनका कोई नहीं था। दिन में जब सब खेत पर होते, मैं नाँद में थोड़ी खली और चोकर डाल आती और उनकी नाक पर पड़े घाव पर तेल लगा देती। रात को जब घर में यह तय हुआ कि उनकी नाकों में नाथ डाली जाएगी, तब मैं भी उनका गराँव खोल देती और कहती — ‘जाओ, अपने घर लौट जाओ।’ पर मैं इतने पर न रुकती। दूसरे दिन मैं अपने दादा से कहती कि जो बैल काम करते हैं उन्हें भूखा रखना पाप है, और किसी जाने-पहचाने आदमी के हाथ झूरी तक यह खबर भिजवाती कि उसके हीरा-मोती यहाँ बहुत दुख में हैं। मुझे डर तो लगता, पर जिनकी आँखें मुझे देखकर भर आती हों, उन्हें छोड़कर सो जाना मुझसे न होता।”
ध्यान रहे: उत्तर लिखते समय अपने-आप को ‘बहुत बड़ा नायक’ मत बनाइए। वह लड़की स्वयं अनाथ थी और मार खाती थी। इसीलिए उसकी छोटी-सी मदद इतनी बड़ी लगती है — जो स्वयं दुखी होकर भी दूसरे का दुख देख ले, वही सबसे बड़ा सहायक है।
प्र2.
2. “दोनों गधे अभी तक ज्यों-के-त्यों खड़े थे।” भय और संकोच इंसान को अवसर मिलने पर भी जकड़े रखता है। क्या आप इस कथन से सहमत हैं? इस वाक्य के संबंध में कहानी और अपने अनुभवों से उदाहरण लेते हुए अपने विचार लिखिए।
उत्तर

हाँ, मैं पूरी तरह सहमत हूँ। प्रेमचंद ने इस छोटे-से प्रसंग में एक बड़ी मनोवैज्ञानिक सच्चाई रख दी है — बंधन जब बहुत दिन का हो जाए, तो वह रस्सी से निकलकर मन में बैठ जाता है।

कहानी से प्रमाण —

  • दीवार गिर चुकी थी, रास्ता खुला था। “तीनों घोड़ियाँ सरपट भाग निकलीं। फिर बकरियाँ निकलीं। इसके बाद भेड़ें भी खिसक गईं; पर गधे अभी तक ज्यों-के-त्यों खड़े थे।”
  • हीरा ने पूछा तो गधे का उत्तर था — “जो कहीं फिर पकड़ लिए जाएँ!” यह भय भविष्य का है, वर्तमान का नहीं। वर्तमान में तो अवसर सामने खड़ा था।
  • हीरा ने समझाया — “तो क्या हरज है। अभी तो भागने का अवसर है।” पर उत्तर वही रहा — “हमें तो डर लगता है, हम यहीं पड़े रहेंगे।”
  • अंत में उन्हें अपने-आप जाना ही नहीं आया — “मोती ने दोनों गधों को सींगों से मार-मारकर बाड़े के बाहर निकाला।” जो अपने पैरों से नहीं निकलता, उसे दूसरे को ठेलकर निकालना पड़ता है।

कहानी के भीतर उलटा उदाहरण — उन्हीं बैलों को देखिए। मार का डर उन्हें भी था; हीरा ने साफ़ कहा भी — “अबकी बड़ी मार पड़ेगी।” पर उसने वह डर काम पर हावी नहीं होने दिया — “जोर तो मारता ही जाऊँगा, चाहे कितने ही बंधन पड़ते जाएँ।” यही अंतर गधों और बैलों में है: दोनों डरते हैं, पर एक डर के आगे रुक जाता है और दूसरा डर के बावजूद चलता रहता है।

नमूना उत्तर (अपने अनुभव से): “मेरी कक्षा में भाषण प्रतियोगिता की सूचना लगी थी। मैंने घर पर पूरा भाषण याद कर लिया था, पर नाम लिखवाने की पर्ची सामने आते ही हाथ रुक गया — यह सोचकर कि यदि बीच में भूल गया तो सब हँसेंगे। प्रतियोगिता के दिन मेरे मित्र ने वही बातें कहीं जो मैं कहना चाहता था और उसे पहला पुरस्कार मिला। उस दिन मुझे लगा कि मुझमें तैयारी की कमी नहीं थी, साहस की कमी थी। अगली बार मैंने पहले नाम लिखवाया, फिर तैयारी की — और डर तब भी था, पर इस बार मैं मंच तक पहुँच गया। तभी से मुझे काँजीहौस वाले गधे याद आते हैं: दरवाज़ा खुला हो और हम खड़े रह जाएँ, तो दोष दरवाज़े का नहीं होता।”
गहरा अर्थ: स्वतंत्रता आंदोलन के संदर्भ में यह प्रसंग और भी तीखा हो जाता है। प्रेमचंद कह रहे हैं कि पराधीनता केवल शासक की ताकत से नहीं टिकती, वह जनता के भय और संकोच से भी टिकती है। इसलिए आंदोलन का पहला काम दीवार तोड़ना नहीं, लोगों के मन से डर निकालना है।
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