प्र1.
1. “उसने उनके माथे सहलाए और बोली— खोले देती हूँ। चुपके से भाग जाओ…” यदि आप वह छोटी लड़की होते, तो बैलों की मदद किस प्रकार करते?
उत्तर
लड़की के पास न शक्ति थी, न अधिकार, न कोई सहारा — फिर भी उसने वह सब किया जो उसके बस में था। उसकी जगह होकर मदद के तीन स्तर हो सकते हैं।
| स्तर | क्या करता/करती | क्यों |
|---|---|---|
| तुरंत की मदद | रोज़ चोरी-छिपे रोटी, गुड़, चोकर और पानी पहुँचाता; घाव पर हल्दी-तेल लगाता; रात में गराँव ढीला कर देता ताकि गरदन न छिले। | भूख और चोट का इलाज सबसे पहले चाहिए। लड़की ने भी यही किया — और इसी की ‘बरकत’ थी कि दोनों दुर्बल न हुए। |
| बचाव की मदद | वही करता जो उसने किया — गराँव खोल देता और भागने का समय ऐसा चुनता जब सब सो चुके हों। साथ ही, जैसा उसने चतुराई से किया, ऊँची आवाज़ में शोर मचा देता (“ओ दादा! दादा! दोनों बैल भागे जा रहे हैं!”) ताकि किसी को मुझ पर संदेह न हो। | यह उसकी सबसे बड़ी समझदारी थी — उसने बैलों को भी बचाया और अपने ऊपर से आरोप भी हटा लिया। हीरा को यही चिंता थी — “कल इस अनाथ पर आफत आएगी।” |
| स्थायी मदद | गाँव के बड़े-बूढ़ों, दादा या पंचायत को बताता कि बैल भूखे रखे जा रहे हैं और मारे जा रहे हैं; झूरी तक खबर पहुँचवाता कि उसके बैल किस हाल में हैं। | भगाना एक रात की मदद है; सच्ची मदद यह है कि अत्याचार रुके। झूरी को पता चलते ही वह अपने बैल वापस ले आता। |
नमूना उत्तर: “यदि मैं वह छोटी लड़की होती, तो सबसे पहले वही करती जो उसने किया — अपने हिस्से की रोटियाँ उन्हें खिलाती, क्योंकि भूख से बड़ा दुख उस समय उनका कोई नहीं था। दिन में जब सब खेत पर होते, मैं नाँद में थोड़ी खली और चोकर डाल आती और उनकी नाक पर पड़े घाव पर तेल लगा देती। रात को जब घर में यह तय हुआ कि उनकी नाकों में नाथ डाली जाएगी, तब मैं भी उनका गराँव खोल देती और कहती — ‘जाओ, अपने घर लौट जाओ।’ पर मैं इतने पर न रुकती। दूसरे दिन मैं अपने दादा से कहती कि जो बैल काम करते हैं उन्हें भूखा रखना पाप है, और किसी जाने-पहचाने आदमी के हाथ झूरी तक यह खबर भिजवाती कि उसके हीरा-मोती यहाँ बहुत दुख में हैं। मुझे डर तो लगता, पर जिनकी आँखें मुझे देखकर भर आती हों, उन्हें छोड़कर सो जाना मुझसे न होता।”
ध्यान रहे: उत्तर लिखते समय अपने-आप को ‘बहुत बड़ा नायक’ मत बनाइए। वह लड़की स्वयं अनाथ थी और मार खाती थी। इसीलिए उसकी छोटी-सी मदद इतनी बड़ी लगती है — जो स्वयं दुखी होकर भी दूसरे का दुख देख ले, वही सबसे बड़ा सहायक है।