गंगा अध्याय 1 मेरी समझ मेरे विचार

अद्यतन2026-09-06

प्र1.
1. “दूसरे दिन गया ने बैलों को हल में जोता, पर इन दोनों ने जैसे पाँव न उठाने की कसम खा ली थी।” जब बैल नए मालिक के यहाँ गए, तो उन्होंने काम करने से इनकार क्यों कर दिया था?
उत्तर

बैलों का इनकार आलस्य या थकान नहीं था — वह एक सोचा-समझा असहयोग था। इसके तीन साफ़ कारण कहानी में मिलते हैं।

  1. बिकने का अपमान — वे समझ बैठे थे कि “मालिक ने हमें बेच दिया।” जिस झूरी की उन्होंने वर्षों सेवा की, उसी ने उन्हें ‘जालिम के हाथ’ सौंप दिया — यह उनके लिए विश्वासघात था। जो सेवा प्रेम से की जाती थी, वह जबरदस्ती से नहीं की जा सकती।
  2. अपमानजनक व्यवहार — गया के यहाँ उन्हें “मोटी रस्सियों से बाँधा” गया, “कल की शरारत का मजा” चखाया गया, और खाने को केवल सूखा भूसा मिला, जबकि गया के अपने बैलों को “खली, चूनी सब कुछ” दी गई। प्रेमचंद इसे नाम भी देते हैं — “आहत सम्मान की व्यथा तो थी ही, उस पर मिला सूखा भूसा।”
  3. तुलना की चोट — झूरी उन्हें “फूल की छड़ी से भी न छूता था। उसकी टिटकार पर दोनों उड़ने लगते थे।” यहाँ वही काम डंडे के दम पर कराया जा रहा था। जहाँ प्रेम था वहाँ वे दुगना बोझ अपनी गरदन पर लेना चाहते थे; जहाँ मार है वहाँ उन्होंने पाँव तक न उठाया।
इसका गहरा अर्थ: यह प्रसंग कहानी को स्वतंत्रता आंदोलन से जोड़ने वाली पहली कड़ी है। काम करने की ताकत उनमें थी — इसी हल को वे झूरी के खेत में हँसते-हँसते खींचते थे। जो नहीं था, वह थी सहमति। पराधीन आदमी की सबसे बड़ी शक्ति यही है कि वह अपना श्रम रोक ले। प्रेमचंद के समय भारत में यही ‘असहयोग’ चल रहा था, और प्रेमचंद ने स्वयं इसी आंदोलन के लिए सरकारी नौकरी छोड़ी थी।
प्र2.
2. “गाँव के इतिहास में यह घटना अभूतपूर्व न होने पर भी महत्वपूर्ण थी।” बैलों का घर लौट आना कोई साधारण घटना नहीं है। कैसे? (संकेत— वे क्यों लौट आए, उनके और झूरी के मन में कौन-कौन से भाव रहे होंगे, क्या वास्तविक जीवन में भी ऐसा होता है आदि।)
उत्तर

यह घटना कई कारणों से साधारण नहीं है।

  • यह असंभव-सा काम था। पगहे इतने मजबूत थे कि “अनुमान न हो सकता था कि कोई बैल उन्हें तोड़ सकेगा” — फिर भी “एक-एक झटके में रस्सियाँ टूट गईं।” प्रेमचंद इसका कारण भी देते हैं — “पर इन दोनों में इस समय दूनी शक्ति आ गई थी।” यह दूनी शक्ति भावना से आई थी, माँस-पेशियों से नहीं।
  • यह चुनाव था, भटकाव नहीं। अनजान गाँव से रात के अँधेरे में सही रास्ता खोजकर वे ठीक अपने ही द्वार पर पहुँचे — “घुटने तक पाँव कीचड़ से भरे हैं।” यह बताता है कि उन्होंने आजादी नहीं, अपना घर चुना।
  • दोनों ओर के भाव। बैलों की आँखों में लेखक ने एक अनोखा भाव देखा — “दोनों की आँखों में विद्रोहमय स्नेह झलक रहा है।” यह एक साथ उलाहना भी है और प्रेम भी। झूरी की ओर से — “स्नेह से गद्गद हो गया। दौड़कर उन्हें गले लगा लिया।” गाँव के बच्चों ने तालियाँ बजाईं, बाल-सभा ने अभिनंदन-पत्र देने का निश्चय किया और किसी ने कहा — “बैल नहीं हैं वे, उस जनम के आदमी हैं।”
  • इसने रिश्ते की सच्चाई साबित कर दी। पशु और मालिक का संबंध यहाँ मालिकी का नहीं, आत्मीयता का सिद्ध हुआ। इसीलिए ‘अभूतपूर्व न होने पर भी महत्वपूर्ण’ — गाँवों में बिके पशु लौट आते हैं, पर हर बार यह लौटना यही याद दिलाता है कि प्रेम को खरीदा-बेचा नहीं जा सकता।
क्या वास्तविक जीवन में भी ऐसा होता है? हाँ। गाय, बैल, कुत्ते और घोड़े गंध, आवाज़ और रास्ते की पहचान से मीलों दूर से लौट आते हैं — गाँवों में ऐसे किस्से आम हैं। इसीलिए लेखक ने इसे ‘अभूतपूर्व’ नहीं कहा; उसने इसे महत्वपूर्ण कहा, क्योंकि महत्व घटना में नहीं, उसके पीछे के भाव में है।
प्र3.
3. “मोती ने मूक-भाषा में कहा— अब तो नहीं सहा जाता, हीरा!” ‘कभी-कभी संघर्ष करना आवश्यक हो जाता है’ इस कथन को कहानी के उदाहरणों से सिद्ध कीजिए।
उत्तर

पूरी कहानी इसी कथन का प्रमाण है। कहानी में सहनशीलता एक हद तक चलती है, फिर हर बार वह क्षण आता है जब सहना ही अन्याय को बढ़ाने लगता है — और तब बैल संघर्ष करते हैं।

प्रसंगपहले क्या सहासंघर्ष का रूपक्या मिला
ससुराल की पहली रातअनजान घर, भूख, बेगानापन“दोनों ने जोर मारकर पगहे तुड़ा डाले और घर की तरफ चले।”अपना घर, झूरी का आलिंगन, गाँव का स्वागत
गया का हल जोतनासूखा भूसा, मोटी रस्सी, डंडेपाँव न उठाना; हीरा की नाक पर डंडे पड़ते ही मोती का हल लेकर भागना — “हल, रस्सी, जुआ, जोत, सब टूट-टाट कर बराबर हो गया।”गया ने उस दिन मारपीट टाल दी — “उसके तेवर देखकर … समझ गए कि इस वक्त टाल जाना ही मसलहत है।”
साँड़ का सामना“भागना कायरता है।” दोनों ने मिलकर योजना बनाई — “मैं आगे से रगेदता हूँ, तुम पीछे से रगेदो।”“साँड़ बेदम होकर गिर पड़ा” — जान बची और आत्मविश्वास मिला
काँजीहौससारा दिन एक तिनका भी नहीं; दीवार की नमकीन मिट्टी चाटनाहीरा का दीवार में सींग गड़ाना, डंडे खाकर भी न रुकना — “जोर तो मारता ही जाऊँगा, चाहे कितने ही बंधन पड़ते जाएँ।” फिर मोती का दो घंटे की जोर-आजमाई से दीवार गिरानातीन घोड़ियाँ, बकरियाँ, भेड़ें और दो गधे — नौ-दस प्राणियों की जान बच गई
दढ़ियल का ले जानानीलाम, भय से काँपती बोटी-बोटी“उसी वक्त मोती ने सींग चलाया। दढ़ियल पीछे हटा।”दढ़ियल गाँव के बाहर भाग गया; बैल हमेशा के लिए घर के हो गए
निष्कर्ष: हर बार जो कुछ मिला, वह सहने से नहीं, लड़ने से मिला। कहानी यह भी दिखाती है कि संघर्ष का मूल्य चुकाना पड़ता है — मार, भूख, बंधन, नीलाम। पर इसके उलट, न लड़ने का मूल्य और भी भारी है: काँजीहौस के दोनों गधे “भागें या न भागें” सोचते ही रह गए और मोती को उन्हें सींगों से ठेलकर बाहर निकालना पड़ा। जो अवसर आने पर भी नहीं लड़ता, उसे कोई और आकर ही बाहर निकालता है।
प्र4.
4. “जब पेट भर गया और दोनों ने आजादी का अनुभव किया…” हीरा एवं मोती ‘स्वतंत्रता’ और ‘अपनापन’ दोनों में से किस भावना से अधिक प्रेरित थे? कारण सहित लिखिए।
उत्तर

दोनों भावनाएँ कहानी में हैं, पर अंतिम रूप से हीरा-मोती ‘अपनापन’ से अधिक प्रेरित हैं — स्वतंत्रता उनके लिए साध्य नहीं, अपनापन तक पहुँचने का साधन है।

‘स्वतंत्रता’ के पक्ष में प्रमाण‘अपनापन’ के पक्ष में प्रमाण
मटर के खेत में — “जब पेट भर गया और दोनों ने आजादी का अनुभव किया तो मस्त होकर उछलने-कूदने लगे।”पहली ही रात लौटने का कारण — “यह नया घर, नया गाँव, नए आदमी, सब उन्हें बेगानों-से लगते थे।”
हीरा का संकल्प — “जोर तो मारता ही जाऊँगा, चाहे कितने ही बंधन पड़ते जाएँ।”छोटी लड़की की दो रोटियाँ — “उस एक रोटी से इनकी भूख तो क्या शांत होती; पर दोनों के हृदय को मानो भोजन मिल गया।”
काँजीहौस की दीवार गिराना और दूसरों को छुड़ानागराँव खुल जाने पर भी न भागना, क्योंकि “कल इस अनाथ पर आफत आएगी। सब इसी पर संदेह करेंगे।”
मोती का मित्र को न छोड़ना — “आज तुम विपत्ति में पड़ गए, तो मैं तुम्हें छोड़कर अलग हो जाऊँ?”
अंत — “दोनों दौड़कर अपने थान पर आए और खड़े हो गए।” स्वतंत्र होने पर भी वे फिर उसी नाँद, उसी थान, उसी झूरी के पास लौटे।
निर्णायक तर्क: ध्यान दीजिए कि आजादी का नशा उन्हें केवल एक बार, मटर के खेत में चढ़ता है — और वह भी पेट भरने के बाद, कुछ ही देर के लिए। इसके विपरीत ‘अपनापन’ हर मोड़ पर उनका निर्णय तय करता है: लौटना, न भागना, मित्र के साथ बंधे रहना, और अंत में थान पर आ खड़े होना। यदि केवल स्वतंत्रता चाहिए होती, तो दढ़ियल से छूटकर वे जंगल की ओर भाग सकते थे — पर वे घर की ओर दौड़े। इसलिए उनके लिए स्वतंत्रता का अर्थ है ‘बंधन से मुक्ति’ नहीं, बल्कि ‘अपनों के बीच लौट आना’।
दूसरा पक्ष भी लिख सकते हैं: यदि आप ‘स्वतंत्रता’ का पक्ष लेना चाहें तो हीरा के काँजीहौस वाले संकल्प और नौ-दस प्राणियों को छुड़ाने के प्रसंग को आधार बनाइए। परीक्षा में दोनों में से कोई भी पक्ष स्वीकार्य है — शर्त यह है कि उत्तर कहानी के प्रमाणों पर टिका हो।
प्र5.
5. “बैलों ने जैसे पाँव न उठाने की कसम खा ली थी।” ‘अत्याचार सहना भी अन्याय में भागीदारी है’— क्या आप इस कथन से सहमत हैं? अपने उत्तर के कारण भी बताइए।
उत्तर

हाँ, मैं इस कथन से सहमत हूँ — इस शर्त के साथ कि सहने वाले के पास विरोध करने का कोई-न-कोई रास्ता मौजूद हो।

सहमति के कारण —

  • चुप्पी को स्वीकृति मान लिया जाता है। अत्याचारी को अपने काम की पुष्टि चाहिए होती है। जब कोई विरोध नहीं होता, तो वह मान लेता है कि उसका किया ठीक है। गया ने पहली बार मार-पीट की, दूसरी बार और अधिक की — रुका तभी जब मोती के “तेवर” दिखे।
  • अत्याचार बढ़ता जाता है। कहानी का क्रम देखिए — पहले सूखा भूसा, फिर मोटी रस्सी, फिर डंडे, फिर “नाकों में नाथ डाल दी जाएँ” की योजना। हर सही हुई ज़्यादती अगली ज़्यादती का रास्ता खोलती है।
  • सहनशीलता को बेवकूफ़ी समझ लिया जाता है। कहानी की पहली ही पंक्तियाँ यही व्यंग्य करती हैं — गधे में “ऋषियों-मुनियों के जितने गुण हैं, वे सभी … पराकाष्ठा को पहुँच गए हैं; पर आदमी उसे बेवकूफ कहता है।” प्रेमचंद आगे और तीखा कहते हैं — “अगर वे भी ईंट का जवाब पत्थर से देना सीख जाते, तो शायद सभ्य कहलाने लगते।”
  • चुप्पी दूसरों को भी बाँध देती है। काँजीहौस के दोनों गधे न भागे और दूसरों के लिए भी उदाहरण बन जाते — यदि मोती न ठेलता, तो वे वहीं मर जाते। कहानी के अंत में बैल स्वयं इसे स्वीकार करते हैं — “हमारी जान को कोई जान ही नहीं समझता।” / “इसीलिए कि हम इतने सीधे हैं।”
पर एक ज़रूरी शर्त: जो सचमुच असहाय है — छोटा बच्चा, बीमार, अकेली स्त्री — उसका चुप रह जाना ‘भागीदारी’ नहीं, विवशता है। कहानी की छोटी लड़की स्वयं सौतेली माँ की मार सहती है; उसे दोषी नहीं ठहराया जा सकता। फिर भी वह जितना कर सकती है, करती है — रोटियाँ लाती है और गराँव खोल देती है। इसलिए सही बात यह है: विरोध की शक्ति रहते हुए चुप रहना अन्याय में भागीदारी है; और शक्ति न हो तो जितना बन पड़े, उतना करना ही विरोध है।
अपने जीवन से जोड़िए: कक्षा में किसी सहपाठी को चिढ़ाया जा रहा हो और बाकी सब हँसते रहें, तो हँसने वाले भी उस चिढ़ाने में शामिल हैं। रोकना न बन पड़े, तो कम-से-कम हँसना बंद करना और शिक्षक को बताना — यह भी विरोध है।
प्र6.
6. “बहुत दिनों साथ रहते-रहते दोनों में भाईचारा हो गया था।” हीरा और मोती अभिन्न मित्र थे। कहानी की किन-किन घटनाओं के आधार पर यह निष्कर्ष निकाला जा सकता है? कम से कम तीन बिंदु लिखिए।
उत्तर

कहानी में कम-से-कम छह घटनाएँ इस निष्कर्ष का आधार बनती हैं। तीन माँगे गए हैं, पर सब जान लेना अच्छा है।

  1. दिनचर्या का साझापन — “दोनों साथ उठते, साथ नाँद में मुँह डालते और साथ ही बैठते थे। एक मुँह हटा लेता, तो दूसरा भी हटा लेता था।” मित्रता की सबसे पहली पहचान यही है कि सुख भी बराबर बँटे।
  2. बिना शब्दों की समझ — “एक-दूसरे से मूक-भाषा में विचार-विनिमय करते थे… अवश्य ही उनमें कोई ऐसी गुप्त शक्ति थी जिससे … मनुष्य वंचित है।”
  3. बोझ अपने ऊपर लेने की होड़ — “हरएक की यही चेष्टा होती थी कि ज्यादा-से-ज्यादा बोझ मेरी ही गरदन पर रहे।” सच्ची मित्रता में स्पर्धा होती है, तो सेवा की होती है।
  4. मित्र पर हाथ उठते ही क्रोध — हीरा की नाक पर डंडे पड़े और मोती का “गुस्सा काबू के बाहर हो गया। हल लेकर भागा।” अपनी मार पर वह चुप रहा था।
  5. संकट में लौट आना — मटर के खेत में मोती पकड़ा गया, तो हीरा जो बच निकला था, लौट आया — “हीरा ने देखा, संगी संकट में है, तो लौट पड़ा। फँसेंगे तो दोनों फँसेंगे।”
  6. स्वतंत्रता से बड़ी मित्रता — काँजीहौस में दीवार गिरने के बाद भी मोती नहीं भागा — “मोती ने आँखों में आँसू लाकर कहा— तुम मुझे इतना स्वार्थी समझते हो, हीरा?” और मार खाने की बात पर बोला — “जिस अपराध के लिए तुम्हारे गले में बंधन पड़ा, उसके लिए अगर मुझ पर मार पड़े, तो क्या चिंता।”
ध्यान देने योग्य बात: इन दोनों का स्वभाव एक-सा नहीं है — हीरा सहनशील और धर्मभीरु है, मोती उग्र और तेज। फिर भी वे अभिन्न हैं। इससे यह सीख मिलती है कि मित्रता एक-जैसा होने से नहीं, एक-दूसरे को स्वीकार करने और आवश्यकता पड़ने पर एक-दूसरे के लिए खड़े हो जाने से बनती है।
प्र7.
7. “उसी समय मालकिन ने आकर दोनों के माथे चूम लिए।” कहानी में मालकिन और छोटी लड़की, दोनों के व्यवहार की तुलना कीजिए।
उत्तर

दोनों स्त्री-पात्र हैं, दोनों के हाथ में बैलों को कुछ देने की शक्ति है — पर एक के पास शक्ति होकर भी करुणा नहीं, और दूसरी के पास करुणा होकर भी शक्ति नहीं।

बिंदुमालकिन (झूरी की स्त्री)छोटी लड़की (भैरो की बेटी)
पहली प्रतिक्रियाबैलों को द्वार पर देखकर “जल उठी” और उन्हें ‘नमक-हराम’ तथा ‘कामचोर’ कहा।बिना कहे “दो रोटियाँ लिए निकली और दोनों के मुँह में देकर चली गई।”
व्यवहार का आधारउपयोगिता — बैल काम नहीं करते, इसलिए दंड के पात्र हैं।करुणा — वे दुखी हैं, इसलिए सहायता के पात्र हैं।
अपनी स्थितिघर की स्वामिनी; भोजन का निर्णय उसी का — “सूखे भूसे के सिवा कुछ न दूँगी, खाएँ चाहे मरें।”अनाथ; माँ मर चुकी है और सौतेली माँ मारती रहती है। जो देती है, चोरी-छिपे और अपने हिस्से से देती है।
प्रभावबैलों की भूख और अपमान बढ़ा — “आहत सम्मान की व्यथा तो थी ही, उस पर मिला सूखा भूसा।”“उस एक रोटी से इनकी भूख तो क्या शांत होती; पर दोनों के हृदय को मानो भोजन मिल गया।” “प्रेम के इस प्रसाद की यह बरकत थी कि … दोनों दुर्बल न होते थे।”
जोखिम उठानाकोई जोखिम नहीं; अपने ही घर में हुक्म चलाया।बहुत बड़ा जोखिम — गराँव खोलकर कहा, “चुपके से भाग जाओ, नहीं तो यहाँ लोग तुम्हें मार डालेंगे।” पकड़े जाने पर मार उसी को पड़ती।
अंत मेंबदल जाती है — “उसी समय मालकिन ने आकर दोनों के माथे चूम लिए।”अंत तक वैसी ही — निस्वार्थ और चुपचाप देने वाली।
अंत का महत्व: कहानी मालकिन को खलनायिका बनाकर नहीं छोड़ती। उसका माथा चूमना बताता है कि वह कठोर नहीं, अनजान थी — उसने बैलों को केवल ‘सम्पत्ति’ की तरह देखा था। जब उसने उनका साहस, उनकी वफ़ादारी और मृत्यु के मुँह से लौटना देखा, तो उसकी दृष्टि बदल गई। यही प्रेमचंद की करुणा है — वे मनुष्य को सुधरने का अवसर देते हैं। और छोटी लड़की यह सिखाती है कि दया के लिए शक्ति या सम्पन्नता ज़रूरी नहीं; ज़रूरी है संवेदनशील हृदय।
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