बैलों का इनकार आलस्य या थकान नहीं था — वह एक सोचा-समझा असहयोग था। इसके तीन साफ़ कारण कहानी में मिलते हैं।
- बिकने का अपमान — वे समझ बैठे थे कि “मालिक ने हमें बेच दिया।” जिस झूरी की उन्होंने वर्षों सेवा की, उसी ने उन्हें ‘जालिम के हाथ’ सौंप दिया — यह उनके लिए विश्वासघात था। जो सेवा प्रेम से की जाती थी, वह जबरदस्ती से नहीं की जा सकती।
- अपमानजनक व्यवहार — गया के यहाँ उन्हें “मोटी रस्सियों से बाँधा” गया, “कल की शरारत का मजा” चखाया गया, और खाने को केवल सूखा भूसा मिला, जबकि गया के अपने बैलों को “खली, चूनी सब कुछ” दी गई। प्रेमचंद इसे नाम भी देते हैं — “आहत सम्मान की व्यथा तो थी ही, उस पर मिला सूखा भूसा।”
- तुलना की चोट — झूरी उन्हें “फूल की छड़ी से भी न छूता था। उसकी टिटकार पर दोनों उड़ने लगते थे।” यहाँ वही काम डंडे के दम पर कराया जा रहा था। जहाँ प्रेम था वहाँ वे दुगना बोझ अपनी गरदन पर लेना चाहते थे; जहाँ मार है वहाँ उन्होंने पाँव तक न उठाया।