गंगा अध्याय 11 झरोखे से

अद्यतन2026-09-06

प्र1.
कविता में लक्ष्मीबाई की दो सखियों ‘काना’ और ‘मंदरा’ का उल्लेख मिलता है जो युद्धक्षेत्र में अंत तक लक्ष्मीबाई के साथ रहीं। लक्ष्मीबाई की सहेलियों में ऐसी ही एक और वीरांगना का नाम आता है, जिनका नाम था ‘झलकारी बाई’। … नीचे दिए गए लेख को पढ़कर आप 1857 के स्वतंत्रता संग्राम में उनके योगदान के विषय में जान सकते हैं। — लेख के आधार पर बताइए कि झलकारी बाई कौन थीं और 1857 के स्वतंत्रता संग्राम में उनका क्या योगदान रहा?
उत्तर

झलकारी बाई कौन थीं — पुस्तक के लेख के अनुसार उनका जन्म 22 नवंबर 1830 को झाँसी के निकट भोजला गाँव में हुआ था। वे एक सामान्य परिवार से थीं और लेख के शब्दों में “केवल अपनी दृढ़ता और साहस से प्रेरित थीं”, जो आगे चलकर एक आदरणीय योद्धा बनीं। उन्होंने बहुत कम उम्र में ही घुड़सवारी, अस्त्र-शस्त्र की कला और योद्धा की तरह लड़ना सीख लिया था। तीरंदाजी, कुश्ती और निशानेबाजी उन्होंने अपने पति पूरन कोरी से सीखी, जो रानी लक्ष्मीबाई के पति राजा गंगाधर राव की सेना में सैनिक थे।

रानी से संबंध — वे प्रायः अपने पति के साथ शाही महल जाया करती थीं। जब रानी लक्ष्मीबाई को उनकी बहादुरी के बारे में पता चला, तो दोनों अच्छी सहेलियाँ बन गईं। लेख एक विशेष बात बताता है — झलकारी बाई का शारीरिक गठन और चेहरा रानी लक्ष्मीबाई से मिलता-जुलता था। यही समानता आगे चलकर इतिहास का रुख मोड़ देती है। उन्हें रानी की ‘दुर्गा दल’ नामक महिला सेना में पद मिला और वे प्रायः रानी की ओर से महत्वपूर्ण निर्णय भी लिया करती थीं।

1857 में उनका योगदान —

क्रमयोगदानलेख का आधार
1महिला टुकड़ी का नेतृत्व — सन् 1857 में जब सिपाहियों का विद्रोह उत्तरी और मध्य भारत में फैला और सिपाही रानी के समर्थन में एकत्र हुए, तब झलकारी बाई को सेना की महिला टुकड़ी का नेतृत्व सौंपा गया।“झलकारी बाई को सेना की महिला टुकड़ी का नेतृत्व करने की जिम्मेदारी सौंपी गई।”
2किले की रक्षा — सन् 1858 में जब जनरल सर ह्यू रोज की कमान में अंग्रेज़ी सेना ने झाँसी के किले पर हमला करके उसे घेर लिया, तो झलकारी बाई और पूरन कोरी दोनों ने कड़ा प्रतिरोध किया।“दोनों ने उसका कड़ा प्रतिरोध किया।”
3रानी का वेश धारण करना — उन्होंने रानी को अपने बच्चे के साथ महल छोड़ने का सुझाव दिया और स्वयं रानी लक्ष्मीबाई का वेश धारण करके सेना की कमान सँभाली तथा अंग्रेज़ों से लड़ीं।“उनकी सरूपता ने अंग्रेजों को भ्रमित किए रखा और उनकी यह चाल लंबे समय तक काम करती रही।”
4रानी को सुरक्षित निकालना — अंग्रेज़ उनकी असली पहचान को लेकर अनिश्चित बने रहे और इसी कारण रानी लक्ष्मीबाई अपने बेटे के साथ महल से निकल सकीं।“उनकी वजह से ही रानी लक्ष्मीबाई अपने बेटे के साथ अपने महल से भाग सकीं।”
5पति के बलिदान के बाद भी लड़ती रहीं — उसी लड़ाई में पूरन कोरी अंग्रेज़ों से लड़ते हुए मारे गए। यह सुनकर झलकारी बाई क्रोधित हो गईं, उन्होंने कई अंग्रेज़ सैनिकों को मार डाला और जमकर लड़ाई लड़ी।लेख का चौथा अनुच्छेद

स्मृति — लेख के अनुसार उनकी कहानी बुंदेलखंड की लोक स्मृति का हिस्सा है; उनके बहादुर करतब वहाँ की लोककथाओं में बार-बार उभरकर सामने आते हैं और उनके सम्मान में हर साल झलकारी बाई जयंती मनाई जाती है। ‘अमर शहीद’ झलकारी बाई सन् 1890 तक जीवित रहीं और अपने समय की शौर्य की प्रतिमूर्ति बन गई थीं।

ध्यान दीजिए: लेख का पहला ही वाक्य कहता है — “इतिहास के पन्नों में लुप्त, यह एक महान योद्धा की कहानी है।” यही इस ‘झरोखे’ का उद्देश्य है — उन नामों की ओर ध्यान दिलाना जो लिखे हुए इतिहास से छूट गए।
प्र2.
कविता ‘झाँसी की रानी’ और ‘झरोखे से’ में दिए गए झलकारी बाई पर आधारित लेख — दोनों को साथ रखकर बताइए कि इनसे 1857 के स्वतंत्रता संग्राम में स्त्रियों की भूमिका के बारे में क्या समझ बनती है? दोनों रचनाओं की विधा और प्रस्तुति में क्या अंतर है?
उत्तर

1. स्त्रियों की भूमिका के बारे में क्या समझ बनती है —

  • स्त्रियाँ अपवाद नहीं थीं। कविता में केवल रानी नहीं, काना और मंदरा भी लड़ती हैं — “युद्ध क्षेत्र में उन दोनों ने भारी मार मचाई थी”। लेख में झलकारी बाई और पूरी ‘दुर्गा दल’ नामक महिला सेना का उल्लेख है। यानी एक स्त्री-योद्धा के पीछे स्त्रियों की एक पूरी टुकड़ी खड़ी थी।
  • वर्ग की सीमा टूटती है। लक्ष्मीबाई रानी थीं; झलकारी बाई एक सामान्य परिवार से थीं और उनके पति साधारण सैनिक थे। फिर भी दोनों की भूमिका एक ही थी — देश के लिए लड़ना। यह भी ‘साझा संघर्ष’ का ही उदाहरण है, जैसे कविता कहती है — “महलों ने दी आग, झोंपड़ी ने ज्वाला सुलगाई थी।”
  • भूमिका केवल लड़ने की नहीं थी। झलकारी बाई ने केवल तलवार नहीं चलाई — उन्होंने रणनीति बनाई (रानी को निकल जाने का सुझाव), वेश बदलकर शत्रु को भ्रमित किया और सेना की कमान सँभाली। यह बुद्धि, नेतृत्व और आत्म-बलिदान — तीनों का काम है।
  • प्रशिक्षण से बनी वीरता। दोनों रचनाओं में एक बात समान है — दोनों स्त्रियों ने बचपन में ही शस्त्र-विद्या सीखी थी। कविता कहती है — “बरछी, ढाल, कृपाण, कटारी उसकी यही सहेली थी”; लेख कहता है — “उन्होंने बहुत कम उम्र में ही घुड़सवारी, अस्त्र-शस्त्र की कला और एक योद्धा की तरह लड़ना सीख लिया था।” यानी अवसर और अभ्यास मिले, तो कोई भी स्त्री योद्धा बन सकती है।
  • इतिहास ने सबको समान जगह नहीं दी। रानी का नाम हर जगह है, पर झलकारी बाई “इतिहास के पन्नों में लुप्त” रहीं और उन्हें बचाया लोक स्मृति ने। यही बात कविता की टेक भी कहती है — कहानी हमें हरबोलों से मिली, दस्तावेज़ों से नहीं।

2. दोनों रचनाओं की विधा और प्रस्तुति का अंतर —

बिंदु‘झाँसी की रानी’ (कविता)‘झलकारी बाई’ (लेख)
विधाकथात्मक कविता — वीर रस का गेय छंद, टेक के साथसूचनात्मक गद्य — जीवनी-परक लेख
भाषाअलंकारमयी और ओजपूर्ण — ‘सिंहनी’, ‘रण-चंडी’, ‘वीर-गति’सीधी और तथ्यपरक — जन्म-तिथि, गाँव का नाम, घटनाओं का क्रम
तिथियाँप्रायः नहीं; केवल ‘सन् सत्तावन’ और ‘तेइस की उम्र’स्पष्ट — 22 नवंबर 1830, 1857, 1858, 1890
उद्देश्यपढ़ने-सुनने वाले में जोश और गर्व जगानाएक भूली हुई योद्धा के विषय में जानकारी देना
प्रभावगाया जा सकता है, इसलिए याद रह जाता है और लोक तक पहुँचता हैप्रमाण देता है, इसलिए तथ्य की दृष्टि से भरोसेमंद है
निष्कर्ष: दोनों रचनाएँ एक-दूसरे को पूरा करती हैं। कविता भाव देती है और लेख तथ्य। कविता से हमें यह जोश मिलता है कि लड़ना क्यों ज़रूरी था; लेख से यह जानकारी मिलती है कि लड़ने वाले और भी थे, जिनके नाम हम भूल चुके हैं। इसीलिए पुस्तक ने कविता के बाद यह ‘झरोखा’ खोला है — ताकि पाठक यह न मान ले कि 1857 में केवल एक स्त्री लड़ी थी।
करके देखिए: 1857 और उसके बाद की तीन और वीरांगनाओं के नाम खोजिए — जैसे अवध की बेगम हज़रत महल, ऊदा देवी और रानी अवंतीबाई लोधी। हर एक पर पाँच वाक्य लिखकर कक्षा में एक ‘वीरांगना भित्ति-पत्र’ तैयार कीजिए।
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