सरल अर्थ — इन वीरों की गाथा छोड़कर अब हम झाँसी के मैदानों में चलें, जहाँ लक्ष्मीबाई पुरुषों के बीच पुरुष बनकर खड़ी है। लेफ्टिनेंट वॉकर अपने जवानों को लेकर आगे बढ़ा। रानी ने तलवार खींच ली और असमान लोगों के बीच द्वंद्व हुआ। घायल होकर वॉकर भाग खड़ा हुआ — उसे बड़ी अनोखी हैरानी थी।
| शिल्प का पक्ष | छंद में कैसे काम कर रहा है |
|---|---|
| अलंकार | अनुप्रास — “मर्द बनी मर्दानों में” (साथ ही यह यमक-सा प्रयोग भी है — एक ही शब्द-मूल दो रूपों में)। वीर रस का पूरा उभार। |
| वर्तमान काल | “जहाँ खड़ी है लक्ष्मीबाई” — पूरी कविता भूतकाल में है, पर यह एक क्रिया वर्तमान में है। इससे दृश्य आँखों के सामने घटित होता-सा लगता है। यह कवयित्री का सचेत शिल्प है। |
| अनेकार्थी शब्द | ‘द्वंद्व’ — पुस्तक के पृष्ठ 188 की तालिका में इसी शब्द पर प्रश्न है। यहाँ इसका अर्थ है युद्ध (दो योद्धाओं की आमने-सामने की लड़ाई), न कि ‘संशय’ या ‘युग्म’। |
| तुक | मैदानों में – मर्दानों में – जवानों में – असमानों में; और ‘हैरानी’ टेक से मिल जाती है। |