सरल अर्थ — सन् 1857 में सारे देश में ऐसी हलचल मची कि राजाओं के सिंहासन तक हिल उठे और राजवंशों ने क्रोध से भौंहें तान लीं। बूढ़े यानी सदियों से थके-हारे भारत में फिर से नई जवानी — नया जोश — आ गया। जो आज़ादी खो चुकी थी, उसकी कीमत अब सबकी समझ में आ गई और सबने मन में ठान लिया कि अंग्रेज़ों को यहाँ से दूर करना है। सन् सत्तावन में वही पुरानी तलवार फिर चमक उठी।
| शिल्प का पक्ष | छंद में कैसे काम कर रहा है |
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| अलंकार | मानवीकरण — निर्जीव ‘सिंहासन’ का ‘हिल उठना’ और भारत का ‘बूढ़ा’ होकर ‘जवानी’ पाना। रूपक — ‘बूढ़ा भारत’ (भारत में वृद्धावस्था का आरोप), ‘नई जवानी’ (नया जोश)। अनुप्रास — “सिंहासन हिल उठे” में ‘स’-‘ह’ की आवृत्ति और “कीमत ... पहचानी” में ‘क’ की आवृत्ति। |
| प्रतीक | ‘पुरानी तलवार’ — यह किसी एक की तलवार नहीं; यह भारत का वह पुराना शौर्य है जो लंबे समय से म्यान में पड़ा जंग खा रहा था। ‘चमक उठी’ कहकर कवयित्री बताती हैं कि वह मरा नहीं था, केवल सोया हुआ था। |
| बिंब | दृश्य बिंब — तनी हुई भौंहें और म्यान से निकलती चमकती तलवार; कान से अधिक आँख को छूने वाला चित्र। |
| तुक और लय | चारों चरणों के अंत में एक ही तुक — तानी – जवानी – पहचानी – ठानी – पुरानी — और यही ‘-आनी’ की तुक टेक के ‘कहानी’ और ‘रानी’ से जा मिलती है। इसी कारण छंद बिना रुके टेक में बह जाता है। |
| रस | वीर रस, जिसका स्थायी भाव है उत्साह। पहली ही पंक्ति से स्वर ऊँचा है। |
| भाषा | ओजपूर्ण खड़ी बोली; ‘फ़िरंगी’ (अंग्रेज़) और ‘आजादी’ जैसे उर्दू-फ़ारसी मूल के शब्द — जो शब्द उस समय आम आदमी की ज़बान पर थे। |