लक्ष्मीबाई के प्रिय खेल — कविता के तीसरे छंद में कवयित्री स्वयं उनकी सूची देती हैं — “नकली युद्ध, व्यूह की रचना और खेलना खूब शिकार, / सैन्य घेरना, दुर्ग तोड़ना, ये थे उसके प्रिय खिलवार”।
| खेल | उसका अर्थ | उससे कौन-सा गुण बनता है |
|---|---|---|
| नकली युद्ध | अभ्यास के लिए झूठमूठ की लड़ाई लड़ना | शस्त्र-संचालन और मैदान में डटे रहने का साहस |
| व्यूह की रचना | सेना को विशेष आकार में खड़ा करना (जैसे चक्रव्यूह) | रणनीति और आगे की चाल सोचने की क्षमता |
| शिकार खेलना | घोड़े पर जंगल में शिकार करना | घुड़सवारी, निशाना और तुरंत निर्णय लेने की आदत |
| सैन्य घेरना | शत्रु-सेना को चारों ओर से घेर लेना | नेतृत्व और सामूहिक चाल का अभ्यास |
| दुर्ग तोड़ना | किले पर आक्रमण करके उसे जीतना | दुर्ग-विद्या की समझ, जो आगे झाँसी की रक्षा में काम आई |
उनका बचपन दूसरों से कैसे भिन्न था —
- सहेलियाँ हथियार थे — “बरछी, ढाल, कृपाण, कटारी उसकी यही सहेली थी।” उस समय लड़कियों के लिए गुड़ियों और घरेलू खेलों की कल्पना की जाती थी; उनकी संगिनी हथियार थे। यह अंतर सबसे बड़ा है।
- पढ़ाई और खेल — दोनों लड़कों के साथ — “नाना के सँग पढ़ती थी वह, नाना के सँग खेली थी।” उन्हें अलग नहीं रखा गया; वे नाना धुंधूपंत के बराबर बैठकर पढ़ीं और उन्हीं के साथ खेलीं।
- कहानियाँ भी वीरता की — “वीर शिवाजी की गाथाएँ उसको याद ज़बानी थीं।” बच्चों को जो कहानियाँ सुनाई जाती हैं, उन्हीं से उनका मन बनता है। उनका मन शिवाजी की गाथाओं से बना।
- खेल में भी युद्ध — दूसरे बच्चों का खेल मनोरंजन के लिए होता है; उनका खेल स्वयं एक प्रशिक्षण था। ‘खिलवार’ कहकर कवयित्री यही कहती हैं कि जो दूसरों के लिए कठिन विद्या थी, वह उनके लिए खेल थी।
- घर का वातावरण — वे पिता की अकेली संतान थीं और बिठूर के पेशवा-परिवार के निकट पलीं, जहाँ शस्त्र, घोड़े और सैन्य-चर्चा रोज़ का हिस्सा थे।