गंगा अध्याय 11 साझा साथ/साझा संघर्ष

अद्यतन2026-09-06

प्र1.
1. “लावारिस का वारिस बनकर ब्रिटिश राज्य झाँसी आया”, ब्रिटिश राज किस नीति के कारण ‘लावारिस का वारिस’ बन जाता था? अपने इतिहास के शिक्षक से पता लगाकर उस नीति के विषय में लिखिए।
उत्तर

वह नीति थी — व्यपगत का सिद्धांत, जिसे हड़प नीति और अंग्रेज़ी में Doctrine of Lapse कहा जाता है। इसे लॉर्ड डलहौजी ने लागू किया, जो सन् 1848 से 1856 तक भारत का गवर्नर-जनरल था।

नीति क्या कहती थी —

  • यदि किसी देशी राज्य के शासक की मृत्यु अपनी संतान के बिना हो जाए, तो उसका दत्तक (गोद लिया) पुत्र उत्तराधिकारी नहीं माना जाएगा।
  • ऐसी स्थिति में वह राज्य ‘लावारिस’ मान लिया जाएगा और ईस्ट इंडिया कंपनी में मिला लिया जाएगा।
  • भारतीय परंपरा में गोद लेना पूरी तरह मान्य था — पुत्र न होने पर राजा गोद ले लेते थे और वही उत्तराधिकारी होता था। अंग्रेज़ों ने इसी परंपरा को अस्वीकार करके राज्य हड़पने का रास्ता बना लिया।

इसी नीति से छीने गए कुछ राज्य —

राज्यवर्षकविता में उल्लेख
सतारा1848“उदैपूर, तंजोर, सतारा, करनाटक की कौन बिसात”
नागपुर1854“हुआ नागपुर का भी घात”
झाँसी1854“लावारिस का वारिस बनकर ब्रिटिश राज्य झाँसी आया”
संबलपुर, जैतपुर, उदयपुर, बघाट आदि1849–1854“उदैपूर ... की कौन बिसात”
अवध (लखनऊ)1856“लिया लखनऊ बातों-बात” — यह ‘कुशासन’ के बहाने लिया गया, हड़प नीति से नहीं; इसीलिए कवयित्री ने ‘बातों-बात’ कहा।
झाँसी के साथ ठीक क्या हुआ: राजा गंगाधर राव की मृत्यु सन् 1853 में हुई। मृत्यु से पहले उन्होंने दामोदर राव को गोद लिया था। अंग्रेज़ों ने उस दत्तक पुत्र को उत्तराधिकारी मानने से इनकार कर दिया और सन् 1854 में झाँसी को अंग्रेज़ी राज्य में मिला लिया। रानी लक्ष्मीबाई ने इसका डटकर विरोध किया — उन्हीं का प्रसिद्ध वाक्य है “मैं अपनी झाँसी नहीं दूँगी।” कवयित्री का व्यंग्य यहीं है: झाँसी लावारिस थी ही नहीं — वारिस मौजूद था। उसे घोषित लावारिस किया गया, ताकि हड़पा जा सके।
परिणाम: इस नीति ने देशी राजाओं में गहरा असंतोष भर दिया और यही 1857 की क्रांति के प्रमुख राजनीतिक कारणों में गिनी जाती है। कविता का छंद 8 इसी असंतोष की पूरी सूची है। सन् 1858 में जब शासन कंपनी से ब्रिटिश ताज के हाथ आया, तो महारानी विक्टोरिया की घोषणा में गोद लेने का अधिकार भारतीय राजाओं को लौटा दिया गया — यानी अंग्रेज़ों को स्वयं यह नीति वापस लेनी पड़ी।
प्र2.
2. इस कविता में लक्ष्मीबाई की जीवन-गाथा के साथ-साथ अनेक वीरों के त्याग और बलिदान का भी उल्लेख है। उनकी सूची बनाइए तथा शिक्षक की सहायता से 1857 की क्रांति में उनके योगदान के विषय में लिखिए।
उत्तर

कविता में जिन वीरों का नाम आया है, उनकी सूची और 1857 में उनका योगदान —

वीरकौन थे1857 की क्रांति में योगदानकविता की पंक्ति
रानी लक्ष्मीबाईझाँसी की रानी; राजा गंगाधर राव की पत्नी; बचपन का नाम मनु, घर का नाम ‘छबीली’झाँसी को अंग्रेज़ों से बचाने के लिए युद्ध किया; वॉकर को घायल किया; सौ मील चलकर कालपी पहुँचीं; तात्या टोपे के साथ ग्वालियर जीता; 17–18 जून 1858 को ग्वालियर के पास वीरगति पाई।“खूब लड़ी मर्दानी वह तो झाँसी वाली रानी थी”
नाना धुंधूपंत (नाना साहब)अंतिम पेशवा बाजीराव द्वितीय के दत्तक पुत्र; बिठूर (कानपुर) के निवासी; लक्ष्मीबाई के बचपन के साथीअंग्रेज़ों ने उनकी पेंशन बंद कर दी थी। उन्होंने कानपुर में विद्रोह का नेतृत्व किया, स्वयं को पेशवा घोषित किया और क्रांति के लिए सैन्य-सामग्री जुटाई।“नाना धुंधूपंत पेशवा जुटा रहा था सब सामान”
ताँतिया (तात्या टोपे)नाना साहब के विश्वस्त साथी और सेनापति; असली नाम रामचंद्र पांडुरंग टोपे1857 के सबसे कुशल सेनानायक। कानपुर, कालपी और ग्वालियर के अभियानों में रानी के साथ रहे। रानी की वीरगति के बाद भी लंबे समय तक छापामार युद्ध लड़ते रहे; सन् 1859 में पकड़े जाकर बलिदान हुए।“नाना धुंधूपंत, ताँतिया, चतुर अज़ीमुल्ला सरनाम”
अज़ीमुल्ला खाँनाना साहब के दीवान और सलाहकार; अंग्रेज़ी तथा फ़्रांसीसी जानने वाले पढ़े-लिखे व्यक्तिनाना साहब की पेंशन का मुक़दमा लड़ने इंग्लैंड तक गए। लौटकर क्रांति के प्रचार और कूटनीति का पक्ष सँभाला — छावनियों और गाँवों तक संदेश पहुँचाने की व्यवस्था इन्हीं से जोड़ी जाती है। कवयित्री ने इसीलिए उन्हें ‘चतुर’ और ‘सरनाम’ (प्रसिद्ध) कहा।“चतुर अज़ीमुल्ला सरनाम”
अहमद शाह मौलवी (मौलवी अहमदुल्ला शाह)फ़ैज़ाबाद (अवध) के मौलवी और उपदेशकअवध में विद्रोह के प्रमुख नेता। लखनऊ की घेराबंदी और शाहजहाँपुर के युद्धों में अंग्रेज़ों से लड़े। सन् 1858 में मारे गए। अंग्रेज़ अफ़सरों ने भी उन्हें बहुत योग्य सेनानायक माना।“अहमद शाह मौलवी, ठाकुर कुँवरसिंह सैनिक अभिराम”
ठाकुर कुँवरसिंहबिहार के जगदीशपुर (आरा, शाहाबाद) के ज़मींदार; विद्रोह के समय लगभग 80 वर्ष केबिहार में विद्रोह का नेतृत्व किया। आरा, आज़मगढ़ और जगदीशपुर में अंग्रेज़ों को पराजित किया। सन् 1858 में विजय के कुछ ही दिन बाद घावों से देहांत हुआ। ‘सैनिक अभिराम’ का अर्थ है — शोभायमान, आदर्श योद्धा।“ठाकुर कुँवरसिंह सैनिक अभिराम”
काना और मंदरारानी लक्ष्मीबाई की सखियाँ और अंगरक्षिकाएँग्वालियर के युद्ध में रानी के साथ रहीं और स्वयं युद्ध-भूमि में लड़ीं — “युद्ध क्षेत्र में उन दोनों ने भारी मार मचाई थी”। ये साधारण स्त्रियाँ थीं, फिर भी अंत तक साथ नहीं छोड़ा।“काना और मंदरा सखियाँ रानी के सँग आई थीं”
झलकारी बाईझाँसी के पास भोजला गाँव में जन्मीं (22 नवंबर 1830); रानी की ‘दुर्गा दल’ नामक महिला सेना की सेनानायिका। (कविता में नहीं, पुस्तक के ‘झरोखे से’ में)झाँसी के किले की घेराबंदी के समय स्वयं रानी का वेश धारण करके सेना की कमान सँभाली और अंग्रेज़ों को भ्रमित किए रखा, जिससे रानी अपने पुत्र के साथ किले से निकल सकीं।पृष्ठ 191–192, ‘झरोखे से’
सूची से क्या दिखता है: ध्यान दीजिए, इस सूची में महाराष्ट्र, अवध, बिहार और बुंदेलखंड — चारों क्षेत्र हैं; हिंदू और मुसलमान दोनों हैं; राजा, सेनापति, विद्वान, ज़मींदार, धर्मोपदेशक और साधारण स्त्रियाँ — सब हैं। यही कवयित्री की सबसे बड़ी बात है: 1857 किसी एक वर्ग या एक क्षेत्र का विद्रोह नहीं था, वह साझा संघर्ष था। इसीलिए इस शीर्षक का नाम ही ‘साझा साथ/साझा संघर्ष’ है।
चोट की पंक्ति: इन नामों को गिनाने के बाद कवयित्री जोड़ती हैं — “लेकिन आज जुर्म कहलाती उनकी जो कुरबानी थी।” अंग्रेज़ी शासन के अभिलेखों में इन वीरों को ‘विद्रोही’ और ‘अपराधी’ लिखा गया था। यह पंक्ति याद दिलाती है कि इतिहास किसकी दृष्टि से लिखा गया है, यह देखना कितना ज़रूरी है।
प्र3.
3. यह कविता जिस समय और परिवेश में लिखी गई है, उसमें युद्ध और अन्य साहसिक कार्य करना सामान्यत: पुरुषों का क्षेत्र माना जाता था। वर्तमान में लगभग हर क्षेत्र में महिलाएँ कार्य कर रही हैं। नीचे कुछ ऐसे ही कार्यक्षेत्र दिए गए हैं। इन क्षेत्रों में काम करने वाली स्त्रियों के नाम और उनके विषय में लिखिए। आप चाहें तो इसमें अपनी समझ के अनुसार कुछ और कार्यक्षेत्र भी जोड़ सकते हैं। (कार्यक्षेत्र — 1. दमकल केंद्र (फायर ब्रिगेड) 2. रेलगाड़ी चालक 3. खेल के विभिन्न क्षेत्र 4. व्यापार और प्रबंधन 5. विज्ञान और तकनीक)
उत्तर

पुस्तक ने केवल कार्यक्षेत्रों की सूची दी है — नाम आपको भरने हैं। पूरी भरी हुई तालिका इस प्रकार है —

क्रमकार्यक्षेत्रस्त्रियों के नामसंक्षिप्त परिचय
1दमकल केंद्र (फायर ब्रिगेड)हर्षिणी कान्हेकर; तान्या सान्यालहर्षिणी कान्हेकर भारत की पहली महिला फ़ायर फ़ाइटर मानी जाती हैं — उन्होंने नागपुर के राष्ट्रीय अग्नि सेवा महाविद्यालय से प्रशिक्षण लिया। तान्या सान्याल भारतीय विमानपत्तन प्राधिकरण की पहली महिला अग्निशमन अधिकारी बनीं। आज अनेक राज्यों की दमकल सेवाओं में महिला दस्ते हैं।
2रेलगाड़ी चालकसुरेखा यादव; मुमताज़ काज़ीसुरेखा यादव भारत की पहली महिला रेल इंजन चालक (लोको पायलट) हैं; आगे चलकर वे वंदे भारत एक्सप्रेस चलाने वाली पहली महिला भी बनीं। मुमताज़ काज़ी डीज़ल इंजन चलाने वाली पहली महिला चालकों में गिनी जाती हैं। मुंबई की उपनगरीय रेल-सेवा में आज कई महिला चालक हैं।
3खेल के विभिन्न क्षेत्रपी.टी. ऊषा; मैरी कॉम; पी.वी. सिंधु; मीराबाई चानू; मिताली राज; हिमा दासपी.टी. ऊषा — दौड़ (एथलेटिक्स) की महान खिलाड़ी, ‘उड़नपरी’। मैरी कॉम — मुक्केबाज़ी में अनेक बार विश्व चैंपियन। पी.वी. सिंधु — बैडमिंटन में ओलंपिक पदक विजेता। मीराबाई चानू — भारोत्तोलन (वेट लिफ़्टिंग) में ओलंपिक पदक। मिताली राज — भारतीय महिला क्रिकेट टीम की कप्तान रहीं। हिमा दास — विश्व स्तर पर दौड़ में स्वर्ण जीतने वाली पहली भारतीय।
4व्यापार और प्रबंधनकिरण मजूमदार-शॉ; इंदिरा नूयी; अरुंधति भट्टाचार्य; फाल्गुनी नायरकिरण मजूमदार-शॉ — जैव-प्रौद्योगिकी कंपनी ‘बायोकॉन’ की संस्थापक। इंदिरा नूयी — एक बड़ी बहुराष्ट्रीय कंपनी की मुख्य कार्यकारी अधिकारी रहीं। अरुंधति भट्टाचार्य — भारतीय स्टेट बैंक की पहली महिला अध्यक्ष। फाल्गुनी नायर — एक बड़े ऑनलाइन व्यापार-मंच की संस्थापक।
5विज्ञान और तकनीककल्पना चावला; टेसी थॉमस; रितु करिधाल; मुथय्या वनिता; जानकी अम्मालकल्पना चावला — अंतरिक्ष में जाने वाली भारतीय मूल की पहली महिला। टेसी थॉमस — मिसाइल कार्यक्रम की वैज्ञानिक, ‘मिसाइल वुमन’ कही जाती हैं। रितु करिधाल और मुथय्या वनिता — इसरो के चंद्र-अभियानों की प्रमुख वैज्ञानिक। जानकी अम्माल — प्रसिद्ध वनस्पति वैज्ञानिक।
6वायुसेना / रक्षा (जोड़ा गया)अवनी चतुर्वेदी, भावना कंठ, मोहना सिंहये तीनों भारतीय वायुसेना की पहली महिला लड़ाकू विमान चालक हैं। आज तीनों सेनाओं में महिलाएँ स्थायी कमीशन पर अधिकारी हैं।
7पुलिस और प्रशासन (जोड़ा गया)किरण बेदी; अन्ना राजम मल्होत्राकिरण बेदी भारत की पहली महिला आई.पी.एस. अधिकारी थीं। अन्ना राजम मल्होत्रा पहली महिला आई.ए.एस. अधिकारी थीं।
8पर्वतारोहण (जोड़ा गया)बछेंद्री पाल; अरुणिमा सिन्हाबछेंद्री पाल एवरेस्ट पर चढ़ने वाली पहली भारतीय महिला हैं। अरुणिमा सिन्हा ने एक पैर खोने के बाद भी एवरेस्ट पर चढ़कर दिखाया।
कविता से जोड़कर देखिए: कवयित्री ने रानी के लिए ‘मर्दानी’ शब्द इसलिए प्रयोग किया क्योंकि उस समय बहादुरी को पुरुष का गुण मान लिया गया था — इसलिए बहादुर स्त्री की प्रशंसा भी ‘पुरुष जैसी’ कहकर की जाती थी। यह भाषा उस युग की सीमा दिखाती है, स्त्री की नहीं। आज जब स्त्रियाँ इंजन चलाती हैं, आग बुझाती हैं, लड़ाकू विमान उड़ाती हैं और अंतरिक्ष तक जाती हैं, तो साहस के लिए ‘मर्दानी’ जैसा शब्द ढूँढ़ने की ज़रूरत ही नहीं रह जाती। कविता की नायिका ने डेढ़ सौ साल पहले जो रास्ता खोला था, ये सब स्त्रियाँ उसी पर आगे बढ़ रही हैं।
करके देखिए: अपने आस-पास से भी दो नाम जोड़िए — अपने विद्यालय की कोई शिक्षिका, गाँव या मुहल्ले की डॉक्टर, आशा कार्यकर्ता, बस चालक, दुकानदार या पंचायत की प्रधान। उनसे मिलकर पूछिए कि उन्हें शुरू में क्या कठिनाई हुई और उन्होंने उसे कैसे पार किया — यह उत्तर कक्षा में सबसे अच्छा माना जाएगा, क्योंकि वह किताब से नहीं, जीवन से आया होगा।
प्र4.
4. कविता में 1857 के प्रथम स्वतंत्रता संग्राम से संबंधित अनेक स्थानों के नाम आए हैं। अपने शिक्षक की सहायता से दिए गए मानचित्र में उन स्थानों/नगरों को चिह्नित करके नाम लिखिए।
उत्तर

यह मानचित्र-कार्य है — चिह्न आपको अपनी पुस्तक के पृष्ठ 187 पर दिए गए भारत के मानचित्र में लगाने हैं। नीचे कविता में आए सभी स्थान, उनका आज का नाम और आज वे किस राज्य/देश में हैं — यह सूची दी गई है। इसी के अनुसार मानचित्र पर बिंदु लगाइए और नाम लिखिए।

कविता में नामआज का नामआज कहाँकविता में किस प्रसंग में
झाँसीझाँसीउत्तर प्रदेश (बुंदेलखंड)रानी का राज्य; कविता का केंद्र
कानपूर / कानपुरकानपुरउत्तर प्रदेशनाना साहब का क्षेत्र (बिठूर कानपुर के पास है); “मेरठ, कानपुर, पटना ने भारी धूम मचाई थी”
बिठूरबिठूरउत्तर प्रदेश (कानपुर के पास)“कैद पेशवा था बिठूर में”
देहलीदिल्लीदिल्ली“छिनी राजधानी देहली की”; “झाँसी चेती, दिल्ली चेती”
लखनऊलखनऊउत्तर प्रदेश“लिया लखनऊ बातों-बात”; “लखनऊ के लो नौलख हार”
मेरठमेरठउत्तर प्रदेशक्रांति का आरंभ-स्थल — “मेरठ, कानपुर, पटना ने भारी धूम मचाई थी”
पटनापटनाबिहारबिहार में विद्रोह (कुँवर सिंह का क्षेत्र इसी ओर)
नागपूर / नागपुरनागपुरमहाराष्ट्र“हुआ नागपुर का भी घात”; “नागपूर के जेवर ले लो”
सतारासतारामहाराष्ट्रहड़प नीति से छीना गया राज्य
कोल्हापुरकोल्हापुरमहाराष्ट्र“जबलपुर, कोल्हापुर में भी कुछ हलचल उकसानी थी”
जबलपुरजबलपुरमध्य प्रदेशवही पंक्ति
तंजोरतंजावुरतमिलनाडु“उदैपूर, तंजोर, सतारा, करनाटक की कौन बिसात”
करनाटककर्नाटक (यहाँ ‘कर्नाटक की नवाबी’, जो आज के तमिलनाडु क्षेत्र में थी)दक्षिण भारतवही पंक्ति
उदैपूरउदयपुरराजस्थान (कुछ इतिहासकार डलहौजी द्वारा हड़पी गई छोटी ‘उदयपुर’ रियासत की ओर संकेत मानते हैं)वही पंक्ति
सिंधसिंधआज पाकिस्तान में“जब कि सिंध, पंजाब, ब्रह्म पर अभी हुआ था वज्र-निपात”
पंजाबपंजाबभारत और पाकिस्तान — दोनों मेंवही पंक्ति
ब्रह्मब्रह्मदेश (बर्मा)आज म्याँमारवही पंक्ति
बंगालेबंगालपश्चिम बंगाल“बंगाले, मद्रास आदि की भी तो यही कहानी थी”
मद्रासचेन्नईतमिलनाडुवही पंक्ति
कलकत्ताकोलकातापश्चिम बंगाल“उनके गहने-कपड़े बिकते थे कलकत्ते के बाजार”
कालपीकालपीउत्तर प्रदेश (जालौन ज़िला, यमुना के किनारे)“रानी बढ़ी कालपी आई, कर सौ मील निरंतर पार”
यमुना-तटयमुना नदी का किनारा (कालपी के पास)उत्तर प्रदेश“यमुना-तट पर अंग्रेजों ने फिर खाई रानी से हार”
ग्वालियरग्वालियरमध्य प्रदेश“किया ग्वालियर पर अधिकार” — और इसी के पास रानी ने वीरगति पाई

मानचित्र भरते समय ध्यान रखिए —

  • पहले झाँसी को चिह्नित कीजिए, क्योंकि पूरी कहानी वहीं से चलती है; फिर उसके पास ही कालपी और ग्वालियर — ये तीनों मिलकर रानी की अंतिम यात्रा बनाते हैं।
  • क्रांति के मुख्य केंद्र — मेरठ, दिल्ली, कानपुर, लखनऊ, झाँसी, पटना — इन्हें एक ही रंग से चिह्नित कीजिए। ये उत्तर भारत में लगभग एक पट्टी बनाते हैं, और इसी से समझ आता है कि क्रांति कहाँ सबसे तीव्र थी।
  • हड़प नीति से छीने गए राज्य — सतारा, नागपुर, झाँसी, उदयपुर — इन्हें दूसरे रंग से चिह्नित कीजिए।
  • सिंध और ब्रह्मदेश (म्याँमार) आज भारत की सीमा के बाहर हैं — मानचित्र में इनकी दिशा तीर से दिखाइए और नीचे टिप्पणी लिख दीजिए।
  • नाम हमेशा बिंदु के दाईं ओर और सीधी लिखावट में लिखिए; मानचित्र में तीर और नाम आपस में न उलझें।
एक रोचक बात: इन नामों को मानचित्र पर एक साथ देखिए — उत्तर में मेरठ और दिल्ली, पूर्व में पटना और कलकत्ता, दक्षिण में तंजावुर और मद्रास, पश्चिम में सिंध और सतारा। कवयित्री ने जान-बूझकर पूरे देश को समेटा है, ताकि पाठक को लगे कि यह किसी एक रियासत की लड़ाई नहीं थी।
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