गंगा अध्याय 11 व्याकरण की बात

अद्यतन2026-09-06

प्र1.
1. “कानपूर के नाना की मुँहबोली बहन ‘छबीली’ थी” — उपर्युक्त पंक्ति में रेखांकित शब्द पर ध्यान दीजिए। कविता में ‘नाना’ शब्द ‘नाना धुंधूपंत’ के लिए प्रयुक्त हुआ है। लेकिन इस शब्द का प्रयोग संदर्भ के अनुसार अन्य अर्थों में भी होता है। जैसे– माता के पिता के लिए तथा अनेक के अर्थ में। इस प्रकार अनेकार्थी शब्द वह शब्द है जिसके एक से अधिक अर्थ होते हैं। नीचे तालिका में दी गई कविता की पंक्तियों में रेखांकित शब्द अनेकार्थी शब्द हैं। कविता के संदर्भ में उनके सही अर्थ पर घेरा लगाइए।
उत्तर

पूरी भरी हुई तालिका इस प्रकार है। मोटे अक्षरों वाला अर्थ ही वह है जिस पर घेरा लगाना है —

काव्य-पंक्ति (रेखांकित शब्द)दिए गए अर्थकविता के संदर्भ में सही अर्थ
तीर चलाने वाले कर में उसे चूड़ियाँ कब भाईं
(रेखांकित शब्द — तीर)
नदी का किनारा, बाण, सीसाबाण
रानी विधवा हुई हाय! विधि को भी नहीं दया आईशास्त्र में लिखी व्यवस्था, प्रणाली, विधाता, तरीकाविधाता
रानी ने तलवार खींच ली, हुआ द्वंद्व असमानों मेंयुद्ध, संशय, युग्मयुद्ध
हो मदमाती विजय, मिटा दे गोलों से चाहे झाँसीकिसी पदार्थ का गोल पिंड, रस्सी/सूत/बर्फ का गोला, तोप से दागने वाले गोले, नारियलतोप से दागने वाले गोले
मिला तेज से तेज, तेज की वह सच्ची अधिकारी थीआभा, गति, तेज चाकू (धार)आभा

हर अर्थ क्यों चुना गया —

  1. तीर = बाण। पूरी पंक्ति है — “तीर चलाने वाले कर में उसे चूड़ियाँ कब भाईं”। ‘चलाना’ क्रिया के साथ ‘तीर’ का अर्थ केवल बाण बन सकता है — नदी का किनारा या सीसा (धातु) कोई ‘चलाता’ नहीं। यहाँ बात रानी के उस हाथ की है जो धनुष-बाण चलाता था।

  2. विधि = विधाता। पंक्ति है — “रानी विधवा हुई हाय! विधि को भी नहीं दया आई”। ‘दया आना’ किसी चेतन पर लागू होता है, किसी नियम या तरीके पर नहीं। इसलिए यहाँ ‘विधि’ का अर्थ है — सृष्टि की रचना करने वाला, यानी विधाता/भाग्य-विधाता। कवयित्री का भाव यह है कि जब भाग्य ही निर्दयी हो गया, तो और किससे आशा की जाए।

  3. द्वंद्व = युद्ध। पंक्ति है — “रानी ने तलवार खींच ली, हुआ द्वंद्व असमानों में”। तलवार खिंचने के बाद जो होता है, वह लड़ाई है — ‘संशय’ (मन का द्वंद्व) या ‘युग्म’ (जोड़ा) यहाँ बैठता ही नहीं। ‘असमानों में’ जोड़कर कवयित्री यह भी बता देती हैं कि यह द्वंद्व बराबरी का नहीं था।

  4. गोले = तोप से दागने वाले गोले। पंक्ति है — “हो मदमाती विजय, मिटा दे गोलों से चाहे झाँसी”। ‘मिटा देना’ और ‘विजय’ — दोनों युद्ध के शब्द हैं। किसी नगर को गोल पिंड, ऊन के गोले या नारियल से नहीं मिटाया जाता; उसे तोप के गोलों से मिटाया जाता है।

  5. तेज = आभा। पंक्ति है — “मिला तेज से तेज, तेज की वह सच्ची अधिकारी थी”। यहाँ रानी की आभा/प्रभा (यश और पराक्रम की चमक) चिता की अग्नि के तेज में जा मिलती है। ‘गति’ या ‘चाकू की धार’ वाला अर्थ लेने पर पंक्ति निरर्थक हो जाएगी। ध्यान दीजिए, यह शब्द एक ही पंक्ति में तीन बार आया है और तीनों बार आभा के ही रंग में — यही इस पंक्ति का सौंदर्य है।

‘नाना’ शब्द से क्या सीखा: पुस्तक ने ‘नाना’ का उदाहरण देकर एक बड़ी बात सिखाई है — शब्द का अर्थ शब्दकोश से नहीं, संदर्भ से तय होता है। ‘नाना’ के तीन अर्थ हैं — (1) माता के पिता, (2) अनेक/विविध, (3) यहाँ एक व्यक्ति का नाम — नाना धुंधूपंत। कविता में तीसरा अर्थ इसलिए सही है क्योंकि आगे उसी छंद में लिखा है “नाना के सँग पढ़ती थी वह”, और छंद 10 में उनका पूरा नाम भी आता है — “नाना धुंधूपंत पेशवा जुटा रहा था सब सामान”।
अभ्यास के लिए और अनेकार्थी शब्द (इसी कविता से): कर — हाथ / कर (टैक्स) / किरण; अंबर — आकाश / वस्त्र; काल — समय / मृत्यु / अकाल; घन — बादल / हथौड़ा / घना; दल — पत्ता / समूह / सेना; हार — पराजय / माला। हर शब्द के दो-दो वाक्य बनाकर देखिए कि अर्थ कैसे बदल जाता है।
प्र2.
2. “कानपूर के नाना की मुँहबोली बहन ‘छबीली’ थी” / “मेरठ, कानपुर, पटना ने भारी धूम मचाई थी” — उपर्युक्त पंक्तियों में रेखांकित शब्दों की वर्तनी पर ध्यान दीजिए। दोनों शब्दों की वर्तनी में थोड़ी भिन्नता है। कई बार रचनाकार कविता की लय, अर्थ की लय इत्यादि को ध्यान में रखते हुए भाषा के स्तर पर इस प्रकार का प्रयोग करते रहे हैं। इस कविता में अन्य शब्दों के भी ऐसे प्रयोग मिलते हैं, उन्हें ढूँढ़कर लिखिए और कक्षा में चर्चा कीजिए। इसी पाठ्यपुस्तक की अन्य कविताओं में भी आपने ऐसा प्रयोग देखा होगा। जहाँ किसी शब्द की मानक वर्तनी से भिन्न वर्तनी का प्रयोग किया गया है। अपने शिक्षक के साथ इस विषय पर चर्चा कीजिए। चर्चा से उभरे बिंदुओं को लिखकर उन पर अपने शिक्षक के साथ पुन: चर्चा कीजिए कि ऐसे प्रयोग क्यों किए गए हैं?
उत्तर

पहले जोड़ी को समझिए — ‘कानपूर’ में ऊ (दीर्घ) है और ‘कानपुर’ में उ (ह्रस्व)। मानक वर्तनी कानपुर है। कवयित्री ने ‘कानपूर’ इसलिए लिखा कि उस पंक्ति में शब्द की ध्वनि लंबी चाहिए थी — “कान-पू-र के नाना की मुँहबोली बहन ‘छबीली’ थी”। ठीक यही शब्द जब सूची में आया, जहाँ तेज़ी चाहिए थी, तो ह्रस्व हो गया — “मेरठ, कानपुर, पटना ने भारी धूम मचाई थी”।

इसी कविता में ऐसे और प्रयोग —

कविता का रूपमानक रूपकविता की पंक्तिक्यों बदला गया
नागपूर / नागपुरनागपुर“‘नागपूर के जेवर ले लो’” / “हुआ नागपुर का भी घात”ठीक ‘कानपूर–कानपुर’ जैसी ही जोड़ी — नीलामी की पुकार में शब्द खिंचकर बोला जाता है, इसलिए ‘नागपूर’।
देहलीदिल्ली“छिनी राजधानी देहली की”‘दिल्ली’ में दो लघु मात्राएँ हैं; ‘देहली’ से चरण की मात्रा पूरी बैठती है। साथ ही यह उस समय का प्रचलित रूप भी था।
रजधानीराजधानी“ने छोड़ी रजधानी थी”‘राजधानी’ लंबा पड़ता; ह्रस्व करने से ‘कहानी–रानी’ की तुक ठीक बैठ गई।
महरानीमहारानी“दासी अब महरानी थी”वही कारण — तुक और मात्रा; और बोलचाल का रूप होने से व्यंग्य भी तीखा हो गया।
नव्वाबोंनवाबों“राजाओं नव्वाबों को भी उसने पैरों ठुकराया”‘व्व’ के द्वित्व से शब्द भारी हो जाता है — पंक्ति का ओज बढ़ता है।
उदैपूरउदयपुर“उदैपूर, तंजोर, सतारा, करनाटक की कौन बिसात”‘उदय’ को ‘उदै’ करने से एक मात्रा बचती है और सूची तेज़ चलती है।
करनाटककर्नाटकवही पंक्ति‘र्’ की संयुक्त ध्वनि खोलकर बोलने से पढ़ने में सरलता — लोकगीत की तरह गाया जा सके।
बहिनबहन“बहिन छबीली ने रण-चंडी का कर दिया प्रकट आह्वान”पुराना और अधिक आत्मीय रूप; बोलचाल में आज भी प्रचलित।
चिनगारीचिंगारी“यह स्वतंत्रता की चिनगारी अंतरतम से आई थी”अनुस्वार खोलकर लिखने से उच्चारण खुलता है और लय ठहरती है।
सन्मुखसम्मुख“अबके जनरल स्मिथ सन्मुख था”उच्चारण के अनुसार लिखा गया रूप।
तेइसतेईस“अभी उम्र कुल तेइस की थी”एक मात्रा घटाकर चरण को संतुलित करना।
होवे, जगावेगाहो, जगाएगा“होवे चुप इतिहास”; “यह तेरा बलिदान जगावेगा”लोकभाषा के क्रिया-रूप; इनसे कविता गीत जैसी लगती है।
उजयालीउजियाली / उजाला“मुदित महलों में उजयाली छाई”‘छाई’ के साथ तुक बैठाने के लिए।
खिलवारखिलवाड़“ये थे उसके प्रिय खिलवार”‘वार, शिकार, अवतार’ की तुक-शृंखला पूरी करने के लिए।
गुमी हुईगुम हुई / खोई हुई“गुमी हुई आजादी की कीमत सबने पहचानी थी”बोलचाल का रूप, जो पंक्ति को सहज बनाता है।

पाठ्यपुस्तक की अन्य कविताओं में ऐसे प्रयोग —

  • पाठ 8, रैदास के पद — छूटै, बरै, जाकी, तोरौ, जोरौ, भरोसां, दासा। यहाँ कारण अलग है — यह ब्रजभाषा का अपना रूप है, केवल लय के लिए किया गया परिवर्तन नहीं।
  • पाठ 9, तुलसीदास — पूरी रचना अवधी में है, इसलिए वहाँ के रूप खड़ी बोली से भिन्न हैं।
  • पाठ 10, निराला — ‘भारति’ जैसा रूप, जो ‘भारती’ के स्थान पर संबोधन की लय के लिए आया है।
चर्चा से उभरने वाले बिंदु — ऐसे प्रयोग क्यों किए जाते हैं:
  1. लय और मात्रा — कविता के हर चरण में मात्राओं का एक संतुलन होता है। एक मात्रा घटाने-बढ़ाने के लिए कवि वर्तनी बदल लेता है।
  2. तुक — ‘रजधानी’ और ‘महरानी’ के बिना ‘कहानी–रानी’ की तुक नहीं बैठती। तुक ही इस कविता को गाने योग्य बनाती है।
  3. गेयता — यह कविता लोकगायकों की तरह गाई जानी थी। गाते समय ‘कानपूर’ जैसा दीर्घ रूप स्वाभाविक लगता है।
  4. लोक की भाषा — कवयित्री चाहती थीं कि यह कविता गाँव-गाँव पहुँचे। इसलिए उन्होंने वही रूप चुने जो लोग बोलते थे — ‘बहिन’, ‘गुमी’, ‘होवे’।
  5. उस समय की भाषा — सन् 1930 के आसपास हिंदी की वर्तनी आज जितनी नियमबद्ध नहीं थी; ‘देहली’ जैसे रूप तब सामान्य थे।
  6. कवि की छूट — इसे साहित्य में ‘काव्य-स्वतंत्रता’ कहते हैं। यह छूट कविता में मान्य है — पर निबंध, पत्र या उत्तर-पुस्तिका में नहीं। वहाँ मानक वर्तनी ही लिखिए।
कक्षा में करने योग्य: दो समूह बनाइए। एक समूह इस कविता से दस ऐसे शब्द छाँटे, दूसरा समूह पाठ 8 और 9 से। फिर दोनों सूचियाँ मिलाकर देखिए — आप पाएँगे कि इस कविता के परिवर्तन लय के कारण हैं, जबकि पाठ 8–9 के रूप बोली (ब्रज/अवधी) के कारण। यह अंतर पहचान लेना ही इस प्रश्न की असली उपलब्धि है।
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