यह कल्पना-आधारित पत्र-लेखन है। पहले देख लीजिए कि इसमें क्या-क्या होना चाहिए —
- पत्र का ढाँचा — स्थान और तिथि, संबोधन, विषय-वस्तु के दो-तीन अनुच्छेद, समापन और भेजने वालों के नाम।
- भाषा — स्वामिभक्ति और आत्मीयता दोनों — काना और मंदरा रानी की सखियाँ भी हैं और सैनिक भी। इसलिए ‘आप’ और आदरसूचक क्रियाएँ, पर स्वर मित्रता का।
- रणनीति ठोस हो — केवल ‘हम लड़ेंगे’ लिखना पर्याप्त नहीं। दुर्ग की रक्षा, रसद, गुप्तचर, महिला टुकड़ी, घोड़े — इन पर स्पष्ट बात होनी चाहिए।
- कविता से जुड़ाव — कविता की बातें पत्र में झलकें — काना और मंदरा का साथ आना, ‘दुर्गा दल’, वॉकर से भिड़ंत, कालपी-ग्वालियर की योजना।
नमूना उत्तर:
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झाँसी दुर्ग, शिविर संख्या 3 पूज्य रानी साहिबा, सादर प्रणाम। कल संध्या को जब आपने दुर्ग की प्राचीर से पूरी सेना को देखा था, तब आपके चेहरे पर जो शांति थी, वही हम दोनों का बल है। हम आपकी सखियाँ हैं, इसलिए मन की बात बिना डरे लिख रही हैं। पहली बात — दुर्ग की रक्षा की। अंग्रेज़ों की तोपें दक्षिण की ओर से आ रही हैं, क्योंकि उधर की दीवार सबसे नीची है। हमारा सुझाव है कि वहाँ रात-दिन पहरा बढ़ा दिया जाए और दीवार के भीतर मिट्टी की एक और दीवार खड़ी कर दी जाए, ताकि गोला लगने पर भी दरार पूरी न पड़े। पूर्वी द्वार पर हमारी महिला टुकड़ी रहेगी — बारूद, पानी और पट्टियाँ पहुँचाने का काम हम सँभालेंगी। दूसरी बात — रसद और पानी की। घेराबंदी लंबी चल सकती है। अनाज को एक ही स्थान पर मत रखवाइए; उसे तीन अलग-अलग तहख़ानों में बँटवा दीजिए। कुओं पर पहरा रहे, क्योंकि शत्रु सबसे पहले पानी पर ही आघात करता है। तीसरी बात — सूचना की। हमने गाँव की चार स्त्रियों को इस काम पर लगाया है। वे दूध और साग बेचने के बहाने शत्रु-शिविर के पास तक जाती हैं और लौटकर बताती हैं कि तोपें कहाँ हैं और कितने घुड़सवार आए हैं। स्त्रियों पर कोई संदेह नहीं करता — यही हमारा सबसे बड़ा शस्त्र है। चौथी बात — निकलने के मार्ग की। यदि दुर्ग टूटने लगे तो आप रुकिएगा नहीं। उत्तर का छोटा द्वार खुला रखिए और अपने साथ नया नहीं, परखा हुआ घोड़ा रखिए। कालपी की ओर का रास्ता हमने दो बार देख लिया है — नदी-नाले कहाँ हैं, यह हमें कंठस्थ है। वहाँ पेशवा और ताँतिया जी की सेना से मिलकर हम फिर संगठित हो सकेंगी। रानी साहिबा, हम यह जानती हैं कि शत्रु की सेना हमसे बड़ी है। पर हम यह भी जानती हैं कि जिस भूमि के लिए हम लड़ रही हैं, वह हमारी है और उन्हें उसका रास्ता तक नहीं मालूम। हम अंत तक आपके साथ रहेंगी — रणभूमि में भी और उसके बाद भी। आपकी सेवा में सदैव तत्पर, |