गंगा अध्याय 11 सृजन

अद्यतन2026-09-06

प्र1.
1. लक्ष्मीबाई की सखियों काना तथा मंदरा की ओर से लक्ष्मीबाई को एक पत्र लिखिए जिसमें काना तथा मंदरा द्वारा ब्रिटिश हुकूमत के विरुद्ध युद्ध की रणनीति पर चर्चा की गई हो।
उत्तर

यह कल्पना-आधारित पत्र-लेखन है। पहले देख लीजिए कि इसमें क्या-क्या होना चाहिए —

  • पत्र का ढाँचा — स्थान और तिथि, संबोधन, विषय-वस्तु के दो-तीन अनुच्छेद, समापन और भेजने वालों के नाम।
  • भाषा — स्वामिभक्ति और आत्मीयता दोनों — काना और मंदरा रानी की सखियाँ भी हैं और सैनिक भी। इसलिए ‘आप’ और आदरसूचक क्रियाएँ, पर स्वर मित्रता का।
  • रणनीति ठोस हो — केवल ‘हम लड़ेंगे’ लिखना पर्याप्त नहीं। दुर्ग की रक्षा, रसद, गुप्तचर, महिला टुकड़ी, घोड़े — इन पर स्पष्ट बात होनी चाहिए।
  • कविता से जुड़ाव — कविता की बातें पत्र में झलकें — काना और मंदरा का साथ आना, ‘दुर्गा दल’, वॉकर से भिड़ंत, कालपी-ग्वालियर की योजना।

नमूना उत्तर:

झाँसी दुर्ग, शिविर संख्या 3
चैत्र मास, संवत् 1915 (सन् 1858)

पूज्य रानी साहिबा,

सादर प्रणाम। कल संध्या को जब आपने दुर्ग की प्राचीर से पूरी सेना को देखा था, तब आपके चेहरे पर जो शांति थी, वही हम दोनों का बल है। हम आपकी सखियाँ हैं, इसलिए मन की बात बिना डरे लिख रही हैं।

पहली बात — दुर्ग की रक्षा की। अंग्रेज़ों की तोपें दक्षिण की ओर से आ रही हैं, क्योंकि उधर की दीवार सबसे नीची है। हमारा सुझाव है कि वहाँ रात-दिन पहरा बढ़ा दिया जाए और दीवार के भीतर मिट्टी की एक और दीवार खड़ी कर दी जाए, ताकि गोला लगने पर भी दरार पूरी न पड़े। पूर्वी द्वार पर हमारी महिला टुकड़ी रहेगी — बारूद, पानी और पट्टियाँ पहुँचाने का काम हम सँभालेंगी।

दूसरी बात — रसद और पानी की। घेराबंदी लंबी चल सकती है। अनाज को एक ही स्थान पर मत रखवाइए; उसे तीन अलग-अलग तहख़ानों में बँटवा दीजिए। कुओं पर पहरा रहे, क्योंकि शत्रु सबसे पहले पानी पर ही आघात करता है।

तीसरी बात — सूचना की। हमने गाँव की चार स्त्रियों को इस काम पर लगाया है। वे दूध और साग बेचने के बहाने शत्रु-शिविर के पास तक जाती हैं और लौटकर बताती हैं कि तोपें कहाँ हैं और कितने घुड़सवार आए हैं। स्त्रियों पर कोई संदेह नहीं करता — यही हमारा सबसे बड़ा शस्त्र है।

चौथी बात — निकलने के मार्ग की। यदि दुर्ग टूटने लगे तो आप रुकिएगा नहीं। उत्तर का छोटा द्वार खुला रखिए और अपने साथ नया नहीं, परखा हुआ घोड़ा रखिए। कालपी की ओर का रास्ता हमने दो बार देख लिया है — नदी-नाले कहाँ हैं, यह हमें कंठस्थ है। वहाँ पेशवा और ताँतिया जी की सेना से मिलकर हम फिर संगठित हो सकेंगी।

रानी साहिबा, हम यह जानती हैं कि शत्रु की सेना हमसे बड़ी है। पर हम यह भी जानती हैं कि जिस भूमि के लिए हम लड़ रही हैं, वह हमारी है और उन्हें उसका रास्ता तक नहीं मालूम। हम अंत तक आपके साथ रहेंगी — रणभूमि में भी और उसके बाद भी।

आपकी सेवा में सदैव तत्पर,
काना और मंदरा

अपना पत्र लिखते समय: इसे ज्यों-का-त्यों उतारने के बजाय अपनी एक-दो रणनीतियाँ जोड़िए — जैसे घायलों के उपचार की व्यवस्था, बच्चों और बूढ़ों को सुरक्षित स्थान पर भेजना, या रात में मशालों की झूठी पंक्ति जलाकर सेना बड़ी दिखाना। मौलिक विचार ही उत्तर को सबसे अच्छा बनाता है।
प्र2.
2. युद्धपूर्व रात्रि में झाँसी की रानी के मन में अगले दिन की संभावनाओं को लेकर कई तरह के भाव और विचार उठ रहे होंगे। आपके जीवन में भी कई ऐसे क्षण आए होंगे जब आपने मानसिक ऊहापोह का अनुभव किया होगा। ऐसी किसी घटना के विषय में अपनी डायरी में लिखिए, जैसे– परीक्षा के एक दिन पूर्व की स्थिति या नौंवी कक्षा में पहला दिन आदि।
उत्तर

यह डायरी-लेखन है और यह आपका अपना अनुभव माँगता है। पहले जान लीजिए कि अच्छी डायरी में क्या होता है —

तत्वक्या करना है
तिथि, दिन और समयऊपर बाईं ओर लिखिए — डायरी की पहली पहचान यही है।
प्रथम पुरुष‘मैं’ में लिखिए। डायरी अपने आप से की गई बात है, किसी को सुनाई गई कहानी नहीं।
ऊहापोह दिखे‘ऊहापोह’ का अर्थ है — मन का दो ओर डोलना। इसलिए डायरी में दोनों पक्ष आने चाहिए — डर भी और भरोसा भी। केवल एक पक्ष लिखने से वह ऊहापोह नहीं रहेगा।
छोटे-छोटे ब्योरेघड़ी की टिक-टिक, माँ की आवाज़, अधूरी पड़ी किताब — यही ब्योरे डायरी को सच्ची बनाते हैं।
अंत में एक निर्णयडायरी प्रायः किसी छोटे-से निश्चय पर समाप्त होती है — जैसे ‘अब सो जाती हूँ’, ‘कल जो होगा देखा जाएगा’।

नमूना उत्तर:

मंगलवार, 18 जून
रात 11 बजकर 20 मिनट

कल मेरी नौवीं कक्षा का पहला दिन है और नींद है कि आ ही नहीं रही।

अभी-अभी बस्ता तीसरी बार जमाया है। नई किताबें रख दीं, ज्यामिति का डिब्बा रख दिया, फिर लगा कि पानी की बोतल ही रखनी भूल गई। सच पूछिए तो बस्ता तैयार है — तैयार तो मैं नहीं हूँ।

मन एक जगह टिकता ही नहीं। कभी लगता है — अच्छा ही तो है, नई कक्षा, नए विषय, विज्ञान की प्रयोगशाला। और अगले ही पल लगता है — नए शिक्षक कैसे होंगे? कक्षा में मेरे साथ बैठने वाला कोई परिचित होगा भी या नहीं? आठवीं में जो दो सहेलियाँ थीं, वे दूसरे अनुभाग में चली गई हैं। अंग्रेज़ी की नई पुस्तक पलटकर देखी तो लगा कि आधे शब्द तो मैं जानती ही नहीं।

माँ अभी कमरे में आई थीं। बत्ती बुझाते हुए बोलीं — “जिसे पढ़ना आता है, उसे कोई भी कक्षा कठिन नहीं लगती।” उन्होंने बात बहुत सीधी कही, पर न जाने क्यों मन कुछ हल्का हो गया।

अभी-अभी अपने आप से एक बात कही है, और वही यहाँ लिख रही हूँ — डर इसलिए लग रहा है क्योंकि कल का दिन नया है, इसलिए नहीं कि वह कठिन है। नया तो नौवीं कक्षा का पहला दिन सबके लिए होगा — मेरे लिए भी, और उस लड़के के लिए भी जो कल मेरे बगल में बैठेगा।

अब पानी की बोतल बस्ते में रखकर सो जाती हूँ। कल सबसे पहले जाकर तीसरी पंक्ति की खिड़की वाली सीट लूँगी — वहाँ से बोर्ड भी दिखता है और बाहर का पीपल भी।

कविता से जोड़कर सोचिए: कवयित्री ने रानी के मन का ऊहापोह कहीं नहीं लिखा — कविता में वे हमेशा निश्चय के साथ खड़ी दिखती हैं। पर सोचिए, अगले दिन क्या होगा यह तो उन्हें भी नहीं पता था। युद्ध के एक दिन पहले उनके मन में भी दो धाराएँ रही होंगी — झाँसी बचेगी या नहीं, साथी टिकेंगे या नहीं, बच्चे का क्या होगा। साहस का अर्थ डर का न होना नहीं है; साहस का अर्थ है डर के बावजूद वही करना जो करना चाहिए। यही बात आपकी डायरी को कविता से जोड़ती है — इसे अपनी डायरी की अंतिम पंक्ति में एक वाक्य के रूप में जोड़ सकते हैं।
अपनी डायरी में: वही घटना चुनिए जो सचमुच आपके साथ घटी हो — परीक्षा से पहले की रात, पहली बार मंच पर बोलने से पहले के मिनट, या किसी मैच से पहले की सुबह। सच्ची घटना पर लिखी दो पंक्तियाँ, गढ़े हुए दो पृष्ठों से बेहतर होती हैं।
क्या यह उपयोगी रहा? त्रुटि बताएँ