प्र1.
पाठ में आदर्श निबंध लेखन के विषय में विस्तार से बताया गया है। अब आप सच्चिदानंद हीरानंद वात्स्यायन ‘अज्ञेय’ का लेख ‘मैं क्यों लिखता हूँ?’ पढ़िए—
उत्तर
‘झरोखे से’ में दिया गया यह अंश आपके पाठ का साथी है — बख्शी पूछते हैं “क्या लिखूँ?” और अज्ञेय पूछते हैं “मैं क्यों लिखता हूँ?” एक विषय की उलझन है, दूसरा प्रेरणा की खोज।
अंश का आशय —
- अज्ञेय आरंभ में ही कहते हैं कि यह प्रश्न देखने में सरल है, पर है बहुत कठिन, क्योंकि इसका सच्चा उत्तर “लेखक के आंतरिक जीवन के स्तरों से संबंध रखता है” — और मन के इतने सारे स्तरों को कुछ वाक्यों में बाँधना संभव ही नहीं। इसलिए वे इतना ही करते हैं कि उनमें से कुछ का ‘स्पर्श’ कर लें।
- उनका सबसे मार्मिक उत्तर यह है — “मैं इसीलिए लिखता हूँ कि स्वयं जानना चाहता हूँ कि क्यों लिखता हूँ।” यानी लेखन उत्तर देने का नहीं, उत्तर खोजने का साधन है। लिखे बिना यह उत्तर मिल ही नहीं सकता।
- वे इसे ‘आभ्यंतर विवशता’ कहते हैं — भीतर की एक ऐसी बेचैनी जिसे लेखक तभी पहचान पाता है जब लिख लेता है, और लिखकर ही उससे मुक्त हो जाता है।
- वे यह भी मानते हैं कि ख्याति मिलने के बाद बाहर की विवशता से भी लिखा जाता है — “संपादकों के आग्रह से, प्रकाशक के तकाजे से, आर्थिक आवश्यकता से।” पर सच्चा कृतिकार अपने सामने यह भेद ईमानदारी से बनाए रखता है कि कौन-सी रचना भीतरी प्रेरणा का फल है और कौन-सा लेखन बाहरी दबाव का।
- अंत में वे एक सुंदर बात जोड़ते हैं — कभी-कभी बाहर का दबाव वास्तव में दबाव नहीं रहता, वह “भीतरी उन्मेष का निमित्त” बन जाता है, यानी बाहरी माँग भीतर की कली को खोल देने का बहाना बन जाती है।
- एक बारीक़ भेद भी वे करते हैं — “सभी लेखक कृतिकार नहीं होते, न उनका सब लेखन ही कृति होता है।” लेखन कोई भी कर सकता है; कृति वही बनती है जो भीतर से आए।
दोनों लेखों की तुलना —
| बिंदु | ‘क्या लिखूँ?’ — बख्शी | ‘मैं क्यों लिखता हूँ?’ — अज्ञेय |
|---|---|---|
| प्रश्न | विषय का — क्या लिखा जाए | प्रेरणा का — क्यों लिखा जाए |
| स्वर | हल्का, विनोदपूर्ण, आत्म-परिहास से भरा | गंभीर, आत्मविश्लेषणपरक |
| लिखने का कारण | बाहर से — नमिता और अमिता का आग्रह, दो घंटे की समय-सीमा | भीतर से — आभ्यंतर विवशता; बाहरी दबाव को वे गौण मानते हैं |
| कठिनाई कहाँ | सामग्री, रूपरेखा, शैली और समय में | अपने ही मन के स्तरों को पहचानने में |
| समाधान | मानटेन की पद्धति + खुसरो की युक्ति | लिख डालना ही समाधान है — “लिखे बिना इस प्रश्न का उत्तर नहीं मिल सकता” |
दोनों कहाँ मिलते हैं: दिलचस्प यह है कि दोनों अंततः एक ही जगह पहुँचते हैं — सच्चा लेखन भीतर से आता है। बख्शी शास्त्र की सारी कसौटियाँ गिनाकर अंत में मानटेन की उस पद्धति को चुनते हैं जिसमें “लेखक की सच्ची अनुभूति रहती है”; अज्ञेय सीधे उसी भीतरी प्रेरणा से बात शुरू करते हैं। और अज्ञेय की यह बात कि बाहर का दबाव ‘भीतरी उन्मेष का निमित्त’ बन जाता है, ठीक बख्शी के निबंध पर लागू होती है — नमिता-अमिता का आग्रह बाहरी दबाव था, पर उसी दबाव से यह सुंदर निबंध जन्मा।
अज्ञेय के विषय में: सच्चिदानंद हीरानंद वात्स्यायन ‘अज्ञेय’ (1911–1987) हिंदी के प्रयोगवादी कवि, कथाकार और निबंधकार थे। तार सप्तक के संपादन से उन्होंने नई कविता की दिशा बदली; शेखर : एक जीवनी और नदी के द्वीप उनके प्रसिद्ध उपन्यास हैं। उन्हें ज्ञानपीठ पुरस्कार मिला था।
अपने लिए लिखिए: अब आप स्वयं आधे पृष्ठ में लिखिए — “मैं क्यों लिखता/लिखती हूँ?” सोचिए कि क्या आप केवल परीक्षा के लिए लिखते हैं, या कभी बिना कहे भी कुछ लिखा है — कोई डायरी, कोई चिट्ठी, कोई तुकबंदी? वही उत्तर आपका सबसे सच्चा उत्तर होगा।