गंगा अध्याय 4 हम ऐसे भी बोलते हैं

अद्यतन2026-09-06

प्र1.
“वे बस हमको गंभीरता से देखते थे… मगर हम सभी समझ जाते थे कि हमको बुलाया किसलिए गया है।” 1. क्या आपके जीवन में भी कोई ऐसा व्यक्ति है जो बिना कुछ बोले सिर्फ नजरों या संकेतों (हाव-भाव) से ही आपको समझा देता है? उस अनुभव के विषय में बताइए।
उत्तर

यह आपके अपने अनुभव का प्रश्न है। अच्छे उत्तर में यह होना चाहिए — वह व्यक्ति कौन है, संकेत क्या था, आपने उसे कैसे समझा, और उस समय आपके मन में क्या चला।

नमूना उत्तर: मेरे जीवन में यह व्यक्ति मेरी नानी हैं। जब घर में मेहमान आए हों और मैं कुछ ऐसा कहने लगूँ जो नहीं कहना चाहिए, तो वे बस एक बार मेरी ओर देख लेती हैं — न भौंहें चढ़ाती हैं, न सिर हिलाती हैं। बस देखती हैं। और मैं बीच वाक्य में रुक जाता/जाती हूँ। इसी तरह जब मैं थाली में कुछ छोड़ने लगूँ, तो वे थाली की ओर एक बार देखती हैं और मैं समझ जाता/जाती हूँ। सबसे अच्छा संकेत तब होता है जब मैं कोई अच्छा काम कर लूँ — तब वे किसी से कुछ कहती नहीं, बस हल्का-सा सिर हिलाकर मुस्करा देती हैं, और वह मुस्कान किसी भी तारीफ़ से बड़ी लगती है।

हमारे विद्यालय में भी ऐसा ही होता है। हमारी हिंदी की शिक्षिका जब कक्षा में शोर होने पर बोलना बंद कर देती हैं और चुपचाप खड़ी रहती हैं, तो दो-तीन क्षण में पूरी कक्षा चुप हो जाती है। कभी-कभी चुप्पी डाँट से अधिक असर करती है।

यह संकेत काम क्यों करता है: ऐसे संकेत वहीं समझ आते हैं जहाँ पहले से रिश्ता और भरोसा हो। लता जी के पिता को कुछ कहना नहीं पड़ता था, क्योंकि बच्चे जानते थे कि वे क्या चाहते हैं और क्यों चाहते हैं। जहाँ यह जान-पहचान नहीं होती, वहाँ वही नज़र केवल डरावनी लगेगी, समझाने वाली नहीं। इसीलिए बिना बोले समझाना केवल भाषा का नहीं, संबंध का कौशल है।
प्र2.
2. यदि कोई व्यक्ति बिना बोले (संकेत भाषा में) आपको कुछ समझा रहा है, तो वह आपके साथ और आप उसके साथ कैसा व्यवहार करेंगे? (संकेत– धैर्य, जिज्ञासा, समानुभूति आदि)
उत्तर

संकेत भाषा (साइन लैंग्वेज) एक पूरी भाषा है — उसका अपना व्याकरण है, अपने शब्द हैं। इसलिए बात करते समय व्यवहार भी वैसा ही सम्मानपूर्ण होना चाहिए जैसा किसी और भाषा में होता है।

गुणमैं क्या करूँगा/करूँगीक्या नहीं करूँगा/करूँगी
धैर्यपूरा संकेत पूरा होने दूँगा/दूँगी; बात समझने में समय लगे तो लगने दूँगा/दूँगी।बीच में टोकना, जल्दी-जल्दी सिर हिलाकर ‘समझ गया’ कह देना, जबकि समझा न हो।
जिज्ञासाकुछ संकेत सीखने की कोशिश करूँगा/करूँगी — कम-से-कम ‘नमस्ते’, ‘धन्यवाद’, ‘आपका नाम क्या है’। इससे सामने वाला अकेला नहीं पड़ता।यह मान लेना कि यह भाषा मेरे काम की नहीं।
समानुभूतिउन्हें ‘बेचारा’ नहीं, बराबर का साथी मानूँगा/मानूँगी। उनसे सीधे बात करूँगा/करूँगी, उनके साथ आए व्यक्ति से नहीं।दया दिखाना, ऊँची आवाज़ में बोलना (इससे कोई लाभ नहीं होता), या पीठ पीछे उनके बारे में बात करना।
ध्यानआमने-सामने खड़ा होकर, चेहरे पर रोशनी रखते हुए बात करूँगा/करूँगी, क्योंकि संकेत भाषा में हाथ के साथ चेहरे के भाव भी अर्थ देते हैं।मुँह फेरकर, चलते-चलते या मुँह ढककर बात करना।
सरल उपायबात न बने तो कागज़ पर लिखकर, चित्र बनाकर या मोबाइल पर टाइप करके काम चलाऊँगा/चलाऊँगी।हार मानकर बातचीत बीच में छोड़ देना।
सम्मानवे जिस गति से बताना चाहें, उसी गति से सुनूँगा/सुनूँगी; अंत में यह पूछ लूँगा/लूँगी कि जो समझा वह ठीक है या नहीं।उनके संकेतों की नकल उतारना या हँसना — यह अपमान है।
पाठ से जोड़कर देखिए: लता जी के पिता बिना बोले समझा देते थे और बच्चे बिना कहे समझ जाते थे। इससे यह सिद्ध होता है कि भाषा का काम शब्द नहीं, अर्थ पहुँचाना है — और अर्थ आँख, हाथ, मुद्रा और चुप्पी से भी पहुँच सकता है। इसीलिए संकेत भाषा को कम भाषा मानना गलत है; वह केवल दूसरा माध्यम है, कम माध्यम नहीं।
करके देखिए: कक्षा में एक खेल कराइए — दो-दो के जोड़े बनाइए और एक साथी को केवल हाव-भाव से कोई वाक्य समझाना है (जैसे ‘कल विद्यालय बंद रहेगा’)। फिर पूछिए कि किसे कठिनाई हुई और क्यों। इससे धैर्य और समानुभूति दोनों का अभ्यास हो जाएगा।
क्या यह उपयोगी रहा? त्रुटि बताएँ