प्र1.
1. “अगर हम समय के चक्र (टाइम मशीन) को घुमाकर सन् 1949-50 में ले जाएँ”, कल्पना कीजिए कि आपके पास टाइम मशीन है। 1940–50 के दशक में जाकर लता जी से मिलिए और उनके साथ बिताए गए एक दिन का वर्णन डायरी के रूप में लिखिए। उस समय की वेशभूषा, भोजन, संगीत आदि का वर्णन अवश्य कीजिए।
उत्तर
डायरी लिखने की विधि — ऊपर दाईं ओर तिथि, दिन और स्थान; फिर उत्तम पुरुष (‘मैं’) में लेखन; भूतकाल में, पर भावों की ताज़गी के साथ; अंत में उस दिन की एक सीख या एक भाव। डायरी किसी और के लिए नहीं, अपने लिए लिखी जाती है — इसलिए उसमें बनावट नहीं होनी चाहिए। इस प्रश्न में तीन चीज़ों का वर्णन अनिवार्य है — वेशभूषा, भोजन और संगीत।
नमूना उत्तर:
18 अगस्त 1949, गुरुवार — मुंबई
आज का दिन मैं जीवन-भर नहीं भूलूँगा/भूलूँगी। सुबह जब टाइम मशीन रुकी, तो मैं मुंबई की एक तंग गली में खड़ा/खड़ी था/थी। सड़कों पर घोड़ागाड़ियाँ और काली-पीली टैक्सियाँ थीं, और कहीं-कहीं ट्राम की पटरियाँ चमक रही थीं। कोई मोबाइल नहीं, कोई चमकता होर्डिंग नहीं — बस दीवारों पर चिपके फिल्मों के हाथ से बने पोस्टर।
वेशभूषा — लता जी सफ़ेद सूती साड़ी में थीं, किनारे पर हल्की-सी धारी। दो चोटियाँ, माथे पर छोटी-सी बिंदी, कानों में साधारण बुंदे और पैरों में सादी चप्पल। न कोई गहना, न कोई तड़क-भड़क। स्टूडियो में पुरुष सफ़ेद कुरता-पाजामा या पतलून-कमीज़ में थे, कई ने टोपी लगा रखी थी; संगीतकार जी ने बंद गले का कोट पहना था।
स्टूडियो — कमरे की दीवारों पर मोटा कपड़ा टँगा था ताकि गूँज न हो। बीच में एक ही बड़ा माइक, और उसके चारों ओर अर्धचंद्राकार बैठे वादक — तबला, हारमोनियम, सारंगी, बाँसुरी, वायलिन और मैंडोलिन। कुर्सियाँ कम थीं, इसलिए कोरस की लड़कियाँ ज़मीन पर बैठी थीं और लता जी भी उन्हीं के बीच बैठकर हँसते हुए बातें कर रही थीं। मुझे सबसे अचरज इस बात पर हुआ कि पूरा गाना एक ही बार में, सबको एक साथ रेकॉर्ड करना पड़ता है — किसी एक की चूक से सबको फिर से शुरू करना पड़ता है। एक पंक्ति ग्यारह बार गाई गई और लता जी के माथे पर एक बल तक नहीं आया।
भोजन — दोपहर में सबने साथ खाया — घर से लाया हुआ टिफिन, जिसमें रोटी, आलू की सूखी सब्ज़ी, थोड़ा अचार और गुड़ था। लता जी ने बहुत कम खाया; कहा कि भरे पेट गाना ठीक नहीं आता। बाद में कड़क मीठी चाय काँच के गिलासों में आई और सबने कुल्हड़ जैसे बरतन में पी।
संगीत — शाम को वे रियाज़ पर बैठीं — तानपूरे की खरज पर लंबे-लंबे ‘सा’। फिर पिताजी की सिखाई एक बंदिश गुनगुनाईं। मैंने पूछा कि इतनी मेहनत के बाद थकान नहीं होती? वे हँस दीं और बोलीं — “थकती तो हूँ, पर कल कितने गीत रेकॉर्ड होने हैं, यह सोचकर नींद अच्छी आती है।”
आज मैंने यह सीखा कि प्रसिद्धि से पहले अनुशासन आता है। जिस आवाज़ को हम आज घर-घर में सुनते हैं, वह चमक-दमक से नहीं, ज़मीन पर बैठकर, बार-बार दोहराकर बनी है।
आज का दिन मैं जीवन-भर नहीं भूलूँगा/भूलूँगी। सुबह जब टाइम मशीन रुकी, तो मैं मुंबई की एक तंग गली में खड़ा/खड़ी था/थी। सड़कों पर घोड़ागाड़ियाँ और काली-पीली टैक्सियाँ थीं, और कहीं-कहीं ट्राम की पटरियाँ चमक रही थीं। कोई मोबाइल नहीं, कोई चमकता होर्डिंग नहीं — बस दीवारों पर चिपके फिल्मों के हाथ से बने पोस्टर।
वेशभूषा — लता जी सफ़ेद सूती साड़ी में थीं, किनारे पर हल्की-सी धारी। दो चोटियाँ, माथे पर छोटी-सी बिंदी, कानों में साधारण बुंदे और पैरों में सादी चप्पल। न कोई गहना, न कोई तड़क-भड़क। स्टूडियो में पुरुष सफ़ेद कुरता-पाजामा या पतलून-कमीज़ में थे, कई ने टोपी लगा रखी थी; संगीतकार जी ने बंद गले का कोट पहना था।
स्टूडियो — कमरे की दीवारों पर मोटा कपड़ा टँगा था ताकि गूँज न हो। बीच में एक ही बड़ा माइक, और उसके चारों ओर अर्धचंद्राकार बैठे वादक — तबला, हारमोनियम, सारंगी, बाँसुरी, वायलिन और मैंडोलिन। कुर्सियाँ कम थीं, इसलिए कोरस की लड़कियाँ ज़मीन पर बैठी थीं और लता जी भी उन्हीं के बीच बैठकर हँसते हुए बातें कर रही थीं। मुझे सबसे अचरज इस बात पर हुआ कि पूरा गाना एक ही बार में, सबको एक साथ रेकॉर्ड करना पड़ता है — किसी एक की चूक से सबको फिर से शुरू करना पड़ता है। एक पंक्ति ग्यारह बार गाई गई और लता जी के माथे पर एक बल तक नहीं आया।
भोजन — दोपहर में सबने साथ खाया — घर से लाया हुआ टिफिन, जिसमें रोटी, आलू की सूखी सब्ज़ी, थोड़ा अचार और गुड़ था। लता जी ने बहुत कम खाया; कहा कि भरे पेट गाना ठीक नहीं आता। बाद में कड़क मीठी चाय काँच के गिलासों में आई और सबने कुल्हड़ जैसे बरतन में पी।
संगीत — शाम को वे रियाज़ पर बैठीं — तानपूरे की खरज पर लंबे-लंबे ‘सा’। फिर पिताजी की सिखाई एक बंदिश गुनगुनाईं। मैंने पूछा कि इतनी मेहनत के बाद थकान नहीं होती? वे हँस दीं और बोलीं — “थकती तो हूँ, पर कल कितने गीत रेकॉर्ड होने हैं, यह सोचकर नींद अच्छी आती है।”
आज मैंने यह सीखा कि प्रसिद्धि से पहले अनुशासन आता है। जिस आवाज़ को हम आज घर-घर में सुनते हैं, वह चमक-दमक से नहीं, ज़मीन पर बैठकर, बार-बार दोहराकर बनी है।
क्यों यही ब्योरे चुने गए: डायरी को सच्चा वही ब्योरा बनाता है जो पाठ से ही निकले — सफ़ेद साड़ी और रंगों से परहेज़, कोरस का साथ-साथ रेकॉर्ड होना, ज़मीन पर बैठना, ‘कल कितने गीत रेकॉर्ड होने हैं’ की चिंता। कल्पना तभी विश्वसनीय होती है जब उसकी जड़ें तथ्य में हों।