गंगा अध्याय 4 हमारी भाषाएँ

अद्यतन2026-09-06

प्र1.
1. “‘गाव गेला वाहुन, नाव गेला राहुन’। मतलब गाँव तो बह जाता है, लेकिन जो नाम है, वह रह जाता है।” आपने एक कहावत और उसका हिंदी में अर्थ पढ़ा। इस कहावत के अर्थ को अपने घर या क्षेत्र की भाषा अथवा भाषाओं में लिखिए।
उत्तर

यह कहावत मराठी की है। इसका भाव है — वस्तु और शरीर नष्ट हो जाते हैं, पर नाम और कर्म बचे रहते हैं। इसे अपने घर की भाषा में लिखते समय शब्दशः अनुवाद मत कीजिए, भाव का अनुवाद कीजिए।

नमूना उत्तर — कुछ भाषाओं में यही भाव:

भाषा / बोलीवाक्य
मराठी (मूल)गाव गेला वाहुन, नाव गेला राहुन।
हिंदीगाँव तो बह जाता है, पर नाम रह जाता है।
भोजपुरीगाँव त बहि जाला, बाकिर नाम रहि जाला।
अवधीगाँव तौ बहि जात है, नाउँ रहि जात है।
ब्रजगाँव तौ बहि जात है, नाम रहि जात है।
राजस्थानीगाँव तो बह ज्यावै, पण नाम रह ज्यावै।
पंजाबीपिंड रुड़्ह जांदा ए, पर नां रह जांदा ए।
गुजरातीગામ તણાઈ જાય છે, પણ નામ રહી જાય છે।
बांग्लाগ্রাম ভেসে যায়, নাম থেকে যায়।
आप क्या कीजिए: ऊपर की सूची केवल नमूना है। अपने घर में जो भाषा या बोली बोली जाती है, उसमें यह वाक्य घर के किसी बड़े से बुलवाकर लिखिए — जैसा वे बोलें, ठीक वैसा। यही सबसे प्रामाणिक उत्तर होगा। साथ में यह भी पूछिए कि आपकी भाषा में इसी भाव की कोई अपनी कहावत है क्या।
प्र2.
2. लता जी ने मराठी कहावत को हिंदी में समझाया। अब आप अपनी मातृभाषा की कोई कहावत चुनिए और उसका हिंदी में अनुवाद कीजिए। अनुवाद के बाद भाव में क्या परिवर्तन आया? लिखिए।
उत्तर

नमूना उत्तर —

मूल कहावत (मराठी)शब्दशः हिंदी अनुवादभाव के अनुसार हिंदी रूप
उथळ पाण्याला खळखळाट फार।उथले पानी में शोर बहुत होता है।थोथा चना बाजे घना।

अनुवाद के बाद भाव में क्या बदला —

  • अर्थ वही रहा, बिंब बदल गया। दोनों कहावतों का आशय एक है — जिसमें ज्ञान कम होता है, वही सबसे अधिक बोलता है। पर मराठी में बिंब पानी का है और हिंदी में चना का। इससे उस क्षेत्र का जीवन झलकता है — जहाँ नदियाँ और झरने हैं, वहाँ पानी का बिंब; जहाँ खेत और अनाज हैं, वहाँ चने का।
  • ध्वनि-सौंदर्य कम हो गया। ‘खळखळाट’ शब्द स्वयं पानी के शोर की नकल है (अनुकरणात्मक शब्द)। ‘थोथा चना बाजे घना’ में तुक तो है, पर वह ध्वनि-अनुकरण नहीं।
  • शब्दशः अनुवाद कहावत नहीं रह जाता। ‘उथले पानी में शोर बहुत होता है’ हिंदी में केवल एक सूचना बनकर रह जाती है — उसमें कहावत जैसी चोट और लय नहीं आती।
यही अनुवाद का सबसे बड़ा पाठ है: कहावत केवल अर्थ नहीं होती — उसमें अर्थ + बिंब + लय + उस समाज का अनुभव सब घुला रहता है। अनुवाद अर्थ को तो पार ले जाता है, पर बिंब और लय प्रायः पीछे छूट जाते हैं। इसीलिए अच्छा अनुवादक शब्द नहीं, समकक्ष कहावत ढूँढ़ता है। लता जी ने भी यही किया — उन्होंने ‘गाव गेला वाहुन’ का शब्दशः अनुवाद नहीं दिया, उसका मतलब समझाया।
और उदाहरण आज़माइए: भोजपुरी — “नाच न जाने आँगन टेढ़”; तमिल — “यानै कु ओरु कालम्, पूनै कु ओरु कालम्” (हाथी का भी समय आता है, बिल्ली का भी); पंजाबी — “जिन्ने मूँह ओन्नियाँ गल्लां”। हर बार देखिए कि अनुवाद में क्या बचा और क्या छूट गया।
प्र3.
3. एक ‘सेतु चित्र’ बनाइए जिसमें दो किनारे हों— एक किनारे पर हिंदी और दूसरे किनारे पर अपने घर या क्षेत्र की भाषा। दोनों किनारों के बीच में ऐसे शब्द लिखिए जो दोनों भाषाओं में समान अर्थ रखते हैं।
उत्तर

बनाने की विधि — कागज़ के दोनों छोरों पर दो किनारे (तट) बनाइए। बाएँ पर लिखिए हिंदी, दाएँ पर अपनी भाषा का नाम। बीच में एक पुल खींचिए और पुल के पाटों पर वे शब्द लिखिए जो दोनों भाषाओं में लगभग एक-से हैं। नीचे नदी बनाइए और उसमें वे शब्द डालिए जो दोनों में अलग-अलग हैं — इससे यह भी दिख जाएगा कि भाषाएँ कहाँ मिलती हैं और कहाँ अलग होती हैं।

नमूना सेतु चित्र (हिंदी ↔ मराठी):

हिंदी मराठी दोनों में एक-से शब्द नाम संगीत राग देश अलग शब्द — पानी / पाणी, हाथ / हात, गाँव / गाव
सेतु चित्र — पुल पर वे शब्द जो हिंदी और मराठी दोनों में एक-से हैं; नदी में वे जो थोड़े बदल जाते हैं।

पुल पर लिखे जाने योग्य शब्द (हिंदी ↔ मराठी) —

बिलकुल एक-सेथोड़े बदले हुए (हिंदी / मराठी)
नाम, संगीत, राग, देश, गीत, मन, सूर्य, आकाश, पुस्तक, विद्यालय, मित्र, सत्यपानी / पाणी, हाथ / हात, गाँव / गाव, दूध / दूध, आँख / डोळा, घर / घर, माँ / आई
ऐसे शब्द एक-से क्यों हैं: हिंदी, मराठी, गुजराती, बांग्ला, पंजाबी, ओड़िआ आदि सब एक ही परिवार की भाषाएँ हैं और इनका बहुत-सा शब्द-भंडार संस्कृत से आया है। इसीलिए ‘संगीत’ शब्द भाषा संगम की सूची में लगभग हर भाषा में एक-सा दिखाई देता है। जो शब्द रोज़मर्रा के हैं (पानी, हाथ, आँख), वे बोलचाल में घिसकर अलग-अलग हो गए; जो शब्द पढ़ाई और शास्त्र के हैं, वे लगभग वैसे ही बचे रहे। यह पुल बताता है कि भारतीय भाषाएँ अलग नहीं, एक ही नदी की धाराएँ हैं।
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