प्र1.
आपने ‘आखिरी चट्टान तक’ रचना पढ़ी जो दक्षिण भारत की यात्रा पर आधारित है। आइए, अब पढ़ते हैं हिंदी के प्रसिद्ध रचनाकार निर्मल वर्मा का कुंभ मेले पर आधारित यात्रा-वृत्तांत का एक अंश (प्रयाग : 1976)। — कुंभ मेले के बारे में यह अंश आपको रोचक लगा? अब इस यात्रा-वृत्तांत को इंटरनेट, पुस्तकालय से ढूँढ़कर पूरा पढ़िए।
उत्तर
हाँ, यह अंश रोचक है — और उसका कारण यह नहीं कि इसमें कुंभ का वर्णन है, बल्कि यह कि इसमें कुंभ का ‘वर्णन’ है ही नहीं। निर्मल वर्मा भीड़, स्नान और अखाड़ों का ब्योरा देने के बजाय एक अकेले आदमी की नींद टूटने से शुरू करते हैं, और पूरा मेला उसी आदमी की आँख-कान से हम तक पहुँचता है।
अंश किस बात से रोचक बनता है —
- आरंभ ही ध्वनि से होता है, दृश्य से नहीं — “मुँह अँधेरे सीटी सुनाई देती है — घनी नींद में सुराख बनाती हुई।” नींद में ‘सुराख’ बनना — यह बिंब ही पाठक को जगा देता है।
- दिशा-भ्रम का सच्चा चित्र — “एक क्षण पता नहीं चलता, मैं कहाँ हूँ, किस जगह हूँ, कौन-सा समय है?” — किसी अनजान जगह में जागने पर सबका यही अनुभव होता है।
- अनोखी उपमाएँ — “आँखें खुलती हैं, तो ढेस-सा अँधेरा गटगट पीने लगती हैं, जैसे मुँह की प्यास आँखें बुझा रही हैं।” अँधेरे को पीना — यह असाधारण कल्पना है।
- श्रव्य बिंब — “बाहर एक फुसफुसाता हुआ शोर है — रेंगती हुई आवाज़ों का रेला — जैसे हजारों पैर रेत को थपथपाते हुए चल रहे हैं।” पूरा जन-सैलाब बिना एक भी आदमी दिखाए खड़ा हो जाता है।
- चाँद का मानवीकरण — “पूर्णिमा का पूरा चाँद, इलाहाबाद के किले पर ऊँघता हुआ… एक गोल, सफेद, मुरझाई बिंदी जिसे सिर्फ एक अँगुली से पोंछा जा सकता था।”
- आत्म-विडंबना — “न मैं तीर्थयात्री लगता हूँ, न कल्पवासी — मैं उसे आधा हिप्पी, आधा जिप्सी-सा दिखाई देता हूँगा — जो अपने पाप-पुण्यों को एक डफल बैग में समेटकर कुंभ मेले में भटकता है।” लेखक अपने ऊपर ही हँसता है।
- छोटा-सा संवाद, बड़ी-सी बात — चौकीदार कहता है — “पुलिस… यात्रियों को रास्ता दिखाना पड़ता है — बेचारे अँधेरे में भटक जाते हैं।” एक वाक्य में पूरे मेले का प्रबंध और उसकी करुणा, दोनों आ गए।
दोनों यात्रा-वृत्तांतों की तुलना —
| बिंदु | ‘आखिरी चट्टान तक’ — मोहन राकेश | ‘प्रयाग : 1976’ — निर्मल वर्मा |
|---|---|---|
| स्थान | कन्याकुमारी — तीन सागरों का संगम | प्रयाग — तीन नदियों का संगम (कुंभ मेला) |
| प्रधान इंद्रिय | आँख — रंग, रेखा, विस्तार | कान — सीटी, फुसफुसाहट, भजन, काँपता स्वर |
| समय | सूर्यास्त से सूर्योदय तक — उजाले से उजाले तक | ‘मुँह अँधेरे’ — रात के अंतिम पहर में |
| दृष्टि | प्रकृति के विराट के आगे मनुष्य की लघुता | जन-समूह के बीच व्यक्ति का अकेलापन |
| भाषा | चित्रात्मक; रंगों की श्रृंखला — सोना, लहू, बैंजनी, स्याही | बिंबात्मक और वाक्य-खंडों में चलती; ‘ढेस-सा अँधेरा’, ‘आवाज़ों का रेला’ |
| समानता | दोनों में लेखक ‘मैं’ है, दोनों तीर्थ-स्थलों पर हैं, दोनों में स्थानीय आदमी से एक छोटा-सा संवाद पूरे वृत्तांत का केंद्र बन जाता है (कन्याकुमारी में ग्रेजुएट नवयुवक, प्रयाग में आश्रम का चौकीदार), और दोनों ही स्थान का ‘विवरण’ देने के बजाय स्थान का अनुभव देते हैं। | |
निर्मल वर्मा के बारे में जान लीजिए: निर्मल वर्मा (1929–2005) ‘नई कहानी’ आंदोलन के प्रमुख रचनाकार थे। उपन्यास — वे दिन, लाल टीन की छत, एक चिथड़ा सुख, रात का रिपोर्टर, अंतिम अरण्य। यात्रा-वृत्तांत — चीड़ों पर चाँदनी, हर बारिश में, धुंध से उठती धुन। उन्हें साहित्य अकादमी पुरस्कार (कव्वे और काला पानी) तथा ज्ञानपीठ पुरस्कार मिला।
पूरा पढ़ने के लिए तरीका: विद्यालय के पुस्तकालय में निर्मल वर्मा के यात्रा-वृत्तांतों का संग्रह माँगिए। पढ़ते समय एक कॉपी में तीन खाने बनाइए — दृश्य, ध्वनि, भाव — और हर पन्ने से एक-एक वाक्य उनमें उतारिए। दो-तीन पन्ने बाद ही आपको दिखने लगेगा कि निर्मल वर्मा का ‘ध्वनि’ वाला खाना सबसे भरा हुआ है और मोहन राकेश का ‘दृश्य’ वाला। यही दो लेखकों की शैली का अंतर है — और यही जानना ‘विधा से संवाद’ करना है।