गंगा अध्याय 6 आप भी संवाददाता

अद्यतन2026-09-06

प्र1.
1. मान लीजिए कि आप एक संवाददाता हैं और आपको उमा की कहानी का पता चलता है। अब आप उमा तथा अन्य पात्रों का साक्षात्कार लेकर उनका पक्ष दर्शकों के सामने प्रस्तुत कीजिए।
उत्तर

अच्छे साक्षात्कार की तैयारी — पाँच नियम

  1. हर पात्र से उसी का पक्ष पूछिए, अपना निर्णय मत सुनाइए। संवाददाता का काम राय देना नहीं, राय निकलवाना है।
  2. प्रश्न छोटे रखिए और उत्तर लंबा आने दीजिए। ‘हाँ/नहीं’ में सिमट जाने वाले प्रश्न मत पूछिए।
  3. हर प्रश्न में पाठ का कोई तथ्य रखिए — तभी उत्तर टाला नहीं जा सकेगा (जैसे ‘मैट्रिक’ वाला झूठ, चश्मे वाला प्रसंग, होस्टल वाली घटना)।
  4. सबसे कमज़ोर पात्र — रतन — को भी अवश्य बोलने दीजिए। अच्छी पत्रकारिता की यही पहचान है।
  5. अंत में संतुलित समापन कीजिए — किसी को खलनायक घोषित किए बिना, प्रश्न दर्शक के सामने छोड़ दीजिए।

नमूना उत्तर — साक्षात्कार (कार्यक्रम का नाम: ‘आपका पक्ष’)

संवाददाता: नमस्कार। आज हम उस घर में हैं जहाँ कल शाम एक विवाह की बातचीत टूट गई। हमारे साथ हैं इस घर की बेटी, उमा। उमा जी, कल जो हुआ, उस पर आपको अफ़सोस है?

उमा: अफ़सोस इस बात का है कि इतने वर्ष तक चुप रही। कल जो कहा, वह देर से कहा। पर कहा — यही राहत है।

संवाददाता: आपने कहा था — “जब कुर्सी-मेज बिकती है तब दुकानदार कुर्सी-मेज से कुछ नहीं पूछता।” इतनी कड़ी बात?

उमा: कड़ी लगी होगी, पर झूठी नहीं थी। सुबह से मुझे तैयार किया जा रहा था — पाउडर, कपड़े, बैठने की जगह, गीत। मेरी चाल देखी गई, मेरा चश्मा देखा गया। एक बार भी किसी ने यह नहीं पूछा कि मैं क्या सोचती हूँ। दुकान में सामान से भी कोई नहीं पूछता।

संवाददाता: आपकी शिक्षा को छिपाया गया था। पिता से आपकी शिकायत है?

उमा: शिकायत नहीं, दुख है। उन्होंने ही तो मुझे पढ़ाया। जिस दिन उन्होंने मुझे कॉलेज भेजा था, उस दिन वे बहुत बड़े आदमी थे। जिस दिन उन्होंने मेरा बी.ए. छिपाया, उस दिन छोटे हो गए।

संवाददाता: अब आगे?

उमा: पढ़ाना चाहती हूँ। मुझे लगता है, अगली उमा को इतनी देर तक चुप न रहना पड़े — इसका इंतज़ाम कक्षा से ही होगा।


संवाददाता: बाबू रामस्वरूप, आपने लड़के वालों से कहा था कि आपकी बेटी मैट्रिक तक पढ़ी है। क्यों?

रामस्वरूप: (कुछ देर चुप) देखिए, बात कड़वी है पर सच है — बाज़ार में जो चीज़ ‘माँग’ में नहीं, उसे कोई नहीं लेता। मुझे लगा, ब्याह हो जाए, बाकी बातें बाद में। मैं गलत था। बेटी ने कल मुझे यही आईना दिखाया।

संवाददाता: पर आप स्वयं तो इन विचारों को ‘दकियानूसी’ कहते थे।

रामस्वरूप: कहता था, और कहता रहूँगा। पर कहने और खड़े होने में फ़र्क है। कल जब बेटी बोल रही थी, मैं चुप था। वही मेरी सबसे बड़ी गलती है।


संवाददाता: प्रेमा जी, आपने कहा था कि पढ़ाई-लिखाई ‘जंजाल’ है। आज भी यही मानती हैं?

प्रेमा: मैंने अपने ज़माने में जो देखा, वही कहा। लड़की पढ़ जाए तो रिश्ता मुश्किल — यह डर था, दुश्मनी नहीं। पर कल जब वह बोली, तो मैंने पहली बार देखा कि मेरी बेटी काँप नहीं रही थी। मैं तो जीवन-भर काँपती रही हूँ। अब सोचती हूँ, शायद जंजाल पढ़ाई नहीं थी।


संवाददाता: बाबू गोपालप्रसाद, आपने कहा कि आपके साथ ‘दगा’ हुआ। पर बेटी के पढ़े होने में दगा क्या है?

गोपालप्रसाद: बात तय हुई थी मैट्रिक की, निकली बी.ए.। हमारे यहाँ बात का मोल होता है।

संवाददाता: और आपके पुत्र पर लगे आरोप का क्या? उस पर आपने एक भी प्रश्न नहीं पूछा।

गोपालप्रसाद: (असहज होकर) वह... वह लड़कों की बात है। हम चलते हैं।


संवाददाता: शंकर जी, आप कुछ कहना चाहेंगे? कल आपने केवल इतना कहा था — “बाबूजी, चलिए।”

शंकर: (धीमे स्वर में, सिर झुकाए) जी... मुझसे तो किसी ने कुछ पूछा ही नहीं था। न वहाँ, न घर पर।

संवाददाता: पर आप चाहते तो बोल सकते थे।

शंकर: (चुप)


संवाददाता: रतन, तुम दिन-भर उस कमरे में आते-जाते रहे। तुम्हें क्या लगा?

रतन: साहब, मैं तो मक्खन लेने भागा था। लौटा तो सब खत्म हो चुका था। हाँ, एक बात कहूँ? बीबी जी जब गा रही थीं न, तब सबसे अच्छा लग रहा था। और जब बोलीं, तब सबसे सच्चा।


संवाददाता: दर्शको, इस घर में कल किसी ने कुछ नहीं तोड़ा — बस एक झूठ टूटा। सवाल यह नहीं कि रिश्ता क्यों टूटा; सवाल यह है कि एक लड़की की डिग्री छिपाने की ज़रूरत ही क्यों पड़ी। जब तक इसका उत्तर नहीं मिलता, हर घर में एक उमा चुप बैठी रहेगी। नमस्कार।

कक्षा में कैसे कीजिए: सात विद्यार्थी — एक संवाददाता, छह पात्र। संवाददाता के पास कागज़ का माइक हो। हर साक्षात्कार 1–2 मिनट का रखिए। एक विद्यार्थी को ‘संपादक’ बनाइए, जो अंत में बताए कि किस उत्तर में सबसे ज़्यादा दम था और क्यों।
प्र2.
2. मान लीजिए कि आप उमा के घर से रिपोर्टिंग कर रहे हैं जब उसके घर में शंकर आया था। इस पूरे घटनाक्रम को जीवंत प्रसारण (लाइव रिपोर्ट) की तरह प्रस्तुत कीजिए।
उत्तर

लाइव रिपोर्ट साक्षात्कार से अलग होती है। इसमें आप जो अभी हो रहा है उसे वर्तमान काल में, क्रम से और दृश्य-चित्र खींचते हुए बताते हैं। पाँच बातें ध्यान रखिए —

  • वर्तमान काल में बोलिए — “अब वे भीतर आ रहे हैं”, “अभी-अभी दरवाज़े पर दस्तक हुई है।”
  • समय की मुहर लगाइए — “शाम के लगभग पाँच बजे हैं...”
  • जो दिख रहा है उसे बताइए — कमरे की सजावट, चेहरे के भाव, हाथ की छड़ी। यही श्रोता की आँख है।
  • राय और तथ्य को अलग रखिए — “मुझे लगता है” कहकर ही राय दीजिए।
  • अंत में निष्कर्ष नहीं, सूचना दीजिए — और एक प्रश्न छोड़ दीजिए।

नमूना उत्तर — जीवंत प्रसारण

[दृश्य 1 — बाहर से] नमस्कार। मैं इस समय शहर के एक साधारण-से मकान के बाहर खड़ा हूँ। भीतर एक बैठक होने जा रही है — लड़की देखने की। थोड़ी देर पहले एक ताँगा यहाँ रुका था और उससे दो सज्जन उतरे — बाबू गोपालप्रसाद, हाथ में बेंत, और उनके पुत्र शंकर, जो सिर झुकाए पीछे-पीछे चल रहे थे।

[दृश्य 2 — भीतर की हलचल] भीतर की तैयारी देखिए। एक तख्त अभी-अभी बिछाया गया है, उस पर धोबी के यहाँ से आई ताज़ा धुली चादर डाली गई है। कोने में हारमोनियम और सितार रख दिए गए हैं। मेज़ पर गुलदस्ता है, जिसे अभी-अभी झाड़न से साफ़ किया गया। और सुनिए — घर का सहायक रतन इस समय दौड़कर मक्खन लेने गया है, क्योंकि नाश्ते में वही एक चीज़ रह गई थी। इस घर में आज सब कुछ सामान्य से थोड़ा ज़्यादा दिख रहा है।

[दृश्य 3 — बातचीत] बातचीत शुरू हो चुकी है। पहले पुराने ज़माने की बातें — कचौड़ियाँ, बारह घंटे की पढ़ाई, ‘उस ज़माने का मैट्रिक’। हँसी हो रही है। और अब... अब स्वर बदल गया है। बाबू गोपालप्रसाद ने कहा है — “अच्छा तो साहब, फिर ‘बिजनेस’ की बातचीत हो जाए।” जी हाँ, दर्शको, आपने ठीक सुना — इस बैठक को यहाँ ‘बिजनेस’ कहा जा रहा है।

[दृश्य 4 — शर्तें] शर्तें साफ़ रखी जा रही हैं — लड़की सुंदर होनी चाहिए, और पढ़ी-लिखी बहुत नहीं, “हद से हद मैट्रिक-पास”। तर्क भी दिया जा रहा है — “मोर के पंख होते हैं, मोरनी के नहीं।” लड़की के पिता इस पर सहमति में सिर हिला रहे हैं, हालाँकि कुछ ही देर पहले वे इन्हीं विचारों को ‘दकियानूसी’ कह चुके थे।

[दृश्य 5 — प्रवेश] और अब... लड़की भीतर आ रही है। पान की तश्तरी हाथ में है, गर्दन झुकी हुई, कपड़े बिलकुल सादे। कमरे में एक क्षण के लिए सन्नाटा है। ...और यह क्या! तश्तरी देते समय उसका चेहरा उठा है और — चश्मा! दोनों मेहमान एक साथ चौंक उठे हैं। सफ़ाई दी जा रही है कि आँखें दुखने आ गई थीं। स्पष्ट है, यहाँ चश्मा भी पढ़ाई का सबूत माना जा रहा है।

[दृश्य 6 — परीक्षा] अब लड़की से गीत सुनाने को कहा गया है। वह सितार उठाकर मीरा का पद गा रही है — ‘मेरे तो गिरधर गोपाल दूसरो न कोई’। स्वर बहुत सधा हुआ है। देखिए, गाते-गाते उसका सिर धीरे-धीरे उठ रहा है... और अचानक वह रुक गई है। उसकी आँखें शंकर की आँखों से मिल गई थीं। गीत बीच में ही छूट गया।

[दृश्य 7 — मोड़] प्रश्न जारी हैं — पेंटिंग? सिलाई? इनाम? और अब वह चुप है, बिलकुल चुप। पिता खाँसकर इशारा कर रहे हैं। मेहमान अधीर हो रहे हैं। और... और वह बोल पड़ी है! सुनिए उसके शब्द — “जब कुर्सी-मेज बिकती है तब दुकानदार कुर्सी-मेज से कुछ नहीं पूछता, सिर्फ खरीदार को दिखला देता है।” दर्शको, कमरे में सन्नाटा छा गया है।

[दृश्य 8 — विस्फोट] अब बात तेज़ी से बिगड़ रही है। लड़की ने मेहमानों के पुत्र पर एक पुराना आरोप सबके सामने रख दिया है। लड़का बस इतना कह रहा है — “बाबूजी, चलिए।” और लड़की ने स्वीकार कर लिया है कि उसने बी.ए. पास किया है। बाबू गोपालप्रसाद खड़े हो गए हैं, छड़ी ढूँढ़ रहे हैं, ‘दगा’ शब्द इस्तेमाल कर रहे हैं।

[दृश्य 9 — अंतिम वार] और जाते-जाते लड़की का आख़िरी वाक्य — “घर जाकर ज़रा यह पता लगाइएगा कि आपके लाडले बेटे के रीढ़ की हड्डी भी है या नहीं— यानी बैकबोन, बैकबोन!” दोनों मेहमान बाहर निकल चुके हैं। पिता कुर्सी पर बैठ गए हैं। लड़की चुप है — पर यह चुप्पी अब सिसकियों में बदल रही है।

[समापन] और ठीक इसी क्षण, दर्शको, घर का सहायक रतन मक्खन लेकर लौटा है और कह रहा है — “बाबूजी, मक्खन!” सब उसकी ओर देख रहे हैं। जिस मक्खन के लिए दिनभर दौड़ लगी, वह अब आया है — जब उसका कोई काम नहीं। यहाँ से, आपका संवाददाता, इस एक प्रश्न के साथ विदा लेता है: आज इस कमरे में परीक्षा किसकी हो रही थी — लड़की की, या हम सबकी?

Tip: लाइव रिपोर्ट लिखते समय हर अनुच्छेद के आगे कोष्ठक में दृश्य का नाम लिख लीजिए, जैसा ऊपर किया गया है। इससे क्रम नहीं टूटता और प्रस्तुति के समय आप सीधे उसी बिंदु पर लौट सकते हैं। और सबसे ज़रूरी — जो पाठ में नहीं है, उसे मत जोड़िए। रिपोर्ट का बल कल्पना से नहीं, ब्योरे की सच्चाई से आता है।
क्या यह उपयोगी रहा? त्रुटि बताएँ