अच्छे साक्षात्कार की तैयारी — पाँच नियम
- हर पात्र से उसी का पक्ष पूछिए, अपना निर्णय मत सुनाइए। संवाददाता का काम राय देना नहीं, राय निकलवाना है।
- प्रश्न छोटे रखिए और उत्तर लंबा आने दीजिए। ‘हाँ/नहीं’ में सिमट जाने वाले प्रश्न मत पूछिए।
- हर प्रश्न में पाठ का कोई तथ्य रखिए — तभी उत्तर टाला नहीं जा सकेगा (जैसे ‘मैट्रिक’ वाला झूठ, चश्मे वाला प्रसंग, होस्टल वाली घटना)।
- सबसे कमज़ोर पात्र — रतन — को भी अवश्य बोलने दीजिए। अच्छी पत्रकारिता की यही पहचान है।
- अंत में संतुलित समापन कीजिए — किसी को खलनायक घोषित किए बिना, प्रश्न दर्शक के सामने छोड़ दीजिए।
नमूना उत्तर — साक्षात्कार (कार्यक्रम का नाम: ‘आपका पक्ष’)
संवाददाता: नमस्कार। आज हम उस घर में हैं जहाँ कल शाम एक विवाह की बातचीत टूट गई। हमारे साथ हैं इस घर की बेटी, उमा। उमा जी, कल जो हुआ, उस पर आपको अफ़सोस है?
उमा: अफ़सोस इस बात का है कि इतने वर्ष तक चुप रही। कल जो कहा, वह देर से कहा। पर कहा — यही राहत है।
संवाददाता: आपने कहा था — “जब कुर्सी-मेज बिकती है तब दुकानदार कुर्सी-मेज से कुछ नहीं पूछता।” इतनी कड़ी बात?
उमा: कड़ी लगी होगी, पर झूठी नहीं थी। सुबह से मुझे तैयार किया जा रहा था — पाउडर, कपड़े, बैठने की जगह, गीत। मेरी चाल देखी गई, मेरा चश्मा देखा गया। एक बार भी किसी ने यह नहीं पूछा कि मैं क्या सोचती हूँ। दुकान में सामान से भी कोई नहीं पूछता।
संवाददाता: आपकी शिक्षा को छिपाया गया था। पिता से आपकी शिकायत है?
उमा: शिकायत नहीं, दुख है। उन्होंने ही तो मुझे पढ़ाया। जिस दिन उन्होंने मुझे कॉलेज भेजा था, उस दिन वे बहुत बड़े आदमी थे। जिस दिन उन्होंने मेरा बी.ए. छिपाया, उस दिन छोटे हो गए।
संवाददाता: अब आगे?
उमा: पढ़ाना चाहती हूँ। मुझे लगता है, अगली उमा को इतनी देर तक चुप न रहना पड़े — इसका इंतज़ाम कक्षा से ही होगा।
संवाददाता: बाबू रामस्वरूप, आपने लड़के वालों से कहा था कि आपकी बेटी मैट्रिक तक पढ़ी है। क्यों?
रामस्वरूप: (कुछ देर चुप) देखिए, बात कड़वी है पर सच है — बाज़ार में जो चीज़ ‘माँग’ में नहीं, उसे कोई नहीं लेता। मुझे लगा, ब्याह हो जाए, बाकी बातें बाद में। मैं गलत था। बेटी ने कल मुझे यही आईना दिखाया।
संवाददाता: पर आप स्वयं तो इन विचारों को ‘दकियानूसी’ कहते थे।
रामस्वरूप: कहता था, और कहता रहूँगा। पर कहने और खड़े होने में फ़र्क है। कल जब बेटी बोल रही थी, मैं चुप था। वही मेरी सबसे बड़ी गलती है।
संवाददाता: प्रेमा जी, आपने कहा था कि पढ़ाई-लिखाई ‘जंजाल’ है। आज भी यही मानती हैं?
प्रेमा: मैंने अपने ज़माने में जो देखा, वही कहा। लड़की पढ़ जाए तो रिश्ता मुश्किल — यह डर था, दुश्मनी नहीं। पर कल जब वह बोली, तो मैंने पहली बार देखा कि मेरी बेटी काँप नहीं रही थी। मैं तो जीवन-भर काँपती रही हूँ। अब सोचती हूँ, शायद जंजाल पढ़ाई नहीं थी।
संवाददाता: बाबू गोपालप्रसाद, आपने कहा कि आपके साथ ‘दगा’ हुआ। पर बेटी के पढ़े होने में दगा क्या है?
गोपालप्रसाद: बात तय हुई थी मैट्रिक की, निकली बी.ए.। हमारे यहाँ बात का मोल होता है।
संवाददाता: और आपके पुत्र पर लगे आरोप का क्या? उस पर आपने एक भी प्रश्न नहीं पूछा।
गोपालप्रसाद: (असहज होकर) वह... वह लड़कों की बात है। हम चलते हैं।
संवाददाता: शंकर जी, आप कुछ कहना चाहेंगे? कल आपने केवल इतना कहा था — “बाबूजी, चलिए।”
शंकर: (धीमे स्वर में, सिर झुकाए) जी... मुझसे तो किसी ने कुछ पूछा ही नहीं था। न वहाँ, न घर पर।
संवाददाता: पर आप चाहते तो बोल सकते थे।
शंकर: (चुप)
संवाददाता: रतन, तुम दिन-भर उस कमरे में आते-जाते रहे। तुम्हें क्या लगा?
रतन: साहब, मैं तो मक्खन लेने भागा था। लौटा तो सब खत्म हो चुका था। हाँ, एक बात कहूँ? बीबी जी जब गा रही थीं न, तब सबसे अच्छा लग रहा था। और जब बोलीं, तब सबसे सच्चा।
संवाददाता: दर्शको, इस घर में कल किसी ने कुछ नहीं तोड़ा — बस एक झूठ टूटा। सवाल यह नहीं कि रिश्ता क्यों टूटा; सवाल यह है कि एक लड़की की डिग्री छिपाने की ज़रूरत ही क्यों पड़ी। जब तक इसका उत्तर नहीं मिलता, हर घर में एक उमा चुप बैठी रहेगी। नमस्कार।