मुहावरा — किस मर्ज की दवा होना। अर्थ — किसी काम का न होना, बिलकुल बेकार होना (व्यंग्य में पूछा जाने वाला प्रश्न)।
वाक्य में इसका काम: ‘मर्ज’ का अर्थ है रोग और ‘दवा’ उसका इलाज। यानी सीधा अर्थ हुआ — “तुम किस बीमारी का इलाज हो?”, और लक्ष्य-अर्थ हुआ — “तुम किसी काम की नहीं हो।” रामस्वरूप यह वाक्य झुँझलाहट में पत्नी से कहते हैं, क्योंकि वे बेटी को ‘तैयार’ नहीं करा पाईं। यह मुहावरा उनके स्वभाव की भी चुगली करता है — घर में वे रोब जमाते हैं, और उन्हीं मेहमानों के सामने ‘हँ-हँ-हँ’ करके झुक जाते हैं।
ध्यान दीजिए: यह मुहावरा तीखा है और किसी व्यक्ति को नीचा दिखाता है। इसका प्रयोग अपने वाक्य में सावधानी से कीजिए — किसी साथी के लिए नहीं, किसी बेकार पड़ी वस्तु या व्यवस्था के लिए।
मेरे नए वाक्य
- जो नल एक बूँद पानी न दे, वह किस मर्ज की दवा है?
- ऐसी योजना किस मर्ज की दवा होगी जिसमें गाँव का नाम ही न हो!