यह एकांकी का सबसे चतुर वाक्य है — देखने में सबसे मामूली, असर में सबसे गहरा। लेखक ने इसे अंत के लिए क्यों बचाकर रखा, इसके पाँच कारण हैं।
- मक्खन पूरे एकांकी में चलता आ रहा है — यह उसका ठिकाना है। बीच में प्रेमा कहती है, “मगर हाँ, मक्खन? मक्खन तो आया ही नहीं।” रामस्वरूप झुँझलाते हैं, “तुम्हें भी किस वक्त याद आई है।” रतन को दौड़ाया जाता है, वह देर करता है तो डाँट पड़ती है — “गया नहीं मक्खन लाने?... सब चौपट कर दिया।” और गोपालप्रसाद टोस्ट से इनकार कर देते हैं — “टोस्ट-वोस्ट मैं खाता भी नहीं।” यह छोटा-सा सूत्र नाटक-भर चलकर अंत में आ पहुँचता है — ठीक तब, जब उसकी कोई ज़रूरत नहीं बची। रचना-शिल्प में इसे कहते हैं कि लेखक ने अपना हर धागा बाँध दिया।
- हास्य — भारी दृश्य के बाद अचानक हल्कापन। दर्शक अभी-अभी उमा की सिसकियाँ सुन रहा था; तनाव चरम पर था। ऐसे में रतन का भोला-सा वाक्य हँसी छुड़ा देता है। नाट्य-कला में इस युक्ति को तनाव-मुक्ति कहते हैं — दर्शक हँसता है, पर हँसते-हँसते उसे बात चुभ भी जाती है।
- व्यंग्य — पूरे आयोजन पर एक चोट। तख्त, दरी, धुली चादर, हारमोनियम, सितार, समोसे, चाय, टोस्ट, पाउडर — यह सारा तामझाम किसलिए था? एक लड़की को ‘बिकाऊ’ दिखाने के लिए। अब सौदा टूट चुका है और मक्खन आ पहुँचा है। यह वाक्य चुपचाप कह देता है कि जिस दिखावे पर इतना श्रम लगा, उसका मोल शून्य था। यही एकांकी का प्रति-व्यंग्य है।
- टिप्पणी — और वह भी सबसे छोटे आदमी के मुँह से। रतन घर का सबसे कमज़ोर पात्र है; उसे दिन-भर ‘उल्लू’ और ‘भीगी बिल्ली’ कहा गया। अंतिम वाक्य उसी को मिलता है। जो पूरे नाटक में डाँट खाता रहा, वही अनजाने में सबसे सच्ची टिप्पणी कर जाता है। लेखक उपदेश नहीं देता — वह एक अनजान आदमी से सच कहलवा देता है।
- एकांकी का अंत ऐसा ही होना चाहिए — तीखा, छोटा और अचानक। यदि लेखक अंत में रामस्वरूप से पश्चात्ताप का भाषण दिलवाते या उमा से उपदेश, तो रचना नाटक न रहकर प्रवचन बन जाती। इसके बजाय रंग-निर्देश है — “सब रतन की तरफ देखते हैं और परदा गिरता है।” सब एक-दूसरे से आँख नहीं मिला पा रहे, इसलिए सबकी नज़र एक कटोरी मक्खन पर टिक जाती है। इस एक क्रिया में उस घर की पूरी शर्मिंदगी बिना एक शब्द के आ जाती है।