गंगा अध्याय 6 एकांकी का विस्तार

अद्यतन2026-09-06

प्र1.
“रतन : बाबूजी, मक्खन! (सब रतन की तरफ देखते हैं और परदा गिरता है।)” 1. एकांकी के अंत में रतन कहता है— “बाबूजी, मक्खन...” और परदा गिर जाता है। लेखक ने इस संवाद से एकांकी का अंत क्यों किया होगा? (संकेत– हास्य, व्यंग्य, टिप्पणी आदि)
उत्तर

यह एकांकी का सबसे चतुर वाक्य है — देखने में सबसे मामूली, असर में सबसे गहरा। लेखक ने इसे अंत के लिए क्यों बचाकर रखा, इसके पाँच कारण हैं।

  1. मक्खन पूरे एकांकी में चलता आ रहा है — यह उसका ठिकाना है। बीच में प्रेमा कहती है, “मगर हाँ, मक्खन? मक्खन तो आया ही नहीं।” रामस्वरूप झुँझलाते हैं, “तुम्हें भी किस वक्त याद आई है।” रतन को दौड़ाया जाता है, वह देर करता है तो डाँट पड़ती है — “गया नहीं मक्खन लाने?... सब चौपट कर दिया।” और गोपालप्रसाद टोस्ट से इनकार कर देते हैं — “टोस्ट-वोस्ट मैं खाता भी नहीं।” यह छोटा-सा सूत्र नाटक-भर चलकर अंत में आ पहुँचता है — ठीक तब, जब उसकी कोई ज़रूरत नहीं बची। रचना-शिल्प में इसे कहते हैं कि लेखक ने अपना हर धागा बाँध दिया।
  2. हास्य — भारी दृश्य के बाद अचानक हल्कापन। दर्शक अभी-अभी उमा की सिसकियाँ सुन रहा था; तनाव चरम पर था। ऐसे में रतन का भोला-सा वाक्य हँसी छुड़ा देता है। नाट्य-कला में इस युक्ति को तनाव-मुक्ति कहते हैं — दर्शक हँसता है, पर हँसते-हँसते उसे बात चुभ भी जाती है।
  3. व्यंग्य — पूरे आयोजन पर एक चोट। तख्त, दरी, धुली चादर, हारमोनियम, सितार, समोसे, चाय, टोस्ट, पाउडर — यह सारा तामझाम किसलिए था? एक लड़की को ‘बिकाऊ’ दिखाने के लिए। अब सौदा टूट चुका है और मक्खन आ पहुँचा है। यह वाक्य चुपचाप कह देता है कि जिस दिखावे पर इतना श्रम लगा, उसका मोल शून्य था। यही एकांकी का प्रति-व्यंग्य है।
  4. टिप्पणी — और वह भी सबसे छोटे आदमी के मुँह से। रतन घर का सबसे कमज़ोर पात्र है; उसे दिन-भर ‘उल्लू’ और ‘भीगी बिल्ली’ कहा गया। अंतिम वाक्य उसी को मिलता है। जो पूरे नाटक में डाँट खाता रहा, वही अनजाने में सबसे सच्ची टिप्पणी कर जाता है। लेखक उपदेश नहीं देता — वह एक अनजान आदमी से सच कहलवा देता है।
  5. एकांकी का अंत ऐसा ही होना चाहिए — तीखा, छोटा और अचानक। यदि लेखक अंत में रामस्वरूप से पश्चात्ताप का भाषण दिलवाते या उमा से उपदेश, तो रचना नाटक न रहकर प्रवचन बन जाती। इसके बजाय रंग-निर्देश है — “सब रतन की तरफ देखते हैं और परदा गिरता है।” सब एक-दूसरे से आँख नहीं मिला पा रहे, इसलिए सबकी नज़र एक कटोरी मक्खन पर टिक जाती है। इस एक क्रिया में उस घर की पूरी शर्मिंदगी बिना एक शब्द के आ जाती है।
सार: ‘बाबूजी, मक्खन!’ हास्य, व्यंग्य और टिप्पणी — तीनों एक साथ है। हास्य ऊपर की परत है, व्यंग्य बीच की, और टिप्पणी सबसे नीचे: इस घर में सबसे ज़रूरी चीज़ मक्खन नहीं थी, रीढ़ की हड्डी थी — और वह किसी के पास नहीं थी, सिवाय उमा के।
प्र2.
2. एकांकी में यदि परदा दोबारा उठ जाए तो अगला दृश्य क्या होगा? अनुमान लगाइए और लिखिए।
उत्तर

यह कल्पना का प्रश्न है, पर कल्पना भी नियम से चलती है। अगला दृश्य लिखते समय तीन शर्तें निभानी चाहिए —

  • पात्र अपने स्वभाव से बाहर न जाएँ — रामस्वरूप अचानक क्रांतिकारी नहीं बन सकते; उन्हें पहले क्रोध आएगा, फिर पछतावा। प्रेमा पहले डरेगी, फिर बेटी की ओर झुकेगी। उमा न चिल्लाएगी, न माफ़ी माँगेगी।
  • वही परिवेश और वही शैली रहे — वही कमरा, वही बोलचाल की हिंदुस्तानी, वही व्यंग्य की हल्की परत।
  • रंग-निर्देश और संवाद-निर्देश अवश्य दीजिए — नाट्य-रूप में लिखे बिना यह ‘अगला दृश्य’ नहीं, केवल सारांश बन जाएगा।

नमूना उत्तर — दृश्य दो

(वही कमरा। कुछ ही मिनट बाद। चाय की ट्रे मेज़ पर वैसी ही पड़ी है, प्याले आधे भरे। रतन मक्खन की कटोरी लिए दरवाज़े में खड़ा है, न भीतर आता है न बाहर जाता है। रामस्वरूप कुर्सी पर बैठे हैं, सिर हाथों में। उमा तख्त पर बैठी है, आँखें पोंछ चुकी है। प्रेमा उसके पास खड़ी है।)

प्रेमा : (रतन को देखकर, झुँझलाकर) अब खड़ा-खड़ा क्या देख रहा है? रख दे भीतर। (रतन जल्दी से भीतर चला जाता है।)

रामस्वरूप : (सिर उठाकर, दबी हुई आवाज़ में) सब खत्म। महीनों की बातचीत... और एक पल में...

प्रेमा : मैंने कहा था न, इस लड़की की ज़बान...

उमा : (शांत, वही हल्की लेकिन मजबूत आवाज़) ज़बान मेरी नहीं थी, माँ। शब्द उन्हीं के थे। मैंने तो सिर्फ लौटा दिए।

रामस्वरूप : (भड़ककर) लौटा दिए! और जो घर की इज्जत गई, वह कौन लौटाएगा?

उमा : बाबूजी, आपने उनसे कहा था कि मैं मैट्रिक तक पढ़ी हूँ। इज्जत उसी दिन गई थी। मुझे तो बस आज पता चला।

(रामस्वरूप कुछ कहने को होते हैं, पर चुप रह जाते हैं। थोड़ी देर कमरे में सन्नाटा। बाहर से किसी ताँगे की घंटी सुनाई देती है।)

प्रेमा : (धीरे से, पहली बार बेटी के सिर पर हाथ रखते हुए) तूने ठीक कहा या गलत, यह मैं नहीं जानती। पर तू काँप नहीं रही थी — यह मैंने देख लिया।

उमा : (हँसने की कोशिश करते हुए) डर तो लगा था, माँ। पर चुप रहती तो जीवन-भर लगता।

रामस्वरूप : (उठकर खिड़की के पास जाते हैं, बाहर देखते हुए) तो अब क्या करेगी?

उमा : बाबूजी, शहर के कन्या विद्यालय में अध्यापिका की जगह खाली है। मैं कल आवेदन भेज दूँ?

प्रेमा : (चौंककर) नौकरी! लोग क्या कहेंगे?

उमा : वही, जो आज कह रहे हैं, माँ। कहने वाले तो चुप बैठने पर भी कहते हैं।

(रामस्वरूप मुड़ते हैं। कुछ पल बेटी को देखते रहते हैं, जैसे पहली बार देख रहे हों।)

रामस्वरूप : (धीमे, लगभग स्वयं से) भेज दे... और हाँ, इस बार सच लिखना — बी.ए. पास

(रतन भीतर से आता है, हाथ खाली।)

रतन : बाबूजी, मक्खन रख आया।

रामस्वरूप : (पहली बार बिना डाँटे, थकी हुई हँसी के साथ) ठीक किया रे। आज उसका कोई काम नहीं।

(उमा मुस्कराकर सितार उठाती है और वही अधूरा छूटा गीत फिर से छेड़ देती है। परदा गिरता है।)

दूसरे संभव मोड़ (आप इनमें से कोई भी चुन सकते हैं):
  • पश्चात्ताप का दृश्य — रामस्वरूप बेटी से क्षमा माँगते हैं और स्वीकार करते हैं कि झूठ उन्होंने डर से बोला था। अंत में वे तय करते हैं कि अब कोई रिश्ता उमा की सहमति के बिना नहीं देखा जाएगा।
  • गोपालप्रसाद का लौटना — कुछ दिन बाद वे यह कहकर लौटते हैं कि उन्हें अब कोई आपत्ति नहीं — और उमा शांति से इनकार कर देती है। यह मोड़ व्यंग्य को और तीखा कर देगा।
  • शंकर का अकेले आना — शंकर बिना पिता के आकर क्षमा माँगता है। यह मोड़ करुण भी है और सार्थक भी, क्योंकि इसमें ‘रीढ़ की हड्डी’ पाने की एक संभावना खुलती है। पर सावधान — इसे बहुत आसान मत बनाइए, वरना उमा का संघर्ष हल्का पड़ जाएगा।
याद रखिए — जो भी मोड़ चुनें, अंत में उमा का आत्म-सम्मान बचा रहना चाहिए, क्योंकि वही इस एकांकी की धुरी है।
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