एकांकी में यह भेदभाव किसी एक पात्र तक सीमित नहीं है — वह घर के भीतर भी है और बाहर भी। नीचे पाठ की वे पंक्तियाँ दी गई हैं जहाँ लड़के और लड़की को अलग-अलग तराज़ू पर तौला गया है।
| प्रसंग | लड़के के लिए | लड़की के लिए |
|---|---|---|
| शिक्षा | “अरे, मर्दों का काम तो है ही पढ़ना और काबिल होना।” / “जब आपने अपने लड़कों को बी.ए., एम.ए. तक पढ़ाया है...” | “हमें ज्यादा पढ़ी-लिखी लड़की नहीं चाहिए... बस हद से हद मैट्रिक-पास होनी चाहिए।” / “कुछ बातें दुनिया में ऐसी हैं जो सिर्फ मर्दों के लिए हैं। और ऊँची तालीम भी ऐसी चीजों में से एक है।” |
| पढ़ाई का परिणाम | पढ़ाई से लड़का ‘काबिल’ बनता है। | पढ़ाई से लड़की ‘बिगड़’ जाती है — “मेम साहब तो रखनी नहीं, कौन भुगतेगा उसके नखरों को।” और माँ के शब्दों में — “तुम्हीं ने उसे पढ़ा-लिखाकर इतना सिर चढ़ा रखा है।” |
| रूप-रंग | शंकर के रूप पर एक शब्द नहीं। उसकी बीमारी और एक साल का पिछड़ना भी क्षमा योग्य है — “यह शंकर एक साल बीमार हो गया था।” | “लड़की का खूबसूरत होना निहायत जरूरी है। कैसे भी हो, चाहे पाउडर वगैरह लगाए, चाहे वैसे ही।” / “आजकल तो लड़की कितनी ही सुंदर हो, बिना टीम-टाम के भला कौन पूछता है?” यहाँ तक कि चश्मे तक पर सफ़ाई देनी पड़ती है — “पढ़ाई-वढ़ाई की वजह से तो नहीं है कुछ?” |
| परीक्षा किसकी | शंकर से कुछ नहीं पूछा जाता। उसके बारे में उसका पिता बोलता है। | उमा को बैठाया जाता है, चाल देखी जाती है (“चाल में तो कुछ खराबी है नहीं”), गाना गवाया जाता है, पेंटिंग-सिलाई-इनाम गिनवाए जाते हैं — और चुप रहने पर डाँट पड़ती है, “ज़रा मुँह तो खोलना चाहिए।” |
| भविष्य | मेडिकल कॉलेज, डिग्री, पेशा। | “कोई नौकरी तो करानी नहीं।” — और पिता भी तुरंत हामी भरते हैं, “नौकरी का तो कोई सवाल ही नहीं उठता।” |
| आचरण की जाँच | होस्टल वाले प्रसंग पर शंकर से कोई प्रश्न नहीं पूछा जाता। | उसी क्षण गोपालप्रसाद का प्रश्न लड़की की ओर मुड़ जाता है — “लड़कियों के होस्टल में?... क्या तुम कालेज में पढ़ी हो?” यानी लड़के का दोष भुला दिया गया और लड़की की शिक्षा ही अपराध बन गई। |
| मज़ाक तक में भेद | — | “खूबसूरती पर टैक्स!... हर एक औरत पर यह छोड़ दिया जाए कि वह अपनी खूबसूरती के ‘ग्रेड’ के माफ़िक अपने ऊपर टैक्स तय कर ले।” और “मर्द के दाढ़ी होती है, औरत के नहीं...!” — हँसी भी स्त्री की क़ीमत आँकने से ही निकलती है। |
इस भिन्नता को मैं किस प्रकार समझता/समझती हूँ
1. यह ‘भिन्नता’ नहीं, असमानता है — जिसे प्रकृति का नाम दे दिया गया है। गोपालप्रसाद का सबसे चालाक तर्क यही है — “मोर के पंख होते हैं, मोरनी के नहीं; शेर के बाल होते हैं, शेरनी के नहीं।” वे एक सामाजिक नियम को प्राकृतिक नियम की तरह पेश करते हैं, ताकि उस पर प्रश्न ही न उठाया जा सके। पर पंख और बाल जन्म से मिलते हैं, शिक्षा नहीं — शिक्षा दी जाती है या रोकी जाती है। यह तुलना इसीलिए झूठी है।
2. इस सोच के भीतर ही एक विरोधाभास है। वही लोग अपने बेटों को एम.ए. तक पढ़ाना चाहते हैं और अपने बेटों की पत्नियों को मैट्रिक से आगे नहीं। पर हर पढ़ी-लिखी बहू किसी की बेटी है और हर बेटी किसी की बहू बनेगी। यानी वे एक ऐसा समाज चाहते हैं जिसमें आधे लोग शिक्षित हों और आधे नहीं — जो असंभव है। रामस्वरूप का झूठ इसी असंभव माँग की पैदाइश है।
3. असली डर योग्यता का नहीं, बराबरी का है। गोपालप्रसाद की आपत्ति यह नहीं कि लड़की पढ़ेगी तो घर नहीं चला पाएगी; उनकी आपत्ति यह है कि वह “अंग्रेजी अखबार पढ़ने लगीं और ‘पालिटिक्स’ वगैरह पर बहस करने लगीं तब तो हो चुकी गृहस्थी।” यानी डर यह है कि पढ़ी-लिखी स्त्री बहस कर सकेगी — अपनी राय रख सकेगी। और एकांकी का अंत बता देता है कि यह डर सच था: उमा बहस करती है, और सौदा टूट जाता है।
4. सबसे बड़ा अन्याय दोहरा मानदंड है। जिस दृश्य में लड़के पर लड़कियों के होस्टल के आसपास घूमने और वहाँ से भगाए जाने का आरोप लगता है, उसी दृश्य में सवाल लड़की से पूछा जाता है कि वह कॉलेज में क्यों पढ़ी। लड़के का आचरण माफ़, लड़की की योग्यता अपराध — यही उस समाज का चरित्र है, और लेखक ने इसे बिना एक शब्द उपदेश दिए दिखा दिया है।
5. मेरा निष्कर्ष: शिक्षा किसी की ‘आवश्यकता’ के हिसाब से नहीं, हर मनुष्य के अधिकार के रूप में मिलनी चाहिए। लड़की की पढ़ाई का उद्देश्य यह नहीं होना चाहिए कि उससे रिश्ता आसानी से मिलेगा या नहीं, बल्कि यह कि वह अपने विवेक से जीवन के निर्णय ले सके — ठीक वैसे ही जैसे उमा ने उस दिन लिया।