गंगा अध्याय 6 तुलना और विचार

अद्यतन2026-09-06

प्र1.
1. “गोपालप्रसाद : भला पूछिए इन अक्ल के ठेकेदारों से कि क्या लड़कों की पढ़ाई और लड़कियों की पढ़ाई एक बात है।” एकांकी में उन पंक्तियों को खोजिए जहाँ एकांकी के पात्रों के व्यवहार में लड़कियों तथा लड़कों के प्रति भिन्न-भिन्न दृष्टि अभिव्यक्त हुई है। अब यह भी लिखिए कि आप इस भिन्नता को किस प्रकार समझते हैं?
उत्तर

एकांकी में यह भेदभाव किसी एक पात्र तक सीमित नहीं है — वह घर के भीतर भी है और बाहर भी। नीचे पाठ की वे पंक्तियाँ दी गई हैं जहाँ लड़के और लड़की को अलग-अलग तराज़ू पर तौला गया है।

प्रसंगलड़के के लिएलड़की के लिए
शिक्षा“अरे, मर्दों का काम तो है ही पढ़ना और काबिल होना।” / “जब आपने अपने लड़कों को बी.ए., एम.ए. तक पढ़ाया है...”“हमें ज्यादा पढ़ी-लिखी लड़की नहीं चाहिए... बस हद से हद मैट्रिक-पास होनी चाहिए।” / “कुछ बातें दुनिया में ऐसी हैं जो सिर्फ मर्दों के लिए हैं। और ऊँची तालीम भी ऐसी चीजों में से एक है।”
पढ़ाई का परिणामपढ़ाई से लड़का ‘काबिल’ बनता है।पढ़ाई से लड़की ‘बिगड़’ जाती है — “मेम साहब तो रखनी नहीं, कौन भुगतेगा उसके नखरों को।” और माँ के शब्दों में — “तुम्हीं ने उसे पढ़ा-लिखाकर इतना सिर चढ़ा रखा है।”
रूप-रंगशंकर के रूप पर एक शब्द नहीं। उसकी बीमारी और एक साल का पिछड़ना भी क्षमा योग्य है — “यह शंकर एक साल बीमार हो गया था।”“लड़की का खूबसूरत होना निहायत जरूरी है। कैसे भी हो, चाहे पाउडर वगैरह लगाए, चाहे वैसे ही।” / “आजकल तो लड़की कितनी ही सुंदर हो, बिना टीम-टाम के भला कौन पूछता है?” यहाँ तक कि चश्मे तक पर सफ़ाई देनी पड़ती है — “पढ़ाई-वढ़ाई की वजह से तो नहीं है कुछ?”
परीक्षा किसकीशंकर से कुछ नहीं पूछा जाता। उसके बारे में उसका पिता बोलता है।उमा को बैठाया जाता है, चाल देखी जाती है (“चाल में तो कुछ खराबी है नहीं”), गाना गवाया जाता है, पेंटिंग-सिलाई-इनाम गिनवाए जाते हैं — और चुप रहने पर डाँट पड़ती है, “ज़रा मुँह तो खोलना चाहिए।”
भविष्यमेडिकल कॉलेज, डिग्री, पेशा।“कोई नौकरी तो करानी नहीं।” — और पिता भी तुरंत हामी भरते हैं, “नौकरी का तो कोई सवाल ही नहीं उठता।”
आचरण की जाँचहोस्टल वाले प्रसंग पर शंकर से कोई प्रश्न नहीं पूछा जाता।उसी क्षण गोपालप्रसाद का प्रश्न लड़की की ओर मुड़ जाता है — “लड़कियों के होस्टल में?... क्या तुम कालेज में पढ़ी हो?” यानी लड़के का दोष भुला दिया गया और लड़की की शिक्षा ही अपराध बन गई।
मज़ाक तक में भेद“खूबसूरती पर टैक्स!... हर एक औरत पर यह छोड़ दिया जाए कि वह अपनी खूबसूरती के ‘ग्रेड’ के माफ़िक अपने ऊपर टैक्स तय कर ले।” और “मर्द के दाढ़ी होती है, औरत के नहीं...!” — हँसी भी स्त्री की क़ीमत आँकने से ही निकलती है।

इस भिन्नता को मैं किस प्रकार समझता/समझती हूँ

1. यह ‘भिन्नता’ नहीं, असमानता है — जिसे प्रकृति का नाम दे दिया गया है। गोपालप्रसाद का सबसे चालाक तर्क यही है — “मोर के पंख होते हैं, मोरनी के नहीं; शेर के बाल होते हैं, शेरनी के नहीं।” वे एक सामाजिक नियम को प्राकृतिक नियम की तरह पेश करते हैं, ताकि उस पर प्रश्न ही न उठाया जा सके। पर पंख और बाल जन्म से मिलते हैं, शिक्षा नहीं — शिक्षा दी जाती है या रोकी जाती है। यह तुलना इसीलिए झूठी है।

2. इस सोच के भीतर ही एक विरोधाभास है। वही लोग अपने बेटों को एम.ए. तक पढ़ाना चाहते हैं और अपने बेटों की पत्नियों को मैट्रिक से आगे नहीं। पर हर पढ़ी-लिखी बहू किसी की बेटी है और हर बेटी किसी की बहू बनेगी। यानी वे एक ऐसा समाज चाहते हैं जिसमें आधे लोग शिक्षित हों और आधे नहीं — जो असंभव है। रामस्वरूप का झूठ इसी असंभव माँग की पैदाइश है।

3. असली डर योग्यता का नहीं, बराबरी का है। गोपालप्रसाद की आपत्ति यह नहीं कि लड़की पढ़ेगी तो घर नहीं चला पाएगी; उनकी आपत्ति यह है कि वह “अंग्रेजी अखबार पढ़ने लगीं और ‘पालिटिक्स’ वगैरह पर बहस करने लगीं तब तो हो चुकी गृहस्थी।” यानी डर यह है कि पढ़ी-लिखी स्त्री बहस कर सकेगी — अपनी राय रख सकेगी। और एकांकी का अंत बता देता है कि यह डर सच था: उमा बहस करती है, और सौदा टूट जाता है।

4. सबसे बड़ा अन्याय दोहरा मानदंड है। जिस दृश्य में लड़के पर लड़कियों के होस्टल के आसपास घूमने और वहाँ से भगाए जाने का आरोप लगता है, उसी दृश्य में सवाल लड़की से पूछा जाता है कि वह कॉलेज में क्यों पढ़ी। लड़के का आचरण माफ़, लड़की की योग्यता अपराध — यही उस समाज का चरित्र है, और लेखक ने इसे बिना एक शब्द उपदेश दिए दिखा दिया है।

5. मेरा निष्कर्ष: शिक्षा किसी की ‘आवश्यकता’ के हिसाब से नहीं, हर मनुष्य के अधिकार के रूप में मिलनी चाहिए। लड़की की पढ़ाई का उद्देश्य यह नहीं होना चाहिए कि उससे रिश्ता आसानी से मिलेगा या नहीं, बल्कि यह कि वह अपने विवेक से जीवन के निर्णय ले सके — ठीक वैसे ही जैसे उमा ने उस दिन लिया।

प्र2.
2. “मुझे अपनी इज्जत, अपने मान का खयाल तो है। लेकिन इनसे पूछिए कि ये किस तरह अपना मुँह छिपाकर भागे थे।” एकांकी में उमा अपने अधिकार और विचार खुलकर व्यक्त करती है। इससे उमा के व्यक्तित्व के विषय में क्या-क्या पता चलता है? आपके विचार से उसके व्यक्तित्व में ये विशेषताएँ कैसे आई होंगी? (संकेत– शिक्षा, परिवार का व्यवहार आदि)
उत्तर

उमा के व्यक्तित्व की विशेषताएँ — पाठ के प्रमाण सहित

विशेषताएकांकी से प्रमाण
आत्म-सम्मान“मुझे अपनी इज्जत— अपने मान का खयाल तो है।” वह न गिड़गिड़ाती है, न सफ़ाई देती है; वह केवल अपनी जगह बताती है।
संयम और धैर्ययह उसका सबसे कम देखा जाने वाला गुण है। वह पूरे दृश्य में चुप रहती है — “(चुप)”, “उसी तरह गर्दन झुकाए”। पिता खाँसकर इशारा करते हैं, फिर भी वह नहीं बोलती। वह तभी बोलती है जब बात सम्मान पर आ जाती है।
विवेक और तर्क-शक्तिवह गाली नहीं देती, उपमा देती है — “जब कुर्सी-मेज बिकती है तब दुकानदार कुर्सी-मेज से कुछ नहीं पूछता, सिर्फ खरीदार को दिखला देता है।” यह पढ़े-लिखे मन की भाषा है।
साहसवह अपने ही घर में, अपने पिता के मेहमानों के सामने, उस समय बोलती है जब पिता तक “चुप” हैं। यह साहस ही उसे शंकर के ठीक विपरीत खड़ा कर देता है।
निर्भीक स्पष्टवादितावह शंकर का सच सबके सामने रख देती है — “अभी पिछली फरवरी में ये लड़कियों के होस्टल के इर्द-गिर्द क्यों घूम रहे थे, और वहाँ से कैसे भगाए गए थे!”
नैतिक स्वच्छता“कोई पाप नहीं किया, कोई चोरी नहीं की, और न आपके पुत्र की तरह ताक-झाँककर कायरता दिखाई है।” वह अपने पक्ष को अपने आचरण पर खड़ा करती है, डिग्री पर नहीं।
सादगीरंग-निर्देश — “सादगी के कपड़े।” माँ का रखा पाउडर वह छूती तक नहीं — “उसे तो इन चीजों से न जाने किस जनम की नफरत है।”
गुण-संपन्नतासितार और गायन में निपुण (“स्वर से जाहिर है कि गाने का अच्छा ज्ञान है”), चित्रकला जानती है, घर-भर की सिलाई करती है। यानी वह विद्रोह के लिए विद्रोह नहीं करती — वह सचमुच योग्य है, और यही उसके पक्ष को मज़बूत बनाता है।
संवेदनशीलतावह पत्थर नहीं है। सब चले जाने पर “उसकी खामोशी सिसकियों में तबदील हो जाती है।” यही आँसू उसे सच्चा और मानवीय बनाते हैं — बहादुरी का अर्थ भावहीन होना नहीं है।

ये विशेषताएँ उसमें कैसे आई होंगी

  1. शिक्षा — सबसे बड़ा कारण यही है। वह बी.ए. पास है और कॉलेज में, संभवतः छात्रावास के वातावरण में, पढ़ी है। कॉलेज ने उसे केवल विषय नहीं दिए — उसने उसे तुलना करने की दृष्टि दी। इसीलिए वह अपने साथ हो रहे व्यवहार को पहचान पाती है और उसे एक उपमा में बाँधकर सबके सामने रख देती है। जो अपनी स्थिति को नाम दे सकता है, वही उससे लड़ सकता है।
  2. पिता का आधा-अधूरा साथ — रामस्वरूप ने बेटी को पढ़ाया — यह छोटी बात नहीं। उस माहौल में पली लड़की के लिए किताब, सितार और रंग-तूलिका साधारण चीज़ें थीं। पर उन्हीं पिता ने उसकी शिक्षा छिपाई और उसे प्रदर्शनी की तरह बैठाया। इस विरोधाभास ने उसे यह भी सिखा दिया कि जो सम्मान माँगे बिना नहीं मिलता, उसे माँगना पड़ता है।
  3. माँ की उलटी सोच — प्रेमा रोज़ यही कहती रही होगी कि पढ़ाई ‘जंजाल’ है और लड़की को ‘राह पर’ आना चाहिए। घर में रोज़ मिलने वाले इस विरोध ने उमा के तर्कों की धार तेज़ की होगी — जिन विचारों को रोज़ काटना पड़े, वे मन में और साफ़ हो जाते हैं।
  4. अपनी योग्यता का भरोसा — जो लड़की गा सकती है, चित्र बना सकती है और घर की सिलाई सँभाल सकती है, उसका आत्मविश्वास किसी की स्वीकृति पर नहीं टिकता। ध्यान दीजिए — उसका “मस्तक उठ जाता है” गाते समय, बोलने से पहले। कला ने उसे वह ऊँचाई पहले ही दे दी थी।
  5. उस दिन का अपमान — कारण नहीं, चिंगारी — चश्मे पर सवाल, चाल की जाँच, गाने का आदेश, इनाम की पूछताछ — एक के बाद एक अपमान ने केवल वह क्षण दिया जिसमें भीतर का बना-बनाया आत्म-सम्मान फूट पड़ा। स्वभाव पहले से था; अवसर उस दिन मिला।
सोचने की बात: उमा किसी का अपमान नहीं करती — वह केवल वही लौटाती है जो उस पर फेंका गया था। गोपालप्रसाद ‘इज्जत’ शब्द पहले बोलते हैं (“आपने मेरी इज्जत उतारने के लिए मुझे यहाँ बुलाया था?”), और उमा वही शब्द उन्हीं को लौटा देती है (“हमारी बेइज्जती नहीं होती...?”)। यही उसके चरित्र का शिखर है — वह बराबरी की भाषा बोलती है, बदले की नहीं।
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