प्र1.
आप जानते ही हैं कि ‘रीढ़ की हड्डी’ एक एकांकी है। एकांकी में भी एक कहानी ही होती है, लेकिन एकांकी की रूपरेखा कहानी से थोड़ी अलग होती है। आगे ‘रीढ़ की हड्डी’ एकांकी से संबंधित कुछ बिंदु दिए गए हैं। एकांकी में से इन बिंदुओं से संबंधित एक-एक उदाहरण ढूँढ़कर लिखिए। 1. एकांकी का नाम 2. लेखक का नाम 3. पात्र 4. परिवेश/देश-काल 5. रंग-निर्देश/मंच-निर्देश 6. संवाद-निर्देश 7. समस्या 8. संवाद 9. मुख्य विचार 10. समाधान/परिणाम
उत्तर
नीचे पुस्तक के दसों बिंदु एकांकी से लिए गए वास्तविक उदाहरणों सहित भरे गए हैं। हर पंक्ति में पहले बिंदु का उत्तर है, फिर पाठ का प्रमाण।
| क्र. | बिंदु | ‘रीढ़ की हड्डी’ में उदाहरण |
|---|---|---|
| 1. | एकांकी का नाम | रीढ़ की हड्डी — शीर्षक एकांकी की अंतिम पंक्ति से आया है: “यानी बैकबोन, बैकबोन!” |
| 2. | लेखक का नाम | जगदीशचंद्र माथुर (जन्म 1917, शाहजहाँपुर — निधन 1978)। एकांकी की रचना सन् 1939 में। अन्य प्रसिद्ध नाट्य-कृतियाँ — भोर का तारा, कोणार्क, ओ मेरे सपने। |
| 3. | पात्र | कुल छह पात्र — उमा (लड़की), रामस्वरूप (लड़की का पिता), प्रेमा (लड़की की माँ), शंकर (लड़का), गोपालप्रसाद (लड़के का पिता), रतन (रामस्वरूप का घरेलू सहायक)। पुस्तक में यह सूची ‘पात्र परिचय’ शीर्षक से पहले ही दे दी गई है — एकांकी की यही पहचान है कि पात्र थोड़े होते हैं। |
| 4. | परिवेश / देश-काल | सन् 1939 के आसपास का एक मध्यवर्गीय शहरी भारतीय घर, और समय एक ही दिन की कुछ घड़ियाँ। प्रमाण — “मामूली तरह से सजा हुआ एक कमरा”; सवारी के लिए ताँगा (“ताँगेवाला जानता था”); “चार पैसे में ढेर-सी बालाई आती थी”; लखनऊ का मेडिकल कॉलेज; ‘इंट्रेंस’, ‘मैट्रिक’, ‘स्त्री-सुबोधिनी’ जैसे उस युग के शब्द। |
| 5. | रंग-निर्देश / मंच-निर्देश | एकांकी का आरंभ ही रंग-निर्देश से होता है — “(मामूली तरह से सजा हुआ एक कमरा। अंदर के दरवाजे से आते हुए जिन महाशय की पीठ नजर आ रही है, वे अधेड़ उम्र के मालूम होते हैं। एक तख्त को पकड़े हुए पीछे की ओर चलते-चलते कमरे में आते हैं। तख्त का दूसरा सिरा रतन ने पकड़ रखा है।)” दूसरा उदाहरण — पात्र-परिचय देता निर्देश: “उनका लड़का कुछ खीस निपोरने वाले नौजवानों में से है। आवाज़ पतली है और खिसियाहट-भरी। झुकी कमर इनकी खासियत है।” |
| 6. | संवाद-निर्देश | संवाद के ठीक पहले कोष्ठक में दिया वह निर्देश जो बताता है कि पंक्ति कैसे बोली जाए — “(ज़रा तेज आवाज़ में) और क्या करेगा?”; “(हल्की लेकिन मजबूत आवाज़ में) क्या जवाब दूँ बाबू जी!”; “(ताव में आकर) बाबू रामस्वरूप, आपने मेरी इज्जत उतारने के लिए मुझे यहाँ बुलाया था?”; “(ज़रा रूखी आवाज़ में) ज़रा मुँह तो खोलना चाहिए।”; “(जोशीली आवाज़ में) और पढ़ाई का यह हाल था...” |
| 7. | समस्या | विवाह के बाज़ार में पढ़ी-लिखी लड़की का ‘दोषी’ हो जाना — और इसीलिए पिता का उसकी शिक्षा छिपाना। पाठ का प्रमाण — “हमें ज्यादा पढ़ी-लिखी लड़की नहीं चाहिए। मेम साहब तो रखनी नहीं, कौन भुगतेगा उसके नखरों को। बस हद से हद मैट्रिक-पास होनी चाहिए” और रामस्वरूप की विवशता — “क्या करूँ, मजबूरी है। मतलब अपना है।” |
| 8. | संवाद | एकांकी पूरी तरह संवादों पर चलती है; लेखक बीच में कुछ नहीं समझाता। उदाहरण — गोपालप्रसाद : “अरे, मर्दों का काम तो है ही पढ़ना और काबिल होना... जनाब, मोर के पंख होते हैं, मोरनी के नहीं; शेर के बाल होते हैं, शेरनी के नहीं।” और उसका उत्तर — उमा : “क्या लड़कियों के दिल नहीं होता? क्या उनके चोट नहीं लगती?” |
| 9. | मुख्य विचार | लड़की कोई वस्तु नहीं, एक व्यक्ति है; और शिक्षा उसका दोष नहीं, उसका बल है। यह विचार एक ही उपमा में खुल जाता है — “जब कुर्सी-मेज बिकती है तब दुकानदार कुर्सी-मेज से कुछ नहीं पूछता, सिर्फ खरीदार को दिखला देता है।” |
| 10. | समाधान / परिणाम | रिश्ता टूट जाता है। गोपालप्रसाद क्रोध में उठ खड़े होते हैं — “बस हो चुका। बाबू रामस्वरूप, आपने मेरे साथ दगा किया... लाइए, मेरी छड़ी कहाँ है?” उमा उन्हें अंतिम चोट देती है (“बैकबोन, बैकबोन!”), पिता “कुर्सी पर धम से बैठ जाते हैं”, उमा की “खामोशी सिसकियों में तबदील हो जाती है”, और रतन का “बाबूजी, मक्खन!” कहते ही परदा गिर जाता है। यानी समाधान व्यावहारिक नहीं, नैतिक है — सौदा टूटा, पर उमा का आत्म-सम्मान बचा रहा। |
एकांकी और कहानी का अंतर — यही तालिका सिखा रही है: कहानी में लेखक स्वयं बोलता है, दृश्य बदलता रहता है और समय वर्षों तक फैल सकता है। एकांकी में लेखक ग़ायब रहता है — वह केवल दो रास्तों से बोलता है: संवाद और रंग-निर्देश। इसीलिए एकांकी में एक ही स्थान, थोड़े पात्र, एक ही समस्या और सीधे चरम-बिंदु तक जाती हुई गति होती है। ‘रीढ़ की हड्डी’ इसका आदर्श उदाहरण है — एक कमरा, छह पात्र, एक बैठक, और लगभग एक घंटे की घटना।
लिखते समय ध्यान रखिए: बिंदु 5 और 6 को विद्यार्थी प्रायः एक मान लेते हैं। अंतर याद रखिए — रंग-निर्देश मंच, स्थान, प्रवेश-प्रस्थान और वातावरण बताता है (कमरा कैसा है, कौन कैसे आता है); संवाद-निर्देश बताता है कि कोई पंक्ति किस स्वर और भाव से बोली जाए। दोनों कोष्ठक में और तिरछे अक्षरों में छपते हैं, पर उनका काम अलग-अलग है।