गंगा अध्याय 6 रंग-निर्देश

अद्यतन2026-09-06

प्र1.
अब इस एकांकी को कक्षा में प्रस्तुत करने का समय है। अपने समूह के साथ मिलकर एकांकी के किसी एक दृश्य का चुनाव कीजिए। उसकी तैयारी कीजिए और कक्षा में उसे प्रस्तुत कीजिए। (संकेत– (i) समूह बनाइए और उचित हाव-भाव द्वारा उस दृश्य का अभिनय कीजिए। (ii) आप अपनी आवश्यकता के अनुसार दिए गए रंग-निर्देश में परिवर्तन भी कर सकते हैं।)
उत्तर

यह करने वाली गतिविधि है, पर तैयारी कागज़ पर होती है। नीचे पहले तरीका दिया गया है, फिर एक दृश्य का पूरा नमूना मंचन-प्रारूप, जिसे आप ज्यों-का-त्यों या बदलकर काम में ले सकते हैं।

तैयारी के पाँच चरण

  1. दृश्य चुनिए — ऐसा हिस्सा लीजिए जिसमें कोई मोड़ हो। तीन अच्छे विकल्प हैं: (क) आरंभ का दृश्य — रामस्वरूप, प्रेमा और रतन की तख्त-दरी वाली भागदौड़ (हास्य से भरा); (ख) चाय-नाश्ते का दृश्य — ‘बिजनेस’ की बातचीत और ‘खूबसूरती पर टैक्स’ (व्यंग्य से भरा); (ग) चरम दृश्य — उमा का पान लेकर आना से लेकर “बैकबोन, बैकबोन!” तक (सबसे प्रभावशाली)।
  2. भूमिकाएँ बाँटिए — छह पात्रों के अलावा दो और भूमिकाएँ रखिए: एक निर्देशक (जो रंग-निर्देश पढ़कर मंच सजाए) और एक प्रॉम्प्टर (जो भूली पंक्ति फुसफुसाकर बताए)।
  3. रंग-निर्देश को मंच में बदलिए — पाठ के निर्देश से केवल तीन चीज़ें चाहिए: एक तख्त (कक्षा की दो बेंच जोड़कर उस पर चादर), दो-तीन कुर्सियाँ, और एक मेज़ जिस पर गुलदस्ता तथा चाय की ट्रे हो। सितार-हारमोनियम न हों तो गत्ते का सितार बना लीजिए या केवल गीत गा दीजिए — पुस्तक ने स्वयं छूट दी है कि “आप अपनी आवश्यकता के अनुसार दिए गए रंग-निर्देश में परिवर्तन भी कर सकते हैं।”
  4. संवाद-निर्देश पर मेहनत कीजिए — यही अभिनय की कुंजी है। उमा की पंक्ति “हल्की लेकिन मजबूत आवाज़ में” बोलनी है, चिल्लाकर नहीं। रामस्वरूप का ‘हँ-हँ-हँ’ हर बार घबराहट के साथ। शंकर हर बार आँखें झुकाकर और कमर झुकाकर बैठे — यही उसका पूरा चरित्र है।
  5. दो पूर्वाभ्यास (rehearsal) कीजिए — पहला केवल संवाद पढ़कर, दूसरा गति और भाव के साथ। प्रवेश-प्रस्थान के रास्ते पहले ही तय कर लीजिए, क्योंकि इस एकांकी में ‘अंदर का दरवाज़ा’ और ‘बाहर का दरवाज़ा’ अलग-अलग हैं।

नमूना उत्तर — मंचन-प्रारूप (चुना गया दृश्य: उमा का प्रवेश से लेकर परदा गिरने तक)

तत्वहमारी योजना
मंच-सज्जामंच के बाएँ कोने में तख्त, उस पर दरी और चादर; उसके पास गत्ते का सितार। दाहिनी ओर तीन कुर्सियाँ और बीच में मेज़, जिस पर चाय की ट्रे और गुलदस्ता। पीछे दीवार पर कुत्ते वाली तसवीर टँगी हो (उसका संवाद में ज़िक्र आता है)। दो प्रवेश-द्वार — बाएँ ‘अंदर का दरवाज़ा’, दाएँ ‘बाहर का’।
प्रकाशसामान्य सफ़ेद प्रकाश। उमा के गाने के समय उस पर एक हल्का घेरा (spot) और शेष मंच थोड़ा मंद — इससे उसका “मस्तक उठ जाना” दिखेगा। अंतिम वाक्य “बैकबोन, बैकबोन!” पर एक क्षण के लिए सब कुछ ठहरा दीजिए, फिर परदा।
वेशभूषाउमा — सादगी के कपड़े, बिना शृंगार, सोने की रिम वाला चश्मा (कागज़ का बना लीजिए — यह दृश्य का सबसे बड़ा ‘धमाका’ है)। रामस्वरूप — कुर्ता-धोती। गोपालप्रसाद — कोट और हाथ में बेंत/छड़ी। शंकर — कमीज़-पतलून, कंधे झुके हुए। रतन — साधारण कुर्ता, हाथ में कटोरी।
मुख्य क्षण (blocking)(1) उमा तश्तरी लिए, गर्दन झुकाए प्रवेश करे; गोपालप्रसाद आँखें गड़ाकर और शंकर आँखें छिपाकर देखें। (2) चेहरा उठते ही चश्मा दिखे — दोनों एक साथ चौंककर “चश्मा!!!” कहें। (3) गीत के बीच उमा की आँखें शंकर से मिलें और वह अचानक रुक जाए। (4) “कुर्सी-मेज” वाले संवाद पर उमा खड़ी हो जाए और पहली बार सीधे गोपालप्रसाद की ओर देखे। (5) अंत में गोपालप्रसाद छड़ी ढूँढ़कर तेज़ी से जाएँ, रामस्वरूप कुर्सी पर धम से बैठें, और रतन मक्खन लेकर आ जाए।
ध्वनिआरंभ में तख्त रखे जाने की आवाज़, बीच में किवाड़ों पर दस्तक, और उमा का मीरा-भजन — ‘मेरे तो गिरधर गोपाल दूसरो न कोई’। कोई पार्श्व-संगीत आवश्यक नहीं; इस एकांकी की ताक़त चुप्पियों में है।
अवधिलगभग 8–10 मिनट — कक्षा की प्रस्तुति के लिए यही उपयुक्त है।
रंग-निर्देश इतने ज़रूरी क्यों हैं: पुस्तक स्वयं कहती है कि रंग-निर्देश से “एकांकी की पृष्ठभूमि की रचना की गई है, जहाँ से एकांकी आगे बढ़ती है” और उससे पाठक तथा निर्देशक को “स्थान, परिवेश, सामाजिक स्थिति आदि के विषय में सटीक जानकारी” मिलती है। यहाँ ‘मामूली तरह से सजा हुआ एक कमरा’ इन तीन शब्दों में ही परिवार की आर्थिक स्थिति बता देता है — न ग़रीब, न रईस, बल्कि वह मध्यवर्ग जिसे ‘दिखाना’ पड़ता है। यही कारण है कि आगे चलकर चादर धोबी से मँगाई जाती है और मक्खन के लिए भागदौड़ होती है।
Try This: प्रस्तुति के बाद कक्षा से तीन प्रश्न पूछिए — (1) किस पात्र की मुद्रा सबसे ज़्यादा याद रह गई? (2) कौन-सी पंक्ति सुनकर सबसे ज़्यादा चुभन हुई? (3) यदि आप निर्देशक होते तो कौन-सा रंग-निर्देश बदलते और क्यों? इन उत्तरों से पता चलेगा कि आपका मंचन कितना सफल रहा।
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