गंगा अध्याय 6 मेरी समझ मेरे विचार

अद्यतन2026-09-06

प्र1.
नीचे दिए गए प्रश्नों पर कक्षा में चर्चा कीजिए और उनके उत्तर लिखिए— 1. बाबू रामस्वरूप समाज में आधुनिक व्यवहार का दिखावा करते हैं, जबकि उनके विचार रूढ़िवादी हैं। इस अंतर्द्वंद्व के उदाहरण एकांकी में से खोजकर लिखिए। (संकेत– उमा के साथ उनका व्यवहार, विवाह के लिए दिखावे करना किंतु इन प्रयासों को छिपाने की चेष्टा करना आदि।)
उत्तर

बाबू रामस्वरूप का अंतर्द्वंद्व यह है कि उनका दिमाग नई पीढ़ी के साथ है और उनके पैर पुरानी व्यवस्था में गड़े हुए हैं। वे जानते हैं कि क्या ठीक है, पर करते वही हैं जो समाज को स्वीकार है। एकांकी में इसके प्रमाण कदम-कदम पर बिखरे हैं —

एकांकी में से उदाहरणयह किस द्वंद्व को दिखाता है
बेटी को बी.ए. तक पढ़ाया — प्रेमा की शिकायत है, “तुम्हीं ने उसे पढ़ा-लिखाकर इतना सिर चढ़ा रखा है।”यह उनका आधुनिक पक्ष है। उस ज़माने में बेटी को कॉलेज भेजना छोटी बात न थी।
पर उसी पढ़ाई को छिपा गए — गोपालप्रसाद अंत में कहते हैं, “आपकी लड़की बी.ए. पास है और आपने मुझको कहा था कि सिर्फ मैट्रिक तक पढ़ी है।”यही सबसे बड़ा प्रमाण है। जिस उपलब्धि पर गर्व होना चाहिए था, उसे उन्होंने दोष की तरह छिपाया।
“गुस्सा तो मुझे बहुत आता है इनके दकियानूसी खयालों पर... मगर लड़की चाहते हैं ऐसी कि ज्यादा पढ़ी-लिखी न हो।” — और तुरंत बाद, “क्या करूँ, मजबूरी है। मतलब अपना है।”एक ही साँस में विरोध और समर्पण। विचार में वे रूढ़ि के विरुद्ध हैं, व्यवहार में उसके साथ।
बेटी के लिए पाउडर भिजवाना — “आजकल तो लड़की कितनी ही सुंदर हो, बिना टीम-टाम के भला कौन पूछता है? इसी मारे मैंने तो पौडर-वौडर उसके सामने रखा था।” (यह बात प्रेमा कहती है, पर व्यवस्था रामस्वरूप की है — “अच्छा तो उमा को जैसे हो तैयार कर लो!”)वे भी लड़की को दिखाने की चीज़ मान रहे हैं — वही सोच जिस पर वे दूसरों को दकियानूसी कहते हैं।
पूरे कमरे की सजावट — तख्त, धुली चादर, दरी, हारमोनियम-सितार, गुलदस्ते की झाड़-पोंछ, नाश्ता, मक्खन के लिए दौड़।दिखावा। घर को कुछ घंटों के लिए वह बना देना जो वह रोज़ नहीं है।
पर इस दिखावे को छिपाने की चेष्टा — प्रेमा को डाँटना, “तुम्हें कतई अपनी जबान पर काबू नहीं है... उन सब लोगों के सामने जिक्र और ढंग से होगा। मगर तुम तो अभी से सब-कुछ उगले देती हो।”दिखावा करना और फिर दिखावे को भी छिपाना — दोहरा पाखंड, जो द्वंद्व का सबसे साफ़ लक्षण है।
बेटी के गुणों की ‘प्रदर्शनी’ — “सुनाओ तो उमा एकाध गीत सितार के साथ”, “यह जो तसवीर टँगी हुई है, कुत्ते वाली, इसी ने खींची है”, “सिलाई तो सारे घर की इसी के जिम्मे रहती है, यहाँ तक कि मेरी कमीजें भी।”पिता बेटी की बोली लगाते से जान पड़ते हैं। उमा का ‘कुर्सी-मेज’ वाला उलाहना इसी दृश्य से निकलता है।
गोपालप्रसाद के स्त्री-विरोधी मज़ाक में साथ देना — “जी हाँ, और मर्द के दाढ़ी होती है, औरत के नहीं...! हूँ... हूँ... हँ...!”जिस सोच से वे भीतर-ही-भीतर लड़ रहे हैं, उसी पर हँसकर वे उसे मान्यता दे देते हैं।
निर्णायक क्षण में चुप्पी — गोपालप्रसाद पूछते हैं, “क्या तुम कालेज में पढ़ी हो?” और रंग-निर्देश है — “(रामस्वरूप चुप)”बेटी अकेले लड़ रही है और पिता एक शब्द नहीं बोलते। यहीं उनका द्वंद्व हार में बदल जाता है।
निष्कर्ष — रामस्वरूप बुरे आदमी नहीं हैं; वे कमज़ोर आदमी हैं। उनकी आधुनिकता बेटी को पढ़ाने तक जाती है, उसके पक्ष में खड़े होने तक नहीं। इसीलिए एकांकी में ‘रीढ़ की हड्डी’ का प्रश्न केवल शंकर पर लागू नहीं होता — रामस्वरूप की रीढ़ भी उतनी ही झुकी हुई है, और यह चोट लेखक ने बहुत चुपचाप की है।
प्र2.
2. ‘रीढ़ की हड्डी’ का संदर्भ दो अलग-अलग पात्रों के लिए भिन्न-भिन्न अर्थों में आया है, उनकी पहचान कीजिए और लिखिए।
उत्तर

एकांकी में ‘रीढ़ की हड्डी / बैकबोन’ शब्द दो बार आता है — दोनों बार शंकर के बारे में, पर बोलने वाले अलग हैं और अर्थ बिलकुल अलग।

पहला संदर्भदूसरा संदर्भ
कौन कहता हैगोपालप्रसाद — अपने बेटे शंकर सेउमा — गोपालप्रसाद से, शंकर के बारे में
पंक्ति“झुककर क्यों बैठते हो? ब्याह तय करने आए हो, कमर सीधी करके बैठो। तुम्हारे दोस्त ठीक कहते हैं कि शंकर की ‘बैकबोन’...”“घर जाकर ज़रा यह पता लगाइएगा कि आपके लाडले बेटे के रीढ़ की हड्डी भी है या नहीं— यानी बैकबोन, बैकबोन!”
अर्थशारीरिक — बैठने की मुद्रा, झुकी हुई कमर। रंग-निर्देश भी यही कहता है — “झुकी कमर इनकी खासियत है।”नैतिक — चरित्र की दृढ़ता, आत्म-सम्मान, अपनी बात पर खड़े होने का साहस।
कहने का भावझुँझलाहट और चिंता — पिता को डर है कि लड़का ‘पसंद’ न आएगा। वाक्य वे बीच में ही तोड़ देते हैं, क्योंकि दोस्तों का ताना दोहराना उन्हें भी अखरता है।तीखा व्यंग्य — वही ताना, वही शब्द, अब चरित्र पर। उमा पिता को उन्हीं के हथियार से उत्तर देती है।
प्रभावदृश्य का एक छोटा-सा हास्य-प्रसंग।एकांकी का चरम-बिंदु — इसके तुरंत बाद परदा गिरने की तैयारी हो जाती है, और यही वाक्य शीर्षक बन जाता है।
यह शिल्प क्यों सुंदर है: लेखक एक ही शब्द को शरीर से चरित्र तक ले जाता है। पहली बार वह मज़ाक जैसा लगता है, दूसरी बार वह घाव कर देता है। नाटक की भाषा में इसे अर्थ-विस्तार कहेंगे — शब्द वही रहता है, संदर्भ बदलने से उसका आकार कई गुना बढ़ जाता है। यही कारण है कि उमा का यह वाक्य केवल शंकर पर नहीं, उस पूरे समाज पर लागू हो जाता है जो लड़की का मोल-भाव करता है पर अपने बेटे के आचरण पर कोई प्रश्न नहीं उठाता।
ध्यान दीजिए: कुछ विद्यार्थी तीसरा संदर्भ भी जोड़ते हैं — बाबू रामस्वरूप, जो बेटी के पक्ष में एक शब्द नहीं बोल पाते और अंत में “कुर्सी पर धम से बैठ जाते हैं।” शब्द भले उनके लिए न आया हो, पर ‘रीढ़ की हड्डी’ का प्रश्न उन पर भी उतना ही खड़ा होता है। ऐसा उत्तर लिखते समय स्पष्ट कर दीजिए कि यह आपका निष्कर्ष है, पाठ का शब्द नहीं।
प्र3.
3. “मेरी समझ में तो ये पढ़ाई-लिखाई के जंजाल आते नहीं।” प्रेमा की इस सोच से उस समय की स्त्री-शिक्षा की स्थिति के विषय में क्या पता चलता है?
उत्तर

प्रेमा का यह एक वाक्य सन् 1939 के आसपास की स्त्री-शिक्षा की पूरी तस्वीर खींच देता है। उससे पाँच बातें साफ़ होती हैं —

  1. लड़की की पढ़ाई ‘जंजाल’ यानी झंझट मानी जाती थी। उसे उपलब्धि नहीं, घर के लिए खड़ी की गई एक मुसीबत समझा जाता था। प्रेमा का तर्क भी यही है — “सारे जतन करके तो हार गई। तुम्हीं ने उसे पढ़ा-लिखाकर इतना सिर चढ़ा रखा है।” यानी शिक्षा को लड़की के ‘बिगड़ने’ का कारण माना जाता था।
  2. शिक्षा की एक ‘हद’ तय थी। प्रेमा को आदर्श वही ज़माना लगता है जब — “‘आ-ई’ पढ़ ली, गिनती सीख ली और बहुत हुआ तो ‘स्त्री-सुबोधिनी’ पढ़ ली।” यानी अक्षर-ज्ञान, हिसाब और घर-गृहस्थी की शिक्षा देने वाली एक पुस्तक — इससे आगे लड़की के लिए कुछ ज़रूरी नहीं समझा जाता था। यही ‘हद’ गोपालप्रसाद भी बाँधते हैं — “बस हद से हद मैट्रिक-पास होनी चाहिए।”
  3. शिक्षा का मूल्य विवाह के बाज़ार से तय होता था। प्रेमा की असली शिकायत यही है — “इंट्रेंस ही पास करा लेते— लड़की अपने हाथ रहती, और इतनी परेशानी न उठानी पड़ती।” अर्थात् पढ़ाई अच्छी या बुरी इससे तय नहीं होती थी कि लड़की क्या बन गई, बल्कि इससे कि रिश्ता आसानी से मिला या नहीं।
  4. यह सोच केवल पुरुषों की नहीं थी। सबसे चुभने वाली बात यही है कि ऐसा कहने वाली एक स्त्री और एक माँ है। रूढ़ि तब सबसे मज़बूत होती है जब वह जिनके विरुद्ध है, उन्हीं के मन में बैठ जाए। प्रेमा के लिए बेटी की पढ़ाई गर्व नहीं, बोझ है — और इसका कारण यह नहीं कि वह निर्दयी है, बल्कि यह कि उसने अपने चारों ओर कभी कोई दूसरा उदाहरण देखा ही नहीं।
  5. स्त्री के पास अपनी उपलब्धि को सही ठहराने की भाषा नहीं थी। प्रेमा ‘स्त्री-सुबोधिनी’ की तुलना बी.ए.–एम.ए. से करती है — “सच पूछो तो ‘स्त्री-सुबोधिनी’ में ऐसी-ऐसी बातें लिखी हैं— ऐसी बातें कि क्या तुम्हारी बी.ए., एम.ए. की पढ़ाई में होंगी।” यह तुलना ही बताती है कि उस समय स्त्री के लिए ‘ज्ञान’ का अर्थ केवल गृहस्थी चलाने का ज्ञान था।
पीछे का सच: पुस्तक की भूमिका स्वयं बताती है कि “उस समय भारतीय समाज में शिक्षा और अन्य कार्यक्षेत्रों में स्त्रियों को समान अवसर नहीं मिलते थे।” प्रेमा की सोच उसी असमानता की उपज है। इसीलिए एकांकी उसे खलनायिका नहीं बनाता — वह भी उसी व्यवस्था की शिकार है, बस उसे इसका पता नहीं।
आज से जोड़िए: आज इसी वाक्य को उलटकर पढ़िए — जिस पढ़ाई को प्रेमा ‘जंजाल’ कहती है, वही उमा को वह आवाज़ देती है जिससे वह पूरे कमरे को चुप करा देती है। एकांकी का उत्तर प्रेमा के वाक्य में नहीं, उमा की उपस्थिति में है।
प्र4.
4. लेखक ने ‘रीढ़ की हड्डी’ शब्द को एकांकी के शीर्षक के रूप में क्यों चुना होगा? यदि आप इस एकांकी का दूसरा शीर्षक रखना चाहें, जो इसकी मुख्य बात को दर्शाए, तो वह क्या होगा और क्यों?
उत्तर

लेखक ने यह शीर्षक क्यों चुना होगा — चार कारण:

  1. यह एकांकी के चरम-बिंदु का शब्द है। अच्छा शीर्षक वहीं से उठाया जाता है जहाँ रचना अपने शिखर पर होती है। उमा का अंतिम वार यही है — “यानी बैकबोन, बैकबोन!” परदा गिरने से ठीक पहले बोला गया वाक्य दर्शक के कानों में सबसे देर तक गूँजता है।
  2. यह शब्द एक साथ दो अर्थ ढोता है। शरीर में रीढ़ की हड्डी शरीर को सीधा खड़ा रखती है; चरित्र में ‘रीढ़ की हड्डी’ आदमी को सीधा खड़ा रखती है। लेखक इसी दुहरेपन का लाभ उठाता है — पहली बार शब्द शंकर की झुकी कमर के लिए आता है, दूसरी बार उसके झुके चरित्र के लिए।
  3. यह पूरे एकांकी की कसौटी बन जाता है। शीर्षक पढ़ते ही दर्शक हर पात्र को इसी तराज़ू पर तौलने लगता है — शंकर की रीढ़ नहीं है; रामस्वरूप की रीढ़ झुक जाती है (“रामस्वरूप चुप”); गोपालप्रसाद के पास अकड़ है, रीढ़ नहीं; और रीढ़ केवल उमा में है, जिसका “मस्तक उठ जाता है।” एक शब्द से लेखक ने पूरे पात्र-मंडल को नाप दिया।
  4. यह व्यंग्य को धार देता है। ‘स्त्री-शिक्षा’ या ‘विवाह की समस्या’ जैसा सीधा शीर्षक उपदेश जैसा लगता। ‘रीढ़ की हड्डी’ शरीर-विज्ञान का शब्द है, जिसे नैतिक अर्थ में मोड़ देने से हँसी और चोट दोनों एक साथ पैदा होती हैं — और व्यंग्य की यही शक्ति है।

नमूना उत्तर — मेरा सुझाया शीर्षक: ‘कुर्सी-मेज़ नहीं’

क्यों: एकांकी की सबसे केंद्रीय पंक्ति उमा की यह है — “जब कुर्सी-मेज बिकती है तब दुकानदार कुर्सी-मेज से कुछ नहीं पूछता, सिर्फ खरीदार को दिखला देता है।” पूरा एकांकी इसी एक रूपक पर टिका है — लड़की को दुकान के सामान की तरह सजाना, दिखाना, नापना-तोलना। ‘कुर्सी-मेज़ नहीं’ शीर्षक उसी रूपक को उठाता है और साथ ही उमा का इनकार भी बोल देता है — मैं वस्तु नहीं हूँ। यह शीर्षक एकांकी की मुख्य बात (स्त्री की मनुष्यता) को सीधे पकड़ता है, जबकि ‘रीढ़ की हड्डी’ उसके परिणाम (चरित्र की परख) को पकड़ता है।

कुछ और सार्थक विकल्प, कारण सहित —

संभावित शीर्षकआधार-पंक्तियह क्या उभारेगा
नाप-तोल“हमारी बेइज्जती नहीं होती जो आप इतनी देर से नाप-तोल कर रहे हैं?”विवाह के लिए लड़की देखने की पूरी रस्म का व्यंग्यपूर्ण नाम। छोटा, तीखा और मंच पर याद रह जाने वाला।
खरीदार“ये जो महाशय मेरे खरीदार बनकर आए हैं...”ध्यान लड़के वालों की भूमिका पर टिकेगा — विवाह एक खरीद है, संबंध नहीं।
हद से हद मैट्रिक“बस हद से हद मैट्रिक-पास होनी चाहिए।”स्त्री-शिक्षा पर लगाई गई ‘हद’ ही मुख्य विषय बन जाएगी — व्यंग्य और भी सीधा हो जाएगा।
मस्तक उठ जाता है“उसके स्वर में तल्लीनता आ जाती है, यहाँ तक कि उसका मस्तक उठ जाता है।”यह शीर्षक निषेध की जगह उमा की जीत पर बल देगा — सकारात्मक, पर व्यंग्य की धार कम हो जाएगी।
शीर्षक चुनने की कसौटी: कोई भी शीर्षक सुझाते समय तीन बातें जाँचिए — (1) क्या वह रचना की मुख्य समस्या को छूता है? (2) क्या वह पाठ के भीतर से उठाया गया है, बाहर से चिपकाया हुआ नहीं? (3) क्या वह रचना पढ़ने के बाद और गहरा लगने लगता है? ‘रीढ़ की हड्डी’ तीनों कसौटियों पर खरा उतरता है — इसीलिए वह अब तक बदला नहीं गया।
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