प्र1.
नीचे दिए गए प्रश्नों पर कक्षा में चर्चा कीजिए और उनके उत्तर लिखिए— 1. बाबू रामस्वरूप समाज में आधुनिक व्यवहार का दिखावा करते हैं, जबकि उनके विचार रूढ़िवादी हैं। इस अंतर्द्वंद्व के उदाहरण एकांकी में से खोजकर लिखिए। (संकेत– उमा के साथ उनका व्यवहार, विवाह के लिए दिखावे करना किंतु इन प्रयासों को छिपाने की चेष्टा करना आदि।)
उत्तर
बाबू रामस्वरूप का अंतर्द्वंद्व यह है कि उनका दिमाग नई पीढ़ी के साथ है और उनके पैर पुरानी व्यवस्था में गड़े हुए हैं। वे जानते हैं कि क्या ठीक है, पर करते वही हैं जो समाज को स्वीकार है। एकांकी में इसके प्रमाण कदम-कदम पर बिखरे हैं —
| एकांकी में से उदाहरण | यह किस द्वंद्व को दिखाता है |
|---|---|
| बेटी को बी.ए. तक पढ़ाया — प्रेमा की शिकायत है, “तुम्हीं ने उसे पढ़ा-लिखाकर इतना सिर चढ़ा रखा है।” | यह उनका आधुनिक पक्ष है। उस ज़माने में बेटी को कॉलेज भेजना छोटी बात न थी। |
| पर उसी पढ़ाई को छिपा गए — गोपालप्रसाद अंत में कहते हैं, “आपकी लड़की बी.ए. पास है और आपने मुझको कहा था कि सिर्फ मैट्रिक तक पढ़ी है।” | यही सबसे बड़ा प्रमाण है। जिस उपलब्धि पर गर्व होना चाहिए था, उसे उन्होंने दोष की तरह छिपाया। |
| “गुस्सा तो मुझे बहुत आता है इनके दकियानूसी खयालों पर... मगर लड़की चाहते हैं ऐसी कि ज्यादा पढ़ी-लिखी न हो।” — और तुरंत बाद, “क्या करूँ, मजबूरी है। मतलब अपना है।” | एक ही साँस में विरोध और समर्पण। विचार में वे रूढ़ि के विरुद्ध हैं, व्यवहार में उसके साथ। |
| बेटी के लिए पाउडर भिजवाना — “आजकल तो लड़की कितनी ही सुंदर हो, बिना टीम-टाम के भला कौन पूछता है? इसी मारे मैंने तो पौडर-वौडर उसके सामने रखा था।” (यह बात प्रेमा कहती है, पर व्यवस्था रामस्वरूप की है — “अच्छा तो उमा को जैसे हो तैयार कर लो!”) | वे भी लड़की को दिखाने की चीज़ मान रहे हैं — वही सोच जिस पर वे दूसरों को दकियानूसी कहते हैं। |
| पूरे कमरे की सजावट — तख्त, धुली चादर, दरी, हारमोनियम-सितार, गुलदस्ते की झाड़-पोंछ, नाश्ता, मक्खन के लिए दौड़। | दिखावा। घर को कुछ घंटों के लिए वह बना देना जो वह रोज़ नहीं है। |
| पर इस दिखावे को छिपाने की चेष्टा — प्रेमा को डाँटना, “तुम्हें कतई अपनी जबान पर काबू नहीं है... उन सब लोगों के सामने जिक्र और ढंग से होगा। मगर तुम तो अभी से सब-कुछ उगले देती हो।” | दिखावा करना और फिर दिखावे को भी छिपाना — दोहरा पाखंड, जो द्वंद्व का सबसे साफ़ लक्षण है। |
| बेटी के गुणों की ‘प्रदर्शनी’ — “सुनाओ तो उमा एकाध गीत सितार के साथ”, “यह जो तसवीर टँगी हुई है, कुत्ते वाली, इसी ने खींची है”, “सिलाई तो सारे घर की इसी के जिम्मे रहती है, यहाँ तक कि मेरी कमीजें भी।” | पिता बेटी की बोली लगाते से जान पड़ते हैं। उमा का ‘कुर्सी-मेज’ वाला उलाहना इसी दृश्य से निकलता है। |
| गोपालप्रसाद के स्त्री-विरोधी मज़ाक में साथ देना — “जी हाँ, और मर्द के दाढ़ी होती है, औरत के नहीं...! हूँ... हूँ... हँ...!” | जिस सोच से वे भीतर-ही-भीतर लड़ रहे हैं, उसी पर हँसकर वे उसे मान्यता दे देते हैं। |
| निर्णायक क्षण में चुप्पी — गोपालप्रसाद पूछते हैं, “क्या तुम कालेज में पढ़ी हो?” और रंग-निर्देश है — “(रामस्वरूप चुप)”। | बेटी अकेले लड़ रही है और पिता एक शब्द नहीं बोलते। यहीं उनका द्वंद्व हार में बदल जाता है। |
निष्कर्ष — रामस्वरूप बुरे आदमी नहीं हैं; वे कमज़ोर आदमी हैं। उनकी आधुनिकता बेटी को पढ़ाने तक जाती है, उसके पक्ष में खड़े होने तक नहीं। इसीलिए एकांकी में ‘रीढ़ की हड्डी’ का प्रश्न केवल शंकर पर लागू नहीं होता — रामस्वरूप की रीढ़ भी उतनी ही झुकी हुई है, और यह चोट लेखक ने बहुत चुपचाप की है।