गंगा अध्याय 6 मेरे उत्तर मेरे तर्क

अद्यतन2026-09-06

प्र1.
निम्नलिखित प्रश्नों के सटीक उत्तर चुनिए और यह भी बताइए कि आपको ये उत्तर उपयुक्त क्यों लगते हैं? 1. एकांकी ‘रीढ़ की हड्डी’ का शीर्षक किसका प्रतीक है? (क) शरीर के एक आवश्यक अंग का (ख) व्यक्ति की ऊँचाई के आधार का (ग) आत्म-सम्मान और नैतिक दृढ़ता का (घ) शारीरिक शक्ति और परिश्रम का
उत्तर

सटीक उत्तर — (ग) आत्म-सम्मान और नैतिक दृढ़ता का

यह उत्तर क्यों उपयुक्त है: एकांकी का अंतिम और सबसे तीखा वाक्य ही शीर्षक की व्याख्या कर देता है — “घर जाकर ज़रा यह पता लगाइएगा कि आपके लाडले बेटे के रीढ़ की हड्डी भी है या नहीं— यानी बैकबोन, बैकबोन!” शंकर के शरीर में रीढ़ की हड्डी तो है ही; उमा जो नहीं पाती वह है चरित्र की सीध। इसी बात की तैयारी लेखक पहले ही कर देता है — रंग-निर्देश में शंकर का परिचय है “झुकी कमर इनकी खासियत है”, और गोपालप्रसाद स्वयं बेटे को टोकते हैं — “झुककर क्यों बैठते हो? ब्याह तय करने आए हो, कमर सीधी करके बैठो। तुम्हारे दोस्त ठीक कहते हैं कि शंकर की ‘बैकबोन’...” वाक्य वहीं टूट जाता है, पर बात पूरी हो जाती है। इसके ठीक उलट उमा है, जिसका मस्तक उठ जाता है — “उसके स्वर में तल्लीनता आ जाती है, यहाँ तक कि उसका मस्तक उठ जाता है।” झुकी कमर बनाम उठा हुआ मस्तक — यही इस एकांकी का प्रतीक-विधान है। इसलिए ‘रीढ़ की हड्डी’ हड्डी का नहीं, आत्म-सम्मान और नैतिक दृढ़ता का प्रतीक है।
विकल्पसही / ग़लतकारण
(क) शरीर के एक आवश्यक अंग काग़लतयह शब्द का शब्दकोशीय अर्थ है, प्रतीकार्थ नहीं। यदि शीर्षक केवल हड्डी की बात करता तो एकांकी में कोई व्यंग्य ही न बचता — और उमा का वाक्य मज़ाक नहीं, चोट है।
(ख) व्यक्ति की ऊँचाई के आधार काग़लतएकांकी में कहीं भी किसी पात्र की लंबाई-ऊँचाई चर्चा का विषय नहीं है। चर्चा का विषय है ‘कमर सीधी’ रखना, जो मुद्रा है, ऊँचाई नहीं।
(ग) आत्म-सम्मान और नैतिक दृढ़ता कासही ✓‘बैकबोन’ अंग्रेज़ी में भी दृढ़ता और स्वाभिमान का मुहावरा है। शंकर का होस्टल-प्रसंग पर चुप रह जाना और सिर्फ़ “बाबूजी, चलिए।” कह पाना इसी दृढ़ता के अभाव का प्रमाण है।
(घ) शारीरिक शक्ति और परिश्रम काग़लतशारीरिक ताकत की बात एकांकी में आती ज़रूर है — गोपालप्रसाद की ‘कचौड़ियाँ’ और ‘बालाई’ वाली शेखी — पर वह हास्य का प्रसंग है। उमा शंकर की ताकत पर नहीं, उसकी कायरता पर उँगली रखती है — “न आपके पुत्र की तरह ताक-झाँककर कायरता दिखाई है।”
प्र2.
2. ‘रीढ़ की हड्डी’ एकांकी में किस पर व्यंग्य किया गया है? (क) पात्रों की निर्धनता और लाचारी पर (ख) पात्रों की भाषा और हास्य पर (ग) विवाह और अशिक्षा पर (घ) समाज की अनुचित मान्यताओं पर
उत्तर

सटीक उत्तर — (घ) समाज की अनुचित मान्यताओं पर

यह उत्तर क्यों उपयुक्त है: एकांकी का हर बड़ा संवाद किसी-न-किसी सामाजिक मान्यता को पकड़कर उसका मज़ाक उड़ाता है। गोपालप्रसाद कहते हैं — “हमें ज्यादा पढ़ी-लिखी लड़की नहीं चाहिए... बस हद से हद मैट्रिक-पास होनी चाहिए” और उसे तर्क का जामा पहनाते हैं — “मोर के पंख होते हैं, मोरनी के नहीं; शेर के बाल होते हैं, शेरनी के नहीं।” यही आदमी ‘सुंदरता ज़रूरी है, चाहे पाउडर लगाकर हो’ कहता है और ‘खूबसूरती पर टैक्स’ का चुटकुला सुनाता है। दूसरी ओर प्रेमा की मान्यता है — “मेरी समझ में तो ये पढ़ाई-लिखाई के जंजाल आते नहीं।” और रामस्वरूप की मान्यता यह है कि बेटी का बी.ए. होना छिपाने की चीज़ है। ये सब व्यक्ति की नहीं, समाज की गढ़ी हुई मान्यताएँ हैं — और लेखक की चोट ठीक इन्हीं पर है। पुस्तक की भूमिका भी यही कहती है कि एकांकी “परंपरागत विवाह की व्यवस्था और स्त्रियों की शिक्षा को लेकर रूढ़िगत सोच पर चोट करती है।”
विकल्पसही / ग़लतकारण
(क) पात्रों की निर्धनता और लाचारी परग़लतकोई पात्र निर्धन है ही नहीं। गोपालप्रसाद स्वयं कहते हैं — “मकान-वकान से हैसियत भी बुरी नहीं मालूम होती।” घर में नौकर है, हारमोनियम और सितार हैं, नाश्ते में मिठाई-नमकीन-फल-चाय-टोस्ट हैं। लाचारी है भी तो सामाजिक है, आर्थिक नहीं।
(ख) पात्रों की भाषा और हास्य परग़लतभाषा और हास्य यहाँ व्यंग्य के औज़ार हैं, निशाना नहीं। ‘पौडर-वौडर’, ‘टोस्ट-वोस्ट’ पर हम हँसते ज़रूर हैं, पर हँसी का लक्ष्य पात्र की बोली नहीं, उसकी सोच है।
(ग) विवाह और अशिक्षा परग़लत (उलटा भी)एकांकी विवाह-संस्था के विरुद्ध नहीं है, वह विवाह की मंडी के विरुद्ध है। और वह अशिक्षा पर व्यंग्य नहीं करता — वह उन लोगों पर व्यंग्य करता है जो लड़की की शिक्षा को दोष मानते हैं। यानी यह विकल्प बात को ठीक उलटकर रख देता है।
(घ) समाज की अनुचित मान्यताओं परसही ✓‘ऊँची तालीम सिर्फ़ मर्दों के लिए है’, ‘लड़की सुंदर होनी चाहिए’, ‘ज़्यादा पढ़ी लड़की नखरे करेगी’ — ये तीनों मान्यताएँ एकांकी में नाम लेकर तोड़ी जाती हैं।
प्र3.
3. “घर जाकर ज़रा यह पता लगाइएगा कि आपके लाडले बेटे के रीढ़ की हड्डी भी है या नहीं” यह वाक्य शंकर की किस छवि को उजागर करता है? (क) नैतिक साहस की कमी और चारित्रिक दुर्बलता (ख) अनुभव और विवेक की कमी (ग) चारित्रिक दृढ़ता और शारीरिक दुर्बलता (घ) उदासीनता और एकाकीपन
उत्तर

सटीक उत्तर — (क) नैतिक साहस की कमी और चारित्रिक दुर्बलता

यह उत्तर क्यों उपयुक्त है: यह वाक्य उमा उस क्षण कहती है जब वह शंकर का पिछला कारनामा उजागर कर चुकी है — “अभी पिछली फरवरी में ये लड़कियों के होस्टल के इर्द-गिर्द क्यों घूम रहे थे, और वहाँ से कैसे भगाए गए थे!” इस आरोप पर शंकर एक शब्द भी अपने बचाव में नहीं कहता; वह केवल इतना कह पाता है — “बाबूजी, चलिए।” जो व्यक्ति अपना पक्ष तक नहीं रख सकता, उसमें नैतिक साहस कहाँ? उमा इसी को ‘कायरता’ कहती है — “न आपके पुत्र की तरह ताक-झाँककर कायरता दिखाई है।” लेखक ने पहले ही संकेत दे दिया था — शंकर “खीस निपोरने वाले नौजवानों में से है”, उसकी “आवाज़ पतली है और खिसियाहट-भरी”, वह उमा को “आँखें छिपाकर” देखता है, और अपने विवाह तक के बारे में उसकी कोई राय नहीं — हर बात उसका पिता बोलता है। यही चारित्रिक दुर्बलता है।
विकल्पसही / ग़लतकारण
(क) नैतिक साहस की कमी और चारित्रिक दुर्बलतासही ✓होस्टल-प्रसंग पर चुप्पी, पिता के पीछे छिपना, आँखें चुराना, और अंत में बिना कुछ कहे चले जाना — चारों प्रमाण एक ही ओर संकेत करते हैं।
(ख) अनुभव और विवेक की कमीग़लतशंकर बी.एससी. कर चुका है और मेडिकल कॉलेज का छात्र है; ‘टैक्स’ जैसे विषय पर टिप्पणी भी करता है। उसमें अनुभव या समझ की कमी नहीं — कमी साहस की है। उमा भी उसकी बुद्धि पर नहीं, उसके आचरण पर प्रश्न उठाती है।
(ग) चारित्रिक दृढ़ता और शारीरिक दुर्बलताग़लतयह विकल्प दोनों बातें उलट देता है। चारित्रिक दृढ़ता तो उसमें है ही नहीं; और शारीरिक दुर्बलता (एक साल की बीमारी) पर एकांकी व्यंग्य नहीं करता — उसे तो गोपालप्रसाद स्वयं सफ़ाई के रूप में पेश करते हैं।
(घ) उदासीनता और एकाकीपनग़लतशंकर उदासीन नहीं है — वह उमा को “आँखें छिपाकर” देखता है, हँसी में साथ देता है, बातचीत में शामिल होता है। और एकाकीपन का तो प्रसंग ही नहीं; वह पूरे समय पिता के साथ है।
प्र4.
4. “जी हाँ, मैं कॉलेज में पढ़ी हूँ। मैंने बी.ए. पास किया है।” उमा की दृष्टि में शिक्षा प्राप्त करने का सही अर्थ है? (क) बड़ी-बड़ी डिग्री प्राप्त करना (ख) कॉलेज में पढ़ना और नौकरी पाना (ग) माता-पिता और पति को प्रसन्न रखना (घ) आत्मबल और स्वतंत्र विचार रखना
उत्तर

सटीक उत्तर — (घ) आत्मबल और स्वतंत्र विचार रखना

यह उत्तर क्यों उपयुक्त है: उमा अपनी डिग्री का बखान नहीं करती — वह उसे तभी बताती है जब उसे अपने सम्मान की रक्षा करनी पड़ती है, और उसी साँस में जोड़ देती है — “कोई पाप नहीं किया, कोई चोरी नहीं की... मुझे अपनी इज्जत— अपने मान का खयाल तो है।” यानी उसके लिए शिक्षा का प्रमाण डिग्री का काग़ज़ नहीं, वह दृष्टि है जो उसे यह देखने की शक्ति देती है कि उसके साथ क्या हो रहा है — “जब कुर्सी-मेज बिकती है तब दुकानदार कुर्सी-मेज से कुछ नहीं पूछता, सिर्फ खरीदार को दिखला देता है।” और वह साहस जो उसे बड़ों के सामने, अपने ही घर में, यह कहने देता है — “क्या वे बेबस भेड़-बकरियाँ हैं, जिन्हें कसाई अच्छी तरह देख-भालकर खरीदते हैं?” ध्यान दीजिए, पूरा दृश्य इसी विरोध पर टिका है: घर के सब लोग चुप हैं (“रामस्वरूप चुप”), केवल पढ़ी-लिखी लड़की बोल पाती है। यही आत्मबल और स्वतंत्र विचार है।
विकल्पसही / ग़लतकारण
(क) बड़ी-बड़ी डिग्री प्राप्त करनाग़लतयदि डिग्री ही लक्ष्य होती तो उमा उसे शुरू में ही गर्व से बताती। वह तो अंत तक चुप रहती है — “(चुप)”, “उसी तरह गर्दन झुकाए” — और डिग्री का उल्लेख भी सफ़ाई के रूप में करती है, शेखी के रूप में नहीं।
(ख) कॉलेज में पढ़ना और नौकरी पानाग़लतनौकरी की बात एकांकी में लड़के वाले उठाते हैं — “कोई नौकरी तो करानी नहीं।” उमा इस बिंदु पर एक शब्द भी नहीं कहती; उसका पूरा विरोध सम्मान के प्रश्न पर है, आजीविका के प्रश्न पर नहीं।
(ग) माता-पिता और पति को प्रसन्न रखनाग़लतयह तो ठीक वही सोच है जिसे उमा तोड़ती है। पिता के इशारे (“रामस्वरूप इशारे के लिए खाँसते हैं”) और आदेश (“जवाब दो, उमा!”) के बावजूद वह वही कहती है जो सच है।
(घ) आत्मबल और स्वतंत्र विचार रखनासही ✓“हल्की लेकिन मजबूत आवाज़ में” — यह रंग-निर्देश ही उत्तर है। शिक्षा ने उसे ऊँची आवाज़ नहीं, मज़बूत आवाज़ दी है।
प्र5.
5. गोपालप्रसाद और रामस्वरूप में क्या-क्या समानताएँ हैं? (क) दोनों प्रगतिशील हैं और रूढ़ियों को नकारते हैं। (ख) दोनों दिखावे और परंपरा के शिकार हैं। (ग) दोनों शिक्षा और रूढ़ियों के समर्थक हैं। (घ) दोनों संगीत और स्वादिष्ट भोजन के प्रेमी हैं।
उत्तर

सटीक उत्तर — (ख) दोनों दिखावे और परंपरा के शिकार हैं।

यह उत्तर क्यों उपयुक्त है: दोनों पढ़े-लिखे हैं, दोनों आधुनिक दिखना चाहते हैं, और दोनों अंततः परंपरा के आगे झुक जाते हैं।
दिखावा — रामस्वरूप का पूरा घर एक ‘सेट’ की तरह सजाया जाता है — तख्त, धुली हुई चादर, कोने की दरी, हारमोनियम और सितार, गुलदस्ते की झाड़-पोंछ, मक्खन के लिए भागदौड़, “विलायती चाय पसंद है या हिंदुस्तानी?” और बेटी के लिए पाउडर तक — प्रेमा के शब्दों में, “आजकल तो लड़की कितनी ही सुंदर हो, बिना टीम-टाम के भला कौन पूछता है?” — पर आदेश रामस्वरूप का ही था, “ज़रा ठीक-ठाक करके नीचे लाना।” उधर गोपालप्रसाद पुराने ज़माने की शेखी बघारते हैं — “बारह घंटे की ‘सिटिंग’ हो गई, बारह घंटे!” — और अपनी आधुनिकता का प्रमाण यह देते हैं कि वे वकील हैं और सभा-सोसाइटियों में जाते हैं।
परंपरा के शिकार — रामस्वरूप को गोपालप्रसाद के “दकियानूसी खयालों पर” गुस्सा आता है, फिर भी वे कहते हैं — “क्या करूँ, मजबूरी है। मतलब अपना है” — और बेटी की डिग्री छिपा जाते हैं। गोपालप्रसाद खुले-आम कहते हैं — “ऊँची तालीम भी ऐसी चीजों में से एक है” जो “सिर्फ मर्दों के लिए” हैं। दोनों की सबसे बड़ी समानता यही है कि दोनों लड़की को व्यक्ति नहीं, सौदे की चीज़ मानते हैं — एक बेचने की तैयारी करता है, दूसरा नाप-तोल करता है। इसीलिए उमा दोनों को एक ही वाक्य में लपेट लेती है — “हमारी बेइज्जती नहीं होती जो आप इतनी देर से नाप-तोल कर रहे हैं?”
विकल्पसही / ग़लतकारण
(क) दोनों प्रगतिशील हैं और रूढ़ियों को नकारते हैं।ग़लतरूढ़ि को नकारता तो कोई भी नहीं। रामस्वरूप उससे डरते हैं और गोपालप्रसाद उसे तर्क देकर सही ठहराते हैं।
(ख) दोनों दिखावे और परंपरा के शिकार हैं।सही ✓दिखावे का प्रमाण — सजा हुआ कमरा, पाउडर, झूठ; परंपरा का प्रमाण — ‘मैट्रिक तक पढ़ी’ का सौदा और जायचा मिलाने की रस्म।
(ग) दोनों शिक्षा और रूढ़ियों के समर्थक हैं।ग़लत (छलावा विकल्प)यह विकल्प आधा सच जोड़कर बनाया गया है। गोपालप्रसाद लड़कियों की शिक्षा के समर्थक हैं ही नहीं — “क्या लड़कों की पढ़ाई और लड़कियों की पढ़ाई एक बात है?” और रामस्वरूप बेटी को पढ़ाकर भी उस शिक्षा को छिपाते हैं, इसलिए वे भी व्यवहार में उसके समर्थक नहीं ठहरते। अतः ‘शिक्षा के समर्थक’ दोनों की साझी विशेषता नहीं है।
(घ) दोनों संगीत और स्वादिष्ट भोजन के प्रेमी हैं।ग़लतयह बात पाठ से ही कट जाती है। गोपालप्रसाद गीत बीच में ही रुकवा देते हैं — “नहीं-नहीं साहब, काफी है” — और खाने से इनकार करते हैं — “नाश्ता ही तो करना था साहब, कोई पेट तो भरना था नहीं... टोस्ट-वोस्ट मैं खाता भी नहीं।” यह विकल्प वैसे भी बहुत छोटी बात है, चरित्र की समानता नहीं।
प्र6.
6. इस एकांकी की संवाद शैली मुख्यतः कैसी है? (क) औपचारिक और शुष्क (ख) स्वाभाविक और व्यंग्यपूर्ण (ग) काव्यात्मक और प्रश्नात्मक (घ) भावुक और संक्षिप्त
उत्तर

सटीक उत्तर — (ख) स्वाभाविक और व्यंग्यपूर्ण

यह उत्तर क्यों उपयुक्त है: स्वाभाविक इसलिए कि संवाद ठीक वैसे ही हैं जैसे उस समय का शहरी मध्यवर्ग बोलता था — हिंदी, उर्दू और अंग्रेज़ी घुली-मिली — “इधर तशरीफ़ लाइए”, “यह सब आप क्या तकल्लुफ़ करते हैं!”, “‘बिजनेस’ की बातचीत हो जाए”, “‘वीक-एंड’ में चला आया था”, “एकाध साल का ‘मार्जिन’ रखता हूँ।” बोलचाल के पुनरुक्त युग्म भी वैसे ही हैं — ‘पौडर-वौडर’, ‘टोस्ट-वोस्ट’, ‘पेंटिंग-वेंटिंग’, ‘इनाम-विनाम’ — और हर पात्र की अपनी अलग लय है: रामस्वरूप का ‘हँ-हँ-हँ’, शंकर का ‘जी...’, प्रेमा की झुँझलाहट।
व्यंग्यपूर्ण इसलिए कि लगभग हर हँसी के नीचे एक चोट छिपी है — “खूबसूरती पर टैक्स!”, “मोर के पंख होते हैं, मोरनी के नहीं”, “बाप सेर है तो लड़का सवा सेर”, और सबसे बढ़कर वह अंतिम पंक्ति जिसमें रतन नाश्ते का मक्खन लेकर आता है — “बाबूजी, मक्खन!” — जब सौदा टूट चुका है। यही दो गुण मिलकर इस एकांकी की शैली बनाते हैं।
विकल्पसही / ग़लतकारण
(क) औपचारिक और शुष्कग़लतऔपचारिकता है ज़रूर, पर वह स्वयं हँसी का विषय है — “आप तो मुझे काँटों में घसीटने लगे।” शुष्क तो यह भाषा कहीं भी नहीं; वह मुहावरों और चुटकियों से भरी है।
(ख) स्वाभाविक और व्यंग्यपूर्णसही ✓बोलचाल की सहज हिंदुस्तानी + हर संवाद में छिपी चोट। यही एकांकी को मंच पर जीवंत बनाती है।
(ग) काव्यात्मक और प्रश्नात्मकग़लतपूरे एकांकी में काव्य केवल एक जगह है — मीरा का गीत ‘मेरे तो गिरधर गोपाल दूसरो न कोई’ — और वह उद्धृत है, संवाद नहीं। प्रश्न भी हैं, पर वे व्यंग्य के प्रश्न हैं, दार्शनिक नहीं।
(घ) भावुक और संक्षिप्तग़लतभावुकता केवल अंतिम दृश्य में आती है, जब उमा की “खामोशी सिसकियों में तबदील हो जाती है।” और संवाद संक्षिप्त तो हैं ही नहीं — गोपालप्रसाद के पुराने ज़माने वाले भाषण कई-कई पंक्तियों के हैं।
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