गंगा अध्याय 6 खोजबीन

अद्यतन2026-09-06

प्र1.
नीचे दिए गए लिंक का प्रयोग करके आप एकांकी विधा और रीढ़ की हड्डी एकांकी के विषय में और अधिक जान-समझ सकते हैं— एकांकी; रीढ़ की हड्डी
उत्तर

पुस्तक ने यहाँ दो विषय सुझाए हैं और उनके लिए लिंक (QR कोड) दिए हैं। इन्हें केवल देख लेना पर्याप्त नहीं — देखकर नोट बनाइए। नीचे दोनों के लिए यह दिया गया है कि क्या खोजना है और कक्षा में क्या लाना है।

विषयक्या खोजें / देखेंकक्षा में क्या प्रस्तुत करें
1. एकांकी (विधा)एकांकी की परिभाषा और उसके तत्व — कथावस्तु, पात्र, संवाद, देश-काल/परिवेश, भाषा-शैली, उद्देश्य और रंग-निर्देश। यह भी देखिए कि एकांकी नाटक से किस तरह अलग है (एक अंक, एक ही समस्या, थोड़े पात्र, कम समय, तेज़ गति, चौंकाने वाला अंत)। हिंदी के प्रमुख एकांकीकार — भुवनेश्वर (कारवाँ), रामकुमार वर्मा (दीपदान, रेशमी टाई), उपेंद्रनाथ ‘अश्क’, विष्णु प्रभाकर और जगदीशचंद्र माथुर स्वयं।एक तुलना-चार्ट बनाइए — बाईं ओर ‘कहानी’, दाईं ओर ‘एकांकी’, और आठ पंक्तियों में अंतर। साथ में किसी एक और एकांकी का नाम, उसका लेखक और उसकी एक-पंक्ति की समस्या लिखिए।
2. ‘रीढ़ की हड्डी’ एकांकीइसका मंचन या पाठ (audio) सुनिए और ध्यान दीजिए कि कलाकार संवाद-निर्देशों को स्वर से कैसे निभाते हैं — रामस्वरूप का ‘हँ-हँ-हँ’, गोपालप्रसाद की ‘जोशीली आवाज़’, उमा की ‘हल्की लेकिन मजबूत आवाज़’। यह भी देखिए कि निर्देशक ने मंच-सज्जा में क्या बदला। साथ ही जगदीशचंद्र माथुर की अन्य कृतियों — भोर का तारा, कोणार्क, ओ मेरे सपने — के बारे में पढ़िए।एक समीक्षा-पर्चा (लगभग 150 शब्द) लिखिए — प्रस्तुति में कौन-सा दृश्य सबसे प्रभावी लगा, किस पात्र का अभिनय सबसे सटीक था, और यदि आप निर्देशक होते तो क्या बदलते। साथ में एक पोस्टर बनाइए जिस पर एकांकी का नाम, पात्र-सूची और वह एक पंक्ति हो जो आपके अनुसार पूरे एकांकी का सार है।
खोजबीन का तरीका: केवल इंटरनेट पर मत रुकिए। (1) विद्यालय के पुस्तकालय से एकांकी-संग्रह लीजिए और एक और एकांकी पढ़िए। (2) घर के बड़ों से पूछिए कि उनके समय में विवाह तय करने की रस्म कैसी होती थी — उत्तर लिखकर लाइए; यह इस पाठ का सबसे जीवंत ‘स्रोत’ होगा। (3) हर स्रोत का नाम अपनी कॉपी में लिख लीजिए — यही आपकी संदर्भ-सूची होगी।
क्यों करें: ‘रीढ़ की हड्डी’ को पूरी तरह समझने के लिए यह जानना ज़रूरी है कि यह एकांकी है — यानी लेखक के पास न पन्नों का विस्तार था, न कई दृश्यों की छूट। उसे सब कुछ एक कमरे में, एक बैठक में और लगभग एक घंटे में कहना था। जब आप यह जान लेंगे, तब समझ आएगा कि हर संवाद कितना नपा-तुला है और अंतिम पंक्ति — “बाबूजी, मक्खन!” — कितनी सोच-समझकर वहाँ रखी गई है।
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