प्र1.
आप अपने विद्यालय एवं सार्वजनिक पुस्तकालय में जाते हैं। हो सकता है, आपको कभी कोई पुस्तक फटी हुई मिली हो या उसमें से कुछ पृष्ठ गायब हों अथवा उसमें पेन से निशान लगे हों— • ऐसा होने के पीछे क्या कारण हो सकते हैं?
उत्तर
इसके कारण दो तरह के होते हैं — जान-बूझकर की गई हानि और असावधानी से हुई हानि। निबंध में दिया गया जापान का उदाहरण पहली कोटि का है।
| कोटि | कारण | टिप्पणी |
|---|---|---|
| जान-बूझकर | ‘मुझे यही पृष्ठ चाहिए’ की स्वार्थ-वृत्ति — चित्र, मानचित्र, सूत्र या प्रश्न-पत्र वाला पन्ना फाड़ लेना। | यही निबंध वाली घटना है — “ये चित्र इस युवक ने पुस्तक में से निकाल लिए और पुस्तक वापस कर आया।” |
| दूसरों को वंचित करने की भावना — प्रतियोगिता में आगे रहने के लिए पन्ने हटा देना। | यह चोरी से भी बुरा है, क्योंकि इसमें किसी को नुकसान पहुँचाने का इरादा है। | |
| पेन से रेखांकन और नोट लिखना — “मैं तो केवल जरूरी पंक्ति दबा रहा हूँ।” | अगला पाठक उसी लकीर को पढ़ने को मजबूर हो जाता है; पुस्तक अपनी तटस्थता खो देती है। | |
| बदले या शरारत की भावना — नाम लिखना, चित्र बनाना, पन्ने मोड़ना। | ‘सौंदर्य-बोध’ पर वही चोट, जो दीवार पर नाम लिखने से लगती है। | |
| असावधानी से | ठूँस-ठूँसकर बस्ते में रखना, गीले हाथ, खाते-पीते पढ़ना। | जिल्द टूटती है, पन्ने चिपकते हैं। |
| पन्ना मोड़कर निशान लगाना (bookmark के बजाय)। | बार-बार मुड़ा पन्ना वहीं से फट जाता है। | |
| पुस्तकालय की व्यवस्था की कमी — जिल्दबंदी न होना, दीमक और नमी, अलमारी में ठूँसकर रखना, समय पर मरम्मत न होना। | यह पाठक का नहीं, व्यवस्था का दोष है — और इसे भी ठीक किया जा सकता है। | |
| छोटे भाई-बहनों के हाथ लग जाना, यात्रा में भीग जाना। | घर ले जाई गई पुस्तक की जिम्मेदारी लेने वाले की होती है। |
मूल कारण एक ही है: पाठक यह भूल जाता है कि पुस्तकालय की पुस्तक सार्वजनिक संपत्ति है — यानी उसकी अपनी भी है और सबकी भी। जो अपनी पुस्तक को फाड़कर नहीं रखता, वह पुस्तकालय की पुस्तक क्यों फाड़ देता है? क्योंकि वहाँ ‘मेरा’ का भाव नहीं जागता। निबंध इसी भाव को जगाना चाहता है — “मैं अपना देश हूँ।”