गंगा अध्याय 7 हमारा पुस्तकालय

अद्यतन2026-09-06

प्र1.
आप अपने विद्यालय एवं सार्वजनिक पुस्तकालय में जाते हैं। हो सकता है, आपको कभी कोई पुस्तक फटी हुई मिली हो या उसमें से कुछ पृष्ठ गायब हों अथवा उसमें पेन से निशान लगे हों— • ऐसा होने के पीछे क्या कारण हो सकते हैं?
उत्तर

इसके कारण दो तरह के होते हैं — जान-बूझकर की गई हानि और असावधानी से हुई हानि। निबंध में दिया गया जापान का उदाहरण पहली कोटि का है।

कोटिकारणटिप्पणी
जान-बूझकर‘मुझे यही पृष्ठ चाहिए’ की स्वार्थ-वृत्ति — चित्र, मानचित्र, सूत्र या प्रश्न-पत्र वाला पन्ना फाड़ लेना।यही निबंध वाली घटना है — “ये चित्र इस युवक ने पुस्तक में से निकाल लिए और पुस्तक वापस कर आया।”
दूसरों को वंचित करने की भावना — प्रतियोगिता में आगे रहने के लिए पन्ने हटा देना।यह चोरी से भी बुरा है, क्योंकि इसमें किसी को नुकसान पहुँचाने का इरादा है।
पेन से रेखांकन और नोट लिखना — “मैं तो केवल जरूरी पंक्ति दबा रहा हूँ।”अगला पाठक उसी लकीर को पढ़ने को मजबूर हो जाता है; पुस्तक अपनी तटस्थता खो देती है।
बदले या शरारत की भावना — नाम लिखना, चित्र बनाना, पन्ने मोड़ना।‘सौंदर्य-बोध’ पर वही चोट, जो दीवार पर नाम लिखने से लगती है।
असावधानी सेठूँस-ठूँसकर बस्ते में रखना, गीले हाथ, खाते-पीते पढ़ना।जिल्द टूटती है, पन्ने चिपकते हैं।
पन्ना मोड़कर निशान लगाना (bookmark के बजाय)।बार-बार मुड़ा पन्ना वहीं से फट जाता है।
पुस्तकालय की व्यवस्था की कमी — जिल्दबंदी न होना, दीमक और नमी, अलमारी में ठूँसकर रखना, समय पर मरम्मत न होना।यह पाठक का नहीं, व्यवस्था का दोष है — और इसे भी ठीक किया जा सकता है।
छोटे भाई-बहनों के हाथ लग जाना, यात्रा में भीग जाना।घर ले जाई गई पुस्तक की जिम्मेदारी लेने वाले की होती है।
मूल कारण एक ही है: पाठक यह भूल जाता है कि पुस्तकालय की पुस्तक सार्वजनिक संपत्ति है — यानी उसकी अपनी भी है और सबकी भी। जो अपनी पुस्तक को फाड़कर नहीं रखता, वह पुस्तकालय की पुस्तक क्यों फाड़ देता है? क्योंकि वहाँ ‘मेरा’ का भाव नहीं जागता। निबंध इसी भाव को जगाना चाहता है — “मैं अपना देश हूँ।”
प्र2.
• ऐसा न हो, इसके लिए क्या किया जा सकता है?
उत्तर

उपाय तीन स्तरों पर करने होंगे — व्यक्ति, पुस्तकालय और विद्यालय/समाज। केवल नियम लगाने से काम नहीं चलेगा; भाव जगाना पड़ेगा।

स्तरक्या किया जाए
मैं स्वयंपुस्तक लेने से पहले उसके पन्ने गिनकर/देखकर लूँ और लौटाते समय भी; कभी पेन से न लिखूँ — केवल अलग कागज़ पर नोट बनाऊँ; पन्ना मोड़ने के बजाय पर्ची लगाऊँ; साफ़ हाथों से, बिना खाए-पीए पढ़ूँ; कवर चढ़ाकर रखूँ; और यदि कोई पन्ना पहले से फटा है तो लेते समय ही बता दूँ।
पुस्तकालयप्रवेश-निर्गम रजिस्टर और सदस्य-कार्ड; जिल्दबंदी और मरम्मत की मासिक व्यवस्था; बहुमाँग वाली पुस्तकों की एक ‘केवल पढ़ने की प्रति’ (reference copy) जो बाहर न जाए; दुर्लभ चित्रों/मानचित्रों की छायाप्रति सुविधा ताकि किसी को पन्ना फाड़ने की जरूरत ही न पड़े; दीमक-नमी से बचाव; और लौटाई गई पुस्तक की उसी समय जाँच।
विद्यालय/समाजविद्यार्थियों की ‘पुस्तक-मित्र’ समिति जो हर महीने फटी पुस्तकें जोड़े; ‘पुस्तक-दान दिवस’; प्रार्थना-सभा में पुस्तकालय-नियमों की चर्चा; अच्छी तरह पुस्तक लौटाने वाले पाठक का सार्वजनिक अभिनंदन (दंड से अधिक असर प्रशंसा का होता है); और जापान वाली घटना को कक्षा में पढ़ाना — एक कहानी सौ उपदेशों पर भारी पड़ती है।
ध्यान दीजिए: जुर्माना अंतिम उपाय है, पहला नहीं। पुस्तकालय भरोसे पर चलता है — वहाँ ताला हर पुस्तक पर नहीं लगाया जा सकता। इसलिए सबसे कारगर उपाय है — पाठक में यह भाव जगाना कि यह पुस्तक उसकी अपनी है, और उसके बाद बीसियों लोगों की भी।
प्र3.
• आप पुस्तकालय में किन नियमों का पालन करते हैं, उन नियमों का पालन करना क्यों अनिवार्य है? इस पर अपनी कक्षा में चर्चा कीजिए और लिखिए।
उत्तर
नियमपालन क्यों अनिवार्य है
1. शांति बनाए रखनापुस्तकालय एकाग्रता का स्थान है। एक व्यक्ति की ऊँची आवाज़ बीस लोगों का ध्यान तोड़ देती है — यानी एक की असुविधा नहीं, बीस की हानि।
2. रजिस्टर में प्रविष्टि और कार्ड से पुस्तक लेनाइससे यह पता रहता है कि कौन-सी पुस्तक किसके पास है। हिसाब न हो तो पुस्तक ‘खो जाती’ है और अगला पाठक वंचित रह जाता है।
3. निश्चित तिथि पर लौटानापुस्तकालय की एक प्रति बीस पाठकों में बारी-बारी घूमती है। देर करने वाला अपना समय नहीं, दूसरों का समय ले रहा होता है।
4. पुस्तक पर कुछ न लिखना, पन्ने न फाड़नायह सार्वजनिक संपत्ति है — मूल कर्तव्य (झ) इसी की रक्षा कहता है। और जापान वाली घटना बताती है कि इसका दंड कभी-कभी पूरे देश को भुगतना पड़ता है।
5. पढ़ी हुई पुस्तक यथास्थान रखना (या निर्धारित ट्रे में)गलत स्थान पर रखी पुस्तक ‘खोई हुई’ के बराबर हो जाती है — वह अलमारी में तो है, पर किसी को मिलेगी नहीं।
6. खाना-पीना न ले जानातेल, पानी और टुकड़े पन्ने खराब करते हैं और चींटी-कीड़े बुलाते हैं। एक बूँद चाय एक पूरे पन्ने को पढ़ने लायक नहीं छोड़ती।
7. मोबाइल मौन (silent) पर रखनायह वही ‘सुरुचि’ है जिसकी बात निबंध करता है — दूसरों की एकाग्रता का सम्मान।
8. क्षति की सूचना स्वयं देनाईमानदारी से बताई गई गलती सुधर जाती है; छिपाई गई गलती अगले पाठक के सिर आ पड़ती है और उस पर आरोप लगता है।
इन सब नियमों के पीछे एक ही सिद्धांत है: पुस्तकालय ‘साझी संपत्ति’ है, और साझी संपत्ति तभी चलती है जब हर व्यक्ति अपने सुख से थोड़ा-सा त्याग करे — थोड़ी चुप्पी, थोड़ी सावधानी, थोड़ा अनुशासन। यही ‘मैं और मेरा देश’ का लघु रूप है: पुस्तकालय एक छोटा देश है और पाठक उसका नागरिक।
कक्षा-चर्चा के लिए एक प्रश्न: यदि पुस्तकालय में कोई नियम-पालक न हो — न लाइब्रेरियन, न रजिस्टर — तब भी क्या आप ये नियम मानेंगे? जो ‘हाँ’ कहता है, वह समझ गया कि नियम डर से नहीं, भाव से निभाए जाते हैं।
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