प्र1.
इस निबंध में स्वतंत्रता सेनानी लाला लाजपत राय का उल्लेख किया गया है। इसमें नागरिक के कर्तव्य एवं अधिकारों की बात की गई है। अब आप लाला लाजपत राय के नीचे दिए गए कुछ विचारों को पढ़िए। — ‘आत्मनिर्भरता’: “प्रगति का तात्पर्य है स्वतंत्रता की ओर प्रस्थान। तुम्हारे पूर्वजों ने तुम्हें यही सिखाया है कि जैसे ही तुममें पर-निर्भरता पनपती है, स्वतंत्रता पलायन कर जाती है। यदि पर-निर्भरता को पूर्णरूपेण नहीं त्याग सकते तो एक सीमा तक कम तो कर ही सकते हो। आत्मनिर्भरता और आत्मविश्वास की आदत डालो, किसी को नाराज करने या परेशान करने के इरादे से नहीं, वरन पुरुषार्थ की भावना से ऐसा करो।” — यूरोप से भारत वापसी पर स्वागत के अवसर पर (बंबई, 20 फरवरी 1920)
उत्तर
भाव — लालाजी कहते हैं कि प्रगति और स्वतंत्रता एक ही दिशा के दो नाम हैं। जिस क्षण किसी व्यक्ति या राष्ट्र में पर-निर्भरता (दूसरों पर आश्रित रहने की आदत) पनपती है, उसी क्षण स्वतंत्रता चुपचाप खिसक जाती है। इसलिए आत्मनिर्भरता और आत्मविश्वास को आदत बनाना चाहिए — और वह भी किसी के प्रति द्वेष से नहीं, बल्कि पुरुषार्थ यानी अपने परिश्रम पर भरोसे की भावना से।
| वाक्यांश | उसका आशय |
|---|---|
| “प्रगति का तात्पर्य है स्वतंत्रता की ओर प्रस्थान” | जो कदम आपको अधिक स्वतंत्र बनाए, वही सच्ची प्रगति है। जिस विकास से परावलंबन बढ़े, वह प्रगति नहीं। |
| “जैसे ही तुममें पर-निर्भरता पनपती है, स्वतंत्रता पलायन कर जाती है” | परतंत्रता पहले बाहर नहीं, भीतर आती है — आदत बनकर। तब जंजीर की जरूरत नहीं रहती। |
| “पूर्णरूपेण नहीं त्याग सकते तो एक सीमा तक कम तो कर ही सकते हो” | यह व्यावहारिक सलाह है। सब कुछ एक साथ नहीं छोड़ा जा सकता, पर आरंभ तो किया ही जा सकता है। यही ‘स्वदेशी’ का सहज रूप है। |
| “किसी को नाराज करने… के इरादे से नहीं, वरन पुरुषार्थ की भावना से” | आत्मनिर्भरता किसी के विरोध का नाम नहीं, अपने बल पर खड़े होने का नाम है। यह घृणा नहीं, आत्मबल की बात है। |
इस विचार का ‘मैं और मेरा देश’ से संबंध: निबंध में लालाजी का जो वाक्य आया है — “जहाँ भी मैं गया, भारतवर्ष की गुलामी की लज्जा का कलंक मेरे माथे पर लगा रहा” — वह भी यूरोप-भ्रमण के बाद का ही अनुभव है, और यह भाषण भी ‘यूरोप से भारत वापसी पर’ दिया गया था (बंबई, 20 फरवरी 1920)। दोनों एक ही यात्रा की दो देनें हैं — एक ने लेखक के मन में ‘भूकंप’ पैदा किया, दूसरा हमें रास्ता बताता है। लेखक का ‘शक्ति-बोध’ और लालाजी की ‘आत्मनिर्भरता’ — दोनों का अर्थ एक ही है: अपने देश पर भरोसा।
आज के लिए इसका अर्थ: पर-निर्भरता आज भी अनेक रूपों में है — दूसरों की राय पर निर्भर रहना, तैयार उत्तर ढूँढ़ना, हर काम के लिए किसी और की प्रतीक्षा करना। विद्यार्थी के लिए आत्मनिर्भरता का सबसे सीधा रूप है — अपना गृहकार्य स्वयं करना और अपनी गलती स्वयं ढूँढ़ना।