गंगा अध्याय 7 झरोखे से

अद्यतन2026-09-06

प्र1.
इस निबंध में स्वतंत्रता सेनानी लाला लाजपत राय का उल्लेख किया गया है। इसमें नागरिक के कर्तव्य एवं अधिकारों की बात की गई है। अब आप लाला लाजपत राय के नीचे दिए गए कुछ विचारों को पढ़िए। — ‘आत्मनिर्भरता’: “प्रगति का तात्पर्य है स्वतंत्रता की ओर प्रस्थान। तुम्हारे पूर्वजों ने तुम्हें यही सिखाया है कि जैसे ही तुममें पर-निर्भरता पनपती है, स्वतंत्रता पलायन कर जाती है। यदि पर-निर्भरता को पूर्णरूपेण नहीं त्याग सकते तो एक सीमा तक कम तो कर ही सकते हो। आत्मनिर्भरता और आत्मविश्वास की आदत डालो, किसी को नाराज करने या परेशान करने के इरादे से नहीं, वरन पुरुषार्थ की भावना से ऐसा करो।” — यूरोप से भारत वापसी पर स्वागत के अवसर पर (बंबई, 20 फरवरी 1920)
उत्तर

भाव — लालाजी कहते हैं कि प्रगति और स्वतंत्रता एक ही दिशा के दो नाम हैं। जिस क्षण किसी व्यक्ति या राष्ट्र में पर-निर्भरता (दूसरों पर आश्रित रहने की आदत) पनपती है, उसी क्षण स्वतंत्रता चुपचाप खिसक जाती है। इसलिए आत्मनिर्भरता और आत्मविश्वास को आदत बनाना चाहिए — और वह भी किसी के प्रति द्वेष से नहीं, बल्कि पुरुषार्थ यानी अपने परिश्रम पर भरोसे की भावना से।

वाक्यांशउसका आशय
“प्रगति का तात्पर्य है स्वतंत्रता की ओर प्रस्थान”जो कदम आपको अधिक स्वतंत्र बनाए, वही सच्ची प्रगति है। जिस विकास से परावलंबन बढ़े, वह प्रगति नहीं।
“जैसे ही तुममें पर-निर्भरता पनपती है, स्वतंत्रता पलायन कर जाती है”परतंत्रता पहले बाहर नहीं, भीतर आती है — आदत बनकर। तब जंजीर की जरूरत नहीं रहती।
“पूर्णरूपेण नहीं त्याग सकते तो एक सीमा तक कम तो कर ही सकते हो”यह व्यावहारिक सलाह है। सब कुछ एक साथ नहीं छोड़ा जा सकता, पर आरंभ तो किया ही जा सकता है। यही ‘स्वदेशी’ का सहज रूप है।
“किसी को नाराज करने… के इरादे से नहीं, वरन पुरुषार्थ की भावना से”आत्मनिर्भरता किसी के विरोध का नाम नहीं, अपने बल पर खड़े होने का नाम है। यह घृणा नहीं, आत्मबल की बात है।
इस विचार का ‘मैं और मेरा देश’ से संबंध: निबंध में लालाजी का जो वाक्य आया है — “जहाँ भी मैं गया, भारतवर्ष की गुलामी की लज्जा का कलंक मेरे माथे पर लगा रहा” — वह भी यूरोप-भ्रमण के बाद का ही अनुभव है, और यह भाषण भी ‘यूरोप से भारत वापसी पर’ दिया गया था (बंबई, 20 फरवरी 1920)। दोनों एक ही यात्रा की दो देनें हैं — एक ने लेखक के मन में ‘भूकंप’ पैदा किया, दूसरा हमें रास्ता बताता है। लेखक का ‘शक्ति-बोध’ और लालाजी की ‘आत्मनिर्भरता’ — दोनों का अर्थ एक ही है: अपने देश पर भरोसा
आज के लिए इसका अर्थ: पर-निर्भरता आज भी अनेक रूपों में है — दूसरों की राय पर निर्भर रहना, तैयार उत्तर ढूँढ़ना, हर काम के लिए किसी और की प्रतीक्षा करना। विद्यार्थी के लिए आत्मनिर्भरता का सबसे सीधा रूप है — अपना गृहकार्य स्वयं करना और अपनी गलती स्वयं ढूँढ़ना
प्र2.
‘अधिकारों की रक्षा’: “हर एक का नैतिक कर्तव्य है कि तन-मन-धन से अपने जन्मसिद्ध अधिकारों की रक्षा करे। मेरी राय में जो ऐसा नहीं करता, अपने नैतिक कर्तव्य से हट जाता है। जितनी जल्दी हम अपनी इस नैतिक जिम्मेदारी को समझ लेंगे, हम स्वराज्य को प्राप्त करने में समर्थ हो सकेंगे।” — जेल जाते समय देशवासियों के नाम संदेश (7 जनवरी 1922)
उत्तर

भाव — लालाजी यहाँ एक बहुत बड़ी बात कहते हैं — अधिकार की रक्षा करना केवल अधिकार नहीं, नैतिक कर्तव्य है। जो अपने जन्मसिद्ध अधिकारों की रक्षा नहीं करता, वह सुविधा नहीं छोड़ रहा — वह अपने कर्तव्य से हट रहा है। और जिस दिन देश के लोग इस जिम्मेदारी को समझ लेंगे, स्वराज्य उसी दिन संभव हो जाएगा।

तीन बातें ध्यान देने योग्य:
  1. ‘जन्मसिद्ध अधिकार’ — यानी वे अधिकार जो किसी सरकार ने दिए नहीं, जो जन्म के साथ मिलते हैं। यही भाव आगे चलकर हमारे संविधान के मौलिक अधिकारों में उतरा।
  2. ‘तन-मन-धन से’ — रक्षा केवल बोलकर नहीं होती; उसमें शरीर का श्रम, मन का संकल्प और आवश्यकता पड़ने पर धन — तीनों लगते हैं। यह संदेश उन्होंने जेल जाते समय दिया था, इसलिए इसमें कहने और करने का अंतर नहीं है।
  3. अधिकार और कर्तव्य का मेल — साधारणतः हम सोचते हैं कि अधिकार लेने की चीज़ है और कर्तव्य देने की। लालाजी दोनों को एक कर देते हैं: अधिकार की रक्षा करना ही सबसे बड़ा कर्तव्य है।
लाला लाजपत राय (झरोखे से)‘मैं और मेरा देश’ (कन्हैयालाल मिश्र ‘प्रभाकर’)
“हर एक का नैतिक कर्तव्य है कि… अपने जन्मसिद्ध अधिकारों की रक्षा करे।”“मेरा अधिकार है कि मेरा मत लिए बिना कोई भी आदमी… किसी अधिकार की कुरसी पर न बैठ सके।”
“जो ऐसा नहीं करता, अपने नैतिक कर्तव्य से हट जाता है।”“मेरा यानी हरेक नागरिक का यह कर्तव्य है कि वह जब भी कोई चुनाव हो, ठीक मनुष्य को अपना मत दे।”
“जितनी जल्दी हम अपनी इस नैतिक जिम्मेदारी को समझ लेंगे, हम स्वराज्य को प्राप्त करने में समर्थ हो सकेंगे।”“जिस देश के नागरिक यह समझते हैं कि चुनाव में किसे अपना मत देना चाहिए और किसे नहीं, वह देश उच्च है।”
‘झरोखे से’ का उद्देश्य: पुस्तक यहाँ एक खिड़की खोलती है — पाठ में जिस व्यक्ति का उल्लेख आया, उसी के अपने शब्द पढ़वाकर। ध्यान दीजिए कि निबंध 1920 में यूरोप से लौटे लालाजी के अनुभव से शुरू होता है और अभ्यास 1922 में जेल जाते लालाजी के संदेश पर समाप्त होता है। बीच के दो वर्षों में असहयोग आंदोलन खड़ा हुआ — और स्वयं लेखक कन्हैयालाल मिश्र ‘प्रभाकर’ भी उसी संघर्ष में बार-बार जेल गए। इसीलिए यह निबंध पढ़ी हुई नहीं, जी हुई बात है।
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