गंगा अध्याय 7 मेरे अनुभव मेरे विचार

अद्यतन2026-09-06

प्र1.
1. “देश की हीनता और गौरव का ही फल उसे नहीं मिलता, उसकी हीनता और गौरव का फल भी उसके देश को मिलता है”, अपने आस-पास के विभिन्न उदाहरणों के द्वारा इस पंक्ति का भाव स्पष्ट कीजिए।
उत्तर

इस पंक्ति का भाव है — नागरिक और देश के बीच लेन-देन दोनों ओर से चलता है। देश ऊँचा होगा तो नागरिक का सिर ऊँचा रहेगा; और नागरिक अच्छा काम करेगा तो देश का सिर ऊँचा होगा। यह एकतरफ़ा रास्ता नहीं, आने-जाने वाली सड़क है।

दिशाअर्थपाठ का उदाहरणहमारे आस-पास का उदाहरण
देश → नागरिकदेश की हीनता या गौरव का फल नागरिक को मिलता है।लाला लाजपत राय — “जहाँ भी मैं गया, भारतवर्ष की गुलामी की लज्जा का कलंक मेरे माथे पर लगा रहा।”आज भारतीय पासपोर्ट लेकर कोई विद्यार्थी विदेश पढ़ने जाता है तो उसे भारत की साख का लाभ मिलता है; भारत में बना टीका दुनिया के दर्जनों देशों तक पहुँचा, तो हर भारतीय ने उसका गौरव अनुभव किया — यद्यपि टीका उसने नहीं बनाया था।
नागरिक → देशनागरिक की हीनता या गौरव का फल देश को मिलता है।जापानी युवक ने फल भेंट कर देश का सिर ऊँचा किया; दूसरे देश के विद्यार्थी ने चित्र चुराकर देश पर कलंक लगाया — “उस देश का कोई निवासी इस पुस्तकालय में प्रवेश नहीं कर सकता।”कोई खिलाड़ी ओलंपिक में पदक जीतता है तो पदक उसके गले में और तिरंगा पूरे देश का ऊपर जाता है। इसके उलट, यदि कोई यात्री विदेशी हवाई अड्डे पर नियम तोड़ता है तो अख़बार उसके नाम से पहले उसके देश का नाम छापते हैं।
अपने मुहल्ले के तीन छोटे उदाहरण, जिन्हें आप स्वयं देख सकते हैं:
  1. विद्यालय की छवि — एक कक्षा के दस विद्यार्थी अंतर-विद्यालय प्रतियोगिता में अनुशासित रहते हैं, तो पूरे विद्यालय की प्रशंसा होती है। एक विद्यार्थी बस में शोर मचाता है, तो लोग कहते हैं — “फलाँ स्कूल के बच्चे ऐसे ही हैं।” यह ‘गाँठ’ का लघु रूप है।
  2. गाँव/मुहल्ले का नाम — जिस मुहल्ले में लोग कूड़ा नियत स्थान पर डालते हैं, वह ‘साफ़ मुहल्ला’ कहलाता है और वहाँ का हर निवासी उस नाम का लाभ उठाता है — मकान का किराया तक बढ़ जाता है।
  3. यातायात — एक व्यक्ति के ग़लत दिशा में गाड़ी चलाने से पूरे चौराहे का जाम लगता है और सैकड़ों लोग देर से पहुँचते हैं। एक की लापरवाही का दंड सबको मिलता है।
भाव का सार: हम अपने आचरण को ‘निजी मामला’ मानते हैं, जबकि वह निजी होता ही नहीं। हर काम पर दो नाम लिखे जाते हैं — करने वाले का और उसके देश का। इसीलिए लेखक कहता है — “मैं अपना देश हूँ।”
प्र2.
2. “मुझे बहुतों की अपने लिए जरूरत पड़ती थी। मैं भी बहुतों की जरूरत का उनके लिए जवाब था।” (क) प्रातःकाल से लेकर रात्रि तक आप अपने किन-किन कार्यों में किस-किसका क्या सहयोग लेते हैं और आप दूसरों को किस तरह का सहयोग देते हैं? अपने अनुभव लिखिए।
उत्तर

यह प्रश्न आपके अपने दिन का लेखा-जोखा माँगता है। इसे लिखने का सबसे अच्छा तरीका है — एक दिन को समय के खंडों में बाँटिए और हर खंड के सामने दो कॉलम बनाइए: मैंने क्या लिया और मैंने क्या दिया। नीचे एक पूरा भरा हुआ नमूना उत्तर है; आप इसे देखकर अपने दिन का ब्योरा लिखिए।

नमूना उत्तर:

समयकार्यकिसका सहयोग लेता हूँमैं क्या सहयोग देता हूँ
प्रातः 6–7उठना, नल का पानी, दूध, अख़बारजल-बोर्ड के कर्मचारी, दूधवाले भैया, अख़बार डालने वाला बालक, माँ जो चाय बनाती हैंअपना बिस्तर स्वयं समेटता हूँ, छोटी बहन को जगाता हूँ, दूध का बर्तन ढककर रखता हूँ
7–8तैयार होना, नाश्तामाँ/पिताजी, बिजली विभाग, गैस सिलिंडर पहुँचाने वालानाश्ते के बर्तन सिंक में रखता हूँ, बिना जरूरत पंखा-बत्ती बंद कर देता हूँ
8–8.30विद्यालय जानारिक्शा/बस चालक, सड़क पार कराने वाला यातायात-सिपाहीकतार में चढ़ता हूँ, बुजुर्ग को अपनी सीट देता हूँ, सड़क पर कचरा नहीं फेंकता
8.30–2कक्षा, पुस्तकालय, खेलअध्यापक, सहपाठी जिनसे नोट्स लेता हूँ, पुस्तकालयाध्यक्ष, सफ़ाई कर्मचारी, रसोइयाकमजोर साथी को गणित समझाता हूँ, कक्षा-मॉनीटर का काम करता हूँ, पुस्तक समय पर लौटाता हूँ
2–5घर लौटना, गृहकार्य, खेलबड़े भाई से संदेह-निवारण, इंटरनेट/पुस्तकालय, मैदान का मालीछोटे बच्चों को खेल में शामिल करता हूँ, मैदान का सामान वापस रखता हूँ
5–8बाज़ार, संध्या-भोजन की तैयारीसब्ज़ीवाला, किराना दुकानदार, किसान जिसने अनाज उगायाथैला घर से ले जाता हूँ, दुकानदार को खुले पैसे देता हूँ, माँ के साथ सब्ज़ी काटता हूँ
8–10पढ़ाई, परिवार से बातचीत, सोनाबिजली, स्ट्रीट लाइट, रात्रि चौकीदार, अस्पताल की आपात सेवा जो जागती रहती हैपानी की टोंटी बंद करता हूँ, कूड़ा अलग-अलग डिब्बों में डालता हूँ, दादी को दवा देकर सुलाता हूँ
इस तालिका से क्या निकलता है: एक दिन में मैं कम-से-कम बीस-पच्चीस अनजान लोगों पर निर्भर रहता हूँ, जिनमें से अधिकांश को मैं पहचानता तक नहीं — किसान, चालक, सफ़ाईकर्मी, बिजलीकर्मी, डाकिया। और उतने ही लोग किसी-न-किसी रूप में मुझ पर निर्भर हैं। यही लेखक का वाक्य है — “मुझे बहुतों की अपने लिए जरूरत पड़ती थी। मैं भी बहुतों की जरूरत का उनके लिए जवाब था।”
लिखने का तरीका: अपनी कॉपी में यही तालिका बनाइए, पर उसमें असली नाम लिखिए — अपने मुहल्ले के दूधवाले का नाम, अपने बस चालक का नाम, अपनी सहेली का नाम। जब नाम लिखे जाते हैं तो यह अभ्यास सूची नहीं रहता, कृतज्ञता बन जाता है।
प्र3.
(ख) उपर्युक्त वाक्य में रेखांकित शब्द ‘बहुतों’ में कौन-कौन सम्मिलित होंगे, अनुमान के आधार पर लिखिए।
उत्तर

‘बहुतों’ शब्द लेखक ने जान-बूझकर खुला छोड़ा है। इसमें वे सब आते हैं जिनके श्रम पर एक नागरिक का दिन टिका होता है — चाहे हम उन्हें जानते हों या न जानते हों। अनुमान के आधार पर उन्हें पाँच घेरों में बाँटा जा सकता है।

घेराकौन-कौन सम्मिलित
1. घर का घेरामाता-पिता, भाई-बहन, दादा-दादी, घर में सहायता करने वाले लोग।
2. पड़ोस का घेरापड़ोसी जिन्होंने ‘ममता-दुलार’ दिया, मित्र, मुहल्ले के बड़े-बुज़ुर्ग, दूधवाला, अख़बार डालने वाला, सब्ज़ीवाला, दर्जी, नाई, मोची, रिक्शा-चालक।
3. विद्यालय का घेराअध्यापक, सहपाठी, पुस्तकालयाध्यक्ष, चपरासी, सफ़ाई कर्मचारी, मध्याह्न-भोजन बनाने वाले, बस चालक और परिचालक।
4. नगर/समाज का घेराकिसान और मज़दूर (जिनकी ‘रसद’ से देश चलता है), डॉक्टर-नर्स, पुलिस, अग्निशमन कर्मी, बिजली-पानी-सफ़ाई विभाग के कर्मचारी, डाकिया, दुकानदार, चालक, इंजीनियर, वैज्ञानिक, कलाकार, पत्रकार।
5. देश और उससे परे का घेरासीमा पर तैनात सैनिक, न्यायाधीश, वे सब जिन्होंने ‘संचित ज्ञान-भंडार’ बनाया — पुराने लेखक, आविष्कारक, स्वतंत्रता सेनानी; और वे अनगिनत लोग जिन्हें हम कभी नहीं देखेंगे पर जिनके काम का लाभ रोज़ उठाते हैं।
अनुमान का आधार क्या है: लेखक ने इसी अनुच्छेद में तीन घेरे स्वयं गिनाए हैं — “मेरा घर, मेरा पड़ोस, मेरा नगर और मैं।” और आगे उसने “वहाँ के संचित ज्ञान-भंडार” तथा “उसकी सेवाओं का सहारा” जोड़ा है। ‘संचित’ का अर्थ है — पीढ़ियों से जमा किया हुआ। इसका सीधा मतलब है कि ‘बहुतों’ में केवल जीवित लोग नहीं, पहले हो चुके लोग भी शामिल हैं। इसीलिए आगे चलकर वह इसी ‘बहुतों’ को ‘देश’ नाम दे देता है।
Try This: कागज़ पर पाँच वृत्त एक-दूसरे के भीतर बनाइए — मैं, घर, पड़ोस, नगर, देश। हर वृत्त में पाँच नाम लिखिए। जो चित्र बनेगा, वही इस निबंध का ढाँचा है।
प्र4.
(ग) रचनाकार को स्वयं के लिए दूसरे लोगों से किस प्रकार के सहयोग की आवश्यकता पड़ती होगी और वह दूसरों को किस प्रकार का सहयोग देता होगा, अनुमान के आधार पर लिखिए।
उत्तर

कन्हैयालाल मिश्र ‘प्रभाकर’ पेशे से पत्रकार और निबंधकार थे, स्वतंत्रता संग्राम में सक्रिय थे और अनेक बार जेल गए। इसी परिचय के आधार पर अनुमान लगाया जा सकता है कि उनका लेन-देन किस तरह का रहा होगा।

उन्हें किन-किन का सहयोग चाहिए होगावे दूसरों को क्या देते होंगे
सूचना देने वाले — गाँव-नगर के लोग, आंदोलन के साथी, प्रत्यक्षदर्शी, जिनसे उन्हें समाचार और घटनाएँ मिलती थीं। (इसी निबंध की सारी घटनाएँ — जापान की, कमालपाशा की, नेहरू जी और किसान की — किसी-न-किसी से सुनी या पढ़ी हुई हैं।)विचार और दिशा — अपने पत्रों नया जीवन और विकास के माध्यम से वे पाठकों को घटनाओं का अर्थ समझाते थे; निबंध लिखकर वे साधारण नागरिक को उसका कर्तव्य और अधिकार बताते थे।
पत्र का तंत्र — मुद्रक, कंपोज़िटर, प्रूफ़ पढ़ने वाले, वितरक, हॉकर, कागज़ बेचने वाले — इनके बिना एक भी अंक नहीं छपता।रोज़गार और मंच — पत्र चलाकर उन्होंने अनेक लोगों को काम दिया और नए लेखकों को छपने का अवसर दिया — संपादक का सबसे बड़ा सहयोग यही होता है।
पुस्तकालय और पूर्वज लेखक — महाभारत का शल्य-कर्ण प्रसंग, भामाशाह का उल्लेख, प्रेमचंद और चेखव के नाम — ये सब ‘संचित ज्ञान-भंडार’ से आए हैं।साहित्य का भंडार — दीप जले शंख बजे, जिंदगी मुसकराई, माटी हो गई सोना जैसे नौ-दस निबंध-संग्रह देकर उन्होंने उसी भंडार में अपना हिस्सा जोड़ दिया।
परिवार और साथी — बार-बार जेल जाने वाले व्यक्ति का घर परिवार ही सँभालता है; आंदोलन के साथी संकट में सहारा बनते हैं।साहस और उदाहरण — जेल-यात्रा स्वीकार कर उन्होंने दूसरों के लिए वह ‘गौरव का दीपक’ जलाया जिसकी बात इसी निबंध में की गई है।
पाठक — लेखक का असली सहारा पाठक ही है। निबंध में वे स्वयं कहते हैं — “कवि-सम्मेलनों और मुशायरों की सारी सफलता दाद देने वालों पर ही निर्भर करती है।”आत्मीय संवाद — वे पाठक को ‘आप’ कहकर, उसका प्रश्न सुनकर, उसकी तारीफ़ करके (“वाह, खूब सवाल पूछा है आपने”) लिखते हैं — यानी वे पाठक को बराबरी का साथी बनाते हैं, श्रोता भर नहीं।
अनुमान लगाते समय क्या ध्यान रखें: ‘अनुमान’ का अर्थ मनगढ़ंत नहीं है। वह पाठ में दिए संकेतों (लेखक-परिचय, निबंध की शैली, उसमें आए उदाहरणों) से निकाला गया तर्कसंगत निष्कर्ष होता है। ऊपर की हर पंक्ति किसी-न-किसी संकेत पर टिकी है — यही अच्छे अनुमान की पहचान है।
प्र5.
3. “सुना नहीं आपने कि जीवन एक युद्ध है और युद्ध में लड़ना ही तो काम नहीं होता।” (क) उपर्युक्त वाक्य के रेखांकित अंश “युद्ध में लड़ना ही तो काम नहीं होता” के आधार पर लिखिए कि देश की प्रगति, विकास एवं सुरक्षा के प्रति हम सभी के क्या-क्या दायित्व हैं? अपने उत्तर को विस्तार देने के लिए अपने घर या पास-पड़ोस के बड़ों और अध्यापक से चर्चा करके लिखिए।
उत्तर

लेखक का तर्क यह है कि युद्ध केवल मोर्चे पर नहीं जीता जाता। “लड़ने वालों को रसद न पहुँचे तो वे कैसे लड़ें। किसान ही खेती न उपजाए तो रसद पहुँचाने वाले क्या करें… युद्ध में जय बोलने वालों का भी महत्व है।” यानी हर काम की एक कड़ी है, और कोई कड़ी छोटी नहीं होती। देश की प्रगति, विकास और सुरक्षा के लिए हमारे दायित्व भी इसी तरह बँटे हुए हैं।

क्षेत्रहमारा दायित्व‘युद्ध’ के रूपक में इसकी जगह
सुरक्षासतर्क रहना; अफ़वाह न फैलाना और न मानना; आपदा-अभ्यास (mock drill) में भाग लेना; सैनिकों और उनके परिवारों का सम्मान करना; किसी भी संदिग्ध वस्तु की सूचना देना।‘लड़ने वाले’ के पीछे खड़ा नागरिक-मोर्चा
अन्न और संसाधनअन्न व्यर्थ न करना; पानी और बिजली बचाना; स्थानीय वस्तुएँ खरीदकर किसान-कारीगर को सहारा देना।‘किसान’ और ‘रसद’ की कड़ी
शिक्षा और कौशलमन लगाकर पढ़ना — यही विद्यार्थी का सबसे बड़ा राष्ट्रीय कर्तव्य है; जो जानते हैं उसे दूसरों को सिखाना; निरक्षर पड़ोसी को अक्षर-ज्ञान देना।भावी सेनापति और वैज्ञानिक तैयार करना
स्वास्थ्य और स्वच्छताघर, गली, विद्यालय और सार्वजनिक स्थान साफ़ रखना; टीकाकरण; रक्तदान (बड़ों द्वारा); पॉलिथीन का त्याग।सेना के लिए स्वस्थ जनसंख्या = ‘सौंदर्य-बोध’ की रक्षा
कर और नियमईमानदारी से कर देना, बिल लेना; यातायात-नियम मानना; सार्वजनिक संपत्ति की रक्षा करना।युद्ध का खर्च जुटाने वाली कड़ी
मनोबलनिराशा न फैलाना; अपने देश की तुलना में उसे हीन सिद्ध करने की आदत छोड़ना; अच्छे काम की सार्वजनिक प्रशंसा करना।‘जय बोलने वाले’ — दर्शकों की तालियों से “खिलाड़ियों के पैरों में बिजली लग जाती है”
लोकतंत्रमतदाता-सूची में नाम जुड़वाना (18 वर्ष पर), सोच-समझकर मत देना, नारों के बहाव में न आना।‘सेनापति’ चुनने का काम
बड़ों और अध्यापक से चर्चा में क्या पूछें (और उत्तर में क्या जोड़ें):
  • दादा/दादी से — “आपके समय में गाँव के लोग मिलकर कौन-सा काम करते थे जो अब नहीं होता?” (उत्तर प्रायः मिलता है — कुआँ-तालाब की सफ़ाई, श्रमदान, चौपाल पर विवाद सुलझाना।)
  • पिताजी/माताजी से — “आप अपने काम से देश की प्रगति में क्या जोड़ते हैं?” — हर काम की एक राष्ट्रीय भूमिका निकल आती है।
  • अध्यापक से — “विद्यार्थी का सबसे बड़ा राष्ट्रीय कर्तव्य क्या है?” — प्रायः उत्तर होता है, समय का सम्मान और ईमानदारी।
इन तीन उत्तरों को अपनी कॉपी में ज्यों-का-त्यों उद्धृत कर दीजिए — इससे आपका उत्तर पुस्तक से निकला हुआ नहीं, जीवन से निकला हुआ लगेगा, और अभ्यास यही चाहता है।
प्र6.
(ख) अपने पास-पड़ोस में विचरने वाले पशु-पक्षियों की जीवनचर्या का अवलोकन कीजिए और अपने अवलोकन के आधार पर लिखिए कि आप उनके संघर्षों को किस रूप में देखते हैं? (संकेत— आप अपनी पाठ्यपुस्तक में दी गई कहानी ‘दो बैलों की कथा’ के मुख्य पात्रों के अनुभवों को भी आधार बना सकते हैं।)
उत्तर

यह प्रश्न पहले अवलोकन माँगता है, फिर व्याख्या। इसलिए उत्तर दो हिस्सों में लिखिए — पहले ‘मैंने क्या देखा’, फिर ‘मुझे उसमें क्या दिखा’।

पहला हिस्सा — अवलोकन (नमूना उत्तर):

प्राणीजीवनचर्या जो मैंने देखीसंघर्ष जो उसमें दिखा
गली का कुत्तासुबह कूड़ेदान के पास, दोपहर छाया में, शाम को अपने ‘इलाक़े’ की सीमा पर भौंकता हुआ। बरसात में सीढ़ियों के नीचे दुबका।भोजन और सुरक्षित जगह के लिए रोज़ की लड़ाई; दूसरे कुत्तों से क्षेत्र की रक्षा; मनुष्य की मार और गाड़ियों का भय।
गौरैयासुबह-शाम झुंड में; तिनके, रुई और धागे ढोकर रोशनदान में घोंसला बनाती है; चूजों के लिए दिन में बीसियों बार आती-जाती है।घर सिकुड़ रहे हैं — रोशनदान बंद, पेड़ कम। घोंसला बनाने की जगह ढूँढ़ना ही उसका सबसे बड़ा संघर्ष है। गर्मी में पानी की खोज।
बैल/भैंसभोर में हाँके जाना, दिन-भर जुताई या गाड़ी, दोपहर में नाँद पर, रात को थान पर जुगाली।परिश्रम पर उसका अपना वश नहीं; भोजन दूसरे की मर्ज़ी पर; काम बंद होते ही उसका ‘मूल्य’ गिर जाता है।
गाय/बछड़ा सड़क परचौराहे पर खड़ी, पॉलिथीन में लिपटा जूठन खाती हुई।भोजन तो मिलता है, पर वह उसे बीमार करता है — यह आधुनिक शहर का नया पशु-संघर्ष है।
चींटियाँपंक्ति बनाकर अपने से कई गुना बड़ा दाना ढोती हुईं; बरसात से पहले अंडे ऊपर ले जाती हुईं।अकेली चींटी दाना नहीं ढो सकती — संगठन ही उनकी शक्ति है। यही ‘अकेला चना क्या भाड़ फोड़े’ का उत्तर भी है।

दूसरा हिस्सा — मैं इन संघर्षों को किस रूप में देखता हूँ:

मुझे इन सबका संघर्ष जीवन के उसी युद्ध का एक और मोर्चा लगता है जिसकी बात इस निबंध में की गई है। तीन बातें साफ़ दिखती हैं —
  • संघर्ष अकेले नहीं जीता जाता। चींटियाँ पंक्ति में, गौरैया झुंड में, कुत्ते समूह में — और ‘दो बैलों की कथा’ में हीरा-मोती संगठित होकर ही साँड़ को हरा पाते हैं — “साँड़ को भी संगठित शत्रुओं से लड़ने का तजुरबा न था।”
  • पशु भी अपमान समझते हैं, केवल भूख नहीं। गया के यहाँ हीरा-मोती को नाँद तो मिली थी, फिर भी “एक ने भी उसमें मुँह न डाला” — क्योंकि उन्हें बेचे जाने का अपमान खल रहा था। मैंने भी देखा है कि पीटा हुआ कुत्ता दोबारा उस दरवाज़े पर नहीं जाता, चाहे वहाँ रोटी ही क्यों न रखी हो।
  • इनका बहुत-सा संघर्ष हमारा बनाया हुआ है। कटे पेड़, बंद रोशनदान, सड़क पर फेंकी पॉलिथीन, तेज़ गाड़ियाँ — ये प्राकृतिक कठिनाइयाँ नहीं, मनुष्य की देन हैं। इसलिए इन्हें कम करना भी हमारा ही दायित्व है।
Check it yourself: एक सप्ताह तक रोज़ पाँच मिनट किसी एक प्राणी को देखिए और तीन पंक्तियाँ लिखिए — उसने क्या खाया, कहाँ रहा, किससे बचा। सात दिन बाद आपके पास सचमुच का अवलोकन होगा, अनुमान नहीं — और यही इस प्रश्न का असली उत्तर है।
प्र7.
(ग) इस निबंध में जीवन को युद्ध क्यों कहा गया है? आप अपने घर के बड़ों से इस विषय पर चर्चा करके उनके और अपने विचार लिखिए।
उत्तर

निबंध में जीवन को ‘युद्ध’ इसलिए कहा गया है क्योंकि लेखक को यह सिद्ध करना है कि देश के लिए हर व्यक्ति कुछ-न-कुछ कर सकता है। पाठक ने आपत्ति की थी — “अजी, भला एक आदमी अपने इतने बड़े देश के लिए कर ही क्या सकता है!… जो बेचारा अपनी ही दाल-रोटी की फिक्र में लगा हुआ हो, वह क्या कर सकता है?” इसी का उत्तर देने के लिए लेखक युद्ध का रूपक उठाता है।

जीवन = युद्ध
युद्ध में लड़ने वाला → सैनिक
लड़ने वाले को अन्न पहुँचाने वाला → रसद पहुँचाने वाला
अन्न उपजाने वाला → किसान
और हौसला बढ़ाने वाला → ‘जय बोलने वाला’
∴ हर कड़ी के बिना युद्ध रुक जाता है ⇒ हर नागरिक की भूमिका है
‘युद्ध’ रूपक के तीन अर्थ:
  1. जीवन में निरंतर संघर्ष है — रोटी, शिक्षा, सम्मान, अधिकार — कुछ भी बिना लड़े नहीं मिलता। लेखक स्वयं जेल गए थे, इसलिए यह उनका भोगा हुआ सत्य है।
  2. युद्ध में काम बँटे होते हैं — यही रूपक का असली प्रयोजन है। “युद्ध में लड़ना ही तो काम नहीं होता।” जो व्यक्ति स्वयं को छोटा समझकर हाथ पर हाथ रखे बैठा है, उसे यह याद दिलाना है कि उसका भी एक मोर्चा है।
  3. युद्ध मनोबल से जीते जाते हैं — इसीलिए ‘जय बोलने वाले’ की चर्चा है, और आगे शल्य का उदाहरण है, जिसने कर्ण के “सघन आत्मविश्वास में संदेह की तरेड़ डाल दी”। मनोबल तोड़ने वाला भी युद्ध का एक पात्र है — नकारात्मक पात्र।

घर के बड़ों से चर्चा — नमूना:

किससे पूछाउनका विचार
दादाजी (सेवानिवृत्त शिक्षक)“जीवन युद्ध है, पर इसमें शत्रु बाहर नहीं होता। आलस्य, डर और लालच — यही तीन शत्रु हैं। जो इन तीनों से रोज़ लड़ता है, वही जीतता है।”
माताजी“घर चलाना भी युद्ध है। इसमें कोई पदक नहीं मिलता, पर एक दिन की चूक से पूरा घर लड़खड़ा जाता है। इसलिए घर के काम को छोटा मत समझो।”
पड़ोस के किसान चाचा“खेत में हर साल नया युद्ध है — कभी पानी नहीं, कभी ज़्यादा पानी। पर अन्न न उगे तो सिपाही भी क्या करेगा? इसीलिए किसान भी सिपाही ही है।”
मेरा अपना विचार: मुझे यह रूपक इसलिए अच्छा लगा कि यह किसी को दर्शक बनकर बैठने की छूट नहीं देता। यदि जीवन युद्ध है तो तटस्थ कोई नहीं रह सकता — जो लड़ नहीं रहा, वह या तो रसद पहुँचा रहा है या शत्रु का काम आसान कर रहा है। पर एक बात मैं जोड़ना चाहूँगा — युद्ध में शत्रु मनुष्य होता है, जबकि जीवन में शत्रु परिस्थिति और अपनी ही कमज़ोरी होती है। इसीलिए यह ऐसा युद्ध है जिसमें जीत सबकी एक साथ हो सकती है।
प्र8.
(घ) देश की भौगोलिक सीमाओं की रक्षा सैनिक करते हैं। इसी तरह हमारे आस-पास हमारे जीवन को बेहतर बनाने के लिए अनेक लोग कार्यरत हैं। ये कौन-कौन लोग हैं और उनके लिए आप क्या-क्या कर सकते हैं?
उत्तर

ये वे लोग हैं जिन्हें लेखक ने ‘रसद पहुँचाने वाले’ और ‘जय बोलने वाले’ कहा है — बिना जिनके कोई नगर एक दिन भी नहीं चल सकता, और जिनका नाम प्रायः कहीं नहीं छपता।

कौनवे क्या करते हैंमैं उनके लिए क्या कर सकता/सकती हूँ
सफ़ाई कर्मचारीभोर में, हमारे उठने से पहले, गली और नालियाँ साफ़ करते हैं।कूड़ा सड़क पर न फेंकूँ; गीला-सूखा कचरा अलग करूँ; उन्हें नाम से बुलाऊँ और धन्यवाद कहूँ; त्योहार पर विद्यालय की ओर से सम्मान करवाऊँ।
किसान और मज़दूरअन्न उपजाते और भवन-सड़क बनाते हैं।थाली में अन्न न छोड़ूँ; स्थानीय उपज खरीदने में परिवार को प्रेरित करूँ; मज़दूरों के बच्चों को पढ़ने में सहायता करूँ।
डॉक्टर, नर्स, आशा और आँगनवाड़ी कार्यकर्ताटीकाकरण, प्रसव, महामारी — सबसे आगे रहते हैं।अस्पताल में शोर न करूँ, कतार तोड़ूँ नहीं; टीकाकरण की सूचना पड़ोस में फैलाऊँ; स्वयं स्वच्छता के नियम मानूँ ताकि उनका बोझ घटे।
पुलिस, अग्निशमन और आपदा-मित्रअपराध, आग और आपदा में जान जोखिम में डालते हैं।यातायात-नियम मानूँ; झूठी सूचना न दूँ; आपात नंबर (112, 101, 108) याद रखूँ और दूसरों को बताऊँ।
शिक्षकअगली पीढ़ी गढ़ते हैं — “संचित ज्ञान-भंडार” आगे पहुँचाते हैं।समय पर कक्षा में पहुँचूँ, गृहकार्य पूरा करूँ, कक्षा को अनुशासित रखने में सहायता करूँ — शिक्षक को इससे बड़ा उपहार नहीं मिलता।
बिजली, जल-बोर्ड और डाक-कर्मीपानी, बिजली, चिट्ठी और अब कूरियर — रोज़ की जीवन-रेखा।पानी-बिजली की बर्बादी रोकूँ; बिल समय पर भरने की याद दिलाऊँ; डाकिये को गर्मी में पानी पूछूँ।
चालक-परिचालक, रिक्शा और ऑटो चालकहमें विद्यालय, अस्पताल और काम तक पहुँचाते हैं।कतार से चढ़ूँ, सीट का दुरुपयोग न करूँ, गाड़ी में कचरा न छोड़ूँ, किराया ठीक-ठीक दूँ।
सैनिक और उनके परिवारसीमाओं की रक्षा।शहीदों के परिवारों के लिए विद्यालय में कृतज्ञता-पत्र लिखूँ; ‘वीरगाथा’ जैसी पुस्तकें पढ़कर कक्षा में सुनाऊँ — जैसे इसी पुस्तक में निर्मल जीत सिंह सेखों की गाथा दी गई है।
ध्यान देने की बात: इस सूची में ‘मैं क्या कर सकता हूँ’ वाला खाना सबसे महत्वपूर्ण है। उसमें लिखी हर बात छोटी है — कूड़ा सही जगह डालना, कतार में लगना, धन्यवाद कहना। पर निबंध का सूत्र यही है — “महत्व किसी कार्य की विशालता में नहीं है, उस कार्य के करने की भावना में है।” बूढ़े किसान की पाव-भर शहद वाली हँडिया भी तो छोटी ही थी।
प्र9.
4. “अपने पड़ोस में खेलकर, पड़ोसियों की ममता-दुलार पा, बड़ा हुआ था।” (क) उपर्युक्त पंक्ति के आधार पर लिखिए कि पास-पड़ोस के लोगों में किस तरह के पारस्परिक संबंध रहे होंगे?
उत्तर

इस एक पंक्ति से पड़ोस की पूरी तस्वीर खुल जाती है। ध्यान दीजिए कि लेखक ने ‘पड़ोसियों का सहयोग’ नहीं कहा — उसने ‘ममता-दुलार’ कहा है। ये दोनों शब्द माता-पिता और बड़े-बुजुर्गों के लिए प्रयोग होते हैं। इसका अर्थ है कि उस समय पड़ोस बड़े परिवार का विस्तार था।

संबंध की विशेषतापंक्ति में उसका संकेतव्यवहार में वह कैसा दिखता होगा
आत्मीयता और अपनापन‘ममता-दुलार’ — यह सेवा नहीं, स्नेह का शब्द है।पड़ोस का बच्चा भी ‘अपना बच्चा’ माना जाता; उसे डाँटने और दुलारने — दोनों का अधिकार सबको था।
खुले द्वार‘अपने पड़ोस में खेलकर’ — बच्चा घर की चारदीवारी में नहीं, गली में बड़ा हुआ।दरवाज़े दिन-भर खुले रहते; बच्चे किसी भी आँगन में खेल सकते, किसी के भी घर पानी पी सकते थे।
सामूहिक जिम्मेदारी‘बड़ा हुआ था’ — यानी पालन-पोषण में पड़ोस की भी भूमिका थी।माता-पिता के बाहर होने पर बच्चा पड़ोस में रह जाता; बीमारी, विवाह और मृत्यु — हर अवसर पर पूरा मुहल्ला साथ खड़ा होता।
परस्पर निर्भरताआगे की पंक्ति — “मुझे बहुतों की अपने लिए जरूरत पड़ती थी। मैं भी बहुतों की जरूरत का उनके लिए जवाब था।”नमक-चीनी से लेकर सलाह तक का लेन-देन; कोई हिसाब नहीं रखा जाता था।
पारस्परिक सम्मान“मैं अपने नगर के लोगों का सम्मान करता था, वे भी मेरा सम्मान करते थे।”बड़ों को चाचा-ताऊ, बुआ-मौसी कहकर पुकारना; उम्र और काम — दोनों का आदर।
निबंध में इसका महत्व: यह पंक्ति केवल यादों का चित्र नहीं है। लेखक इसी सीढ़ी से आगे बढ़ता है — घर → पड़ोस → नगर → देश। जिसने पड़ोस में ‘मेरा-तेरा’ मिटाना सीख लिया, उसी को यह बात समझ आएगी कि “मैं और मेरा देश दो अलग चीजें तो हैं ही नहीं।” देश-प्रेम की पहली पाठशाला पड़ोस ही है।
पाठ की एक छोटी-सी बात: पुस्तक में पाठ के भीतर यह वाक्य “पड़ोसियों का ममता-दुलार पा” छपा है (पृष्ठ 121), जबकि अभ्यास में इसे “पड़ोसियों की ममता-दुलार पा” उद्धृत किया गया है (पृष्ठ 130 और 135)। भाव दोनों में एक ही है; उत्तर लिखते समय अभ्यास वाला ही रूप लिखिए।
प्र10.
(ख) वर्तमान समय में ऐसे संबंधों में किस तरह के परिवर्तन आए हैं और इनके क्या कारण हो सकते हैं? लिखिए।
उत्तर

आज पड़ोस बचा है, पर पड़ोसीपन घट गया है। मकान पास-पास हैं, मन दूर-दूर।

पहलेअब
दरवाज़े खुले रहते थे; बच्चे किसी भी घर में खेल लेते थे।दरवाज़े बंद, कैमरे और इंटरकॉम; बच्चे केवल अपने फ़्लैट में या मोबाइल पर खेलते हैं।
पड़ोसी का बच्चा भी ‘अपना’ था — डाँटने और दुलारने का अधिकार सबको था।‘आप अपने बच्चे को देखिए’ — निजता की सीमा-रेखा खिंच गई है।
सुख-दुःख में पूरा मुहल्ला उपस्थित।बधाई और शोक — दोनों संदेश मोबाइल पर; उपस्थिति की जगह सूचना ने ले ली।
ज़रूरत की चीज़ें पड़ोस से माँग ली जाती थीं।दस मिनट में सब कुछ ऐप से घर आ जाता है — इसलिए माँगने का बहाना ही समाप्त हो गया।
शाम को चौपाल या चबूतरे पर बैठक।शाम टीवी और मोबाइल की स्क्रीन पर; ‘चौपाल’ अब ऑनलाइन समूह बन गया है।

कारण —

  • शहरीकरण और स्थानांतरण — नौकरी के लिए बार-बार शहर बदलना पड़ता है, इसलिए न कोई जड़ जमती है, न संबंध।
  • बहुमंज़िला आवास — फ़्लैट में लिफ़्ट है, आँगन नहीं। जहाँ साझा आँगन नहीं होता, वहाँ साझा जीवन भी नहीं बनता।
  • एकल परिवार और समय की कमी — माता-पिता दोनों कामकाजी; लौटने पर इतना समय ही नहीं बचता कि पड़ोस में बैठा जाए।
  • तकनीक — मनोरंजन, बातचीत, खरीदारी — सब स्क्रीन पर उपलब्ध। इससे सुविधा बढ़ी, पर आमने-सामने की भेंट घटी।
  • असुरक्षा और अविश्वास — अपराध की खबरें बढ़ने से अजनबी पर भरोसा घटा है; बच्चों को ‘किसी के घर मत जाना’ सिखाया जाता है।
  • प्रतिस्पर्धा और दिखावा — पड़ोसी अब साथी नहीं, तुलना का पैमाना बन गया है — किसकी गाड़ी बड़ी, किसके बच्चे के अंक अधिक।
क्या किया जा सकता है (कुछ करने योग्य सुझाव): मुहल्ले की सफ़ाई या वृक्षारोपण का साझा कार्यक्रम; एक साझा पुस्तक-अलमारी जिसमें सब पुस्तकें रखें और लें; त्योहार सामूहिक रूप से मनाना; बुज़ुर्ग पड़ोसियों से सप्ताह में एक बार मिलने जाना; और सबसे सरल — अपने पाँच पड़ोसियों के नाम याद रखना। संबंध नाम से ही शुरू होते हैं।
प्र11.
5. “क्या सुरुचि और सौंदर्य को आपके किसी काम से ठेस लगती है?” अपने घर/विद्यालय के आस-पास, सार्वजनिक संसाधनों और ऐतिहासिक महत्व के स्थानों की स्वच्छता एवं सौंदर्य को बनाए रखने के लिए आप और आपके सहपाठी, संबंधी क्या-क्या करते हैं?
उत्तर

लेखक ने इसे ‘सौंदर्य-बोध’ कहा है और चेतावनी दी है — “यदि आपका उत्तर हाँ है, तो आपके द्वारा देश के सौंदर्य-बोध को भयंकर आघात लग रहा है और आपके द्वारा देश की संस्कृति को गहरी चोट पहुँच रही है।” इसलिए यह उत्तर केवल सूची नहीं, अपने आचरण की जाँच है।

स्थानहम क्या करते हैंक्या नहीं करते (और क्यों)
घर और गलीगीला-सूखा कचरा अलग-अलग डिब्बों में डालते हैं; घर का कूड़ा गली में नहीं, कूड़ा-गाड़ी में देते हैं; त्योहारों के बाद अपनी गली स्वयं साफ़ करते हैं; दरवाज़े के सामने एक गमला रखते हैं।घर का कूड़ा बाहर नहीं फेंकते — क्योंकि गली भी किसी का घर है।
विद्यालयकक्षा में कागज़ के टुकड़े नहीं छोड़ते; ‘बाल संसद’/स्वच्छता-समिति में बारी-बारी ड्यूटी करते हैं; दीवार-पत्रिका बनाते हैं; पानी की टोंटी बंद करते हैं; मध्याह्न-भोजन के बाद अपना स्थान साफ़ करते हैं।बेंच और शौचालय की दीवारों पर कुछ नहीं लिखते — यह विद्यालय की, यानी अपनी ही, संपत्ति है।
सार्वजनिक संसाधन (बस, रेल, पार्क, अस्पताल)कतार में लगते हैं; बस-रेल में कचरा साथ लेकर उतरते हैं और डिब्बे में डालते हैं; पार्क की बेंच और झूले ठीक-ठाक रखते हैं; सार्वजनिक नल बंद करते हैं।ज़ीनों-कोनों में थूकते नहीं, न मेलों-रेलों में ‘ठेलमठेल’ करते हैं — निबंध में इन्हीं दोनों का नाम लिया गया है।
ऐतिहासिक स्थानभ्रमण से पहले नियम पढ़ते हैं; कचरा थैले में वापस लाते हैं; निर्देश-पट्टिकाओं का पालन करते हैं; ‘हेरिटेज वॉक’ में सहपाठियों को स्मारक की कहानी सुनाते हैं।दीवारों पर अपना या किसी का नाम नहीं लिखते — पुस्तक ने संकेत में यही उदाहरण दिया है। जो पत्थर सात सौ वर्ष से खड़ा है, उस पर एक दिन का नाम लिखना उसका अपमान है।
प्रकृतिपॉलिथीन की जगह कपड़े का थैला; जन्मदिन पर एक पौधा; नदी-तालाब में मूर्ति-विसर्जन के नियमों का पालन; पक्षियों के लिए गर्मी में पानी का सकोरा।पटाखों और लाउडस्पीकर से ध्वनि-प्रदूषण नहीं फैलाते — शोर भी सौंदर्य-बोध पर चोट है।
इन कामों का देश से क्या संबंध: लेखक कहता है कि ये ‘छोटी-छोटी बातें’ ही देश की संस्कृति बनाती हैं। विदेशी पर्यटक हमारे संविधान की पंक्तियाँ पढ़कर नहीं, हमारी सड़कों और स्मारकों को देखकर हमारी संस्कृति की राय बनाता है। इसीलिए एक केले का छिलका भी ‘निजी मामला’ नहीं रह जाता।
Try This — तीन-सप्ताह की चुनौती: कक्षा में एक चार्ट लगाइए जिसमें तीन कॉलम हों — मैंने आज क्या साफ़ किया / मैंने आज क्या गंदा नहीं किया / मैंने आज किसे रोका। तीसरा कॉलम सबसे कठिन है और सबसे ज़रूरी भी।
प्र12.
6. “मैं कोई ऐसा काम न करूँ जिससे मेरे देश की स्वतंत्रता को, दूसरे शब्दों में, उसके सम्मान को धक्का पहुँचे।” देश के सम्मान को धक्का न पहुँचे, इसके लिए क्या करें और क्या नहीं करें? अपने-अपने समूह में इसकी चर्चा कीजिए और चर्चा से उभरे बिंदुओं को प्रातःकालीन सभा में पढ़कर सुनाइए।
उत्तर

यह समूह-कार्य है, इसलिए उत्तर दो सूचियों के रूप में बनाइए — ‘करें’ और ‘न करें’। नीचे एक पूरी तैयार सूची और प्रातःकालीन सभा में पढ़ने योग्य नमूना भाषण दिया गया है।

क्षेत्रक्या करेंक्या न करें
वाणीअपने देश की कमियों पर बात करते समय समाधान भी बताएँ; अच्छे कामों की चर्चा उतने ही उत्साह से करें।रेलों, बसों, क्लबों और चौपालों पर अपने देश को दूसरे देशों से हीन सिद्ध करने की आदत न पालें — यही ‘शक्ति-बोध’ पर चोट है।
आचरणकतार में लगें; समय का पालन करें; सार्वजनिक संपत्ति की रक्षा करें; कहीं भी हों, नियम पढ़कर मानें।केले का छिलका सड़क पर, घर का कूड़ा बाहर, ज़ीनों-कोनों में पीक — कुछ भी नहीं। स्मारक पर नाम न लिखें।
ईमानदारीपरीक्षा में स्वयं लिखें; पुस्तकालय की पुस्तक समय पर, पूरी लौटाएँ; अपना काम अपने बल पर करें।नकल, चोरी और झूठ — जापान वाले विद्यार्थी का उदाहरण याद रखें, जिसकी एक चोरी से पूरे देश पर बोर्ड लग गया।
अंतरजाल (इंटरनेट)तथ्य जाँचकर ही कुछ साझा करें; अच्छी भाषा लिखें; अपने देश की उपलब्धियाँ साझा करें।अफ़वाह और घृणा-भाषा न फैलाएँ; किसी भाषा, प्रदेश या समुदाय का मज़ाक न उड़ाएँ — यह भीतर से देश को कमज़ोर करता है।
प्रतीक और संस्कृतिराष्ट्रगान के समय सावधान खड़े हों; ध्वज-संहिता जानें; अपनी भाषा और लोक-कला का सम्मान करें।तिरंगे के कागज़-प्लास्टिक झंडे 15 अगस्त के बाद सड़क पर न छोड़ें — यह सबसे आम और सबसे दुखद अनादर है।
नागरिकता18 वर्ष के होते ही मतदाता-सूची में नाम जुड़वाएँ; कर ईमानदारी से भरें; बिल लें और दें।“मेरे एक मत से क्या होगा” — यह वाक्य न कहें। लेखक इसी सोच को ‘जीवनशास्त्र का घोर अज्ञान’ कहता है।
नमूना उत्तर — प्रातःकालीन सभा के लिए (लगभग एक मिनट):
“आदरणीय प्रधानाचार्य महोदय, अध्यापकगण और मेरे प्यारे साथियो! आज हमारे समूह ने एक प्रश्न पर विचार किया — देश के सम्मान को धक्का न पहुँचे, इसके लिए हम क्या करें? हमें उत्तर अपनी पाठ्यपुस्तक गंगा के निबंध ‘मैं और मेरा देश’ में मिला। लेखक कन्हैयालाल मिश्र ‘प्रभाकर’ कहते हैं — ‘मैं और मेरा देश दो अलग चीजें तो हैं ही नहीं।’
जापान के एक साधारण युवक ने केवल फलों की एक टोकरी देकर अपने देश का सिर ऊँचा कर दिया, और एक विद्यार्थी ने पुस्तकालय की पुस्तक से चित्र निकालकर अपने पूरे देश पर प्रतिबंध लगवा दिया। दोनों ने ‘छोटा’ काम किया था — पर देश का नाम दोनों के साथ जुड़ गया।
इसलिए हमारे समूह ने तय किया है कि हम तीन काम करेंगे — पहला, कक्षा और गली में कचरा नियत स्थान पर ही डालेंगे; दूसरा, परीक्षा में नकल नहीं करेंगे; और तीसरा, कहीं भी अपने देश को हीन बताने वाली बात बिना जाँचे न कहेंगे, न आगे बढ़ाएँगे।
हमारा विश्वास है कि जिस दिन हर विद्यार्थी ये तीन छोटी बातें मान लेगा, उस दिन कोई बड़ी घोषणा किए बिना ही हमारे देश का सम्मान बढ़ जाएगा। धन्यवाद!”
समूह-चर्चा कैसे चलाएँ: पहले हर सदस्य दो मिनट में तीन बिंदु लिखे — बोलने से पहले लिखना ज़रूरी है, वरना केवल मुखर लोग बोलते रह जाते हैं। फिर सारे बिंदु बोर्ड पर लिखकर उन्हें ‘करें/न करें’ में छाँटिए। अंत में मत लेकर पाँच सबसे ज़रूरी बिंदु चुनिए — यही सभा में पढ़े जाएँगे। इससे चर्चा भाषण नहीं, निर्णय बनती है।
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