गंगा अध्याय 7 मेरी समझ मेरे विचार

अद्यतन2026-09-06

प्र1.
नीचे दिए गए प्रश्नों पर कक्षा में चर्चा कीजिए और उनके उत्तर लिखिए— 1. स्वामी रामतीर्थ फल देने वाले युवक का उत्तर सुनकर मुग्ध क्यों हो गए?
उत्तर

स्वामी रामतीर्थ इसलिए मुग्ध हुए क्योंकि उस साधारण-से जापानी युवक ने फलों का कोई दाम नहीं माँगा — उसने मूल्य के रूप में केवल अपने देश की प्रतिष्ठा माँगी।

घटना यह थी कि स्वामी जी जापान में रेल-यात्रा कर रहे थे, उन दिनों फल ही उनका भोजन था और एक दिन उन्हें फल न मिले। स्टेशन पर भी न मिलने पर उनके मुँह से निकल गया — “जापान में शायद अच्छे फल नहीं मिलते!” प्लेटफ़ॉर्म पर खड़ा एक युवक, जो अपनी पत्नी को रेल में बैठाने आया था, यह सुनकर अपनी बात बीच में छोड़कर भागा और कहीं दूर से ताजे फलों की एक टोकरी ले आया। स्वामी जी ने उसे फल बेचने वाला समझकर दाम पूछे, तो उसने लेने से इनकार कर दिया और बहुत आग्रह पर कहा — “आप इनका मूल्य देना ही चाहते हैं तो वह यह है कि आप अपने देश में जाकर किसी से यह न कहिएगा कि जापान में अच्छे फल नहीं मिलते।”

मुग्ध होने के तीन कारण:
  • देश-प्रेम की सजगता — युवक ने अपने देश के विरुद्ध कही गई एक साधारण-सी बात को भी अनसुना नहीं किया। उसे लगा कि यह बात भारत तक जाएगी और जापान की छवि पर दाग रहेगा।
  • निःस्वार्थ त्याग — उसने अपना काम छोड़ा, दूर तक दौड़कर फल लाए, अपने पैसे खर्च किए — और बदले में एक पैसा नहीं लिया। लाभ की जगह उसने केवल अपने देश का नाम चुना।
  • छोटे काम में बड़ी भावना — फलों की एक टोकरी कोई बड़ा काम नहीं है, पर उसके पीछे की भावना बहुत बड़ी थी। लेखक का सूत्र — “महत्व किसी कार्य की विशालता में नहीं है, उस कार्य के करने की भावना में है” — यहीं जीवित हो उठता है।
निबंध में इसका काम: लेखक ने यह घटना ‘अकेला चना क्या भाड़ फोड़े’ कहावत को झूठा सिद्ध करने के लिए दी है। एक अकेला, नाम-अनजान युवक भी अपने देश का गौरव बढ़ा सकता है — यही इस प्रसंग का उद्देश्य है, और यही देखकर स्वामी जी मुग्ध हुए।
प्र2.
2. जापान के युवक ने स्वामी रामतीर्थ को दिए गए फलों के मूल्य के रूप में क्या माँगा? आपके मन में उस युवक के व्यक्तित्व की कौन-सी छवि उभरती है, यह भी लिखिए।
उत्तर

उसने मूल्य के रूप में केवल एक वचन माँगा — “आप अपने देश में जाकर किसी से यह न कहिएगा कि जापान में अच्छे फल नहीं मिलते।” न रुपया, न धन्यवाद, न परिचय — केवल इतना कि उसके देश के बारे में कोई बुरी बात दूसरे देश तक न पहुँचे।

उसके व्यक्तित्व की छवि —

गुणघटना का वह अंश जिससे यह गुण दिखता है
प्रखर राष्ट्र-प्रेमीअपने देश के विषय में कही गई एक टिप्पणी भी उसे बेचैन कर देती है; वह उसे तुरंत, अपने खर्च पर, ग़लत सिद्ध करता है।
तत्पर और कर्मशील“सुनते ही वह अपनी बात बीच में छोड़कर भागा और कहीं दूर से एक टोकरी ताजे फल लाया।” वह सोचता नहीं रहा, दौड़ पड़ा — गाड़ी छूटने से पहले काम पूरा करना था।
निःस्वार्थ और स्वाभिमानीदाम लेने से इनकार — “उसने दाम लेने से इनकार कर दिया।” वह दान भी नहीं दे रहा, सौदा भी नहीं कर रहा; वह अपने देश की साख की रक्षा कर रहा है।
अतिथि-सत्कार में विनम्र“लीजिए, आपको ताजे फलों की जरूरत थी” — इस वाक्य में कोई अहसान नहीं, केवल सहज सेवा-भाव है।
दूरदर्शीवह जानता है कि एक यात्री की एक पंक्ति कल किसी और देश में हजारों लोगों की राय बन जाएगी। इसलिए वह मूल्य के रूप में वस्तु नहीं, वचन माँगता है।
सार में कहें तो: वह ऐसा साधारण नागरिक है जिसने अपने देश को अपने से अलग नहीं माना। उसके लिए ‘जापान की बदनामी’ और ‘अपनी बदनामी’ में कोई अंतर नहीं था — और यही निबंध की केंद्रीय बात है कि नागरिक और देश दो अलग चीजें नहीं हैं
प्र3.
3. “बात यह है कि मैं और मेरा देश दो अलग चीज तो हैं ही नहीं।” स्वयं को देश से अलग न मानने के पीछे क्या तर्क हो सकते हैं, उदाहरण देकर स्पष्ट कीजिए।
उत्तर

स्वयं को देश से अलग न मानने के पीछे मुख्यतः पाँच तर्क दिए जा सकते हैं, और निबंध हर तर्क के साथ एक उदाहरण भी देता है।

तर्कउदाहरण / प्रमाण
1. व्यक्ति का निर्माण ही समाज से होता है। मनुष्य अकेले नहीं बनता — घर, पड़ोस और नगर उसे गढ़ते हैं।“अपने नगर में घूम-फिरकर, वहाँ के विशाल समाज का संपर्क पा, वहाँ के संचित ज्ञान-भंडार का उपयोग कर… एक मनुष्य से भरा-पूरा नगर बनकर मैं खड़ा हुआ था।” यही सिलसिला आगे बढ़े तो नगर के बाद देश आता है।
2. देश की स्थिति नागरिक के गौरव को तय करती है। देश हीन हो तो व्यक्ति के सारे साधन बेकार हो जाते हैं।लाला लाजपत राय — “मैं अमेरिका गया, इंग्लैंड गया, फ्रांस गया… पर जहाँ भी मैं गया, भारतवर्ष की गुलामी की लज्जा का कलंक मेरे माथे पर लगा रहा।”
3. नागरिक का आचरण देश की छवि तय करता है। यह पहले तर्क का उलटा रास्ता है — और यही ‘गाँठ’ है।जापानी युवक ने फल देकर अपने देश का सिर ऊँचा किया; दूसरे देश के विद्यार्थी ने पुस्तकालय की पुस्तक से चित्र निकालकर अपने देश के मस्तक पर कलंक का टीका लगाया — और पुस्तकालय के बाहर लिख दिया गया कि उस देश का कोई निवासी भीतर नहीं आ सकता।
4. अधिकार और कर्तव्य एक ही सिक्के के दो पहलू हैं। जिससे हम सुरक्षा और सम्मान पाते हैं, उसकी रक्षा करना भी हमारा ही काम है।“जैसे मैं अपने सम्मान और साधनों से अपने जीवन में सहारा पाता हूँ, वैसे ही देश के सम्मान और साधनों से भी सहारा पाऊँ, यह मेरा अधिकार है” — और इससे पहले, “मैं कोई ऐसा काम न करूँ जिससे मेरे देश की स्वतंत्रता को… धक्का पहुँचे, यह मेरा कर्तव्य है।”
5. देश कोई अलग वस्तु नहीं, नागरिकों का ही जोड़ है। ‘देश’ का अर्थ केवल भौगोलिक सीमा नहीं, उसमें रहने वाले लोग हैं।“जीवन एक युद्ध है और युद्ध में लड़ना ही तो काम नहीं होता” — सैनिक, किसान, रसद पहुँचाने वाला और ‘जय बोलने वाला’, सब मिलकर ही देश बनते हैं। दर्शकों की तालियों से “खिलाड़ियों के पैरों में बिजली लग जाती है”।
अपने अनुभव से उदाहरण (नमूना): जब कोई भारतीय खिलाड़ी ओलंपिक में पदक जीतता है, तो पदक उसके गले में पड़ता है पर तिरंगा पूरे देश का उठता है — और हम, जिन्होंने कुछ नहीं किया, गर्व अनुभव करते हैं। इसके ठीक उलट, जब कोई यात्री विदेश में नियम तोड़ता है तो अख़बार उसका नाम नहीं, उसके देश का नाम छापते हैं। यही ‘गाँठ’ रोज़ हमारे आस-पास दिखती है।
निष्कर्ष: व्यक्ति और देश का रिश्ता माँ और संतान जैसा नहीं, अंग और शरीर जैसा है। अंग शरीर से अलग होकर न जीवित रहता है, न शरीर उसके बिना पूरा रहता है। इसीलिए लेखक कहता है — “मैं अपने देश का नागरिक हूँ और मानता हूँ कि मैं अपना देश हूँ।”
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