गंगा अध्याय 7 मेरे उत्तर मेरे तर्क

अद्यतन2026-09-06

प्र1.
निम्नलिखित प्रश्नों के सटीक उत्तर चुनिए और यह भी बताइए कि आपको ये उत्तर उपयुक्त क्यों लगते हैं? 1. “एक दिन आनंद की इस दीवार में दरार पड़ गई”, इस पंक्ति में रेखांकित शब्द ‘दरार’ किस ओर संकेत करता है? (क) पूर्णता के भाव की तुष्टि (ख) पारस्परिक संबंध टूटने की स्थिति (ग) पूर्णता के भाव पर प्रहार (घ) सुख-सुविधाओं का अभाव
उत्तर

सटीक उत्तर — (ग) पूर्णता के भाव पर प्रहार

यह उत्तर क्यों उपयुक्त है: ‘दीवार’ यहाँ ईंट-गारे की नहीं है। लेखक स्वयं आगे स्पष्ट कर देता है — “यह दीवार थी मानसिक विचारों की; इसलिए यह भूकंप भी किसी प्रांत या प्रदेश में नहीं उठा, मेरे मानस में ही उठा था।” जिस विचार की यह दीवार थी, वह था अपनी पूर्णता का भाव — “मैं समझ रहा था कि मैं अपने में अब पूरा हो गया हूँ, पूरा फैल गया हूँ, पूरा मनुष्य हो गया हूँ… वाह कैसी सुंदर, कैसी संगठित और कैसी पूर्ण है मेरी स्थिति!” लाला लाजपत राय के एक वाक्य ने इसी भाव को तोड़ दिया — “वह अनुभव ही तो वह भूकंप था, जिसने मेरी पूर्णता को एक ही ठसक में अपूर्णता की कसक से भर दिया।” अतः ‘दरार’ पूर्णता के भाव पर पड़ी चोट का प्रतीक है।
विकल्पसही / ग़लतकारण
(क) पूर्णता के भाव की तुष्टिग़लत‘तुष्टि’ का अर्थ है संतोष, तृप्ति। दरार पड़ने से संतोष बढ़ा नहीं, टूटा। दरार के तुरंत बाद लेखक कहता है — “मेरी स्थिति एकदम हीन है”। यह तुष्टि का नहीं, अतृप्ति का वाक्य है।
(ख) पारस्परिक संबंध टूटने की स्थितिग़लत‘दरार’ शब्द का यह लाक्षणिक अर्थ होता तो है (पुस्तक ने ‘व्याकरण की बात’ में यही उदाहरण भी दिया है — “उनके संबंधों में दरार पड़ गई”), पर इस पंक्ति में लेखक का किसी से संबंध नहीं टूटा। उसका नगर, पड़ोस, घर सब ज्यों-का-त्यों है; टूटा केवल उसका आत्म-संतोष है।
(ग) पूर्णता के भाव पर प्रहारसही ✓दीवार = पूर्णता का मानसिक भाव; भूकंप = लालाजी का अनुभव; दरार = उस भाव पर पड़ी चोट। तीनों कड़ियाँ पाठ में शब्दशः मौजूद हैं।
(घ) सुख-सुविधाओं का अभावग़लतसुविधाओं का अभाव था ही नहीं। लेखक कहता है — “ममता, सहारा, ज्ञान और आनंद के उपहार पाकर भी…”। यानी सब कुछ पाकर भी वह हीन अनुभव कर रहा है — कमी साधनों की नहीं, गौरव की है।
ध्यान दीजिए: निबंध की पूरी रचना ही रूपक पर टिकी है — दीवार (पूर्णता का भाव) → भूकंप (लालाजी का अनुभव) → दरार (आत्म-गौरव पर चोट)। तीनों को अलग-अलग नहीं, एक शृंखला के रूप में पढ़िए, तभी उत्तर स्वयं खुल जाता है।
प्र2.
2. निबंध में कहा गया है कि “ऐसे प्रश्नों का उत्तर देने में एक अपूर्व आनंद आता है।” लेखक को किस तरह के प्रश्नों का उत्तर देने में आनंद की अनुभूति होती है? (क) बात को विस्तार देने वाले प्रश्नों का (ख) बात का निष्कर्ष प्रस्तुत करने वाले प्रश्नों का (ग) बिना किसी संदर्भ के पूछे गए प्रश्नों का (घ) किसी की समझ का आकलन करने वाले प्रश्नों का
उत्तर

सटीक उत्तर — (क) बात को विस्तार देने वाले प्रश्नों का

यह उत्तर क्यों उपयुक्त है: ‘अपूर्व आनंद’ वाली पंक्ति से ठीक पहले लेखक स्वयं कारण गिना देता है — “बड़े महत्व का प्रश्न है। इस अर्थ में भी कि यह बात को खिलने का, आगे बढ़ने का अवसर देता है और इस अर्थ में भी कि ठीक समय पर पूछा गया है।” ‘बात का खिलना’ और ‘आगे बढ़ना’ — यही तो विस्तार है। जो प्रश्न बातचीत का दरवाज़ा और चौड़ा कर दे, लेखक को उसी का उत्तर देने में आनंद आता है। यही कारण है कि आगे भी जब पाठक पूछता है, तो लेखक कहता है — “वाह, खूब सवाल पूछा है आपने। सवाल क्या, बातचीत में आपने तो एक कीमती मोती ही जड़ दिया यह।”
विकल्पसही / ग़लतकारण
(क) बात को विस्तार देने वाले प्रश्नों कासही ✓“बात को खिलने का, आगे बढ़ने का अवसर देता है” — यह वाक्य सीधे इसी विकल्प का पर्याय है।
(ख) बात का निष्कर्ष प्रस्तुत करने वाले प्रश्नों काग़लतनिष्कर्ष का अर्थ है बात को समेट देना। लेखक तो बात को खोलना चाहता है। निबंध में निष्कर्ष सबसे अंत में आता है — “ठीक मनुष्य को अपना मत दें” — बीच के प्रश्न उसे रोकते नहीं, उस तक पहुँचाते हैं।
(ग) बिना किसी संदर्भ के पूछे गए प्रश्नों काग़लतलेखक ने प्रश्न की तारीफ़ ही इसलिए की कि वह “ठीक समय पर पूछा गया है”। समय और संदर्भ का ध्यान रखना ही प्रश्न का गुण बताया गया है — निःसंदर्भ प्रश्न उसका उलटा है।
(घ) किसी की समझ का आकलन करने वाले प्रश्नों काग़लतयह परीक्षा का प्रश्न होता है, बातचीत का नहीं। निबंध में पाठक लेखक को परखने नहीं, समझने के लिए पूछ रहा है। ऐसा कोई संकेत पाठ में नहीं है।
प्र3.
3. “अपने महान राष्ट्र की पराधीनता के दीन दिनों में जिन लोगों ने अपने रक्त से गौरव के दीपक जलाए”, इस वाक्य में पराधीनता के दिनों को दीन कहा गया है क्योंकि पराधीन भारत में— (क) भोजन, आवास और वस्त्र जैसी मूलभूत सुविधाओं का अभाव था। (ख) लोगों के आत्मसम्मान और गौरव की भावना का दमन होता था। (ग) महत्वपूर्ण निर्णय लेने की स्वतंत्रता थी। (घ) धार्मिक रीति-रिवाजों को मनाने पर रोक लगाई जाती थी।
उत्तर

सटीक उत्तर — (ख) लोगों के आत्मसम्मान और गौरव की भावना का दमन होता था।

यह उत्तर क्यों उपयुक्त है: पूरे निबंध में पराधीनता की पीड़ा पेट की नहीं, माथे की बताई गई है। लाला लाजपत राय का वाक्य ही प्रमाण है — “जहाँ भी मैं गया, भारतवर्ष की गुलामी की लज्जा का कलंक मेरे माथे पर लगा रहा।” ‘लज्जा’ और ‘कलंक’ — दोनों सम्मान से जुड़े शब्द हैं। लेखक की अपनी शिकायत भी यही है — “मेरा कहीं भी और कोई भी अपमान कर सकता है — एक मामूली अपराधी की तरह और मुझे यह भी अधिकार नहीं कि… अपील या दया-प्रार्थना ही कर सकूँ।” और निष्कर्ष तो और साफ़ है — “यदि स्वर्ग के भी सब उपहार और साधन हों, पर उसका देश गुलाम हो… तो वे सारे उपहार और साधन उसे गौरव नहीं दे सकते।” इसीलिए वे दिन ‘दीन’ अर्थात हीन, दयनीय, आत्मगौरव से रीते दिन थे।
विकल्पसही / ग़लतकारण
(क) मूलभूत सुविधाओं का अभावग़लतनिबंध यह बात कहीं नहीं कहता। उलटे, लेखक के पास घर, पड़ोस, नगर, ज्ञान, सेवाएँ — सब कुछ था; लालाजी संसार-भ्रमण कर रहे थे। कमी साधन की नहीं, सम्मान की थी।
(ख) आत्मसम्मान और गौरव की भावना का दमनसही ✓‘लज्जा का कलंक’, ‘अपमान’, ‘गौरव नहीं दे सकते’ — पाठ के ये तीनों संकेत एक ही दिशा में जाते हैं।
(ग) महत्वपूर्ण निर्णय लेने की स्वतंत्रता थीग़लतयह वाक्य ही उलटा है। पराधीनता का अर्थ ही है निर्णय की स्वतंत्रता का होना। यदि स्वतंत्रता होती तो दिन ‘दीन’ क्यों कहलाते?
(घ) धार्मिक रीति-रिवाजों पर रोकग़लतनिबंध का विषय धर्म है ही नहीं। ‘मैं और मेरा देश’ नागरिक के सम्मान, कर्तव्य और अधिकार की बात करता है — धार्मिक प्रतिबंध का कोई उल्लेख पूरे पाठ में नहीं है।
शब्द पर ध्यान: ‘दीन’ का अर्थ है — गरीब, दयनीय, हीन। पर यहाँ यह विशेषण दिनों के लिए आया है, लोगों की जेब के लिए नहीं। इसीलिए इसका सही अर्थ है — ऐसे दिन जिनमें राष्ट्र का माथा झुका हुआ था
प्र4.
4. निबंध के अनुसार मनुष्य साधन-संपन्न होते हुए भी गौरव का अनुभव नहीं कर सकते यदि— (क) उन्हें विदेश भ्रमण के अवसर न मिलें। (ख) उनका देश किसी दूसरे देश के अधीन हो। (ग) उनके नगर की शासन प्रणाली कमजोर हो। (घ) अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का हनन होता हो।
उत्तर

सटीक उत्तर — (ख) उनका देश किसी दूसरे देश के अधीन हो।

यह उत्तर क्यों उपयुक्त है: यहाँ अनुमान लगाने की भी जरूरत नहीं — लेखक ने वाक्य लगभग इन्हीं शब्दों में लिखा है — “किसी मनुष्य के पास संसार के ही नहीं, यदि स्वर्ग के भी सब उपहार और साधन हों, पर उसका देश गुलाम हो या किसी भी दूसरे रूप में हीन हो तो वे सारे उपहार और साधन उसे गौरव नहीं दे सकते।” ‘गुलाम होना’ ही ‘किसी दूसरे देश के अधीन होना’ है। लालाजी इसका जीवंत प्रमाण हैं — साधन, यश, व्यक्तित्व, विश्व-भ्रमण सब उनके पास था, फिर भी माथे पर कलंक ही रहा।
विकल्पसही / ग़लतकारण
(क) विदेश भ्रमण के अवसर न मिलेंग़लतयह तो उलटा उदाहरण है। लालाजी को अवसर मिला ही — “मैं अमेरिका गया, इंग्लैंड गया, फ्रांस गया” — फिर भी गौरव नहीं मिला। इससे सिद्ध होता है कि भ्रमण गौरव की शर्त नहीं है।
(ख) उनका देश किसी दूसरे देश के अधीन होसही ✓“उसका देश गुलाम हो… तो वे सारे उपहार और साधन उसे गौरव नहीं दे सकते” — पाठ का सीधा कथन।
(ग) नगर की शासन प्रणाली कमजोर होग़लतनिबंध में लेखक का नगर तो उसे सब कुछ दे रहा था — ममता, ज्ञान, सम्मान, सहारा। समस्या नगर की नहीं, राष्ट्र की स्थिति से जुड़ी है। निबंध बार-बार ‘देश’ शब्द दोहराता है, ‘नगर’ को वह पीछे छोड़ चुका है।
(घ) अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का हनन होग़लतयह भी पराधीनता का एक परिणाम हो सकता है, पर निबंध इसे कारण के रूप में नहीं गिनाता। लेखक ने जो एक ही शर्त लिखी है वह है — देश का गुलाम या हीन होना। परीक्षा में वही उत्तर सही होता है जो पाठ में लिखा हो, जो केवल संभव हो वह नहीं।
प्र5.
5. “पर उन दो घटनाओं में वह गाँठ इतनी साफ है”, इस वाक्य में रेखांकित शब्द ‘गाँठ’ किन दो बातों को साथ बाँधती है? (क) देश और नागरिक (ख) देश और संविधान (ग) देश और विदेश (घ) व्यवसाय और आजीविका
उत्तर

सटीक उत्तर — (क) देश और नागरिक

यह उत्तर क्यों उपयुक्त है: उत्तर उसी वाक्य के दूसरे आधे भाग में लिखा हुआ है — “उन दो घटनाओं में वह गाँठ इतनी साफ है, जो नागरिक और देश को एक साथ बाँधती है, कि आप दो बड़ी-बड़ी पुस्तकें पढ़कर भी उसे इतना साफ नहीं देख सकते।” ‘दो घटनाएँ’ भी यही सिद्ध करती हैं — जापानी युवक ने फल भेंट कर अपने देश का सिर ऊँचा किया, और चित्र चुराने वाले विद्यार्थी ने अपने देश के मस्तक पर कलंक का टीका लगा दिया। दोनों बार काम एक नागरिक ने किया और नाम देश का हुआ — यही वह ‘गाँठ’ है। इसी को लेखक आगे प्रश्न-रूप में दोहराता है — “देश की हीनता और गौरव का ही फल उसे नहीं मिलता, उसकी हीनता और गौरव का फल भी उसके देश को मिलता है?”
विकल्पसही / ग़लतकारण
(क) देश और नागरिकसही ✓वाक्य में ही शब्दशः लिखा है — “जो नागरिक और देश को एक साथ बाँधती है”।
(ख) देश और संविधानग़लतसंविधान की चर्चा अभ्यास के ‘अधिकार और कर्तव्य’ शीर्षक में आती है, निबंध के इस प्रसंग में नहीं। दोनों घटनाओं में कोई कानून नहीं, केवल एक-एक युवक का आचरण है।
(ग) देश और विदेशग़लतघटनाएँ विदेश (जापान) में घटती अवश्य हैं, पर गाँठ देशों के बीच नहीं है। जापान तो केवल मंच है; बँधे हुए हैं युवक और उसका अपना देश।
(घ) व्यवसाय और आजीविकाग़लतनिबंध का विषय ही नहीं। जापानी युवक ने तो दाम लेने से इनकार कर दिया था — वह विक्रेता था ही नहीं, स्वामी जी की यह भूल थी।
प्र6.
6. प्रस्तुत निबंध में मुख्यतः कौन-सा भाव व्यक्त हुआ है? (क) लोकतांत्रिक शासन व्यवस्था (ख) पारिवारिक संबंधों का महत्व (ग) व्यक्ति और देश का अंतर्सबंध (घ) देश का महत्व और व्यक्ति की उपेक्षा
उत्तर

सटीक उत्तर — (ग) व्यक्ति और देश का अंतर्संबंध

यह उत्तर क्यों उपयुक्त है: निबंध का शीर्षक ही ‘मैं और मेरा देश’ है — ‘और’ ही उस संबंध का सेतु है। लेखक स्वयं सारे तर्कों का निचोड़ एक वाक्य में रख देता है — “बात यह है कि मैं और मेरा देश दो अलग चीजें तो हैं ही नहीं।” पूरी रचना इसी एक भाव के इर्द-गिर्द बुनी गई है — पहले ‘मैं’ का विस्तार (घर → पड़ोस → नगर), फिर उस विस्तार में पड़ी दरार (देश गुलाम है), फिर दो घटनाओं से नागरिक और देश की ‘गाँठ’, फिर भावना का महत्व, और अंत में कर्तव्य (ठीक मनुष्य को मत देना) तथा अधिकार (मेरा मत लिए बिना कोई कुरसी पर न बैठे)। ये सब एक ही केंद्रीय भाव की शाखाएँ हैं।
विकल्पसही / ग़लतकारण
(क) लोकतांत्रिक शासन व्यवस्थाग़लतचुनाव की चर्चा निबंध के अंतिम अंश में आती है, और वह भी ‘कसौटी’ के रूप में — कि नागरिक की समझ से देश की उच्चता तोली जाए। यह मुख्य भाव का एक उदाहरण है, स्वयं मुख्य भाव नहीं।
(ख) पारिवारिक संबंधों का महत्वग़लतघर और पड़ोस केवल आरंभिक भूमिका हैं, जिनके सहारे लेखक ‘मैं’ का दायरा बढ़ाता है। तीसरे ही अनुच्छेद में वह नगर तक और फिर देश तक पहुँच जाता है।
(ग) व्यक्ति और देश का अंतर्संबंधसही ✓“मैं और मेरा देश दो अलग चीजें तो हैं ही नहीं” — यही निबंध का केंद्रीय वाक्य है, और शीर्षक भी यही कहता है।
(घ) देश का महत्व और व्यक्ति की उपेक्षाग़लतनिबंध व्यक्ति की उपेक्षा करता ही नहीं। वह साफ़ कहता है — “उसके एक नागरिक के रूप में मेरा यह अधिकार भी है कि अपने देश के सम्मान का पूरा-पूरा भाग मुझे मिले।” कर्तव्य और अधिकार दोनों बराबर तौले गए हैं।
‘मुख्यतः’ शब्द पर ध्यान दीजिए: ऐसे प्रश्नों में वह विकल्प चुनिए जो पूरी रचना पर लागू हो, न कि वह जो किसी एक अनुच्छेद पर। विकल्प (क) दो अनुच्छेदों पर लागू होता है, (ख) एक पर — पर (ग) पहली पंक्ति से अंतिम पंक्ति तक लागू होता है।
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