प्र1.
[पुस्तक में इस रचना पर कोई प्रश्न नहीं दिया गया है — यह अतिरिक्त पठन के लिए है।] ‘साथ-साथ पढ़ें’ के अंतर्गत दी गई रचना ‘निर्मल जीत सिंह सेखों’ का सार अपने शब्दों में लिखिए।
उत्तर
यह रचना परम वीर चक्र विजेता फ्लाइंग ऑफिसर निर्मल जीत सिंह सेखों की जीवन-गाथा है। इसके तीन हिस्से हैं — जीवन-परिचय, ‘आसमान की सुरक्षा’ और ‘प्रशस्ति पत्र’।
| चरण | तथ्य |
|---|---|
| जन्म और परिवार | सरदार त्रिलोक सिंह सेखों और हरबंस कौर के पुत्र। जन्म 17 जुलाई 1945। गाँव इसवाल, लुधियाना (पंजाब) के समीप — हलवारा एयरफोर्स स्टेशन के पास। संभवतः इसीलिए वे बचपन से ही वायुयानों की ओर आकर्षित रहे। पिता भारतीय वायुसेना में सेवा दे चुके थे, और उन्हें उन्नीसवीं शताब्दी के प्रसिद्ध योद्धा हरी सिंह नलवा की कहानियों से विशेष लगाव था। |
| शिक्षा | लुधियाना के समीप अजितसर मोहे स्थित खालसा हाई स्कूल से शिक्षा; मैट्रिक में प्रथम श्रेणी। सन् 1962 में दयालबाग इंजीनियरिंग कॉलेज, आगरा में प्रवेश; एन.सी.सी. कैडेट रहते हुए एरो-मॉडलिंग में गहरी रुचि। 1965 के युद्ध के बाद वायुसेना में जाने का सपना पूरा करने के लिए इंजीनियरिंग की पढ़ाई बीच में ही छोड़ दी। |
| वायुसेना में | 4 जून 1967 को नियुक्ति। लंबी कद-काठी के कारण छोटे लड़ाकू विमान ‘नैट’ में बैठना असहज था, पर वे शीघ्र ही उसे उड़ाने में सिद्धहस्त हो गए। उदार और मैत्रीपूर्ण स्वभाव के कारण सब उन्हें प्यार से ‘भाई’ कहते थे। अक्टूबर 1968 में वे ‘फ्लाइंग बुलेट्स’ कही जाने वाली 18वीं स्क्वाड्रन में फ्लाइंग ऑफिसर के रूप में शामिल हुए। |
| 1971 और श्रीनगर | 1971 में पाकिस्तान ने भारत के उत्तर-पश्चिमी भागों पर हवाई हमले से युद्ध छेड़ दिया। सन् 1948 के एक अंतरराष्ट्रीय समझौते के कारण भारत श्रीनगर में हवाई सुरक्षा के लिए एयरक्राफ्ट नहीं रख सकता था, पर युद्ध के कारण कश्मीर घाटी की रक्षा हेतु वहाँ ‘नैट’ की टुकड़ी रखी गई — सेखों इसी टुकड़ी में थे। उन्होंने भयानक ठंड के अनुकूल स्वयं को ढाल लिया। |
| 14 दिसंबर 1971 | पेशावर से उड़े पाकिस्तानी वायुसेना के एफ-86 सेबर जेट फाइटरों ने श्रीनगर हवाई क्षेत्र पर हमला किया। सेखों उस समय रेडिनेस ड्यूटी पर थे। जान की परवाह किए बिना वे नैट लेकर उड़ पड़े। परिस्थितियाँ प्रतिकूल थीं, फिर भी उन्होंने छह सेबर विमानों को मार्ग में रोका और आक्रमण कर दिया। कंट्रोल रूम को उनका संदेश था — “मैं दो सेबर फाइटर एयरक्राफ्ट के पीछे लगा हूँ। मैं उन्हें भागने नहीं दूँगा।” प्रशस्ति पत्र के अनुसार उन्होंने एक विमान मार गिराया और दूसरे को आग के हवाले कर दिया। तभी चार और शत्रु-विमानों ने उन्हें घेर लिया — एक के पीछे चार। वृक्ष जितनी ऊँचाई पर लड़ी गई उस लड़ाई में अंततः संख्या-बल भारी पड़ा; उनका विमान गिरकर ध्वस्त हो गया और वे वीरगति को प्राप्त हुए। |
| सम्मान और स्मृति | आयु मात्र 26 वर्ष। पत्नी मनजीत सेखों से विवाह हुए केवल दस माह हुए थे। वे भारतीय वायुसेना के एकमात्र परम वीर चक्र विजेता हैं। 7 अक्टूबर 1982 को वायुसेना की पचासवीं वर्षगाँठ पर विशेष डाक आवरण; सन् 2000 में उनके सम्मान में डाक टिकट; लुधियाना जिला न्यायालय के प्रांगण तथा एयरफोर्स म्यूजियम, पालम (नई दिल्ली) में नैट एयरक्राफ्ट के साथ उनकी प्रतिमा। चेतन आनंद निर्देशित फिल्म ‘हिन्दुस्तान की कसम’ (1973) वायुसेना के 1971 के इसी गौरवशाली अध्याय पर आधारित है। गजट ऑफ इंडिया अधिसूचना सं. 7-प्रेसी./72 द्वारा उन्हें यह सम्मान दिया गया। |
रचना का संदेश: प्रशस्ति पत्र के शब्दों में — “ऐसे समय में जब मृत्यु निश्चित थी, फ्लाइंग ऑफिसर सेखों ने सर्वोच्च वीरता, हवाई रण-कौशल और असाधारण संकल्प का परिचय अपने निहित कर्तव्यों से भी ऊपर उठकर देते हुए वायुसेना की परंपराओं को नई ऊँचाइयाँ दीं।” यही इस गाथा की धुरी है — कर्तव्य वह न्यूनतम है जो निभाना ही है; वीरता वह है जो उससे आगे जाती है।