गंगा अध्याय 7 साथ-साथ पढ़ें

अद्यतन2026-09-06

प्र1.
[पुस्तक में इस रचना पर कोई प्रश्न नहीं दिया गया है — यह अतिरिक्त पठन के लिए है।] ‘साथ-साथ पढ़ें’ के अंतर्गत दी गई रचना ‘निर्मल जीत सिंह सेखों’ का सार अपने शब्दों में लिखिए।
उत्तर

यह रचना परम वीर चक्र विजेता फ्लाइंग ऑफिसर निर्मल जीत सिंह सेखों की जीवन-गाथा है। इसके तीन हिस्से हैं — जीवन-परिचय, ‘आसमान की सुरक्षा’ और ‘प्रशस्ति पत्र’।

चरणतथ्य
जन्म और परिवारसरदार त्रिलोक सिंह सेखों और हरबंस कौर के पुत्र। जन्म 17 जुलाई 1945। गाँव इसवाल, लुधियाना (पंजाब) के समीप — हलवारा एयरफोर्स स्टेशन के पास। संभवतः इसीलिए वे बचपन से ही वायुयानों की ओर आकर्षित रहे। पिता भारतीय वायुसेना में सेवा दे चुके थे, और उन्हें उन्नीसवीं शताब्दी के प्रसिद्ध योद्धा हरी सिंह नलवा की कहानियों से विशेष लगाव था।
शिक्षालुधियाना के समीप अजितसर मोहे स्थित खालसा हाई स्कूल से शिक्षा; मैट्रिक में प्रथम श्रेणी। सन् 1962 में दयालबाग इंजीनियरिंग कॉलेज, आगरा में प्रवेश; एन.सी.सी. कैडेट रहते हुए एरो-मॉडलिंग में गहरी रुचि। 1965 के युद्ध के बाद वायुसेना में जाने का सपना पूरा करने के लिए इंजीनियरिंग की पढ़ाई बीच में ही छोड़ दी।
वायुसेना में4 जून 1967 को नियुक्ति। लंबी कद-काठी के कारण छोटे लड़ाकू विमान ‘नैट’ में बैठना असहज था, पर वे शीघ्र ही उसे उड़ाने में सिद्धहस्त हो गए। उदार और मैत्रीपूर्ण स्वभाव के कारण सब उन्हें प्यार से ‘भाई’ कहते थे। अक्टूबर 1968 में वे ‘फ्लाइंग बुलेट्स’ कही जाने वाली 18वीं स्क्वाड्रन में फ्लाइंग ऑफिसर के रूप में शामिल हुए।
1971 और श्रीनगर1971 में पाकिस्तान ने भारत के उत्तर-पश्चिमी भागों पर हवाई हमले से युद्ध छेड़ दिया। सन् 1948 के एक अंतरराष्ट्रीय समझौते के कारण भारत श्रीनगर में हवाई सुरक्षा के लिए एयरक्राफ्ट नहीं रख सकता था, पर युद्ध के कारण कश्मीर घाटी की रक्षा हेतु वहाँ ‘नैट’ की टुकड़ी रखी गई — सेखों इसी टुकड़ी में थे। उन्होंने भयानक ठंड के अनुकूल स्वयं को ढाल लिया।
14 दिसंबर 1971पेशावर से उड़े पाकिस्तानी वायुसेना के एफ-86 सेबर जेट फाइटरों ने श्रीनगर हवाई क्षेत्र पर हमला किया। सेखों उस समय रेडिनेस ड्यूटी पर थे। जान की परवाह किए बिना वे नैट लेकर उड़ पड़े। परिस्थितियाँ प्रतिकूल थीं, फिर भी उन्होंने छह सेबर विमानों को मार्ग में रोका और आक्रमण कर दिया। कंट्रोल रूम को उनका संदेश था — “मैं दो सेबर फाइटर एयरक्राफ्ट के पीछे लगा हूँ। मैं उन्हें भागने नहीं दूँगा।” प्रशस्ति पत्र के अनुसार उन्होंने एक विमान मार गिराया और दूसरे को आग के हवाले कर दिया। तभी चार और शत्रु-विमानों ने उन्हें घेर लिया — एक के पीछे चार। वृक्ष जितनी ऊँचाई पर लड़ी गई उस लड़ाई में अंततः संख्या-बल भारी पड़ा; उनका विमान गिरकर ध्वस्त हो गया और वे वीरगति को प्राप्त हुए।
सम्मान और स्मृतिआयु मात्र 26 वर्ष। पत्नी मनजीत सेखों से विवाह हुए केवल दस माह हुए थे। वे भारतीय वायुसेना के एकमात्र परम वीर चक्र विजेता हैं। 7 अक्टूबर 1982 को वायुसेना की पचासवीं वर्षगाँठ पर विशेष डाक आवरण; सन् 2000 में उनके सम्मान में डाक टिकट; लुधियाना जिला न्यायालय के प्रांगण तथा एयरफोर्स म्यूजियम, पालम (नई दिल्ली) में नैट एयरक्राफ्ट के साथ उनकी प्रतिमा। चेतन आनंद निर्देशित फिल्म ‘हिन्दुस्तान की कसम’ (1973) वायुसेना के 1971 के इसी गौरवशाली अध्याय पर आधारित है। गजट ऑफ इंडिया अधिसूचना सं. 7-प्रेसी./72 द्वारा उन्हें यह सम्मान दिया गया।
रचना का संदेश: प्रशस्ति पत्र के शब्दों में — “ऐसे समय में जब मृत्यु निश्चित थी, फ्लाइंग ऑफिसर सेखों ने सर्वोच्च वीरता, हवाई रण-कौशल और असाधारण संकल्प का परिचय अपने निहित कर्तव्यों से भी ऊपर उठकर देते हुए वायुसेना की परंपराओं को नई ऊँचाइयाँ दीं।” यही इस गाथा की धुरी है — कर्तव्य वह न्यूनतम है जो निभाना ही है; वीरता वह है जो उससे आगे जाती है।
प्र2.
‘साथ-साथ पढ़ें’ की यह रचना ‘मैं और मेरा देश’ निबंध के किन-किन विचारों को जीवन में उतरता हुआ दिखाती है? स्पष्ट कीजिए।
उत्तर

यह रचना संयोग से यहाँ नहीं रखी गई है। निबंध जो बातें तर्क से कहता है, यह गाथा उन्हीं को घटना बनाकर दिखा देती है।

‘मैं और मेरा देश’ का विचारसेखों की गाथा में वह कैसे उतरा
“मैं और मेरा देश दो अलग चीजें तो हैं ही नहीं।”छब्बीस वर्ष का एक युवक, जिसका विवाह दस माह पहले हुआ था, अपने जीवन और देश के बीच कोई रेखा नहीं खींचता। उसके लिए ‘मेरी जान’ और ‘मेरा देश’ एक ही हैं — इसलिए चुनने का प्रश्न ही नहीं उठता।
“अकेला चना क्या भाड़ फोड़े— यह कहावत… सौ फीसदी झूठ है।”एक अकेला नैट विमान छह सेबर जेटों के सामने। “हालाँकि बराबरी की टक्कर न होते हुए भी फ्लाइंग ऑफिसर सेखों ने अकेले ही दुश्मनों को पूरी टक्कर दी।” अकेले चने ने सचमुच भाड़ फोड़ा।
“देश की हीनता और गौरव का फल… उसकी हीनता और गौरव का फल भी उसके देश को मिलता है।”एक व्यक्ति की वीरता से पूरी वायुसेना का गौरव बढ़ा — “उनके निर्भीक हवाई युद्ध ने शत्रु चालकों के इरादों पर सेंध लगा दी, जिसके कारण वे कश्मीर में कोई विशिष्ट सफलता प्राप्त न कर सके।”
“जीवन एक युद्ध है और युद्ध में लड़ना ही तो काम नहीं होता।”यहाँ रूपक अपने शाब्दिक रूप में आ जाता है। और साथ ही यह भी दिखता है कि सेखों को वहाँ तक पहुँचाने में कितने लोग लगे — पिता, विद्यालय, एन.सी.सी., कंट्रोल रूम, ज़मीनी दल। लड़ा एक, पर पीछे पूरी शृंखला थी।
“महत्व किसी कार्य की विशालता में नहीं है, उस कार्य के करने की भावना में है।”उड़ान के समय परिस्थितियाँ प्रतिकूल थीं और सफलता की संभावना क्षीण। फिर भी उड़ान भरी गई — क्योंकि पीछे भावना थी, गणित नहीं।
“मेरा कर्तव्य है कि… मैं कोई ऐसा काम न करूँ जिससे मेरे देश की स्वतंत्रता को… धक्का पहुँचे।”प्रशस्ति पत्र इससे भी आगे जाता है — उन्होंने वीरता का परिचय “अपने निहित कर्तव्यों से भी ऊपर उठकर” दिया। निबंध कर्तव्य की न्यूनतम रेखा बताता है; सेखों उसकी अधिकतम सीमा दिखा देते हैं।
“जिन लोगों ने अपने रक्त से गौरव के दीपक जलाए…”लेखक ने यह पंक्ति स्वतंत्रता सेनानियों के लिए लिखी थी। यह गाथा बताती है कि वह परंपरा 1947 पर समाप्त नहीं हुई — 1971 में भी वह दीपक जलता रहा।
एक और सूत्र: निबंध में लेखक कहता है कि साधारण नागरिक भी बहुत कुछ कर सकता है — कोई ‘जय बोलकर’, कोई ‘रसद पहुँचाकर’। इस गाथा को पढ़ने के बाद यह भी समझ आता है कि सबसे आगे खड़े व्यक्ति को हमारा क्या देना बनता है — याद रखना। इसीलिए डाक टिकट जारी होते हैं, प्रतिमाएँ लगती हैं और वीरगाथा जैसी पुस्तकें छपती हैं। पढ़ना भी एक तरह की कृतज्ञता है।
प्र3.
‘प्रशस्ति पत्र’ किसे कहते हैं? फ्लाइंग ऑफिसर निर्मल जीत सिंह सेखों के प्रशस्ति पत्र की भाषा और शैली की विशेषताएँ बताइए। साथ ही अपने विद्यालय के किसी व्यक्ति के लिए एक प्रशस्ति पत्र तैयार कीजिए।
उत्तर

प्रशस्ति पत्र वह औपचारिक लेख है जिसमें किसी व्यक्ति के असाधारण कार्य का विवरण देकर उसे सार्वजनिक रूप से सम्मानित किया जाता है। वीरता-पदकों के साथ जारी होने वाला प्रशस्ति पत्र (citation) राजपत्र में प्रकाशित होता है — यहाँ भी नीचे लिखा है, ‘गजट ऑफ इंडिया नोटिफिकेशन, सं. 7-प्रेसी./72’।

विशेषताप्रशस्ति पत्र से उदाहरण
1. पहचान से आरंभ“फ्लाइंग ऑफिसर निर्मल जीत सिंह सेखों (10877), फ्लाइंग ब्रांच (पायलट)” — नाम, पदवी, सेवा-संख्या और शाखा। कोई भूमिका नहीं, सीधा परिचय।
2. तथ्यपरक और तिथि-सहित“14 दिसंबर 1971 को श्रीनगर हवाई पट्टी पर दुश्मन के छह सेबर एयरक्राफ्ट के एक दल द्वारा हमला किया गया था।” — तिथि, स्थान, संख्या — सब निश्चित।
3. संयत भाषा, अतिशयोक्ति नहीं“इस लड़ाई में यह हुआ कि उन्होंने एक एयरक्राफ्ट को मार गिराया तथा दूसरे को आग के हवाले कर दिया।” — जो हुआ, वही; कोई नारा नहीं।
4. विषमता का रेखांकन“इस बार एक के पीछे चार थे… हालाँकि बराबरी की टक्कर न होते हुए भी…” — वीरता तभी सिद्ध होती है जब यह दिखे कि परिस्थिति कितनी प्रतिकूल थी।
5. गरिमामय, औपचारिक शब्दावली‘रेडिनेस ड्यूटी’, ‘डिटैचमेंट’, ‘उत्तम साख को कायम रखे हुए थे’, ‘वीरगति को प्राप्त हो गए’ — सैनिक-प्रशासनिक शब्दावली।
6. दृश्य खींचने वाली एक पंक्ति“इस लड़ाई में जो कि एक वृक्ष जितनी ऊँचाई पर लड़ी जा रही थी…” — पूरे प्रशस्ति पत्र में यही एक चित्रात्मक वाक्य है, और वही सबसे अधिक याद रहता है।
7. निष्कर्ष-वाक्य“…अपने निहित कर्तव्यों से भी ऊपर उठकर देते हुए वायुसेना की परंपराओं को नई ऊँचाइयाँ दीं।” — अंत में यह बताया जाता है कि यह कार्य सामान्य कर्तव्य से किस प्रकार ऊपर था। यही पदक का आधार होता है।
नमूना उत्तर — प्रशस्ति पत्र

प्रशस्ति पत्र
श्रीमती कमला देवी, सफाई सहायिका, राजकीय उच्चतर माध्यमिक विद्यालय

श्रीमती कमला देवी विगत सत्रह वर्षों से इस विद्यालय में सेवारत हैं। वे प्रतिदिन प्रातः छह बजे विद्यालय पहुँचती हैं — विद्यार्थियों और शिक्षकों के आने से बहुत पहले — और चौदह कक्षाओं, दो प्रयोगशालाओं तथा पूरे प्रांगण को स्वच्छ करती हैं।

सन् 20×× की वर्षा में जब विद्यालय के प्रांगण में पानी भर गया था और अवकाश घोषित हो चुका था, तब भी वे स्वेच्छा से आईं और दो दिन तक कीचड़ हटाकर विद्यालय को समय पर खुलने योग्य बनाया। महामारी के दिनों में उन्होंने बिना अवकाश लिए कक्षाओं को संक्रमणमुक्त रखा।

वे किसी विद्यार्थी को कागज़ फेंकते देखती हैं तो डाँटती नहीं, केवल कहती हैं — “बेटा, यह भी तो तुम्हारा ही घर है।” यह एक वाक्य विद्यालय की स्वच्छता-नीति से अधिक प्रभावी सिद्ध हुआ है।

अपने निर्धारित कर्तव्यों से कहीं आगे बढ़कर की गई इस निष्ठापूर्ण सेवा के लिए विद्यालय परिवार उन्हें हार्दिक कृतज्ञता के साथ यह प्रशस्ति पत्र समर्पित करता है।

    — प्रधानाध्यापक एवं समस्त विद्यार्थी
    दिनांक — 5 सितंबर 20××
प्रशस्ति पत्र लिखने के तीन नियम: (1) प्रशंसा के विशेषण कम, कार्य के विवरण अधिक — ‘वे बहुत परिश्रमी हैं’ की जगह ‘वे प्रातः छह बजे पहुँचती हैं’ लिखिए। (2) कम-से-कम एक ऐसी घटना दीजिए जो उस व्यक्ति ने कर्तव्य से ऊपर उठकर की हो — यही प्रशस्ति का आधार है। (3) अंत में सम्मान का वाक्य, तिथि और हस्ताक्षर। भाषा गरिमामय रखिए, पर बनावटी नहीं।
क्या यह उपयोगी रहा? त्रुटि बताएँ