शारदा अध्याय 1 अभ्यासाद् जायते सिद्धिः

अद्यतन2026-09-06

प्र1.
संस्कृतं कस्याः साधकम् ?
उत्तर

उत्तरम् — भारतीयैकतायाः। (हिन्दी — भारतीयों की एकता का।)

पाठ की पंक्ति — भारतीयैकतासाधकं संस्कृतम्
विग्रह — भारतीयैकतायाः + साधकम्
प्रश्न ‘कस्याः’ = स्त्रीलिङ्ग · षष्ठी · एकवचन
अतः उत्तर भी उसी रूप में — भारतीयैकतायाः
नियम: ‘साधकम्’ जिसका साधक है, उसमें सम्बन्धे षष्ठी होती है। ‘एकता’ स्त्रीलिङ्ग आकारान्त शब्द है, इसलिए उसकी षष्ठी एकवचन ‘एकतायाः’ बनती है (जैसे लता → लतायाः)। ‘कस्याः’ स्वयं स्त्रीलिङ्ग षष्ठी है — प्रश्न का रूप ही उत्तर का रूप तय कर देता है।
सावधान: उत्तर ‘भारतीयैकता’ (प्रथमा) लिखना अशुद्ध होगा। एकपदेन उत्तर देते समय भी विभक्ति प्रश्न के अनुसार ही रखनी है।
प्र2.
सर्वदा संस्कृतं कस्य सन्दोहदम् ?
उत्तर

उत्तरम् — आनन्दस्य। (हिन्दी — आनन्द का।)

पाठ की पंक्ति — सर्वदानन्दसन्दोहदं संस्कृतम्
सन्धिविच्छेदः — सर्वदा + आनन्द + सन्दोहदम्
विग्रह — सर्वदा आनन्दस्य सन्दोहदम्
‘कस्य’ = पुंलिङ्ग/नपुंसकलिङ्ग · षष्ठी · एकवचन → आनन्दस्य
क्यों यही उत्तर: ‘सन्दोहः’ का अर्थ है समूह, और ‘सन्दोहदम्’ अर्थात् ‘समूह को देने वाली’। किसका समूह ? — आनन्द का। पुस्तक का भावार्थ भी यही कहता है — ‘सर्वदा आनन्दस्य परम्परामेव जनयति’। ‘सर्वदा’ अव्यय है, इसलिए वह प्रश्न में भी वैसा ही रहता है और उत्तर में नहीं आता।
प्र3.
संस्कृतं कस्य प्रेरणादायकम् ?
उत्तर

उत्तरम् — सत्पथस्य। (हिन्दी — सन्मार्ग का / सत्य के मार्ग का।)

पाठ की पंक्ति — सत्पथप्रेरणादायकं संस्कृतम्
विग्रह — सत्पथस्य प्रेरणादायकम्
‘सत्पथः’ — पुंलिङ्ग · अकारान्त → षष्ठी एकवचन सत्पथस्य
शब्द का अर्थ: पुस्तक की शब्दार्थ-तालिका ‘सत्पथः = सन्मार्गः’ देती है, अर्थात् अच्छाई का रास्ता। संस्कृत उस रास्ते पर चलने की प्रेरणा देती है — पुस्तक का भावार्थ २ इसे ‘सन्मार्गं दर्शयति’ कहकर दोहराता है।
जोड़कर देखिए: यही पद अभ्यास के प्रश्न ८ (मेलनम्) में भी आया है — ‘सत्पथे → प्रेरणादायकम्’। वहाँ सप्तमी (‘सत्पथे’ = सन्मार्ग पर) है, यहाँ षष्ठी। दोनों शुद्ध हैं, केवल दृष्टि बदलती है।
प्र4.
संस्कृतं कासां परिष्कारकम् ?
उत्तर

उत्तरम् — (सर्व)वाणीनाम्। (हिन्दी — सब वाणियों का / सबकी वाणी का।)

पाठ की पंक्ति — सर्ववाणीपरिष्कारकं संस्कृतम्
विग्रह — सर्ववाणीनां परिष्कारकम्
‘कासाम्’ = स्त्रीलिङ्ग · षष्ठी · बहुवचन
‘वाणी’ ईकारान्त स्त्रीलिङ्ग → षष्ठी बहुवचन वाणीनाम् (नदी → नदीनाम् इव)
यहाँ बहुवचन क्यों: प्रश्न में ‘कासाम्’ है, ‘कस्याः’ नहीं — अर्थात् उत्तर बहुवचन में चाहिए। पद में ‘सर्व’ जुड़ा है, इसलिए बात एक वाणी की नहीं, सब लोगों की वाणी की है। पुस्तक का भावार्थ भी बहुवचन में है — ‘वचनानि परिष्करोति’।
ध्यान दें: ‘परिष्कारकम्’ में ‘परि’ उपसर्ग + √कृ है; ‘परि’ के बाद ‘स्’ का ‘ष्’ हो जाता है — षत्व विधान (परि + स्कारक → परिष्कारक)। इसी नियम से ‘परिष्कार’, ‘परिष्कृत’ बनते हैं।
प्र5.
कस्य विस्तारकं संस्कृतम् ?
उत्तर

उत्तरम् — विश्वबन्धुत्वस्य। (हिन्दी — विश्वबन्धुत्व का / सारे संसार के भाईचारे का।)

पाठ की पंक्ति — विश्वबन्धुत्वविस्तारकं संस्कृतम्
विग्रह — विश्वबन्धुत्वस्य विस्तारकम्
‘बन्धुत्वम्’ नपुंसकलिङ्ग → षष्ठी एकवचन बन्धुत्वस्य
शब्द कैसे बना: बन्धु + त्व प्रत्यय = बन्धुत्वम् (भाव-वाचक, नपुंसकलिङ्ग) — ‘भाई होने का भाव’। इसी तरह भारतीय + त्व = भारतीयत्वम् (श्लोक १)। ‘-त्व’ लगते ही शब्द नपुंसकलिङ्ग हो जाता है, चाहे मूल शब्द किसी भी लिङ्ग का हो।
जोड़कर देखिए: प्रश्न ६ (ग) में इसी पद का विग्रह पूछा गया है और प्रश्न ८ (ङ) में इसी का मेलन — तीनों जगह उत्तर एक ही सूत्र से निकलता है : विश्वबन्धुत्वस्य विस्तारकम्
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