प्र1.
छात्राः मिलित्वा पृथक् पृथक् पञ्चानां छात्राणां लघुसमूहान् निर्माय यति-गति-लयपूर्वकं गीतगानस्य अभ्यासं करिष्यन्ति।
उत्तर
यह क्रियात्मक कार्य है — पाँच-पाँच विद्यार्थियों के छोटे समूह बनाकर पूरे गीत का सस्वर गान करना है। इसका उत्तर कॉपी में नहीं, कक्षा में गाकर दिया जाता है। नीचे वह विधि दी है जिससे गान शुद्ध और सुन्दर बने।
गान की विधि —
- समूह बनाइए: पाँच-पाँच के समूह; एक विद्यार्थी ‘सूत्रधार’ बने जो हर श्लोक की पहली पंक्ति आरम्भ करे, शेष चार साथ दोहराएँ।
- यतिः (विराम): प्रत्येक पंक्ति में समास के बाद और ‘संस्कृतम्’ से पहले एक छोटा विराम लीजिए — जैसे ‘भारतीयैकतासाधकं / संस्कृतम्’। यही यति है; इसी से लम्बा समास साँस में समा जाता है।
- गतिः (चाल): चारों पंक्तियों की चाल एक-सी रखिए। हर पंक्ति में मात्राएँ लगभग बराबर हैं, इसलिए एक पंक्ति में जितना समय लगे, अगली में भी उतना ही लगे।
- लयः (ताल): हर पंक्ति ‘संस्कृतम्’ पर समाप्त होती है — इसी आवर्तन को ताल बना लीजिए। ताली इसी शब्द पर पड़े, तो पूरा समूह एक साथ रहेगा।
- उच्चारण: संयुक्ताक्षरों को न निगलिए — ज्ञानपुञ्ज, सद्गुणग्राम, पञ्चशील, विश्वचेतश्चमत्कारकम्, भुक्तिमुक्तिद्वयोद्वेलनम्। ‘म्’ (हलन्त) को पूरा बोलिए, ‘म’ नहीं।
| श्लोकः | यति (विराम) कहाँ | भावानुसार स्वर |
|---|---|---|
| १ — भारतीयैकतासाधकं… | समास के बाद, ‘संस्कृतम्’ से पूर्व | गौरवपूर्ण, ऊँचा स्वर — एकता का उद्घोष |
| २ — सर्वमस्तिष्कसंस्कारकं… | ‘सर्व’ के बाद हल्का, फिर समासान्त पर | शान्त, समझाने वाला स्वर — संस्कार की बात |
| ३ — विश्वबन्धुत्वविस्तारकं… | ‘सर्वतः’ के बाद स्पष्ट विराम | विस्तृत, खुला स्वर — विश्व तक फैलता भाव |
| ४ — त्यागसन्तोषसेवाव्रतं… | ‘त्याग-सन्तोष-सेवा’ के तीनों खण्डों के बीच | दृढ़ स्वर — व्रत का संकल्प |
| ५ — धर्मकामार्थमोक्षप्रदं… | चारों पुरुषार्थों के बीच हल्का ठहराव | तीसरी पंक्ति में तीनों ‘-दं’ पर बल |
| ६ — शब्दलालित्यलीलावनं… | ‘पूर्वजानां / यशः / स्मारकम्’ — तीन खण्ड | कोमल, मधुर स्वर; अन्तिम पंक्ति धीमी और लम्बी |
अभ्यास की युक्ति: पहले पूरा गीत बिना लय के शुद्ध पढ़िए, फिर लय लगाइए। जो पहले शुद्ध नहीं पढ़ पाता, वह लय में और अशुद्ध हो जाता है। समूह में एक विद्यार्थी को ‘शुद्धता-निरीक्षक’ बनाइए जो केवल उच्चारण सुने।