प्र1.
अस्य गीतस्य रचयितुः परिचयं लिखत। तस्य काः कृतयः सुप्रसिद्धाः सन्ति ?
उत्तर
अस्य गीतस्य रचयिता वाराणस्यां विद्यमानस्य ‘सार्वभौमसंस्कृतप्रचारकार्यालयस्य’ संस्थापकः पण्डितः वासुदेव-शास्त्रि-द्विवेदिमहाभागः अस्ति। महाशयेन सरलसंस्कृतेन बहवः ग्रन्थाः विरचिताः, संस्कृतप्रचारार्थं विपुलं साहित्यं च प्रकाशितम्। ‘परमार्थसुधा’ इति संस्कृतपत्रिका अपि एतेन सम्पाद्यते स्म।
(हिन्दी — इस गीत के रचयिता वाराणसी में स्थित ‘सार्वभौम संस्कृत प्रचार कार्यालय’ के संस्थापक पण्डित वासुदेव-शास्त्री द्विवेदी जी हैं। उन्होंने सरल संस्कृत में अनेक ग्रन्थ लिखे और संस्कृत के प्रचार के लिए विपुल साहित्य प्रकाशित किया। ‘परमार्थसुधा’ नामक संस्कृत-पत्रिका का सम्पादन भी वे करते थे।)
| क्रमः | कृतिः / कार्यम् | स्वरूपम् |
|---|---|---|
| १ | सुरभारतीसन्देशः | संस्कृतभाषायाः सन्देशपरः ग्रन्थः |
| २ | स्वर्गीयसंस्कृतकविसम्मेलनम् | संस्कृतकवीनां सम्मेलन-रूपकम् |
| ३ | भोजराज्ये संस्कृतसाम्राज्यम् | राजा भोजस्य संस्कृत-प्रेमविषयकः ग्रन्थः |
| ४ | कौत्सस्य गुरुदक्षिणा | कौत्स-वरतन्तु-रघु-कथायाम् आधारितम् आख्यानम् |
| ५ | परमार्थसुधा | संस्कृतपत्रिका — एतेन सम्पाद्यते स्म |
| ६ | सार्वभौमसंस्कृतप्रचारकार्यालयः (वाराणसी) | संस्थापनम् — संस्कृतप्रचारस्य संस्था |
कवि का परिचय गीत को कैसे समझाता है: जिस व्यक्ति ने जीवन भर संस्कृत के प्रचार के लिए संस्था बनाई, पत्रिका निकाली और जान-बूझकर सरल संस्कृत में लिखा — वही यह गीत लिख सकता था। यही कारण है कि पूरे गीत में कठिन क्रियारूप नहीं हैं; बस एक-एक लम्बा समास और उसके बाद ‘संस्कृतम्’। ऐसा गीत गाया जा सकता है, याद रखा जा सकता है — और प्रचार के लिए यही चाहिए था।
ध्यान दें: ‘सम्पाद्यते स्म’ कर्मवाच्य का लङ्-अर्थ वाला प्रयोग है — वर्तमान क्रियारूप के साथ ‘स्म’ लगने पर अर्थ भूतकाल का हो जाता है (‘सम्पादित की जाती थी’)। यही नियम ‘पठति स्म’ = ‘पढ़ता था’ में भी लगता है।